अगर मैं नक्सली हूं तो मुझे जेल में डालना चाहिए या फिर मेरा निष्कासन होना चाहिए?

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खबरों के मुताबिक, उन्होंने निर्भया कांड पर बनी ​डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘इंडियाज डॉटर’ के विश्वविद्यालय में प्रदर्शन को लेकर मुहिम चलाई थी. वे लगातार धरना-प्रदर्शनों और सामाजिक गतिविधियों में शामिल रहते थे. इसे लेकर कुछ छात्रों ने प्रबंधन से उनकी शिकायत की थी और उन पर नक्सली गतिविधियों को बढ़ावा देने व परिसर में राजनीति गतिविधियां चलाने का भी आरोप लगाया गया है.

संदीप पांडेय ने ‘तहलका’ से कहा, ‘मैं आपसे पूछता हूं कि अगर मैं नक्सली या देशविरोधी हूं, तो केस दर्ज कर मुझे जेल में डालना चाहिए या फिर मेरा निष्कासन होना चाहिए? विश्वविद्यालय में पिछले कई महीने से मुझे लेकर गुटबाजी चल रही थी, लेकिन इसे लेकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर को कोई आपत्ति नहीं थी. दरअसल, यह एक वैचारिक लड़ाई है. हम संघ की विचारधारा के विरुद्ध हैं, इसीलिए ये लोग हम से परेशान हैं.’

उन्होंने बताया, ‘वाइस चांसलर गिरीश त्रिपाठी, डीन धनंजय पांडेय और एक सज्जन, ये तीनों ही आरएसएस से संबंध रखते हैं. इन्होंने बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में मुझे निष्काषित करने के लिए दबाव बनाया. जब मेरा कॉट्रैक्ट रिन्यू हो रहा था, तब डीन धनंजय पांडेय ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर राजीव संगल से कहा था कि जिसे जेल में होना चाहिए, वे यहां विश्वविद्यालय में हैं. जब धनंजय पांडेय ने मेरी नियुक्ति नहीं की, तो डायरेक्टर ने हायर अथॉरिटी के रूप में खुद मेरी नियुक्ति की. अभी कुछ समय पहले मुझे एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में हिस्सा लेने के लिए ऑस्ट्रिया बुलाया गया तब मेरी वीजा फीस रोक दी गई और इसे रोकने का तर्क ये दिया गया कि मेरी नियुक्ति अवैध है. दरअसल, यह सब आरएसएस का काम है.’

इस बारे में वाइस चांसलर गिरीश त्रिपाठी का कहना है, ‘इस मामले में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है, न इससे आरएसएस का कोई लेना-देना है. संदीप पर जो कथित आरोप थे, उसके मद्देनजर बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने यह फैसला लिया है. मैं इसका चेयरमैन जरूर हूं, लेकिन ये मेरा नहीं बोर्ड का फैसला है.’

आजकल किसी का नक्सली कह देना आम बात है : अरुंधति

संदीप पांडेय की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति ने बताया, ‘संदीप पर नक्सली होने और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया है. उन्होंने निर्भया पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाने के लिए अभियान चलाया था, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन के मना करने पर फिल्म दिखाई नहीं गई, अगर दिखाते भी तो उसमें कुछ गलत नहीं है. पर आजकल किसी को भी नक्सली कह देना आम बात हो गई है. जबसे संदीप की नियुक्ति हुई है तभी से आरएसएस के लोग उनके पीछे पड़े थे. उनकी नियुक्ति का भी विरोध किया गया था. उनके कॉन्ट्रैक्ट ​रिन्यूअल के समय भी मंत्रालय की तरफ से इसे रोकने की कोशिश हुई थी जबकि उनके अकादमिक रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ नहीं थी. डायरेक्टर ने भी यह माना है. दरअसल वाइस चांसलर आरएसएस के हैं. आरएसएस के लोगों ने ही आपत्ति उठाई थी. उन्हें हम जैसे लोग पसंद नहीं हैं. जिन मुद्दों पर हम लड़ते हैं, उन पर उन्हें आपत्ति है.’