डेंगू बना महामारी, हमारी कितनी तैयारी?

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फोटो : पुष्कर व्यास

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में हर साल एडीज मच्छरों से फैलने वाला डेंगू सैकड़ों जिंदगियां तबाह कर देता है. राजधानी दिल्ली के साथ भी हर साल ऐसा ही होता है. बीते सितंबर महीने में एक मासूम की डेंगू से मौत सिर्फ इस वजह से हो गई क्योंकि उसे समय रहते अस्पताल में भर्ती कराया न जा सका. यहां ध्यान देने लायक बात ये हैं कि अविनाश नाम के इस मासूम को भर्ती करने से पॉश इलाके दक्षिण दिल्ली के कई अस्पताल मना कर चुके थे. कुछ डॉक्टरों का दावा है कि अगर उसे समय से अस्पताल में भर्ती कर लिया जाता तो उसे बचाया जा सकता था. बहरहाल, यह अमानवीय घटना यही नहीं थमी. अविनाश की मौत के बाद उसके माता-पिता ने आत्महत्या कर ली. डेंगू की भेंट चढ़े इन लोगों ने राजधानी में हड़कंप मचा दिया और तब केंद्र और दिल्ली सरकार का ध्यान डेंगू से बचाव की तरफ गया. विभिन्न मोहल्लों में फॉगिंग का सिलसिला शुरू हुआ और शहर के तमाम बस स्टॉप, सार्वजनिक स्थान, रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन और मेट्रो ट्रेनों को डेंगू के खिलाफ जागरूकता फैलाने वाले विज्ञापनों से पाट दिया गया. हालांकि इस पूरी कवायद का कुछ खास असर होता नहीं दिख रहा, क्योंकि हर दिन डेंगू से मरने वाले लोगों की खबरें आने का सिलसिला अब तक थमा नहीं है. आखिर ऐसा क्यों है कि डेंगू से निपटने के 10 बड़े संस्थान होने के बावजूद भारत को डेंगू का केंद्र कहा जाने लगा हैै? अगर बीमारियों से जुड़ी कहावत ‘इलाज से बढ़कर है बचाव’ पर वाकई में गौर किया गया होता तो क्या अब तक इस महामारी से बचने के सार्थक तरीके इजाद नहीं होने चाहिए थे? ये कुछ सवाल हैं जिनका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं. हालांकि यहां सरकार को जवाब देना चाहिए कि उनके पास डेंगू से निपटने के उपायों का क्या ढांचा है? क्या सिर्फ चिकित्सकीय दिशा निर्देश इस रोग से लड़ने के लिए काफी हैं? क्यों देश के पास मलेरिया उन्मूलन अभियान की तरह डेंगू से लड़ने का कोई स्थायी इलाज या टीका नहीं है? देश में केंद्र सरकार की ओर से संचालित 10 ऐसे संस्थान हैं, जो महामारी-विज्ञान, चिकित्सकीय अध्ययन, रोग निदान, रोग नियंत्रण और टीका विकास शोध के कामों में लगे हैं. हर साल हजारों जिंदगियां बचाने के लिए इन संस्थानों को शोध के लिए करोड़ों रुपये जारी किए जाते हैं लेकिन अब तक डेंगू के इलाज के लिए कोई सार्थक उपाय नहीं खोजा जा सका है. जानकारी के लिए ‘तहलका’ ने जब स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एसी धारीवाल से संपर्क किया तब उनका कहना था, ‘हमारा काम रोकथाम के तरीके खोजने व चिकित्सकीय प्रबंधन का है. क्या हम किसी चीज की उत्पत्ति रोक सकते हैं? मच्छरों के बारे में तो ऐसा संभव ही नहीं है. हमारा काम तो बस रोकथाम और रोग निदान करना है.’ जब ये पूछा गया कि क्या देश में डेंगू के टीके से संबंधित कोई शोध हो रहा है तो उन्होंने पलटकर सवाल करते हुए कहा, ‘क्या हम किसी ऐसे टीके के बारे में जानते हैं? कृपया आप ये सवाल इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग से करें, ये हमारे विभाग के तहत नहीं आता.’ इसके बाद ‘तहलका’ ने एम्स के मेडिसिन विभाग में कार्यरत डॉ. आशुतोष बिस्वास से बात की. वह डेंगू के लिए चिकित्सकीय दिशा निर्देश तैयार करने वाले विशेषज्ञों में से एक हैं. उनका कहना था, ‘जहां तक मेरी जानकारी है, इस वक्त देश में डेंगू को लेकर ऐसा कोई विशेष शोध नहीं हो रहा है. इस समय जब डेंगू की मृत्यु दर घट रही है तो हमारा पूरा ध्यान रोग की पहचान करने और इलाज पर ही है. साथ ही मच्छरों की संख्या नियंत्रित करना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. इनके प्रकोप को रोकने के लिए एक सख्त प्रक्रिया का होना बेहद जरूरी है.’ C अपनी बात को पुख्ता करते हुए वो बीते सालों में डेंगू की वजह से घटे मृत्यु दर के आंकड़े बताते हैं. उनके अनुसार, 1996 में मृत्युदर 3.3 फीसदी थी जो 2010 में घटकर 0.4 प्रतिशत हुईं और 2013 में इसका प्रतिशत और घटकर 0.3 ही रह गया. हालांकि 2014 में डेंगू से 137 मौतें हुई थीं. इसके अलावा सरकार की ओर से पिछले महीने जारी आंकड़ों का सच माना जाए तो पता चलता है कि डेंगू के मामले में सिंतबर अब तक का सबसे खराब महीना साबित हुआ है. पिछले छह सालों में डेंगू के मामले किसी एक महीने में इतने नहीं आए जितने की एक से 26 सितंबर के बीच दर्ज किए गए हैं. इस छोटे से समय में डेंगू के 5,151 मामले दर्ज किए गए. वैश्विक स्तर पर बात करें, तो डेंगू के लिए कोई लाइसेंसशुदा दवाई या टीका उपलब्ध नहीं है. हालांकि सनोफी पैस्टर डेंगूरोधी टीका (सीवाईडी-टीडीवी/टेट्रावैलेंट डेंगू वैक्सीन) विकसित करने वाली बड़ी संस्थाओं में से एक है लेकिन इसे भारत में ‘फेज 3’ के दवा परीक्षण की अनुमति नहीं मिली है. ‘फेज 3’ के परीक्षण एक बड़ी आबादी पर किए जाते हैं. 2011-12 में पेंटावैलेंट टीके (बच्चों में पांच घातक रोगों- डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी और हीमोफिलस एनफ्लूएंजा टाइप-बी के लिए दिया जाने वाला टीका) के परीक्षण के दौरान हुई मौतों के कारण सरकार को चिकित्सकीय परीक्षणों के लिए कठोर नियम बनाने पड़े थे. अब तक इस कंपनी ने लातिन अमेरिकी देशों जैसे ब्राजील, कोलंबिया, होंडुरास, मैक्सिको, प्यूूर्टो रिको में परीक्षण किए हैं. साथ ही थाईलैंड में इनका सर्वे भी किया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार इन लातिन अमेरिकी देशों और कुछ एशियाई देशों में किए गए परीक्षणों में घातक डेंगू के खिलाफ 95 प्रतिशत सफलता देखी गई है. हालांकि ये परिणाम डेंगू के कुछ गंभीर मामलों पर ही आधारित हैं. साथ ही अब तक ये भी पता नहीं चल सका है कि ये टीका देने के कितने समय तक व्यक्ति इस रोग से बचा रह सकता है? अब तक इस टीके के लंबे समय तक सुरक्षित असर के विषय में भी ज्यादा जानकारी नहीं है. ‘तहलका’ से बात करते हुए सनोफी की वरिष्ठ निदेशक संचार (दक्षिणी एशिया) और सार्वजनिक प्रशासन (सनोफी इंडिया) अपर्णा थॉमस बताती हैं, ‘भारत में डेंगू देशज यानी स्थानीय हो चुका है. देश के कई हिस्सों, जैसे दिल्ली को ही ले लीजिए, में एक निश्चित समय पर डेंगू के चारों प्रकार (डेन-1, डेन-2, डेन-3, डेन-4) पाए गए. हमने यहां के पांच शहरों, नई दिल्ली, लुधियाना, कोलकाता पुणे और बंगलुरु, में किए गए अपने परीक्षणों में काफी बड़े भौगोलिक क्षेत्र के लोगों को जांचा. परिणाम दिखाते हैं कि ये टीका सुरक्षित है और मानव शरीर भी इसे सकारात्मक रूप से स्वीकार कर रहे हैं, साथ ही ये हमारे वैश्विक डेंगू टीका विकास कार्यक्रम के अनुरूप भी है.’ भारत में परीक्षण के लिए कंपनी ने इन पांच केंद्रों से 18-45 की उम्र के 189 लोगों को चुना. परीक्षण के लिए दी गई खुराक उतनी ही थी, जितनी वैश्विक प्रभावोत्पादकता कार्यक्रम के ‘फेज 3’ में दी गई थी. भारत में ये परीक्षण 2012 से 2014 के बीच कराए गए. थॉमस बताती हैं, ‘भारत में हुए परीक्षणों के नतीजे दिखाते हैं कि टीके की तीन खुराक को शरीर अच्छी तरह सहन कर ले रहा है, ये सुरक्षित है और शरीर में डेंगू के चारों प्रकारों के खिलाफ एंटीबाॅडी (प्रतिरक्षी) भी बना रही है. इस परीक्षण में घातक डेंगू का कोई मामला नहीं देखा गया, न कोई मृत्यु या न ही इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव. जैसा मैंने पहले भी कहा कि ये नतीजे हमारे वैश्विक डेंगू टीका विकास कार्यक्रम जैसे ही हैं.’ टीका बनाने में आने वाली चुनौतियों के बारे में वे बताती हैं, ‘ये टीका अपने विकासक्रम में आज जहां पहुंचा है, इसे वहां तक पहुंचाने में टीम ने कई मुश्किलें पार की हैं. सबसे पहले तो परीक्षण करने के लिए कोई भी जानवर उपलब्ध नहीं है, जिसमें डेंगू के लक्षण पाए जाते हों. यह मनुष्यों को होने वाली बीमारी है. दूसरा, सनोफी पैस्टर को इसके प्रभाव जानने के लिए बहुत बड़े स्तर पर अध्ययन करना पड़ा क्योंकि दूसरी बीमारियों के बिलकुल उलट डेंगू से सुरक्षा के लिए बहुत ज्यादा अध्ययन सामग्री मौजूद ही नहीं हैं. इसके अलावा बढ़ते हुए बाजारों में चिकित्सकीय जांच करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना पड़ता है. जैसे हमें ये ध्यान रखना होता ही कि जिस क्षेत्र में हम इसका अध्ययन कर रहे हैं वहां इस तरह के काफी मामले हों, ताकि परीक्षण के लिए पर्याप्त और निश्चित मात्रा में नमूने जमा किए जा सकें. परीक्षण करने वाले जांचकर्ता अनुभवी हों और जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निर्धारित नियमों के तहत काम करने में सक्षम हो. साथ ही ये भी ध्यान रखें कि इस जांच में भाग लेने वालों का लगातार अध्ययन भी किया जाए जिससे यदि उनमें किसी भी तरह का बुखार या बीमारी देखी जाए तो समय पर उसका पता लगाया जा सके.’ न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, सनोफी द्वारा थाईलैंड में किया गया अध्ययन दिखाता है कि नौ साल और उससे ऊपर की उम्र तक की एक निश्चित आबादी का टीकाकरण करने से डेंगू से पीड़ित होकर अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में गिरावट आई है. फिर भी नौ साल से कम उम्र के बच्चों पर इस टीके के प्रभाव को समझने के लिए अब भी काफी कुछ जानना बाकी है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक नवीन खन्ना का कहना है, ‘देश को डेंगू रोधी टीका विकसित करने में अभी पांच साल और लगेंगे, क्योंकि इसके लिए काफी खर्च की जरूरत है.’ [ilink url=”http://tehelkahindi.com/dengue-vaccine-might-be-ready-in-five-years-says-scientist-naveen-khanna/” style=”tick”]पढ़ें नवीन खन्ना का पूरा साक्षात्कार [/ilink]

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फोटो : विजय पांडेय

वहीं, दूसरी तरफ भारत-यूनाइटेड किंगडम के आपसी सहयोग पर आधारित औद्योगिक अनुसंधान और विकास कार्यक्रम के तहत ऑक्सीटेक लिमिटेड नाम की ब्रिटिश कंपनी ‘सस्टेनेबल डेंगू प्रिवेंशन प्रोजेक्ट’ के तहत स्थायी रूप से डेंगू का निराकरण करने के लिए काम कर रही है. इस अध्ययन के तहत यह देखा जा रहा है कि मच्छरों में आनुवांशिक बदलाव करके किस प्रकार से डेंगू को रोका जा सकता है. कंपनी ने तकरीबन नौ करोड़ मच्छरों में आनुवांशिक बदलाव करके बाहर छोड़ा है, ताकि पर्यावरण और मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जा सके. कंपनी अब तक अपनी प्रयोगशाला में मच्छरों की लगभग 150 पीढ़ियों का अध्ययन कर चुकी है. दिलचस्प बात ये है कि इस प्रयोग में 90 प्रतिशत सफलता मिली है. इस शोध के मायने इसलिए और बढ़ जाते हैं क्योंकि मच्छरों ने आनुवांशिक उत्परिवर्तन (म्युटेशन) के चलते कीटनाशकों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है यानी कीटनाशकों का इन पर असर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. बहरहाल अंतर्राष्ट्रीय टीकों के प्रति सरकार का रवैया उदासीन है. उचित आंकड़ों की कमी भी चिंता का एक विषय है. अमेरिका की ब्रांडेस यूनिवर्सिटी के डोनाल्ड शेपर्ड के अक्टूबर 2014 में जारी शोध पत्र के अनुसार, पूरे विश्व में सिर्फ भारत में ही डेंगू का प्रकोप सबसे अधिक है. यहां हर साल 55 लाख भारतीयों को डेंगू होता है, जो कि सरकारी आंकड़ों से 282 गुना ज्यादा है. डोनाल्ड ने तीन साल तमिलनाडु में डेंगू के मामलों का अध्ययन किया और 18 राज्यों से आंकड़े इकट्ठा किए हैं. आंकड़ों में आया हुआ ये फर्क डेंगू की पहचान के लिए होने वाले दो तरह के परीक्षणों के कारण है. एनएस-1 टेस्ट, जिसे डाॅक्टरों और मरीजों की ओर से बहुतायत में प्रयोग किया जाता है, को इन आंकड़ों में नहीं गिना गया है. आधिकारिक उद्देश्य से सिर्फ प्रयोगशाला में हुए परीक्षणों का ही आंकड़ा दर्ज किया जाता है. इस पर राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एसी धारीवाल कहते हैं, ‘आंकड़ों में थोड़ा-बहुत फर्क हो सकता है पर ज्यादा नहीं.’ वर्तमान में डब्लूएचओ का उद्देश्य डेंगू की मृत्यु दर को 50 फीसदी और अस्वस्थता दर को 25 फीसदी तक घटाना है और कहने की जरूरत नहीं है कि इन आंकड़ों में भारत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. 2012 में दक्षिण एशिया क्षेत्र में डेंगू के लगभग दो लाख नब्बे हजार मामले दर्ज हुए थे, जिसमें करीब 20 प्रतिशत भागीदारी भारत की थी. आज की तारीख में, जब हर साल डेंगू के मामले बढ़ रहे हों, तब ये चिंता का विषय है. 2010 में डेंगू के 20 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जो बढ़कर 2012 में 50 हजार और 2013 में 75 हजार हो गए. राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2014 मेंे 40 हजार केस दर्ज हुए हैं. देश की खराब स्वास्थ्य सेवाओं और उस से भी खराब डॉक्टर-मरीज अनुपात को देखते हुए इस संख्या को नीचे ले आना भी एक बड़ा काम है. देश में प्रति 1800 मरीजों पर एक डॉक्टर है. भारत में डब्लूएचओ की प्रतिनिधि डॉ. नता मेनाब्दे ने ‘नेशनल गाइडलाइन्स फॉर क्लीनिकल मैनेजमेंट ऑफ डेंगू फीवर 2014’ में साफ बताया है कि कैसे हम सार्वजानिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डेंगू से निपटने में असफल होते जा रहे हैं. वो कहती हैं, ‘1 से 10 मार्च तक नई दिल्ली में वेक्टर जनित रोगों (मलेरिया, डेंगू, लसीका फाइलेरिया, कालाजार, जापानी इंसेफलाइटिस और चिकनगुनिया) पर एक जॉइंट मॉनिटरिंग मिशन संचालित किया गया था, जिसमें रोग को पहचान पाने और प्रबंधन में डॉक्टर की अक्षमता साफ दिखाई देती है. इस गाइडलाइन में यह अनुशंसा भी की गई कि स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए विशेषकर वहां जहां रोग की स्थिति घातक हो चुकी हो. इस मिशन में ये भी कहा गया कि पहले और दूसरे चरण पर प्रबंधन और गंभीर रोगियों पर वरीयता के आधार पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही नाजुक हालत में परामर्श की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए. कोई संदेह की बात नहीं है कि यहां जोर जन स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर है पर स्वास्थ्य बजट के कम हो जाने के कारण ये बहुत दुष्कर हो गया है. अब तक सरकार अपने चिकित्सकीय दिशा निर्देशों पर ही काम कर रही है. डेंगू का सबसे भयंकर प्रकोप 1996 में हुआ था, सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में डेंगू के 16,517 मामले दर्ज हुए थे, जिसमें दिल्ली से अधिकतम 10,252 मामले थे. मरने वालों की संख्या 545 थी. इनमें से 423 मौतें अकेले दिल्ली में हुई थीं. ऐसी स्थिति 2006 में भी आई थी, जहां 12 हजार रोगी थे और 184 लोगों की मृत्यु हुई. उस समय जो बात सरकार के लिए मददगार साबित हुई, वो थी रोग का चिकित्सकीय प्रबंधन. डेंगू पहले बुखार, फिर हैमरेज और आघात के रूप में शुरू होता है और इनकी तीव्रता के हिसाब से ही स्थिति विशेष में चिकित्सकीय मदद दी जाती है.

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फोटो : एएफपी

विडंबना यह है कि 2008 तक देश में इस बीमारी के प्रबंधन की राह इतनी आसान नहीं थी. भारत में उस समय डेंगू बुखार और डेंगू हैमरेज बुखार के लिए डब्लूएचओ के दक्षिण एशियाई क्षेत्र के निर्धारित दिशा निर्देशों का अनुपालन हो रहा था, जिसमें 2011 में संशोधन किए गए. इसी तरह 2009 में डब्लूएचओ ने रोगों के अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों के साथ डेंगू और घातक डेंगू की पहचान, प्रकार और प्रबंधन के लिए भी नए निर्देश जारी किए थे. हालांकि इन दोनों दिशा निर्देशों में साम्य न होने के कारण इनका कोई फायदा नहीं हुआ. किसी भी रोग का सही वर्गीकरण (प्रकार) मालूम करना बहुत ही जरूरी है क्योंकि किसी भी रोग से से होने वाली मृत्यु का कारण उसकी विकट अवस्था की पहचान न हो पाना है. अगर एक बार डेंगू की तीव्रता का पता चल जाता है तो सरकारी और निजी अस्पताल दोनों द्वारा दी गई स्वास्थ्य सेवाएं लाभदायक साबित होती हैं. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक टीम ने डब्लूएचओ की 2011 और 2009 के दिशा निर्देशों को जोड़ते हुए डेंगू बुखार के चिकित्सकीय प्रबंधन के लिए नए राष्ट्रीय दिशा निर्देश बनाए हैं. पर ऐसा लगता है कि रोकथाम के तरीके और डॉक्टरी मदद सिर्फ कागजों तक ही सीमित है.

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