चला गया समाजवादी आंदोलन का सिपाही | Tehelka Hindi

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चला गया समाजवादी आंदोलन का सिपाही

समाजवादी चिंतक, विचारक, लेखक प्रो. कृष्णनाथ शर्मा नहीं रहे. 70 के दशक के आरंभिक सालों में उन्होंने साफ-साफ कह दिया था कि भारत में शीघ्र ही राजनीति हाजीपुर के मेले का रूप लेने वाली है. गठबंधन सरकार का दौर आने वाला है. सभी अपनी-अपनी सीटों के साथ दुकान लगाएंगे और बेचेंगे. उस समय उनकी इस बात पर काफी हंगामा भी हुआ था, लेकिन बाद में भारत की राजनीति उसी रास्ते पर चली.

निराला September 22, 2015
Krishnanath  WEB

प्रो. कृष्णनाथ शर्मा (1 मई 1934 – सितंबर 2015)

छह सितंबर की बात है. बंगलुरु के पास स्थित हरिदवनम से एक खबर चली कि समाजवादी चिंतक, विचारक, लेखक प्रो. कृष्णनाथ शर्मा नहीं रहे. उन्हें जानने वाले बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक एक-दूसरे को फोन करते रहे. कुछ ने इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर भी टकटकी लगा ली कि शायद उनसे जुड़ी खबर मिल जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अगले दिन उम्मीद थी कि अखबारों में खबर आएगी, मगर एकाध अखबारों ने ही उन्हें तरजीह दी. प्रो. कृष्णनाथ कौन थे और उनके जाने से कैसी रिक्तता आई, यह कोई नहीं जान सका.

कृष्णनाथ की मृत्यु के तीन दिनों बाद ही शोर-शराबे के साथ भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन शुरू हुआ. उम्मीद की गई कि कम से कम वहां उन पर कुछ बात होगी. अधिकारियों, मंत्रियों, नेताओं वाले इस सम्मेलन में उन पर तब भी कोई चर्चा नहीं हुई. हिन्दी के साहित्यकारों के वर्चस्व वाला सम्मेलन भी होता तो उनसे कृष्णनाथ जैसे लोगों की याद करने की उम्मीद बेमानी थी. कहानी-कविता की आत्ममुग्ध दुनिया में छटपटाते हिन्दी साहित्य के लोग और एक-दूसरे की पीठ थपथपाकर आगे बढ़ने को आतुर हिन्दी साहित्य समाज में कृष्णनाथ जैसे लोगों को महत्व नहीं दिया जाता है, उनके साथ अनाथों जैसा व्यवहार किया जाता है.

बहरहाल हिन्दी वालों ने जो किया सो किया. आज चहुंओर समाजवादी राजनीति की होड़ मची है, उसमें कुछ लोगों को छोड़कर शायद ही किसी ने ये याद करने की कोशिश की कि समाजवादी राजनीति के लिए संभावनाओं के द्वार खोलने में प्रो. कृष्णनाथ जैसे लोगों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही थी. जबकि उन्होंने अपना व्यक्तित्व व कृतित्व समाजवादी राजनीति और हिन्दी साहित्य में खपा दिया था. अब तक प्रो. कृष्णनाथ से कुल चार मुलाकातें हुई थीं. पहली मुलाकात कोई पांच साल पहले बनारस के सारनाथ स्थित उनके आवास पर हुई थी. सारनाथ में उनका आवास तिब्बती विश्वविद्यालय के पास नवापुरा गांव में है. दिन के करीब 11 बजे झक्क सफेद लुंगी, सफेद बनियान और माथे पर सफेद साफा बांधे एक कुर्सी पर बैठकर वह किताबों की दुनिया में खोए हुए थे. तकरीबन चार घंटे तक बातचीत हुई.

इस बतकही में एक सुखद आश्चर्य ये था कि गलती से भी उनकी जुबान से ऐसा कोई वाक्य नहीं निकला, जिसमें अंग्रेजी का कोई शब्द हो. यह साधना की ही बात थी. प्रो. कृष्णनाथ अंग्रेजी समेत कई भाषाओं के प्रखर जानकार और दुनिया भर की यात्रा कर चुके थे.

साठ के दशक में अंग्रेजी में ही उन्होंने ‘द इंपैक्ट ऑफ फॉरेन एड ऑन इंडियन कल्चर’ विषय पर काम किया था. इसके जरिये उन्होंने काफी पहले भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरे को चिह्नित किया था. वे कहते थे कि भारतीय जीवन, संस्कृति और सरोकारों के क्षेत्र में विदेशी पूंजी के आने से क्या होने वाला है. आज जिस विषय पर देशभर में बातें हो रही हैं, ये बातें 60 के दशक में ही प्रो. कृष्णनाथ ने की थी. 70 के दशक के आरंभिक सालों में शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में एक सेमिनार के दौरान उन्होंने साफ-साफ कह दिया था कि भारत में शीघ्र ही राजनीति हाजीपुर के मेले का रूप लेने वाली है. गठबंधन सरकार का दौर आने वाला है. सभी अपनी-अपनी सीटों के साथ दुकान लगाएंगे और बेचेंगे. उस समय उनकी इस बात पर काफी हंगामा भी हुआ था, लेकिन बाद में भारत की राजनीति उसी रास्ते पर चली.

यह सब प्रो. कृष्णनाथ तब कह रहे थे, जब वे काशी विद्यापीठ में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक हुआ करते थे और उनकी गिनती तेज-तर्रार अर्थशास्त्रियों में होती थी. वर्ष 1934 में काशी विद्यापीठ में ही उनका जन्म हुआ था. एक ऐसे परिवार में, जिस परिवार से नेहरू-गांधी से लेकर आचार्य नरेंद्र देव के पारिवारिक और घनिष्ठ संबंध थे. बाद में उनका घर लोहिया से लेकर अच्युत पटवर्धन तक का भी डेरा बना. आचार्य नरेंद्र देव के प्रभाव में आकर कृष्णनाथ मात्र 16 साल की उम्र में समाजवादी आंदोलन से जुड़े और हर दिन नई राह खोजते रहे.

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