जेएनयू : देशद्रोहियों का गढ़?

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इस साल सत्र की शुरुआत में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर रखने की मांग की थी. इसी दौरान भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि जेएनयू नक्सलियों, जेहादियों और राष्ट्र विरोधियों का अड्डा बन गया है. उन्हें यहां का उप-कुलपति बनाने की चर्चा चली तो उन्होंने कहा कि पहले जेएनयू कैंपस में एंटी नॉरकोटिक्स ब्यूरो और सीआईएसएफ कैंप लगाया जाना चाहिए. जेएनयू के पूर्व छात्र सुयश सुप्रभ कहते हैं, ‘हाल के वर्षों में जेएनयू में संघ का प्रभाव बढ़ा है. लेकिन उनकी राजनीति का तरीका अलग है. वे उपद्रव और आतंक के सहारे लोगों को भड़काने की राजनीति करते हैं. जेएनयू की परंपरा में बहुत सी चीजें कमजोर हुई हैं. लिंगदोह कमेटी के सहारे छात्र राजनीति को लगातार कमजोर किया जा रहा है. वे समाज का जैसा ढांचा चाहते हैं, उसी के अनुरूप राजनीति भी चाहते हैं. हम सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की बात करते हैं तो इससे उन्हें परेशानी होती है.’

भाजपा और संघ के जेएनयू विरोध पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थी आशीष मिश्र कहते हैं, ‘भाजपा सोच-विचार की हर संभावना को नष्ट करते हुए नागरिक को मात्र भीड़ बना देना चाहती है. इस प्रक्रिया में सबसे बड़े प्रतिरोधी हैं सोचने-समझने व तर्क करने वाले लोग. जो लोग अपने ही देश के मानक विश्वविद्यालय पर इस तरह की बातें कह रहे हैं उनके बारे में क्या कहा जा सकता है! जिस पवित्र स्थान पर पैर रखने से बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी डरते हैं, मूर्ख वहां धड़धड़ा के घुस जाता है.’

‘जेएनयू की यही खास बात है कि यह हमें क्रिटिकल होना सिखाता है. हम कहते हैं कि एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण न करे, अगर यह आपको देश तोड़ने वाला विचार लगता है तो आपकी देश की कल्पना ही गड़बड़ है’

जेएनयू में ही शोधछात्र और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इस विरोध के पीछे सवर्ण वर्चस्व की मानसिकता को रेखांकित करते हैं. वे कहते हैं, ‘जेएनयू का विरोध तमाम तरह से होता रहा है. लेकिन इस बार एक सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से संगठित ढंग से यह हमला हुआ है, जो अपने आप में एक संदेश है. जेएनयू में रेडिकलिज्म पहले भी था, उससे उन्हें दिक्कत नहीं थी. अब इसमें सामाजिक विविधता भी जुड़ गई है. यह दोनों बातें एक साथ होना सत्ता प्रतिष्ठान को पसंद नहीं है. 2011 में पूरी तरह से आरक्षण लागू होने के बाद यहां पर लड़कियों और दलितों-पिछड़ों की भागीदारी खूब बढ़ गई है. वैसे भी दलित संगठनों का सामना करना दक्षिणपंथी संगठनों के लिए मुश्किल होता है क्योंकि वे सामाजिक न्याय का मसला उठाते हैं. इसकी जगह कोई मुस्लिम संगठन हो तो उनके लिए यह आसान हो जाता है. महिलाओं व दलितों की ज्यादा संख्या और रेडिकलिज्म का एक साथ होना उन्हें चुभता है, जबकि यह दोनों चीजें अलग-अलग और भी जगह हैं, लेकिन वहां पर विरोध नहीं होता.’

जेएनयू पर एक आरोप यह भी लगता है कि यह भारतीय मूल्यों को नष्ट करने पर तुला है और यहां पढ़ने वाली लड़कियां स्वच्छंद होती हैं, या फिर उनको सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों को तोड़ना सिखाया जाता है. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आकर यहां एमए कर रहीं अदिति मिश्रा किसी पार्टी या संगठन से जुड़ी नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘एक लड़की के रूप में मुझे जेएनयू के कैंपस में जितनी आजादी मिली, उतनी और कहीं नहीं मिली. जेएनयू ही एक ऐसी जगह है, जहां पर कभी मुझे डर नहीं लगा. दिल्ली की सड़कों पर शाम सात-आठ बजे डर लगता है, लेकिन जेएनयू में रात के दो बजे भी डरने की जरूरत नहीं होती. मैं यहां पर आराम से रह सकती हूं, पढ़ती हूं, तो क्या मैं नक्सली या आतंकी हूं? जो आरोप लगा रहे हैं, उन्हें अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करना चाहिए कि लोग उन्हें क्यों नापसंद करते हैं.’

आरएसएस के सपनों के भारत में परंपराओं के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों का बड़ा मजबूत स्थान है. वे खुले तौर पर दलितों और महिलाओं के पक्ष को खारिज तो नहीं कर पाते, लेकिन मनुस्मृति पर आधारित शोषणकारी वर्ण व्यवस्था और गैर-लोकतांत्रिक पारिवारिक मूल्यों को भी बनाए रखना चाहते हैं. इसीलिए दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श से आरएसएस के लोग खासे असहज हो जाते हैं. पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘आरएसएस जिस समाज की कल्पना करता है, वह जेएनयू जैसे परिसर में बहुत ठोस तरीके से ध्वस्त हो जाती है. यहां की वैचारिकी का पूरे देश में एक खास असर है. संघ का आरोप उनकी जेएनयू जैसे बौद्धिक परिसर के बरअक्स खड़ा होने की कोशिश है कि हम आरोप लगाएं और वहां के लोग हमसे बहस करें. वे अपने राजनीतिक विरोधियों को ही राष्ट्रद्रोही कहते हैं. जो इनके वै​चारिक सामाजिक खांचे में फिट न बैठे, वह इनके लिए देशद्रोही हो जाता है.’

यह भी एक तथ्य है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को कमजोर किया गया है. जर्मनी के मीडिया संस्थान डायचे वेले में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने बताया, ‘बीएचयू कैंपस  में छात्रों का राजनीतिक विमर्श में भाग लेने व संगठन बनाने का अधिकार छीन लिया गया है. हम सबको याद है कि किस तरह छात्र संघ व शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार को छात्रों के साथ बातचीत करने से रोक दिया गया था. लेकिन आरएसएस की गतिविधियां जारी हैं. परिसर में अन्य छात्र संगठनों की गतिविधियां तो प्रतिबंधित हैं, लेकिन एबीवीपी खुलेआम काम कर रही है. विश्वविद्यालय परिसरों का अराजनीतिकरण किया जा रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि शिक्षा के क्षेत्र को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के लिए खोला जाना है. विरोध और विमर्श की संस्कृति उसमें बाधा बन सकती है. पूरे देश में शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के मंच के रूप में विश्वविद्यालयों की भूमिका को खत्म किया जा रहा है.’ अब सवाल उठता है कि क्या जेएनयू पर हमला इसी योजना की कड़ी है?

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जेएनयू छात्रसंघ में इस बार एबीवीपी के एक प्रत्याशी सौरभ शर्मा को भी ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर जीत हासिल हुई थी. उन्होंने कहा, ‘मैं पांचजन्य के आरोप से सहमत हूं. सब लोग यहां ऐसे नहीं हैं, लेकिन कुछ लोग हैं जो नक्सलवाद और देशद्रोही गतिविधियों के समर्थक हैं. जब दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों पर नक्सली हमला हुआ तो यहां पर खुशियां मनाई गईं. याकूब मेमन की फांसी पर उन्हें शहीद बताया गया और अब्दुल कलाम की मृत्यु पर उन्हें भला बुरा कहा गया. यहां के वामपंथी खास विचार की तरफ लोगों का ध्रुवीकरण करते हैं. वे महिषासुर दिवस मनाते हैं. आप रावण या महिषासुर की पूजा कीजिए, लेकिन वे लोग हिंदू देवी देवताओं को गालियां देते हैं. वामपंथी संगठन लोकतंत्र की बात करते हैं लेकिन जैसा स्पेस अपने लिए चाहते हैं, वैसा सबको क्यों नहीं देना चाहते? वे भारतीय संस्कृति का विरोध क्यों करते हैं? हम भी सबके लिए स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन वे लोग जिस स्वतंत्रता की बात करते हैं, वह देश तोड़ने वाली है.’

जेएनयू वह कैंपस है, जहां 1975 में आपातकाल का पुरजोर विरोध किया गया. यहां के छात्रों ने सिख विरोधी दंगों, बाबरी ध्वंस और गुजरात दंगों का विरोध किया. जो भी नेता जेएनयू पहुंचा, उसे तीखे सवालों का सामना करना पड़ा

जेएनयू की छात्रा रह चुकीं साहित्यकार सुमन केशरी कहती हैं, ‘जेएनयू इस देश में एकमात्र ऐसा कैंपस है जहां पर लड़कियां सुरक्षित हैं. जेएनयू सही अर्थों में विश्वविद्यालय है जो विश्वदृष्टि देता है. वहां छात्रों में एक लोकतांत्रिक और समतामूलक दृष्टि विकसित होती है. वहां पढ़ने वाली लड़कियां सही अर्थों में अपने को मनुष्य मानती हैं, क्योंकि उनकी बहुत लोकतांत्रिक और चेतनासंपन्न ट्रेनिंग होती है. जेएनयू में ऐसा खुला वातावरण है कि वे अन्याय के खिलाफ खड़ी हो पाती हैं. अब इस बात से जिन्हें लगता है कि संस्कृति टूट जाएगी, यह उनकी और संस्कृति की समस्या है. किसी परिवार में अगर हर सदस्य लोकतांत्रिक और स्वतंत्रचेत्ता सोच का हो, तो इससे तो परिवार और मजबूत व लोकतांत्रिक होंगे. बाकी कैंपसों में जेएनयू जैसा खुलापन और वैचारिक माहौल क्याें नहीं है.’

गुजरात विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र अर्श संतोष लिखते हैं, ‘विश्वविद्यालयी शिक्षा और शोध के हवाले से विश्व-स्तर पर जो थोड़ी-बहुत पहचान भारत की बनी थी वह जेएनयू के कारण ही थी. इसीलिए आरएसएस खेमे को वह देशद्रोहियों का अड्डा लगता है. हालांकि सच यह है कि केवल जेएनयू ही नहीं, हर वह विश्वविद्यालय जहां दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी छात्र पढ़ते हैं, वह इन्हें देशद्रोहियों का ही अड्डा लगता है. इन्हें वैज्ञानिक, तर्क आधारित शिक्षा ही राष्ट्रद्रोही लगती है. पढ़ाई-लिखाई का माहौल देखकर ही इन्हें परेशानी होने लगती है.’

जेएनयू में छात्रसंघ की उपाध्यक्ष शहला कश्मीर से हैं. उनके मुताबिक, जो कुछ भी जेएनयू ने उन्हें दिया है, वह कश्मीर में संभव नहीं था. वे कहती हैं, ‘सोचने के दो तरीके हो सकते हैं. एक कहता है कि समाज में जो भी हो रहा है, सब ठीक है. दूसरा है आलोचनात्मक ढर्रा ​जो हमेशा सवाल करता है. जेएनयू की यही खास बात है कि यह हमें क्रिटिकल होना सिखाता है. हम कहते हैं कि एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण न करे, अगर यह आपको देश तोड़ने वाला विचार लगता है तो आपकी देश की कल्पना ही गड़बड़ है. जेएनयू कैंपस में ​जैसा वैचारिक माहौल है, वैसा दूसरे विश्वविद्यालयों में नहीं है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय राज्य विश्वविद्यालय जैसा है. यहां तक कि डीयू या जामिया भी जेएनयू जैसे नहीं है. यहां लड़कियों की अपनी आवाज है. यहां छात्रों की ट्रेनिंग बेहद लोकतांत्रिक है. यहां का माहौल समाज को नई कल्पना देता है. अगर कोई समाज शोषणकारी आधार पर टिका है तो उसे तोड़ा ही जाएगा. जेएनयू जैसा है, उसे लड़-लड़कर ऐसा बनाया गया है. जिन्हें लगता है कि यह देशद्रोहियों का गढ़ है, उनकी अपनी सोच जड़ हो चुकी है.’ बहरहाल अब सवाल उठता है कि जेएनयू की वैचारिक-बौद्धिक परंपरा से संघ और भाजपा को ही क्यों दिक्कत है?

जेएनयू अपनी विशिष्ट छात्र राजनीति के कारण भी जाना जाता है. छात्र राजनीति को लेकर गठित जीएम लिंगदोह कमेटी ने जेएनयू की छात्र राजनीति को आदर्श रूप में स्वीकार किया है. जेएनयू के शोध छात्र ताराशंकर कहते हैं, ‘यहां ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां चुनाव में हिंसा, धनबल या बाहुबल का प्रयोग नहीं होता है. जेएनयू के चार दशक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई बाहुबली या दबंग उम्मीदवार चुनाव जीता हो. यहां हिंसा की जगह तर्कों, विचारों और बहस पर आधारित राजनीति होती है. जेएनयू में कम से कम खर्च में स्वस्थ राजनीति की परंपरा है. तमाम समस्याओं पर हाथ से बने रंगीन पोस्टर जेएनयू की राजनीति को अलग पहचान देते हैं. जेएनयू की दीवारें इन पोस्टरों से साल भर जीवंत रहती हैं. कितना भी गरीब छात्र हो, यहां आसानी से चुनाव लड़ लेता है. पूरी चुनाव प्रक्रिया छात्र अपने दम पर संपन्न कराते हैं. यहां की राजनीति कैंपस के बाहर जनहित के मुद्दों पर सड़कों पर संघर्षरत दिखाई देती है. देश भर में कहीं भी अन्याय हो, जेएनयू एक सशक्त आवाज बनकर खड़ा होता है. यहां ‘लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को’ का नारा देते हुए कहा जाता है कि ‘जब राजनीति हमारा भविष्य तय करती है तो क्यों न हम राजनीति को तय करें’.

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  1. जेएनयू के बारे में संघी अफवाहों और अनर्गल आरोपों के दनादन हमलों के बीच यह आलेख एक मुंहतोड़ जवाब की तरह है|

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