‘दुर्भाग्य से हमारे पास इतनी पावर नहीं है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें या किसी को नोटिस भेजकर यहां आने पर मजबूर कर सकें’ | Tehelka Hindi

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‘दुर्भाग्य से हमारे पास इतनी पावर नहीं है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें या किसी को नोटिस भेजकर यहां आने पर मजबूर कर सकें’

सोशल मीडिया के लंपट गिरोहों से पीड़ित महिलाओं को कहां राहत मिलेगी, यह अभी किसी को नहीं पता. कुछ महिलाओं ने पुलिस में शिकायत की लेकिन ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही. ऐसे में महिलाएं क्या करें? इस बारे में राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरमैन ललिता कुमारमंगलम से बातचीत.

कृष्णकांत 2016-06-15 , Issue 11 Volume 8

LalithaKumarmangalmWeb

सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित महिलाओं के साथ गाली-गलौज की जाती है, मारने या बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं. क्या महिला आयोग इस पर संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई कर रहा है?

यह महिलाओं की गरिमा का अपमान है. कार्रवाई तो हम कुछ नहीं कर सकते. स्वत: संज्ञान भी हम कहां से लें? कैसे लें? हाल ही में जो कविता कृष्णन के साथ हुआ, उस मामले में कानूनी तौर पर हम क्या कर सकते हैं? अगर हम कुछ कहें तो ‘फ्रीडम आॅफ स्पीच’ की बात आ जाती है. संविधान में फ्रीडम आॅफ स्पीच है, लेकिन संविधान में ये भी लिखा है कि महिला के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए. अब कोर्ट तो हम नहीं जा सकते, लेकिन अगर कविता जाना चाहती हैं तो हम उनका सपोर्ट करेंगे. लेकिन एक मसला यह भी है कि अगर कोई मसला कोर्ट में विचाराधीन है तो हम हस्तक्षेप ही नहीं कर सकते. हमें इसकी इजाजत नहीं है. कोर्ट में जो मामला है, वह सिर्फ कोर्ट ही देखती है. हमने ऐसी घटनाओं की निंदा की है, उससे ज्यादा क्या कर सकते हैं?

मुझे नहीं पता कि महिलाएं इतना क्यों बर्दाश्त करती हैं. उनको कोर्ट जाना चाहिए. कविता से मैंने इस बारे में बात तो नहीं की है, लेकिन कल तक मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली कि वे कोर्ट गईं या नहीं. अगर वे कोर्ट जाना चाहती हैं तो हमारा सपोर्ट रहेगा. दुर्भाग्य से हमारे देश में किसी भी मामले में तुरंत मानवाधिकार, फ्रीडम आॅफ स्पीच वगैरह आ जाता है. तथाकथित उदारवादी बनाम अनुदारवादियों का मामला बन जाता है. मुद्दों के राजनीतिकरण से मूल मुद्दा कमजोर हो जाता है और राजनीति शुरू हो जाती है.

लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसे मामले में मानवाधिकार या फ्रीडम आॅफ स्पीच का मुद्दा उठेगा. गाली देना तो कोई आजादी नहीं है? सागरिका घोष और प्रियंका चतुर्वेदी को बलात्कार करने की धमकी दी जाती है. यह तो साफ तौर पर अपराध है?

हां, यह अपराध है और उनको शिकायत करनी चाहिए. वे शिकायत करें तो फिर हम कुछ जरूर करेंगे. समस्या ये हो जाती है कि अगर मैं खुद से उनके पास जाती हूं तो वाम बनाम दक्षिण बनाम ये बनाम वो… हम ये भूल जाते हैं कि ये मसला कितना गंभीर है. मैं बार-बार यही कहती हूं कि कृपया इस मसले पर राजनीति न करें. आप किसी पार्टी से, किसी भी विचारधारा से हों, पर हम सब हैं तो महिलाएं ही. अगर इतनी बड़ी-बड़ी महिलाएं सागरिका जी या कविता जी वगैरह असुरक्षित हैं तो इस देश में सुरक्षित कौन है? अगर हम सब एक साथ जुड़ते हैं तो इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. जब तक मैं महिला आयोग में हूं, मैं निश्चिंत कर दूं कि मैं राजनीति नहीं कर सकती हूं, खास तौर से ऐसे मुद्दों पर. राजनीति छोड़कर सारी महिलाओं को एकजुट हो जाना चाहिए, जैसे निर्भया के बाद किसी ने राजनीति नहीं देखी क्योंकि जनता का दबाव आ गया था. इसलिए मेरी निजी राय है कि जनता की ओर से दबाव उत्पन्न कीजिए, इस हद तक कि कोई भी ऐसा करने से डरे. अभी वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे जानते हैं कि बच जाएंगे. 

मैं मानती हूं कि सोशल मीडिया पर महिलाओं को गाली-गलौज, धमकी और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, असहिष्णुता भी है. मैं अगर कहूं कि आप जो कह रहे हैं वह गलत है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको धमकी दूं या बुरे-बुरे शब्द इस्तेमाल करूं.

क्या महिला आयोग इस मसले पर अपनी तरफ से कोई पहल कर सकता है? स्वत: संज्ञान ले सकता है? कार्रवाई कर सकता है? या फिर सरकार को कोई मशविरा भेज सकता है कि इस चलन को रोकने की कोशिश की जाए?

नहीं. देखिए, सिर्फ कानून इस मामले में कुछ कर सकता है और कानून की बहुत लंबी प्रक्रिया है. हमने पहले भी इनडीसेंट रिप्रेजेंटेशन आॅफ वूमेन (प्राेहिबिशन) ऐक्ट को लेकर बहुत सारी टिप्पणियां की हैं. अध्ययन किया है. सरकार को भेजा भी है. कंसल्टेशन वगैरह की भी कोशिश की है. अभी न्यू ड्राफ्ट वूमेन पॉलिसी में भी ये मुद्दा आया है. तो यह विचार-विमर्श में तो है. हम महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी अपनी टिप्पणी भेज रहे हैं. हम सूचना प्रसारण मंत्रालय के भी पास जाएंगे. अब मसला ये है कि विभिन्न मंत्रालयों का झंझट  है. मंत्रालयों को सिर्फ नेता नहीं चलाते, नौकरशाह चलाते हैं. फाइल में कोई कुछ लिख देगा, तो क्या करेंगे? जैसे निर्भया फंड के मामले में असली कहानी यह है कि किसी ने उसकी फाइल पर लिख दिया कि सीसीटीवी कैमरे जेंडर सेंसिटिव होने चाहिए. अब आप बताइए कि कैमरा कभी जेंडर सेंसिटिव हो सकता है? कैमरा लगाने का मतलब ये है कि लोगों के मन में डर पैदा हो कि महिला के साथ कुछ करते हैं तो वह रिकॉर्ड हो जाएगा. अब ऐसे कारणों से फाइल रुक जाती है और यह किसी मंत्री ने नहीं लिखा है. लेकिन आरोप मंत्री पर आएगा फिर राजनीति शुरू हो जाएगी. महिला आयोग किसी भी पीड़ित महिला को सपोर्ट करने का इच्छुक है, लेकिन पहल उनको करनी होगी.

असहमति के नाम पर किसी को सार्वजनिक मंच पर गाली देने से खराब कुछ हो नहीं सकता. इसे कैसे रोका जा सकता है?

मैं मानती हूं कि मैं किसी से असहमत हो सकती हूं लेकिन गाली-गलौज नहीं होनी चाहिए. लेकिन अब इसका क्या करें? अब जो हो सकता है वह कानून की मदद से या फिर संसद में कानून बनाया जा सकता है. लेकिन कानून बनाने की लंबी प्रक्रिया है. तब तक क्या करें? चुप रहने से तो कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि जहां तक मुझे मालूम है, यह सब और बढ़ रहा है. हम एक मीटिंग बुलाकर लोगों के साथ इस पर चर्चा भी करेंगे कि क्या किया जा सकता है. प्रतिष्ठित महिलाओं और आम महिलाओं को साथ लेकर एक दबाव समूह तैयार किया जा सकता है जो ऐसा करने वालों पर दबाव डाले, जो सरकार के मंत्रियों से जाकर मिले, उनसे कहे कि सर आप ऐसा कर सकते हैं और कीजिए, यह जरूरी है. ऐसा करने पर जरूर कुछ होगा.

दुर्भाग्य से हमारे पास इतना पावर नहीं है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें या किसी को नोटिस भेजकर यहां आने पर मजबूर कर सकें. अगर हम किसी आरोपी को एक दफा सार्वजनिक तौर पर बुला पाएं तो भी उन पर दबाव बनेगा. महिला आयोग ने मांग रखी है कि हमें कम से कम उतना अधिकार दे दीजिए, जितना मानवाधिकार आयोग को है कि हम किसी की गिरफ्तारी की सिफारिश कर सकें. महिला आयोग महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए जो कुछ हो सकता है, वह जरूर करेगा.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 11, Dated 15 June 2016)

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