फिर मंडल की हांडी

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राजनीतिक जानकार बताते हैं कि घोर मंडलवादी राजनीति की सिफारिश करके भी लालू प्रसाद अपनों से ही घिरते जा रहे हैं. दूसरी ओर मौन साधकर नीतीश कुमार भी उसी चक्र में फंसते जा रहे हैं. लालू के इस नये पैंतरे से दोनों के बीच संबंध बनने के जो आसार बने हैं, उसमें भी अगर-मगर लगने की संभावनाएं बढ़ गई हैं. राजनीतिक जानकार बताते हैं कि जाति की राजनीति करने के बावजूद नीतीश कुमार खुलकर अब इस तरह जाति की राजनीति करने सामने नहीं आएंगे. तब सवाल यह उठता है कि आखिर दोनों करेंगे क्या. नीतीश कुमार क्या करेंगे ? क्या लालू प्रसाद की इस कवायद का खंडन करेंगे या मौन साधकर साथ हो जाएंगे. मणी कहते हैं, ‘दोनों के पास कोई विकल्प नहीं है. मजबूरी में साथ हो रहे हैं. लेकिन बहुत संभावनाएं अब नहीं दिखती क्योंकि मंडलवादी राजनीति का नया चेहरा अब भाजपा है जिसका नेता, जो अब पीएम बन चुका है,  पिछड़े समूह का है. वह आर्थिक रूप से भी पिछड़ी श्रेणी का है. चाय बेचनेवाला है और भाजपा की ओर से पीएम बन चुका है.’

बातचीत के आखिर में मणी एक और सवाल उठाते हैं. कहते हैं, ‘बिहार में मगध विश्वविद्यालय सबसे बड़े दायरेवाला विश्वविद्यालय है. उसका नाम कुशवाहा जाति से आनेवाले और बिहार आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले दिग्गज नेता जगदेव प्रसाद के नाम पर करने की मांग वर्षों से होती रही. लेकिन अभी कुछ दिनों पहले उस विश्वविद्यालय का नामकरण बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नाम पर करने की घोषणा कर दी गई. मगध में या पिछड़ों की राजनीति में या फिर शिक्षा के क्षेत्र में क्या सत्येंद्र नारायण सिन्हा की भूमिका जगदेव प्रसाद से ज्यादा थी? फिर क्यों लालू प्रसाद या नीतीश कुमार ने नहीं कहा कि जगदेव प्रसाद के नाम पर ही विश्वविद्यालय का नाम होगा. वीपी सिंह के नाम पर ही रखा जाता तो भी एक बात होती. वीपी सिंह का इतना हक तो बिहार पर बनता ही है और मंडल की राजनीति को आगे बढ़ानेवालों से इतनी उम्मीद भी की ही जाती है. वे पहचान के तौर पर ही सही, वीपी सिंह का सम्मान करें. मणी कहते हैं, ‘मंडल या आरक्षण अब बूढ़ी गाय हो चुकी है, इसका दोहन अब बात बनाकर उस तरह से नहीं किया जा सकता.’

लालू प्रसाद के संगी-साथी या राजनीतिक विश्लेषक जो सवाल उठा रहे हैं, वह हवाबाजी जैसी बात भी नहीं. लालू के एक सहयोगी कहते हैं, ‘उन्होंने इस चुनाव में देख लिया कि उनके तीन दिग्गज राजपूत नेता जगदानंद सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह और प्रभुनाथ सिंह हार गए. सवर्णों की एक ही जाति पर लालू प्रसाद को ज्यादा भरोसा था. वे मानकर चल रहे थे कि राजपूत पहले की तरह उनका साथ देंगे. लेकिन इस बार उलटा हुआ. जहां-जहां राजपूत उम्मीदवार थे वहां यादवों ने तो राजद के नाम पर राजपूत उम्मीदवारों का साथ दिया, लेकिन राजपूतों ने राजद के नाम पर गैर राजपूत राजद उम्मीदवारों का साथ नहीं दिया.’ जानकारों की मानें तो लालू प्रसाद को लग रहा है कि अब सवर्णों के किसी खेमे से मोह रखने से कुछ हासिल नहीं होनेवाला इसलिए एक बार पिछड़ी राजनीति पर बाजी लगाई जाए. शायद कुछ हासिल किया जा सके. इसीलिए लालू प्रसाद ककहरा रट रहे हैं और कह रहे हैं कि राजद, जदयू और कांग्रेस को मिलाकर 45 प्रतिशत मत मिले हैं, तीनों साथ होते या आगे होंगे तो भाजपा की हवा निकल जाती या निकल जाएगी.

साफ है कि लालू दो और दो चार का हिसाब लगा रहे हैं. उनके और नीतीश, दोनों के ही साथ रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘राजनीति में दो और दो चार कभी-कभी सिर्फ संयोग से ही होता है. लालू प्रसाद अब यदि सिर्फ जाति की राजनीति और मंडल के जरिये नैया पार लगाना चाहते हैं और नीतीश उस पर सवार होना चाहते हैं तो सिवाय घाटे के कुछ नहीं होनेवाला.’ तिवारी आगे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में तमाम कोशिशों के बाद यादवों तक का वोट लालू प्रसाद अपने पक्ष में नहीं रख सके तो दूसरों को क्या समेट पाएंगे? पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों का वोट भाजपा के साथ गया है. उससे लड़ने के लिए 1990 का फॉर्मूला नहीं आजमाया जा सकता. वह एक समय की बात थी. अब बहुत पानी बह चुका है. मंडल का राग गाकर या ठेके में आरक्षण की बात भर करने से पिछड़ी जाति के युवा आकर्षित नहीं होनेवाले. उन्हें रोजगार चाहिए, अच्छी पढ़ाई चाहिए, सारी सुविधाएं चाहिए. ठेका सार्वजनिक तौर पर आर्थिक सशक्तिकरण नहीं करता. इसका दायरा सीमित होता है.’ तिवारी जो कहते हैं उसका विस्तार प्रेम कुमार मणी भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘लालू प्रसाद को कुछ भी कहने से पहले आंकड़ों को विस्तार से देखना चाहिए. बीते लोकसभा चुनाव में अतिपिछड़ों के मतों में भाजपा ने जबर्दस्त सेंधमारी की है. अतिपिछड़ों का 42 प्रतिशत वोट भाजपा को गया है, 26 प्रतिशत जदयू को और महज नौ प्रतिशत राजद को. ऐसा क्यों हुआ, इस पर सोचना चाहिए.’

मंडलवादी राजनीति का दौर लौटाने की लालू की इस बात पर जितने लोगों से बात होती है, उनमें ज्यादातर यही कहते हैं कि सबकुछ आजमा कर थक चुके लालू प्रसाद एक बार चित या पट की राजनीति करना चाहते हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘वक्त बहुत आगे निकल चुका है. इसे न तो लालू समझ रहे हैं, न नीतीश. लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी आजकल सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता को ही मूल मसला बनाने की राह पर दिखते हैं, लेकिन अब इतने से युवा पीढ़ी साथ नहीं आनेवाली. विकास एक अहम एजेंडा होगा. इसके इर्द-गिर्द ही सबको रखना होगा.’ अर्थशास्त्री टीएन झा कहते हैं, ‘बिहार में मंडलवादी ताकतों के एकजुट होने, सामाजिक न्याय की धारा को और गति देने की जरूरत है. लेकिन इसके रास्ते क्या होंगे इस पर सोचना होगा. मंडल की राजनीति से एक और सामंती वर्ग का उदय भर न हो, इसका ध्यान रखना होगा. ‘

सवाल सबके सही होते हैं, विश्लेषण भी सबके सही लगते हैं. लेकिन अहम सवाल यह है कि लालू तो अपनी चाल चल चुके हैं. इस चाल से उन्हें क्या फायदा होगा, क्या नुकसान, यह खुद लालू या उनके दल के नेता भी नहीं जानते. हां, इतना तय है कि यह बयान देकर वे भाजपा को मुख्य पार्टी के तौर पर मजबूत करने की एक कोशिश कर रहे हैं. एक ओर भाजपा, दूसरी तरफ लालू या नीतीश या फिर दोनों. माना जा रहा है कि अगली लड़ाई का स्वरूप ऐसा ही होगा. जिस तरह से लोकसभा चुनाव में मुकाबला भाजपा बनाम लालू के बीच रहा, उसी तरह लालू प्रसाद यादव विधानसभा चुनाव में भी भाजपा बनाम लालू के बीच ही मुकाबला रखना चाहते हैं. नीतीश या तो लालू प्रसाद के साथ आएं या फिर अन्य की श्रेणी में रहें.

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  1. बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, जिन्हें प्यार से लोग उन्हें छोटे साहब कहते थे ने छठे और सातवें दशक में बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभायी। सत्येन्द्र बाबू 1961 में बिहार के शिक्षा मंत्री बने जो उप मुख्यमंत्री के हैसियत में थे,शिक्षा मंत्री के रूप में शैक्षणिक सुधार किया, साथ ही मगध विश्वविद्यालय की स्थापना की।पने छह दशक के राजनीतिक जीवन में छोटे साहब के प्रोत्साहन पर आपातकाल आन्दोलन से नितीश कुमार,नरेन्द्र सिंह,रामजतन सिन्हा,लालू प्रसाद यादव,रघुवंश प्रसाद सिंह,सुशिल कुमार मोदी,रामविलास पासवान और सुबोधकान्तसहाय सरीखें तात्कालीन युवा नेता निकले|

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