‘यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है’

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svami mukteshvaranandबनारस अब तो शांत दिख रहा है लेकिन सुना जा रहा है कि अंदर ही अंदर अभी माहौल गर्म है. ये उपद्रव आपके नेतृत्व में निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा के कारण हुआ, जिसमें पुलिस ने लाठीचार्ज किया और बाद में कर्फ्यू भी लगा. क्या आगे भी ऐसी कोई यात्रा निकालने की योजना है?

अन्याय प्रतिकार यात्रा और उसके बाद संतों का सम्मेलन दोनों ही ऐतिहासिक रहे. काशी में उस दिन वर्षों बाद दलगत और संगठनागत भावना से ऊपर उठकर सनातन समाज एक हो गया. साधु-संतों ने एकजुटता दिखाई. अब जब ऐतिहासिक कदम उठ गए हैं तो लड़ाई आगे भी जारी रहेगी लेकिन अब लड़ाई का तरीका बदल देंगे क्योंकि इस तरीके में सरकार को अराजकता फैलाने में सहूलियत मिल जाती है. मगर हम अपनी आवाज बंद नहीं करेंगे.

आपने 15 दिन पहले से ही अन्याय प्रतिकार यात्रा की घोषणा कर दी थी, फिर उस रोज इस यात्रा में हिंसा क्यों फैली? क्या आपकी तैयारी पूरी नहीं थी?

हमारे लोग तो वहां पहुंच भी नहीं सके थे, जहां से हंगामे की शुरुआत हुई. हंगामे की शुरुआत गोदौलिया चौक से हुई और तब तक हमारे लोग पीछे ही थे. वहां पहले से ही भारी संख्या में पुलिसवाले और हजारों लोग मौजूद थे. अब वे हजारों लोग कौन थे, जिन्होंने माहौल को इस कदर खराब कर दिया, ये तो जांच से ही पता चलेगा. हम चाहते हैं कि सरकार इसकी निष्पक्ष जांच करवाए.

आपके धुर विरोधी रहे विश्व हिंदू परिषद और दूसरे संगठन भी आपकी इस यात्रा में साथ थे और आपके अनुसार हिंसा में आपके लोग शामिल नहीं थे. ऐसे में आपको अराजकता फैलाने का संदेह किस पर है?

ये कैसे कहें. बिना जांच के कुछ कहना ठीक नहीं, लेकिन मैं बार-बार कहूंगा कि सरकार को जांच करवानी चाहिए कि ये कौन लोग थे, जिन्होंने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसा में बदल दिया. फिर पुलिस ने माहौल को और बिगाड़ दिया. हां, इतना जरूर कहूंगा कि राज्य सरकार का रवैया शुरू से सहयोगपूर्ण नहीं था.

सरकार उनसे बात कर ले, जिन पर लाठियां चली हैं ताकि उनके मन में पुलिस-प्रशासन के बारे में बनी धारणा टूटे वरना कल को वे बच्चे ही तो नक्सली बनेंगे

इस यात्रा में साध्वी प्राची भी आईं थीं, जबकि उस खेमे के लोग राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही आपके विरोधी रहे हैं. ये कैसे संभव हुआ?

अन्याय प्रतिकार यात्रा के करीब एक पखवाड़े पहले मैं पुलिस के लाठीचार्ज का शिकार हुआ था. जाहिर है, चोट लगी थी और मैं अस्पताल में भर्ती था. तब एक संत साथी होने के नाते साध्वी प्राची मुझे देखने अस्पताल आई थीं. उसी समय उन्होंने कहा था कि वे भी यात्रा में शामिल होंगी. हमने तब ही शर्त रख दी थी कि अगर वे आएंगी तो मर्यादा में रहकर ही बोलेंगी. फिर जब वे मंच पर आईं और जैसे ही मुसलमानों के बारे में कुछ बोलने की शुरुआत की, मैंने उनसे माइक छीन लिया.

यह भी अजीब है कि आपकी अन्याय प्रतिकार यात्रा में तो साध्वी प्राची समेत विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के कई नामी लोग शामिल हुए, जबकि कुछ दिन पहले जब आप पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ था तो स्वामी जीतेंद्रानंद और शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद जैसे लोगों ने आपके विरोध में बयान दिए थे. 

अब जिसने भी विरोध किया और जो भी बोला, उसे बनारस के लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया और न ही काशी विद्वत परिषद ने उन बातों पर कुछ कहा.

गणेश चतुर्थी के बाद आपने धरना-प्रदर्शन इसलिए शुरू किया ताकि गणेश प्रतिमाओं को गंगा में विसर्जित करने दिया जाए और कोर्ट के साफ आदेश हैं कि गंगा में प्रतिमा विसर्जन नहीं होगा. तो क्या आप कोर्ट के आदेश को नहीं मानना चाहते? जब ये आदेश आया तब ही इसे चुनौती क्यों नहीं दी?

धरना-प्रदर्शन की शुरुआत हमने नहीं की थी. हमने तो दो दिनों तक देखा-सुना कि गणेशजी की प्रतिमा विसर्जित होने के लिए गई है और प्रशासन ने गोदौलिया और दशाश्वमेध घाट के बीच में उसे रोक दिया है. अधिकारी मेरी बात सुनते नहीं, जो उनसे आग्रह करता. नेता भी मेरी बात नहीं सुनते. मुझे यह ठीक नहीं लगा कि मैं अपने कमरे में सोया रहूं और गणेशजी की प्रतिमाएं सड़क पर विसर्जन का इंतजार करती रहें. तब मैं भी अपने मठ से बटुकों के साथ गया लेकिन वहां तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर मामले को दूसरी ही दिशा में मोड़ दिया. रही बात कोर्ट के आदेश को चुनौती देने की तो इस मामले में कोर्ट के आदेश की कोई जानकारी ही नहीं थी. वह तो गणेशजी की प्रतिमा को बीच सड़क पर रोका गया, तब हम इस बारे में जान सके.

लाठीचार्ज के बाद ही आपने इस यात्रा का ऐलान कर दिया था, तब से लेकर अब तक काफी समय था. क्या इस बीच यात्रा रोकने के लिए सरकार ने आपसे बात नहीं की?

लाठीचार्ज कराना सीधे-सीधे राज्य सरकार का मामला था. हमने यही कहा भी था कि डंडा चलाने वाला दोषी नहीं बल्कि दोषी सरकार है, जिनके नियंत्रण में डंडा चलाने वाले हैं. वह इस विषय पर बात करें. हमने कभी नहीं कहा कि प्रदेश के मुखिया माफी मांगे, सिर्फ यह कहा कि संवाद स्थापित किया जाए. कम से कम उन बच्चों से, जो उस धरने में शामिल थे और जिन पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां चलाईं. उस लाठीचार्ज का वीडियो बना, यूट्यूब पर गया, जिसे देश ने और लाखों बच्चों ने देखा. हमारी शर्त तो सिर्फ यही थी कि सरकार उन बच्चों से बात कर ले, जिन पर लाठियां चली हैं ताकि उनके मन में पुलिस और प्रशासन के बारे में बनी धारणा तो टूटे, वरना कल को वे बच्चे नक्सली ही तो बनेंगे. लेकिन सरकार ने तो बात ही नहीं की.

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सुना तो यह गया है कि यात्रा के समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आपसे बात करने की कोशिश की थी पर आपने मना कर दिया.

हम जब यात्रा पर निकल चुके थे तब उनके लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री बात करना चाहते हैं. हमने बातचीत के लिए दिन के 12 बजे तक का ही समय निर्धारित किया था, उसके बाद बात करने के लिए न तो समय था और न ही उसका कोई अर्थ होता.

मुख्यमंत्री ने इस मसले पर कुछ नहीं कहा पर बनारस तो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है. प्रधानमंत्री, जो दुनियाभर के मसलों पर ट्वीट करते रहते हैं, काशी में हुए इस बवाल पर वे भी चुप हैं. इस पर आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद करें, जबकि सब जानते हुए भी मुख्यमंत्री ही चुप्पी साधे रहे. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. हम तो मुख्यमंत्री से ज्यादा उम्मीद लगाए हुए थे कि वे इस मामले का समाधान निकालेंगे. और फिर क्या मुख्यमंत्री, क्या प्रधानमंत्री! यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है, जहां लोगों को अपने लोगों से ही फुर्सत नहीं. सभी अपने परिवार में उलझे हुए हैं. राजतंत्र इसलिए खत्म हुआ कि तानाशाही खत्म होगी लेकिन ये लोकतंत्र तो और ज्यादा खतरनाक राजतंत्र बनता जा रहा है. पहले के राजा रात में वेष बदलकर प्रजा का सुख-दुख जानने भी निकलते थे, अब के राजाओं को तो प्रजा के सुख-दुख से कोई मतलब ही नहीं.

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