कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता : मुनव्वर राना | Tehelka Hindi

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कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता : मुनव्वर राना

शायरी को महबूबा से मां की मुहब्बत तक ले आने वाले शायर मुनव्वर राना के तमाम परिजन बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. उस बात का जिक्र आते ही वे भावुक हो जाते हैं. उनका ख्वाब है कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कभी जंग न हो. जब उन पर हमले हों तो तीनों मिलकर लड़ें. वे तीनों देशों की एकता के हामी हैं, लेकिन तीनों देशों के एकीकरण को नामुमकिन मानते हैं. उनसे कृष्णकांत कीे बातचीत.

कृष्णकांत 2016-08-15 , Issue 15 Volume 8

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भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश- तीनों मुल्कों के एकीकरण की बात बार-बार उठती है. एकीकरण पर आपका क्या नजरिया है?

देखिए, मुल्क भी घर की तरह होते हैं. जब घर में एक बार दीवारें उठ जाती हैं तो टूटती नहीं हैं. इसलिए ये नामुमकिन है कि तीनों मुल्क एक हो जाएंगे. यह बिल्कुल वैसा है कि तीनों भाई फिर से आकर एक घर में रहने लगें. अगर तीनों भाइयों में मोहब्बत बरकरार रहती है तो यह भी वैसे ही है जैसे तीनों एक जगह रहते हैं. तो ये ख्वाब देखने से कोई फायदा ही नहीं है क्योंकि रास्ते में इतनी अड़चनें हैं कि ये मुमकिन ही नहीं है. ये तो बिल्कुल वैसा ही है कि सूरज पूरब की जगह पश्चिम से निकल आए. लेकिन जरूरत इस बात की है कि जब ये तमाम यहूदी और ईसाई एक होकर दुनिया के तमाम फैसले करते हैं, बमबारी करके तमाम मुल्कों को बर्बाद करते हैं, दुनिया में पहले एड्स फैलाते हैं फिर उसकी दवाएं बेचते हैं, तो हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक होकर दुनिया का मुकाबला करने के लिए क्यों नहीं खड़े हो सकते?

मेरा विचार यह है कि 25 साल तक तीनों देशों में इस बात पर मुआयदा हो कि हममें जंग नहीं होगी, हममें छेड़छाड़ नहीं होगी. 25 साल में जो हम जंगी सामान खरीदते हैं, उनमें कटौती करके एजुकेशन और मेडिकल हब बनाएंगे. तो ये एक ऐसी शुरुआत हो सकती है कि तीनों मुल्कों में लोगों के दिल एक हो जाएं. क्योंकि अगर आप बर्लिन की मिसाल देते हैं तो दोनों के दिल एक थे. यहां दिल एक नहीं हैं. यहां सियासत ने इतनी नफरतें फैला रखी हैं, इतनी कहानियां बुन रखी हैं कि वहां खबर फैला दी गई कि हिंदू बहुत जालिम होता है, काट देगा. यहां वालों को ये बता दिया गया कि मुसलमान बहुत जालिम होता है, जाओगे तो छुरी लेकर बैठा रहता है, अल्ला हो अकबर कर देगा. जहां इतने फासले हों, इतनी कहानियां हों, जब तीनों मुल्क कहानियों पर चल रहे हों, तीनों मुल्क आज तक जब ये फैसला नहीं कर सके कि बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि दोनों एक ही मुल्क की चीजें हैं, उसके लिए लड़ रहे हैं. जितना कागज बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि पर खर्च कर दिया गया, उतने में हमारी एक पूरी पीढ़ी शिक्षित हो गई होती. बजाय यह करने के उस पर पैसा बर्बाद किया गया. ऐसे एशियाई मुल्कों को आप एक नहीं कर सकते. सिर्फ यही है कि चूंकि इनके पहनावे, इनकी बोली, इनका खान-पान, रहन-सहन, मिजाज सब एक है. ये सब एग्रेसिव हैं, जरा-से में गुस्सा हो जाएं, जरा-से में आपकी जूतियां उठा लें. जरा-से में लड़ने को तैयार हो जाएं, जरा से में गुलाब का फूल लेकर खड़े हो जाएं. ये तीनों के मिजाजों में शामिल हैं. इस लिहाज से तीनों आपस में रिश्तेदार हैं. तो रिश्तेदार अगर आपस में मिल जाएं तो यही बहुत है. ये जरूरी नहीं कि सब रिश्तेदार एक घर में आकर रहने लगें.

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आजादी की लड़ाई के दौरान एक तरफ संघ और हिंदू महासभा थी और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग थी. हिंदू संगठनों का वृहद भारत का अभियान तब से चल रहा है. दूसरी तरफ मुसलमानों के खिलाफ समय-समय पर द्वेषपूर्ण अभियान भी चलता रहता है. इस अंतर्विरोध के साथ एकीकरण कैसे संभव है?

देखिए, जब इतिहास में झूठ लिखा जाने लगे, इतिहास में लिखे झूठ पर फैसला किया जाने लगे, इतिहास में लिखे सच पर पर्दा डाला जाने लगे और अगर सड़कों के नाम मिटाए जाने लगे तो ऐसे में एकीकरण के बारे में कैसे सोचा जाए? इतिहास में लिखी इस बात को नहीं तलाश किया जा रहा है कि औरंगजेब के जमाने में ही हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुल्क था. उसके बाद हिंदुस्तान घटता ही गया. ये जितने म्यांमार, नेपाल, अफगानिस्तान और काबुल ये सब हमारे ही मुल्क में थे. हिंदुस्तान सबसे बड़ा मुल्क औरंगजेब के जमाने में था. उसने पूरी जिंदगी हिंदुस्तान को बड़ा और एक करने में गुजारी. तो उसकी इस बात से पर्दा डालने में लगे हैं. अब ये बताने में लगे हैं कि उसने अपने भाई को मार दिया. अगर उसने अपने भाई को मार दिया तो अशोक ने क्या किया था? कहने का मतलब कि जब इतिहास से खराब चीजें निकालकर आप फैसला करेंगे तो कैसे होगा?

जितना कागज बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि पर खर्च कर दिया गया, उतने में हमारी एक पूरी पीढ़ी शिक्षित हो गई होती. बजाय यह करने के उस पर पैसा बर्बाद किया गया. ऐसे एशियाई मुल्कों को आप एक नहीं कर सकते 

असल में, ये सब मसले जब तक सियासत से निकालकर बाहर नहीं लाएंगे, बात नहीं बनेगी. मैं कहता रहा हूं कि जब तक साहित्यकार, लेखक, कवि, कलाकार, पत्रकार- ये 25 से 30 प्रतिशत तक संसद में नहीं आते, तब तक देश के हालात सुधर नहीं सकते, चाहे ये देश हो या वो देश हो. क्योंकि यहां से जो जाते हैं, वे केवल छुट्टी में जाते हैं पाकिस्तान और चले आते हैं. हमारी तरह वो खुले में नहीं घूमते. तो ये कैसे मेल कर सकते हैं.

जब तक यह सोचने वाले लोग न हों, जिनका मिजाज एकता का हो, तब तक ऐसा नहीं हो सकता. आप देखिए कि कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता है. इनके मिजाज जो हैं, वो नफरत करने वाले हैं, चाहे इधर के हों या उधर के हों, चाहे मुसलमान हों, या हिंदू हों, इनके यहां मुहब्बत का तसव्वुर किया ही नहीं जा सकता. इनसे हमें जंग करनी पड़ेगी, लेकिन जैसी जंग हमारे महात्मा गांधी करते थे, अहिंसा के साथ.

जिस दौरान नरेंद्र मोदी पाकिस्तान गए, उसी दौरान राम माधव ने अल जजीरा चैनल को साक्षात्कार दिया कि तीनों मुल्क कानूनी रास्ते से भाईचारे के साथ एक हो जाएंगे. क्या ये एक राजनीतिक अभियान भर है या फिर इसका कोई और निहितार्थ है? क्या ऐसा हो सकता है?

अगर राम माधव के घर के चार लोग अलग-अलग रहने लगे हों तो उनसे कहिए पहले उनको एक कर लें, हम हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश को एक कर लेंगे. जो बात लॉजिक में नहीं आती है, उसको कैसे कर लेंगे आप? ये है कि चार घर हो जाएं, लेकिन चार दिल न हों. दिल न बंटें. हम तो कहते हैं कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ये मुआयदा होना चाहिए, दिलों में ये मुहब्बत होनी चाहिए कि एक भाई पर हमला हो तो तीनों भाई मिलकर लड़ेंगे. ये फैसला सुना दें दुनिया को कि कोई जंग होगी तो तीनों मिलकर लड़ेंगे. आप देखेंगे कि पूरी दुनिया की रूह कांप जाएगी.

तीनों देशों की एकता की जो बातें आप कह रहे हैं, ये कैसे संभव है? क्या यूरोपीय संघ के तौर पर कोई संघ बन सकता है?

क्यों नहीं बन सकता? ये फर्जी मुठभेड़, फर्जी आतंकवादी, फर्जी बमबारी, ये खत्म हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा. सब मिल जाएंगे आपस में. आप बॉर्डर पर जाकर देखें तो मिलिट्री चीखती है कि इतना सख्त पहरा है कि परिंदे पर नहीं मार सकते, लेकिन पाकिस्तान की चिड़ियां हजारों की तादाद में आकर हिंदुस्तान के दरख्तों पर बैठ जाती हैं. तो वहां सब एक हैं. कोई नफरत नहीं है. एक-दूसरे से मांग कर बीड़ी पीते हैं. एक-दूसरे से मांग कर सिगरेट पीते हैं. एक-दूसरे से मांग कर दवा खाते हैं. वहां सब मुहब्बत से एक साथ हैं. अचानक एक शोशा-सा उठता है और बात बिगड़ जाती है. लेकिन सरहदी जिंदगी बड़ी खतरनाक है. कब किसको कहां पकड़कर कहां इस्तेमाल कर लिया जाए. मुजरिम बना दिया जाए, जासूस बना दिया जाए, स्मगलर बना दिया जाए, पाकिस्तानी-हिंदुस्तानी बना दिया जाए. दोनों तरफ ये है. लेकिन ये सब करना बहुत आसान है. मेरा कहना है कि अगर 25 बरस तक ये मुआयदा हो जाए कि जंग नहीं होगी तो सब ठीक हो जाएगा.

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ये एक शायर का ख्वाब है जो बहुत सुंदर लगता है. क्या अस​ल में ये संभव है?

मोदी साहब ने पिछले साल एक पहल की जो पाकिस्तान में उतर गए जहाज से, ये बड़ा काम था. इसे दुनिया किसी नजर से देखे, हम एक शायर की नजर से देखते हैं. एक इंसान की नजर से देखते हैं, एक बहादुर इंसान की नजर से देखते हैं कि अगर मोदी साहब उतरे तो इसे हिंदुस्तान की कमजोरी न समझा जाए. जिस तरह मोदी उतर सकते हैं, वैसे ही हमारी फौजें भी लाहौर में उतर सकती हैं. इसे हमारी कमजोरी न समझा जाए. लेकिन हम अगर हिंदुस्तानी हैं तो हम बड़े भाई की तरह हैं. बड़े भाई का नसीब ही ऐसा होता है कि उसे झुकना पड़ता है छोटे भाई को मनाने के लिए. मोदी इसलिए नहीं गए थे कि उनको कोई समझौता करना है वहां, झुकना है, वो तो सिर्फ उनकी मां के पैर छूने गए थे. हमने वहां सारी जिंदगी शायरी की है. हम इस रिश्ते के बारे में जानते हैं कि यह बहुत ही अजीबोगरीब रिश्ता है. हमने ये बात पहले भी कई बार कही है कि ‘कोई सरहद नहीं होती, कोई गलियारा नहीं होता, अगर मां बीच में होती तो बंटवारा नहीं होता’.
तो मैं ये कहता हूं कि अगर नेहरू और जिन्ना की मांएं भी बैठी होतीं 1947 में तो शायद हिंदुस्तान बंटता नहीं. तो अब भी अगर कोई बातचीत हो तो दोनों की मांओं को वहां मौजूद रहना चाहिए. आप देखिएगा कि इस मसले का हल निकलेगा और नफरतें बीच में पनप नहीं पाएंगी.

जब मुल्क बंटवारा हुआ, आप कितने बरस के थे. उस वक्त की कुछ बातें याद हैं?

तब हम दो बरस के थे. बंटवारे की कोई याद नहीं है. हां, मुहाजिरनामा हमारी किताब है. दरअसल, बंटवारा ऐसी कहानी है जिसको आज तक आपके माता-पिता आपको सुनाते हैं. उनके माता-पिता उनको सुनाते रहे. ये ऐसा गम है जो कभी पुराना हुआ ही नहीं. ये ऐसा गम है जो कभी मैला हुआ ही नहीं, ये हमेशा ताजा होता रहा.

दिलों में ये मुहब्बत होनी चाहिए कि एक भाई पर हमला हो तो तीनों भाई मिलकर लड़ें. ये फैसला सुना दें दुनिया को कि कोई जंग होगी तो तीनों मिलकर लड़ेंगे. आप देखेंगे कि पूरी दुनिया की रूह कांप जाएगी

बंटवारा होने के बाद आपके परिवार पर क्या असर हुआ? क्या पूरा परिवार यहीं रहा या परिवार भी बंट गया?

पाकिस्तान बना तो सबको तमाम ख्वाब दिखाए जाने लगे कि ये होगा, वो होगा. इस ख्वाब के साथ हमारी बुआएं सब चली गईं, क्योंकि उन सबके पति जाने को तैयार थे. हमारे दो चाचा चले गए. हमारी दादी चली गईं. वो दादा को भी ले गईं. पहली बार मैंने ये मुहावरा गलत होते देखा कि असल से ज्यादा सूद प्यारा होता है. क्योंकि दादी हमको बहुत चाहती थीं लेकिन हमें छोड़कर चली गईं. मेरे पिता जी नहीं गए. वो जिद्दी आदमी थे. उनसे पूछा गया कि क्या करोगे यहां हिंदुस्तान में तो बोले कि कोई काम नहीं मिलेगा तो हम अपने पूर्वजों की कब्रों की देखभाल करेंगे. लेकिन हम जाएंगे नहीं और मेरे पिता जी नहीं गए.

लेकिन पूरी जिंदगी के लिए ये जो जख्म था, जो उदासी थी, वो आज तक घरों में मौजूद है. बुआ उधर हैं, मौसी इधर हैं. खालू इधर हैं तो फूफा इधर हैं. दादी उधर हैं. मुझे तो सबसे बड़ा गम यही है कि रायबरेली के कब्रिस्तान में 600 बरस से हमारे बुजुर्गों की कब्रें बिछी हुई हैं. दो कब्रें उनमें कम पड़ती हैं, हमारी दादी की और हमारे दादा की. अगर हम कभी दुनिया के ताकतवर आदमी बन जाएं तो पाकिस्तान से उन कब्रों को नोचकर ले आएं और उनको रायबरेली की मिट्टी में बो दें. ताकि ये तरतीब जो बिगड़ गई है, वह पूरी हो जाए. जब हम लोग जाते हैं ईद-बकरीद पर कब्रों के पास, तो ये फौरन अंदाजा हो जाता है कि ये दो जगहें खाली रह गई हैं. यहां हमारे दादा और दादी को होना चाहिए था.

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पाकिस्तान में रह रहे आपके परिजन, जिनको लेकर आप इतने भावुक हो जाते हैं, उनसे मिलने कभी पाकिस्तान गए आप?

हां, कई बार गया हूं. मुशायरों के हवाले से गया हूं. पहली बार 1990 में गया था. फिर 2006 से 08 तक लगातार गया. इसके बाद मैं बीमार हो गया. घुटनों का आॅपरेशन हुआ था. 2009 से 2013 तक इसी से परेशान रहा तो जाना नहीं हुआ. अबकी मैंने जाने का इरादा किया था, मुशायरा था, उन लोगों ने बुलाया था, लेकिन यहां सहिष्णुता और असहिष्णुता का मामला चल रहा था. हमने सोचा कि कुर्सियों पर जो नालायक लोग बैठे हैं, जब ये कह रहे हैं कि ये पता लगाना चाहिए कि अखलाक पाकिस्तान क्यों गया था, बजाय इसके कि अपने जुर्म पर निगाह डालें, अपने जुर्म पर शर्मिंदा हों, अपने गुनाह पर परेशान हों, ये कह रहे हैं कि अखलाक पाकिस्तान क्यों गया था. तो अगर मैं चला जाऊंगा तो ये फौरन बोल देंगे कि ये पाकिस्तान गया था, वहां से ये लेकर आया है वो लेकर आया है. मैंने कहा था टीवी पर बहस के दौरान कि 67 बरस में बिजली के तार तो जोड़ नहीं सके, लेकिन हमारे तार दाऊद इब्राहिम से जोड़ देते हैं.

असहिष्णुता की बहस में आप भागीदार रहे. उस पूरे प्रकरण पर क्या राय बनी आपकी?

दिक्कत ये है कि जब चिंतन को आप अपनी आलोचना समझने लगें तो इसका मतलब है कि आप पागल हो चुके हैं. आपका मेडिकल ​ट्रीटमेंट होना चाहिए. हमारी चिंता को आप आलोचना कह रहे हैं. हम ये कह रहे हैं कि इस देश में अगर सौ आदमी अचानक उठते हैं और एक आदमी को मार डालते हैं तो इसका मतलब है कि अगर इस एक्शन का रिएक्शन, रिएक्शन का फिर एक्शन होने लगा तो पूरा मुल्क गोधरा और गुजरात बनकर रह जाएगा. अगर ये बात मैंने कही तो मैंने बुरी बात कहां कही? ये मेरे चिंतन का विषय था, इसको आपने आलोचना कहा और फौरन कह दिया कि यहां-वहां से पैसा आ गया होगा, बिहार से ये मिल गया होगा, कांग्रेस से वो मिल गया होगा. ये कितने बेवकूफ लोग हैं कि ये सरस्वती पुत्रों को रिश्वतखोर अफसर समझते हैं. भगवान इनको सद्बुद्धि दे और क्या कहा जा सकता है?

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 15, Dated 15 August 2016)

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