‘मुझे बस यही समझ में आया कि मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है’ | Tehelka Hindi

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‘मुझे बस यही समझ में आया कि मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है’

हर कदम पर अपनी जातीय पहचान को लेकर कड़वे अनुभवों के चलते मुझे यह शिद्दत से महसूस होने लगा था कि मेरी और मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है, लेकिन समाज से मेरा सवाल है कि जातीय पहचान को लेकर मानवीय गरिमा को कब तक रौंदा जाता रहेगा?

अरुण प्रकाश 2016-02-15 , Issue 3 Volume 8

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बोकारो में पापा की पोस्ट ऑफिस में नौकरी से घर का गुजारा किसी तरह चल जाता था. उन दिनों काॅलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने का जिक्र करने पर माली हालत की वजह से पापा ने साफ मना कर दिया था. मैंने सुना था कि दिल्ली में लोग ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी पढ़ाई करते हैं. तब यही रास्ता सुझाकर मैंने दिल्ली में पढ़ाई करने के लिए पापा को मनाया था. हमारे समुदाय (दलित) के लिए नौकरियों में आरक्षण होता है, इस बारे में पता था लेकिन कॉलेज में भी ऐसा कोई नियम लागू है, न तो इस बारे में पता था और न ही कोई बताने वाला था.

बहरहाल, दो दोस्तों के साथ दिल्ली आ गया. उनके साथ एक ही दिन हुआ था कि उनका व्यवहार इस कदर बदला कि मैंने अगली रात रेलवे स्टेशन पर बिताने का फैसला किया. इसके लिए दिल्ली में ही रहने वाले एक और दोस्त को फोन किया और मदद मांगी. उसने बेझिझक मुझे अपने यहां आ जाने के लिए कहा जो खुद भी तीन दोस्तों के साथ रहता था. इसके बाद मैं एडमिशन की तैयारियों में लग गया. एक कॉलेज में फॉर्म भरते वक्त एक सज्जन ने जानकारी दी कि एससी/एसटी के लिए अलग फॉर्म होता है और अंक प्रतिशत में छूट भी मिलती है. फॉर्म भरते वक्त कुछ चीजें समझ में नहीं आ रही थीं तो कमरे पर आकर दोस्तों से मदद मांगी, लेकिन उस दिन उनका भी व्यवहार अजीब तरीके का था. फॉर्म न भर पाने के लिए उन्होंने काफी मजाक उड़ाया, जलील किया और अंत में कह ही दिया, ‘साला! तुम्हें एडमिशन फॉर्म भरना नहीं आता और चले हो कॉलेज पढ़ने! अब यही चूड़े-चमार ही तो रह गए हैं पढ़ने लिखने के लिए और अफसर बनने के लिए!’

एडमिशन के बाद भी मेरी पहचान की वजह से मेरा संघर्ष जारी रहा और दोस्तों द्वारा मुझ पर जाति आधारित टिप्पणियां जारी रहीं

उस वक्त लगा जैसे किसी ने उबलता हुआ पानी ऊपर डाल दिया है. आंसू रोकने की कोशिश में आंखें लाल हो गई थीं. अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव का व्यवहार पहले भी झेला था लेकिन इस तरह पहली बार हुआ था. लेकिन मैं क्या कर सकता था. सिर्फ उस वक्त वहां से खुद को हटा लिया और समझा लिया कि मुझे इस सबका सामना करते हुए ही अपनी पढ़ाई पूरी करनी है. मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय का रामजस कॉलेज अलॉट किया गया. अलॉटमेंट स्लिप लेकर कॉलेज पहुंचा लेकिन मुझसे कहा गया कि इस स्लिप पर एचओडी के हस्ताक्षर जरूरी हैं, लेकिन सारा कॉलेज छान मारने पर भी वे नहीं मिले. अगले कई रोज मैं कॉलेज आता और सारे दिन एचओडी को ढूंढता रहता. रात रेलवे स्टेशन पर गुजारता. जब एडमिशन के लिए मात्र एक दिन बचा था तो एचओडी के घर का पता निकालकर उनके घर पहुंच गया. वहां भी दिक्कतों से मेरा पीछा नहीं छूटा. उन्होंने मुझे घर तक चले आने के लिए काफी डांटा और अगले रोज कॉलेज में ही मिलने के लिए कहा. वे अगले रोज कॉलेज में मिले तो जरूर लेकिन सीट खत्म होने की बात कही. कई दिन तक धक्के खाने के बाद एचओडी का दो टूक जवाब सुनकर मेरे तो सारे सपने टूट गए पर मैंने हार नहीं मानी. घूम-घूम कर सबको  अपनी समस्या बताता रहा, तब मुझे किसी ने रजिस्ट्रार के पास भेज दिया. रजिस्ट्रार के हस्तक्षेप से आखिरकार रामजस काॅलेज में मुझे एडमिशन मिल गया.

एडमिशन के बाद भी मेरी पहचान की वजह से मेरा संघर्ष जारी रहा. कुछ दोस्तों के साथ रहना शुरू किया, लेकिन दोस्तों की ओर से कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से जाति आधारित टिप्पणियां जारी रहीं. आखिरकार फिर से उनका साथ छोड़ना पड़ा. सौभाग्य से मुझे ट्यूशन मिलनी शुरू हो गई और खर्चे की चिंता कम हो गई. हर कदम पर अपनी जातीय पहचान को लेकर कड़वे अनुभवों के चलते मैं काफी अंतर्मुखी हो गया था. क्लास के दूसरे साथियों की तरह मौज मस्ती करना अफोर्ड नहीं कर सकता था, इसलिए अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने का फैसला लिया. मुझे यह शिद्दत से महसूस होने लगा था कि मेरी और मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है, लेकिन समाज से मेरा सवाल है कि जातीय पहचान को लेकर मानवीय गरिमा को कब तक रौंदा जाता रहेगा?

(लेखक दिल्ली में रहते हैं और वकालत करते हैं)

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 3, Dated 15 February 2016)

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