‘नक्सलवाद’ की खूंटी

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यह तो दो नेताओं की बयानबाजी की एक बात हुई. खूंटी जिले में फैली अशांति की दूसरी कहानी भी है जो बताती  है कि राजनीति और जंगल माफियाओं ने ही मिलकर इस इलाके को जानबूझकर इतना अशांत किया ताकि उनका खेल आसानी से चलता रहे. अभी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में यहां से झारखंड पार्टी के एक उम्मीदवार एनोस एक्का भी थे. आम आदमी पार्टी से दयामनी बरला भी चुनाव मैदान में थीं. बरला समर्थकों को एनोस एक्का के लोगों द्वारा खूब परेशान करने की खबरें आईं. आप समर्थकों पर हमले भी हुए. एनोस के बारे में यह कहा जाता है कि चुनावी मैदान में उनकी ताकत की वजह सिर्फ यही थी कि उनके साथ पीएलएफआई ने समझौता किया था और इसके एवज में उनसे मोटी रकम ली थी. गिरफ्तार जेठा कच्छप भी पुलिस के सामने इकबालिया बयान में यह कह चुका है कि एनोस को समर्थन देने का फैसला दिनेश गोप ने लिया था और इसके लिए विशेष निर्देश भी जारी हुए थे. विधायक और ग्रामीण विकास मंत्री रह चुके एनोस पर अपराधियों को संरक्षण देने के िलए मुकदमा दर्ज हुआ. फिलहाल वे फरार हैं. हाल ही में आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में 100 करोड़ रु से भी अधिक कीमत की बताई जाने वाली उनकी कई संपत्तियां कुर्क हुई हैं.

एनोस-दिनेश के गठजोड़ का खुलासा इस चुनाव के बाद हुआ. लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ है. दरअसल खूंटी में राजनीति के पहले माफियाओं ने पीएलएफआई जैसे संगठनों को आगे बढ़ाया ताकि उन्हें जंगल काटने या लड़कियों की तस्करी करने में ज्यादा परेशानी न हो. दयामनी बरला कहती हैं, ‘हमें कुछ नहीं कहना लेकिन यह सोचना होगा कि आखिर क्यों सबसे साहसी, पराक्रमी और सकारात्मक नजीर पेश करनेवाला जिला आज इस खतरनाक मुहाने पर पहुंच चुका है.’

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कुंदन पाहन, खूंटी के खुंखार चेहरों में से एक हैं. इलेस्ट्रेशन: एम दिनेश

दयामनी ज्यादा नहीं बोलतीं. वे जानती हैं कि आदिवासियों की सबसे ज्यादा बसावट वाले इस इलाके में अब बोलना भी उतना ही खतरनाक है, जितना चलना. जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ, कभी इसी खूंटी से यह मुहावरा  निकला था कि झारखंड में बोलना ही संगीत होता है और चलना ही नृत्य.

खैर! खूंटी के इलाके में हम आगे बढ़ते जाते हैं. शाम ढलते-ढलते यह साफ होता जाता है कि कैसे पीएलएफआई जैसा एक संगठन दिन-ब-दिन तेज रफ्तार से अपने दायरे का विस्तार करके खूंटी के अलावा गुमला, सिमडेगा और रांची शहर तक पहुंच जाता है और फिर अपने संगठन को फ्रेंचाइजी पर देकर झारखंड से सटे उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले में और छत्तीसगढ़ के जशपरु जिले तक में फैल जाता है. राजनीति की शह पर पीएलएफआई बढ़ा है, यह भी साफ हो जाता है और जंगल माफियाओं ने इसे खड़ा किया और पुलिस परोक्ष तौर पर इसका सहयोग करती रही है, यह भी. इससे जुड़े कई किस्से सुनने को मिलते हैं जो कोरे नहीं होते.

जैसे खूंटी से आगे बढ़ने पर तिलेश्वर साहू का किस्सा सुनने को मिलता है. साहू झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष हुआ करते थे. कुछ माह पहले उनकी हत्या हो गई. बताया जाता है कि साहू ही थे जो एनोस एक्का को राजनीति में लाए थे. माओवादियों से परेशानी न हो और साहू से भी ज्यादा परेशानी न हो, इसलिए एनोस साहू जाति का विरोध करनेवाले दिनेश गोप के करीब हो गए और फिर पैसे से सहयोग करके पीएलएफआई को आगे बढ़ाने में लगे रहे.

सवाल उठता है कि आखिर कितना पैसा है पीएलएफआई के पास कि महज सात साल में यह किसी बड़ी घटना को अंजाम दिए या पुलिस से मुठभेड़ किए बगैर इतना फैल गया है और दहशत का पर्याय बनने के साथ ही इलाके के नौजवानों को अपने से जोड़ने में सफल भी रहा है. झारखंड पुलिस के पूर्व प्रवक्ता रहे एसएन प्रधान कहते हैं कि सिर्फ लेवी से ही पीएलएफआई की सालाना इनकम करीब 150 करोड़ रुपये है. प्रधान सिर्फ डेढ़ अरब रुपये सालाना की बात बताते हैं, लेकिन एक दूसरे पुलिस अधिकारी बताते हैं कि यह तो अकेले पीएलएफआई प्रमुख दिनेश गोप की कमाई है.

हम पीएलएफआई द्वारा लेवी वसूली का तरीका समझने की कोशिश करते हैं. मालूम होता है कि सरकारी कामों में लेवी लेने के साथ ही पीएलएफआई से खुद को जुड़ा बताने वाले लोग नौकरीपेशा जमात से भी हर माह लेवी वसूलते हैं. पेंशनधारियों से भी  नियमित लेवी ली जाती है. इसके अलावा जिले के जंगल को कटवाने में भूमिका निभाकर वे जंगल के ठेकेदारों से भी मोटी कमाई करते हैं.

सिर्फ लेवी से ही पीएलएफआई की सालाना इनकम करीब 150 करोड़ रुपए है. कुछ यहां तक कहते हैं कि यह तो अकेले दिनेश गोप की कमाई का आंकड़ा है

खूंटी में घूमते हुए हमें दिनेश गोप के बारे में दूसरी बातें भी सुनने को मिलती हैं. कहा जाता है कि वह भविष्य में राजनीति के अखाड़े में उतरने के लिए अभी से ही बड़े स्तर पर तैयारी भी कर रहा है. लोगों का उस पर विश्वास जमा रहे इसके लिए वह इलाके में विद्या विहार नाम से कई स्कूल भी चलाता है. कुछ लोग बताते हैं कि पीएलएफआई को लोगों से मान्यता मिले, इसके लिए भी दिखाने का यह काम होता है. हालांकि इस स्कूल में काम करनेवाले शिक्षक साफ मना करते हैं कि पीएलएफआई से उनका कोई लेना-देना है, लेकिन सब जानते हैं. पीएलएफआई का जोनल कमांडर जेठा कच्छप भी पुलिस से इकबालिया बयान में कह चुका है  कि ये स्कूल पीएलएफआई के सहयोग और संरक्षण में चलते हैं.

पीएलएफआई का स्कूल देखने हम इलाके के अंदरूनी हिस्से में जाते हैं. रनिया के कोटांगेर-गरई के पहाड़ी इलाके में बड़े परिसर में फैला स्कूल परिसर रांची के स्कूलों के कैंपस को झुठलाता है. वैसे आज स्कूल बंद है. मालूम होता है कि स्कूल में पढ़ाई के लिये नाममात्र की रकम ली जा रही है, मात्र 700 रुपये प्रति माह. इसी रकम में रहने, खाने और पढ़ने का कॉम्बो पैक ग्रामीण क्षेत्र की जनता के लिये किसी वरदान से कम नहीं. अनाथ बच्चों के लिए स्कूल में फ्री सेवा भी है. खेल का बड़ा मैदान भी दिखता है. घुड़सवारी होती है, यह भी पता चलता है. ऐसे दर्जन भर स्कूलों के बारे में जानकारी दी जाती है जिन्हें सुदूर इलाकों में चलाया जाता है. ग्रामीणों की इस स्कूल से सहानुभूति दिखती है. हम स्कूल देखने जाते हैं तो हम स्कूल के बारे में जितना पूछते हैं उससे ज्यादा कुछ नौजवान हमसे हमारे बारे में ही पूछते हैं. एक-एक सवाल कि आप कौन हैं, कहां से आए हैं, क्यों आए हैं, कहां जाएंगे, किसने बताया है स्कूल के बारे में आदि-आदि. हम उन नौजवानों से नहीं पूछते कि स्कूल का इतना बखान कर रहे हो और पीएलएफआई को महान संगठन बता रहे हो तो आखिर क्यों इसी संगठन ने इसी जुलाई में 400 सरकारी स्कूलों को बंद करवाकर 40 हजार बच्चों की पढ़ाई रुकवा दी थी. पढ़ाई तो उनके लिए भी जरूरी है, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. यह सवाल करने के अपने खतरे हैं सो हम सवाल को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं. स्कूल से आगे बढ़ने पर ही हमें यह जानकारी भी दी जाती है कि पीएलएफआई मजदूर संगठन नाम से एक एनजीओ भी चलाता है.

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पीएलएफआई सुदूर इलाकों में ऐसे दर्जन भर स्कूल चला रहा है जिनमें बहुत कम फीस में बच्चों के लिए सारी सुविधाएं. दिनेश गोप इन स्कूलों के जरिये छवि सुधारना चाहता है ताकि वह राजनीति में दांव आजमा सके. फोटो: सुशील सिंह

स्कूल देख हम लौटने को होते हैं तो अड़की में राजबीर से मुलाकात होती है. अड़की की पहचान खूंटी में भी सबसे खतरनाक इलाके की है. बीती जुलाई में यहीं पुलिस ने मुठभेड़ के बाद भाकपा माओवादी के सबजोनल कमांडर तुलसी दास उर्फ विशालजी को मार गिराया था. तुलसी पर दो लाख रुपये का इनाम था. राजबीर हमारा सवाल सुनने से पहले अपना सवाल पूछते हैं. कहते हैं, ‘आपने कभी गौर किया है कि हालिया वर्षों में इसी खूंटी से होकर रांची से सारंडा जानेवाले और अपराध-माओवादी मुक्त करनेवाले नेताओं की फौज आती-जाती रही है. लेकिन इस बीच खूंटी की ओर ध्यान किसी ने नहीं दिया, ऐसा क्यों?’ जवाब भी वे खुद देते हैं, ‘इससे भी समझ सकते हैं कि सरकारों की ज्यादा रुचि इलाके को अपराध मुक्त बनाने या आमलोगों के बीच शांति बहाली की बजाय कहीं और होती है. चूंकि सारंडा में कॉरपोरेट के लिए रास्ता खोलना था इसलिए वहां ऑपरेशन सारंडा बचाओ चला, लेकिन खूंटी निर्धनतम जिला है और यहां सबसे ज्यादा गरीब आदिवासी रहते हैं इसलिए यहां अभियान नहीं चलता. यहां जंगल एक संपत्ति थी जिसका नाश कर दिया गया है तो भला इस जिले के नागरिकों को बचाने के लिए विशेष अभियान क्यों कर चलता. दिल्ली तक से लोग क्यों बड़ी-बड़ी बातें इस जिले के लिए करते.’ राजबीर आगे बताते हैं, ‘खूंटी को सिर्फ खूंटी के हिसाब से नहीं देखिए. अब यह ऐसा जिला बन गया है, जो आसपास के कई जिलों में माओवादी और आपराधिक घटनाओं की नब्ज तय करता है. खूंटी में माओवादियों का प्रभाव कम हुआ है तो वे पास के जिलों में आतंक मचा रहे हैं. माओवादी जानते हैं  कि वे चतरा और पलामू में टीपीसी से घिर चुके हैं और खूंटी-रांची सिमडेगा-गुमला आदि में पीएलएफआई का वर्चस्व बढ़ गया है, इसलिए वे बीच में पड़नेवाले लोहरदगा आदि जिले में अपने को मजबूत करने में लगे हुए हैं.’ उनकी बात जारी रहती है, ‘आपने सुना होगा कि अभी हाल में नवसशस्त्र पीपुल्स मोर्चा नाम से एक नए संगठन का जन्म हुआ है जो ग्रामीणों से जबरिया बच्चे मांग रहा था और नहीं देने पर ग्रामीणों की पिटाई भी कर रहा था. 40 बच्चों को गांव से उठा ले जाने की सूचना भी आई थी.’

‘अपने-अपने इलाके में एक संगठन बनाओ. जाति, अपराध, राजनीति का थोड़ा घालमेल करो. फिर क्रांति की बयार बहाने के बहाने तमाम कुकृत्य करते रहो’

राजबीर की बात हम ध्यान से सुनते हैं. वे गंभीर विश्लेषक की तरह आगे कहते हैं, ‘रांची शहर में अब पीएलएफआई मुठभेड़ करता है, पुलिस कुछ नहीं करती. पुलिस कुछ करेगी भी नहीं इनका. जो हो रहा है या अभी अभियान के नाम पर हुआ, वह दिखावे के लिए हुआ.’ वे आगे बताते हैं, ‘पीएलएफआई से सिर्फ एक पीएलएफआई के होने का खतरा नहीं है, नवसशस्त्र पीपुल्स मोर्चा जैसे कई पीएलएफआई खड़े होंगे, क्योंकि यह आसानी से नाम, दाम और काम, तीनों बनाने का जरिया बन गया है. खूंटी जिला बेरोजगारों का ध्यान एक नये धंधे की ओर खींच रहा है. अपने-अपने इलाके में एक संगठन बनाओ. जाति, अपराध, राजनीति का थोड़ा घालमेल कर. फिर उसमें लिबरेशन जैसा शब्द जोड़ो और नक्सलवाद के नाम पर क्रांति और बदलाव की बयार बहाने के बहाने हर तरह के कुकृत्य करते रहो.’ राजबीर चलते-चलते कहते हैं, ‘हम अपना नाम गलत बताए हैं आपको. असली नाम कैसे बताएंगे, रहना तो इसी इलाके में है.’

राजबीर से बात खत्म होती है. हम वापस खूंटी जिला मुख्यालय होते हुए रांची आते हैं. यहां मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती ऐसे संगठनों और माओवादियों को रोकने के लिए उत्साहित बयान देते हैं. कहते हैं कि आरपार की लड़ाई होगी. डीजीपी राजीव कुमार के मुताबिक माओवादी घटनाओं का असर कम हो गया है. 35 प्रतिशत कम हो गया है.

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पीएलएफआई सुदूर इलाकों में ऐसे दर्जन भर स्कूल चला रहा है जिनमें बहुत कम फीस में बच्चों के लिए सारी सुविधाएं.

उनकी बात सही है लेकिन बात का दूसरा पक्ष वे नहीं बताते. माओवादी असर कम हुआ है, लेकिन पीएलएफआई का असर बढ़ा है. 2011 में कुल घटनाओं में माओवादियों की सहभागिता 59 प्रतिशत थी. 2013 में यह घटकर 35 प्रतिशत हो गई. यह राहत की बात लग सकती है. लेकिन यह राहत तब काफूर हो जाती है जब पता चलता है कि 2011 में पीएलएफआई की सहभागिता 15 प्रतिशत थी जो 2013 में बढ़कर 37 प्रतिशत हो गई. इसका जवाब किसी के पास नहीं होता कि क्या पीएलएफआई जैसे संगठनों का अपराध अपराध नहीं होता. क्या सिर्फ माओवादियों से ही राज्य अशांत होता है? अगर हां तो क्या इसलिए कि माओवादी पुलिस से भी भिड़ते हैं और पीएलएफआई जैसे संगठन पुलिस से कभी नहीं भिड़ते बल्कि आमलोगों की रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल करते हैं.

इन सवालों का जवाब झारखंड में आधिकारिक तौर पर कोई दे भी नहीं सकता, क्योंकि यहां के मुख्यमंत्री ही पीएलएफआई से मुक्ति की बजाय पीएलएफआई के निर्माण और गठन की प्रक्रिया का इतिहास बताते हुए एक पूर्व डीजीपी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करके अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं.

आखिर में हमारी बात फिर दयामनी बरला से होती है. वे कहती हैं, ‘इस इलाके में भाजपा के नेताजी ही सांसद हैं पिछले कई टर्म से. उन्हें भी कुछ बोलना चाहिए, एक शांत इलाके के अशांत इलाके में बदलने पर भी उनका हमेशा खामोशी साधे रहना इलाके के लिए ठीक नहीं.’ दयामनी का इशारा कड़िया मुंडा की तरफ है. वही कडि़या मुंडा जो भाजपा के दिग्गज नेता हैं और पिछली लोकसभा के उपाध्यक्ष थे. लेकिन खूंटी की दुर्गति से उठे सवालों का जवाब कोई नहीं देना चाहता.

खूंटी और आसपास के इलाकों में ऑपरेशन कारो चलाने में अहम भूमिका निभाने वाले झारखंड के मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती को अब इस पद से हटा दिया गया है. सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह फैसला कुंदन पाहन और पीएलएफआई, दोनों के दवाब में लिया गया. कहा जा रहा है कि ये दोनों ही संगठन खूंटी में पुलिस से आक्रामक अभियान के चलतेे उन्हें हो रहे नुकसान से चिंतित थे.

लेकिन खूंटी को हो रहा असल नुकसान यहां के आम बाशिंदों के सिवा किसी के लिए चिंता का सबब नहीं है.

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3 COMMENTS

  1. बेहतरीन रिपोर्ट निराला भैया
    सारंडा ही क्यों ……?

  2. झाड़खंड की सच्चाई को सामने लाने वाला महत्वपूर्ण लेख…

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