नाम का इकबाल

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filesराजस्थान के एक छोटे-से कस्बे फलोदी में इकबाल नाम के एक आदमी को बैंक खाता खुलवाने के लिए अपना नाम बदलना पड़ा. बैंक वालों का आग्रह था कि सिर्फ इकबाल नहीं चलेगा, आगे मोहम्मद या पीछे खान होना जरूरी है. इकबाल ने स्कूल का प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र सब कुछ दिखाया, लेकिन बैंक के किसी दिशा-निर्देश के आगे कुछ काम न आया. अंततः वे इकबाल खान हो गए.

यह किस्सा पढ़ते हुए ख्याल आया कि मुझे भी इंटरनेट साइटों पर रजिस्ट्रेशन कराते हुए कई बार एक और नाम खोजना-जोड़ना पड़ता है. फेसबुक पर ही मैं प्रियदर्शन नहीं, प्रिय दर्शन हूं, जो अंग्रेजी हिज्जे की गफलत और कुछ नादानों की खुशफहमी की वजह से कभी-कभी प्रिया दर्शन मान लिया जाता है.

लेकिन मेरा मामला इंटरनेट की बेचेहरा दुनिया में एक ऐसा यांत्रिक फॉर्म भरने से जुड़ा है जिसके साथ मासूम-सा लगने वाला यह सामाजिक पूर्वग्रह नत्थी है कि नाम है तो कोई उपनाम भी होगा. इकबाल का मामला सार्वजनिक दुनिया के ऐसे कारोबार का है जिसमें आमने-सामने होने, अपनी बात रखने और अपने मूल नाम को बचाए रखने की काफी गुंजाइश है. इस गुंजाइश के सिमटने की एक बड़ी वजह यह समझ में आती है कि आम तौर पर सरकारी कर्मचारी कायदे-कानूनों के नाम पर लिखे हुए शब्दों की परवाह करते हैं, उसके पीछे की जरूरत या सोच पर नहीं. लेकिन क्या इसकी और भी वजहें हो सकती हैं? बहुत हल्का-सा यह संदेह और सवाल सिर उठाता है कि कहीं इकबाल की मुश्किल का वास्ता उसकी धार्मिक पहचान से भी तो नहीं है. क्या वह हिंदू होता और इकबाल की जगह प्रेमचंद होता तो भी उसका फॉर्म खारिज हो जाता? या मेरा यह संदेह हर मामले में एक सांप्रदायिक कोण खोज निकालने के एक दूसरे पूर्वग्रह का नतीजा है?

समस्या बहुत छोटी-सी है लेकिन जटिल है. इसे छोड़कर आगे बढ़ सकते हैं, ज्यादा बड़े सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में लग सकते हैं. लेकिन जैसे वीरेन डंगवाल की एक कविता के मुताबिक तलवे में चावल का दाना लग जाए तो उसकी चिपचिपाहट ध्यान खींचती रहती है और तब तक बड़ी समस्याएं स्थगित हो जाती हैं, कुछ उसी तरह पहचान का यह पका-अधपका चावल मेरे तलवे में लग गया है. शायद इसलिए भी कि कहीं यह एहसास है कि नाम और पहचान की इस शिनाख्त के पीछे यांत्रिकता हो, सांप्रदायिकता हो, अनमनापन हो, पूर्वग्रह हो, जो कुछ भी हो, लेकिन कुछ ऐसा भी है जो मानवीय नहीं है- या कम से कम मानवीय रिश्तों के प्रति उदार नहीं है. वह चीज क्या है?  इस सवाल के जवाब में एक दूसरी खबर मेरे सामने खड़ी हो जाती है. यह बताती है कि मुंबई हवाई अड्डे पर 37 साल की एक महिला को जांच के लिए अपने कृत्रिम पांव हटाने पड़े. यह उसके लिए बहुत अपमानजनक था- अपने अपाहिजपन से लड़ने की उसकी कोशिश के विरुद्ध व्यवस्था के एक हंटर जैसा.

[box]नाम और पहचान की इस शिनाख्त के पीछे यांत्रिकता हो, सांप्रदायिकता हो, जो कुछ भी हो, लेकिन कुछ ऐसा भी है जो मानवीय नहीं है[/box]

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