‘मेरी रग-रग में बसा है साम्यवाद’

पिनाराई पिजयन | 70 | मार्सर्वादी कम्युनिस्ट पाटीर् के पोनित ब्यूरो सदस्य
पिनाराई पिजयन | 70 |
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य

राज्य पार्टी के 50 वर्ष के इतिहास में 17 वर्षों तक उसका नेतृत्व करनेवाले पिनाराई को हर कोई अपने नजरिए से देखता है. एक खास दूरी के साथ पार्टी के सदस्यों (कार्ड होल्डर) के लिए वह बेहद सम्मान और आदर के पात्र हैं. दक्षिणपंथियों के लिए वह एक ऐसे व्यावहारिक वामपंथी हैं जो प्रतिबद्धता और विचारधारा के बजाय शासन-प्रशासन को अधिक तरजीह देता है. क्रांतिकारी झुकाव रखनेवाले मध्यवर्ग के अच्छे खासे हिस्से में उन्हें एक ऐसा खलनायक बनाकर तिरस्कृत भी किया जाता है, जिसने कॉर्पोंरेट और वर्ग शत्रुओं से गठबंधन करने के चक्कर में कम्युनिस्ट मूल्यों व सिद्धांतों की बलि दे दी है.लेकिन इस सबके बावजूद पार्टी के बाहर और भीतर विरोधी खत्तों में ‘दक्षिणपंथी’ और ‘भ्रष्ट’ माने जानेवाले पिनाराई विजयन ने अपने काम करने की चाल-ढाल को नहीं छोड़ा है. मैथ्यू सैम्यूएल को दिए अपने एक खास इंटरव्यू में वह साफ कहते हैं कि साम्यवाद (कम्युनिज्म) तो उनकी रग-रग में बसा है. पार्टी में उनको एक समय नापसंद करनेवाले कट्टर विरोधी और लोकप्रिय नेता वी.एस. अच्युतानंदन के चलते भले ही उन्हें आज अपने तौर तरीकों से काम करने का मौका नहीं मिल पा रहा है. गौरतलब है कि अच्युतानंदन से झगड़े के चलते एक वक्त उन्हें अपनी पोलित ब्यूरो की सदस्यता से भी हाथ धोना पड़ा था. लेकिन बदले हालात और अच्युतानंदन व उनके बीच घटती दूरी के कारण इस 70 वर्षीय नेता की फिर से चुनावी राजनीति में आने की पदचाप सुनाई दे रही है. पिनाराई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है. केरल में अगरचे इतिहास खुद को दोहराता है तो पिनाराई ईश्वर का अपना राज्य कहे जानेवाले इस प्रदेश की अगुआई करते दिखाई पड़ सकते हैं. और अगर ऐसा हो जाता है तो निसंदेह यह कायापलट का संकेत भी होगा. पेश है उनके इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण संपादित अंश.

आपने केरल में माकपा का 17 वर्ष तक नेतृत्व किया है. आपने पार्टी के इतिहास में सबसे अधिक समय तक सचिव के दायित्व का निर्वहन किया है. उथल-पुथल के उस दौर पर बात करने से पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आप साम्यवादी (कम्युनिस्ट) आंदोलन की ओर आकर्षित कैसे हुए

मैं अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के लिए किसी व्यक्ति विशेष या फिर आत्मगत प्रभाव को तो जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहता हूं. मेरा जन्म पिनाराई में हुआ. यह केरल के पारापरम गांव के पास स्थित है. पारापरम वो गांव है जहां कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे पहली मीटिंग आयोजित हुई थी. मुझे आज भी याद है कि उस वक्त किए जा रहे पुलिसया अत्याचारों के दौरान भी हमारे इलाके से कई व्यक्ति ऐसे थे जो कम्युनिस्ट बन चुके थे.

मैं अपने गांव के आसपास कम्युनिस्ट कायकर्ताओं पर लगातार की जा रही पुलिस की ज्यादतियों व अत्याचारों की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ. यह 1948 का दौर था. उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा हुआ था. इस दौर में कम्युनिस्ट नेता भूमिगत ( अंडरग्राउंड) होकर काम कर रहे थे. पुलिस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के कार्यकर्ताओं का लगातार सुनियोजित तरीके से दमन कर रही थी.

बचपन में मेरी मां ने मुझे पुलिसया दमन और बर्बरता की कई कहानियां सुनाई थीं. मेरी यादों में मेरे बचपन की एक घटना आज भी ताजा है. एक दिन मेरी मां घर के कुएं के पास मेरा हाथ पकड़े खड़ी थीं और पास के इलाके में कम्युनिस्टों की खोज में जुटी पुलिस का एक किस्सा बता ही रहीं थीं कि उसी वक्त पुलिस और कुछ गुंडों ने हमारे घर पर धावा बोल दिया. उन्होंने हमारे घर के सारे समान को बाहर फेंक दिया. इसके बाद पुलिस मेरे बड़े भाई , जोकि कम्युनिस्ट समर्थक था, को बुरी तरह से पीटने के बाद गिरफ्तार करके अपने साथ ले गई. पुलिसया दमन की यह घटना और ऐसी कई घटनाओं के साथ-साथ बहादुर कम्युनिस्टों के प्रतिरोध की कहानियां आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं. ये कहानियां और जीवन के अनुभवों ने मेरे स्कूली दिनों में मुझे कम्युनिस्ट बनने के लिए प्रेरित और प्रभावित किया. .

बचपन में मुझे राक्षसों से डर लगता था. लेकिन मेरा झुकाव वामपंथ कीओर भी बढ़ रहा था. मुझे याद है कि हाई स्कूल में पहुंचने तक मैं नास्तिक बन चुका था

क्या यह कहना सही होगा कि बचपन से ही आपका वामपंथ की ओर झुकाव था. शायद आपका पालन-पोषण कुछ अलग तरह से हुआ था. क्या आप अपने स्कूली जीवन में नास्तिक थे?

बिलकुल नहीं! मेरा बचपन किसी अन्य निम्न वर्गीय बच्चे की तरह ही था. पर जैसा मैंने पहले कहा है कि मेरे बचपन के दिनों से ही मेरा दिल -दिमाग साम्यवाद की ओर आकर्षित हो गया था. कई पौराणिक कथाओं को सुनते हुए मैं बड़ा हुआ हूं. मुझे राक्षसों और शैतानों से बहुत डर लगता था. मुझे आज भी याद है कि मैं अपने स्कूली दिनों में रसोई के पास बैठकर पढ़ा करता था क्योंकि मेरे मन में उस समय यह डर समाया हुआ था कि अगर मैं अकेला रहा तो शैतान मुझे पकड़ लेंगे. रसोई में मेरी मां काम करती रहती थी. इस वजह से मुझे कुछ संतोष मिलता था. जब मैं बड़ा होने लगा उसी दौरान मैंने थैयम देखने के लिए कवयूकल ( ये वो मंदिर हैं जहां छोटी जाति के लोग पूजा के लिए जाते हैं. थैयम इनके वार्षिक उत्सव का एक अनुष्ठान या एक किस्म की रस्म होती है) जाने लगा. अगर मुझे सही याद पड़ता है तो मैं हाई स्कूल में पहुंचने तक नास्तिक बन चुका था.

अपने राजनीतिक विकास के आरंभिक दौर में आपको किन दिग्गज नेताओं ने प्रभावित किया? उस वक्त वो कौन से प्रमुख मसले थे जिनसे पार्टी जुझ रही थी?

केरल पार्टी के संस्थापक सदस्य पी. कृष्णापिल्लई वो नेता थे जिनके बारे में हम अपने बचपन से सुनते आ रहे थे. जब मैं पार्टी में सक्रिय हुआ तो ई.एम.एस नंबूदरीपाद, ए.के .गोपालन और ई.के नाॅयनार जैसे कई दिग्गज नेता , पार्टी के प्रतीक बन चुके थे. पट्टीयम गोपालन जैसे प्रमुख नेता भी थे जब मैं छात्र था. यह वो वक्त था जब साम्यवादियों को कांग्रेस व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दोनों की ओर से हमले झेलने पड़ रहे थे. खासकर आरएसएस केरल के उत्तरी भाग को टारगेट कर रही थी. थलासेरी में मुसलमानों के खिलाफ हुए सांप्रदायिक दंगे उनकी कार्य प्रणाली का एक बेहतरीन नमूना थे. ये सोच-समझकर भड़काए गए दंगे थे. इन दंगों में हमने अपने दो कामरेडों को हमेशा के लिए खो दिया. वे दोनों मुसलमानों का बचाव करने के दौरान मारे गए. मैं भी उन पार्टी कार्यकर्ताओं में से एक था जिसने आरएसएस से अल्पसंख्यकों को इस नरसंहार से बचाने की कोशिश की थी. यह एक मुश्किल काम था. लेकिन हम इसमें सफल इसीलिए हो पाए क्योंकि हमारे साथ जनता पीछे खड़ी थी.

इस तरह के अनुभवों ने शायद आपको सैद्धांतिक हठधर्मी बना दिया है या फिर माकपा जैसी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए इस तरह की हटधर्मिता आवश्यक है? क्या जब आप चुनावी राजनीति में शिरकत करेंगे तो अपने कामकाज के तरीके बदलेंगे?

(मुस्कुराते हुए) ये सब व्यक्तियों के व्यक्तिगत गुण होते हैं. अच्छा अब क्या तुम यह भी मानते हो कि मैं कभी हंसता नहीं हूं? अरे, भई मैं भी हंसता हूं पर तभी जब उसकी कोई वजह होती है. चुनावी राजनीति में जाने से संबंधित तुम्हारे सवाल का जो दूसरा हिस्सा है, उसका मैं अभी जवाब नहीं दूंगा. हां पार्टी का नेता होने के नाते मैं वर्तमान परिस्थितियों पर टीका-टिप्पणी अवश्य कर सकता हूं. मैं नॉयनार मंत्रिमंडल में थोड़े समय के लिए मंत्री था. इस दौरान जिन्होंने भी मेरा विरोध किया वे आज मेरे कार्यों और प्रयासों की सराहना कर रहे हैं. 1996 में जब लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सत्ता में आया तो राज्य गहरे बिजली संकट से जुझ रहा था. यहां बिजली की भारी कमी थी. सो तब हमारी सरकार की प्राथमिकता थी कि बिजली के क्षेत्र (पॉवर सेक्टर) में सुधार किए जाएं और यह जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई. और मुझसे जो भी बेहतर बन पड़ा मैंने किया.

राज्य सचिव के तौर पर 17 वर्षों तक काम करने के बाद, आपके नेतृत्व में पार्टी में आए बदलावों के बारे में आपकी क्या राय है? माकपा को मजबूत बनाने में आपका क्या योगदान है?

केरल में माकपा के पास एक लंबी परंपरा रही है जिसमें वरिष्ठ नेताओं जैसे ईएमएस नम्बूदरीपाद, एके गोपालन, सीएच कनरन और कई अन्य नेताओं की शानदार विरासत शामिल है. पार्टी के संस्थापक पी कृष्णापिल्लई और अन्य नेताओं द्वारा झेली गई तमाम कठिनाइयों की वजह से पार्टी मजबूत हुई. पार्टी की मौजूदगी के इन सभी वर्षों के दौरान, केरल के सामाजिक उतार-चढ़ाव और यहाँ के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ में माकपा का एक विशेष स्थान रहा. माकपा ने कभी भी अपने आप को जनता से दूर नहीं होने दिया. लोगों के मुद्दे उठाने में पार्टी सबसे आगे रही और जब हम सत्ता में नहीं रहे तब भी हमने आगे बढ़कर जनता के मुद्दे उठाए. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सत्ता में रहने के बावजूद संघर्ष जारी रखने के लिए हमारी आलोचना भी करते हैं.

माकपा आज भी मजदूर वर्ग की अपनी विचारधारा पर अडिग है. हम इस देश के वंचित तबको के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं

लेकिन ऐसा केवल इस वजह से हुआ कि हम उस समय भी लोगों का भरोसा कायम रखने में सफल रहे जब हमें राज्य में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. हमारे सामूहिक राजनीतिक प्रयास महत्वपूर्ण रहे और इसका क्रेडिट (श्रेय) कोई एक व्यक्ति नहीं ले सकता है. यह समग्रता में पार्टी की उपलब्धि है. हमारी पार्टी में हर बात पर सामूहिक रूप से चर्चा करने और इसके अनुसार निर्णय लेने की व्यवस्था मौजूद है.

माकपा में अंदरूनी लड़ाई कोई नई बात नहीं है. आपके द्वारा जिम्मेदारी संभालने से पहले, केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई में गुटबाजी को लेकर तीखी भर्त्सना की थी. लेकिन निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि जिन वर्षों के दौरान आप वहाँ प्रभारी थे, तब पार्टी में अंदरूनी लड़ाई सार्वजनिक तौर पर सामने आई. आप इस विचलन का सामना किस तरह कर सके? आपके अनुसार इसके कारण क्या हैं ?

देश में किसी भी राज्य में माकपा को ऐसी अंदरूनी लड़ाई नहीं झेलनी पड़ी हैं जैसी कि उसे केरल में झेलनी पड़ी. गुटों के बीच के झगड़े ऐसी चीज थी जिसने पार्टी के आधार को हिला दिया. इस समस्या का हल ढूंढ़ने में केंद्रीय नेतृत्व भी सहयोग करने के लिए हमारे साथ आकर खड़ा हुआ. इन सभी कारणों के मिले-जुले प्रभाव से, हम धीरे-धीरे गुटबाजी को नियंत्रित करने में सक्षम हुए हैं. राज्य में पार्टी को नष्ट करने की चाहत रखने वाले लोगों ने मीडिया के माध्यम से इसे ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया. पक्षपातपूर्ण और आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित की गईं और आज भी प्रकाशित की जा रही हैं. मेरे विचार से, हमारी नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने की इस कोशिश का पार्टी ने सफलतापूर्वक मुकाबला किया है. हम कभी भी अपने सामाजिक आधार से दूर नहीं हुए और संकट का सामना करने के हमारे तरीके से भी यह बात पता चलती है. केंद्रीय नेतृत्व से राज्य इकाई को मिले समर्थन को देखकर भी राज्य इकाई वाकई काफी अभिभूत हुई.

हाल ही में राज्य इकाई की बैठक से वरिष्ठ नेता वीएस अच्युतानंदन के बैठक छोड़कर चले जाने से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के विचारों में मतभेद एक बार फिर से सबके सामने आ गए. क्या अच्युतानंदन का व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी नेतृत्व को उनके खिलाफ कार्रवाई करने से रोक रहा है?

इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया गया है. पार्टी के पोलित ब्यूरो ने भी इस मामले को काफी गंभीरता से लिया है.

राज्य में जातिवाद लगातार मजबूत हो रहा है. मध्यवर्ग के बीच भी अपनी जाति और धर्म पर जोर देने की प्रवृत्ति हावी होती दिख रही है

केरल के कम्युनिस्ट आंदोलन को निकटता से जाननेवाले लोगों का कहना है कि अब पार्टी नेताओं के काम करने की शैली बदल गई है. पार्टी लगभग पिछले दशक के दौरान अधिक बाजार-उन्मुख हो गई है. उनका कहना है कि पार्टी की ‘पेरिपुवदा’ ‘कत्तन छाया’ संस्कृति ने क्रोनी कैपिटलिजम की घुसपैठ का रास्ता खोल दिया है.आलोचक उदाहरण देते हैं कि बड़े उद्यमियों और व्यवसायियों की मदद से माकपा ने एक टेलीविजन चैनल शुरू किया है.

कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह बेहद स्वाभाविक है कि वह समय के अनुसार बदले. इसी भावना के साथ हमारी पार्टी भी बदली है. वह निश्चित तौर पर पुरानी शैली और तरीकों को छोड़कर आगे बढ़ गई है हालांकि हम मजदूर वर्ग की अपनी विचारधारा पर आज भी उसी मजबूती से डटे हैं जैसे कि हम पुराने समय में हुआ करते थे. कम्युनिस्ट पार्टी के तौर पर, हम इस देश के वंचित तबके और मजदूर वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और लगातार खड़े रहेंगे. जहाँ तक आप टेलीविजन चैनल की बात कर रहे हैं, कैराली टीवी कोई पार्टी चैनल नहीं है. जब कुछ युवा लोग एक टेलीविजन चैनल शुरू करने के विचार के साथ हमारे पास आए तो पार्टी ने इस पर विचार किया और आखिरकार हमने इसे मदद करने का फैसला किया क्योंकि न सिर्फ हम, बल्कि स्वतंत्र राय रखनेवाले कई लोग भी एक अलग तरह के टेलीविजन चैनल की जरूरत महसूस करते हैं जो समाज की समस्याएँ प्रसारित करने के लिए पर्याप्त समय दे. आज सभी ओर असर डालनेवाली संचार क्रांति से दूर रहना कोई समझदारी नहीं है. हमने चैनल के लिए फंड इकट्ठा करने को समर्थन दिया हालांकि ‘कैराली’ को माकपा चैनल के तौर पर कहे जाने की आलोचना होती है, लेकिन हमने इसे पार्टी चैनल के तौर पर बदलने की चाहत कभी नहीं रखी. जब पार्टी ने देशाभिमानी दैनिक शुरू किया तो हमने लोगों से फंड इकट्ठे किए. एके गोपालन जैसे बड़े नेता फंड इकट्ठा करने के लिए श्रीलंका जैसे देशों में गए. तो इसमें कोई विचलन नहीं है.

जिस दौरान आप माकपा के राज्य सचिव थे, उस समय कई पार्टियों ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को छोड़ दिया। कई लोगों ने कहा कि आपके हठधर्मी रवैये की वजह से ये पार्टियाँ एलडीएफ छोड़कर गईं. यहाँ तक कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी कहा कि फ्रंट छोड़नेवाली पार्टियों को वापिस लाने के लिए समझाया जाना चाहिए था.

हमें उन लोगों से कोई समस्या नहीं थी जो हमें छोड़कर चले गए. पीजे जोसेफ की केरल कांग्रेस को माकपा या लेफ्ट फ्रंट से कोई समस्या नहीं रही और वे कोई कारण बताए बगैर फ्रंट को छोड़कर चले गए. जनता दल ने कोझिकोड संसदीय निवार्चन सीट से सीट शेयरिंग के मुद्दे पर फ्रंट को छोड़ा. यहाँ तक कि केंद्रीय नेतृत्व ने उनके सामने एक फार्मूला पेश किया लेकिन जनता दल नेतृत्व कोई समझौता करने को अनिच्छुक था. असल में हमें आरएसपी से भी कोई दिक्कत नहीं थी हालांकि वे कोल्लम संसदीय निर्वाचन सीट का मामला उठाते रहे. माकपा इस सीट से 10 से भी अधिक वर्षों से चुनाव लड़ती रही है. असल में, जब उनकी मांग पर बातचीत आगे बढ़ ही रही थी तभी आरएसपी ने फ्रंट छोड़ दिया.

मेरी साफ मान्यता है कि जो भी समाज विरोधी बात करेगा, मैं उसकी आलोचना करूंगा. मैं अपनी शैली नहीं बदलनेवाला मुझे अपने स्टैंड पर पूरा भरोसा है

क्या फ्रंट छोड़नेवाली पार्टियों को वापिस बुलाते हुए उनका स्वागत किया जाएगा?

यदि वे वाकई एलडीएफ में वापिस आना चाहते हैं तो उन्हें पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) से गठबंधन समाप्त करना होगा और यूडीएफ के साथ गठबंधन तोड़ने की अपनी नीति की सार्वजनिक तौर पर घोषणा करनी चाहिए.

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