पुलिस तंत्र में आपको पता नहीं चलता कि कब आप मनुष्य से पशु बन गए : वीएन राय | Tehelka Hindi

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पुलिस तंत्र में आपको पता नहीं चलता कि कब आप मनुष्य से पशु बन गए : वीएन राय

विभूति नारायण राय भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति रहे हैं. इससे इतर एक संवेदनशील कथाकार के रूप में भी उन्हें साहित्यिक जगत में प्रतिष्ठा हासिल है. ‘शहर में कर्फ्यू’, ‘किस्सा लोकतंत्र’ और ‘प्रेम की भूतकथा’ इनके चर्चित उपन्यास हैं. सांप्रदायिक दंगों में भारतीय पुलिस की भूमिका पर इनका उल्लेखनीय शोध-कार्य है. 22 मई, 1987 को उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा में घटित भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय पर हाल ही में ‘हाशिमपुरा 22 मई’ नाम से उनकी बहुप्रतीक्षित किताब प्रकाशित हुई है. इस किताब के बहाने उनसे बातचीत.

2016-08-31 , Issue 16 Volume 8

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आपकी किताब  ‘हाशिमपुरा 22 मई’  को लेकर कई तरह के विवाद उठ खड़े हुए. पहली बार हाशिमपुरा हत्याकांड के संदर्भ में भारतीय सेना के आचरण पर भी उंगलियां उठाई गई हैं. आपने इस घटना को भारतीय राज्य की विफलता के रूप में देखा है. क्या इस निंदनीय घटना पर कुछ और प्रकाश डालेंगे?

मेरे मतानुसार, हाशिमपुरा भारतीय राज्य के सभी स्टेक होल्डरों की असफलता की गाथा है. तफ्तीश करने वाली एजेंसी सीआईडी ने सेना की भूमिका की पड़ताल ही गंभीरता से नहीं की. राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह से हाशिमपुरा हत्याकांड के निहितार्थ को समझने में असफल रहा. प्रेस ने भी शुरुआत में ही इस जघन्य घटना को दबाने का प्रयास किया. अदालतों में घिसट-घिसट कर चले इस मुकदमे का फैसला होने में पंद्रह वर्षों से अधिक का समय लग गया. इस तरह से आप देखें तो हाशिमपुरा को भारतीय राज्य ने कभी भी चुनौती  के रूप में नहीं लिया. कभी भी यह महसूस नहीं किया गया कि राज्य की एक एजेंसी के द्वारा देश की राजधानी के बगल में 42 मुसलमानों को पकड़कर मार देने और दोषियों को दंड न मिलने से धर्म निरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों के सामने बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा. मेरा मानना है कि भारतीय राज्य ने कभी भी हाशिमपुरा के निहितार्थ को समझने का गंभीर प्रयास किया ही नहीं.

काफी समय से इस किताब का इंतजार किया जा रहा था. इसे लिखने और फिर प्रकाशित करवाने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा?

इस किताब को लिखने और प्रकाशित करवाने में मुझे 20 वर्ष से अधिक लग गए. इसके पीछे कई कारण थे. व्यस्तता, आलस्य और लापरवाही से अधिक इस हत्याकांड से जुड़े सैकड़ों लोगों से मिलना, उनके इंटरव्यू लेना, हजारों की तादाद में फैले सरकारी दस्तावेजों तक पहुंचना, उनका अध्ययन कर उसमें से काम की चीजें छांटना और ऐसे ही बहुत-से काम थे जिन्हें करने में उम्मीद से अधिक समय लगा. फिर इसके प्रकाशक पेंगुइन ने अपना समय लिया. वे मूलतः अंग्रेजी के प्रकाशक हैं, इसलिए उनकी प्राथमिकता के अनुसार अंग्रेजी में अनुवाद तो आ गया पर मूल हिंदी किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हो सकी है. आशा है कि इसका हिंदी संस्करण अगले महीने तक आ जाएगा.

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किसी लेखक के निर्माण में उसका परिवेश कितना जिम्मेदार होता है?

साहित्य समाज सापेक्ष होता है. मेरा यह मानना है कि वह किसी शून्य से नहीं उपजता और न ही उसकी कोई समाज निरपेक्ष भूमिका होती है. लेखक अपने समय, परिवेश और परंपरा से जो कुछ ग्रहण करता है उसका लेखन उसी का रचनात्मक परिणाम होता है.

यह महसूस नहीं किया गया कि 42 मुस्लिमों को मार देने और दोषियों को दंड न मिलने से धर्म निरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों पर सवाल खड़ा हो जाएगा

साहित्य के प्रति किस उम्र में लगाव पैदा हुआ?

बचपन से ही मेरी रुचि लिखने-पढ़ने की रही है. सौभाग्य से जिन छोटे शहरों में मेरा बचपन बीता उनमें दुर्लभ पुस्तकालय थे. मैंने विश्व का बहुत-सा क्लासिक साहित्य इन्हीं पुस्तकालयों की वजह से अपने बचपन में पढ़ा. मेरे छात्र जीवन के दौरान धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान और सारिका जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाएं निकला करती थीं और बड़े प्रतिष्ठानों की होने के बावजूद ये काफी हद तक व्यावसायिक दबावों से मुक्त थीं. इनमें मुझे समकालीन प्रतिष्ठित हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठित रचनाओं के अतिरिक्त विश्व भर की महत्वपूर्ण कृतियों को पढ़ने का मौका मिला.

लेखन की शुरुआत किस तरह हुई?

पढ़ने के साथ लिखने की शुरुआत भी छात्र जीवन में ही हुई. स्वाभाविक था कि शुरू में मैंने कविताएं लिखीं और पहली कविता बनारस से छपने वाले अखबार आज में प्रकाशित हुई. धीरे-धीरे यह समझ में आया कि कविता को साधना मेरे वश का नहीं है और फिर मैंने गद्य की विधाओं में काम करना शुरू किया. शुरू में कहानियां और व्यंग्य लिखे जो उन दिनों की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं- शंकर्स  वीकली, धर्मयुग, कादम्बिनी, दिनमान और कल्पना में प्रकाशित भी हुए.

आप किन लेखकों को पढ़ते हुए बड़े हुए या दूसरे शब्दों में कहें तो आपके व्यक्तित्व के निर्माण में किन लेखकों और किताबों की भूमिका है?

धीरे-धीरे मेरी दिलचस्पी कथा साहित्य में बढ़ती गई और मुख्य रूप से प्रेमचंद, रेणु, राही मासूम रजा, अमृतलाल नागर जैसे हिंदी के लेखक मेरे प्रिय रहे हैं. विदेशी लेखकों में मैंने टॉलस्टॉय, गोर्की, चेखव, तुर्गनेव, मोपासां, हेमिंग्वे और मार्खेज को खूब पढ़ा. इन सभी को पढ़ते हुए साहित्य की मेरी समझ विकसित हुई और मैंने संस्कार ग्रहण किए.

भारतीय राज्य को ले लें, न तो इसे आप क्लासिक अर्थों में फासिस्ट राज्य कह सकते हैं और न ही यह पूरी तरह से लोकतंत्र बन पाया है

आपकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद से हुई है. उस समय का इलाहाबाद साहित्यिक दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध था. उस दौर की कौन-सी स्मृतियां अब भी जीवंत हैं?

1969 में एमए करने के लिए मैं इलाहाबाद आया. उस समय का इलाहाबाद हिंदी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण गढ़ था. हिंदी कथा साहित्य के बड़े नाम भैरव प्रसाद गुप्त, उपेंद्रनाथ अश्क, इला चंद जोशी, नरेश मेहता, मार्कंडेय, दूधनाथ, अमरकांत, शेखर जोशी, रवींद्र कालिया, ममता कालिया, शैलेश मटियानी और सतीश जमाली सक्रियता के चरम पर थे. कविता के दो बड़े नाम महादेवी वर्मा और सुमित्रा नंदन पंत अभी भी शहर में थे. इन सबके अलावा सत्य प्रकाश मिश्र, विजय देवनारायण साही, विपिन अग्रवाल, लक्ष्मीकांत वर्मा, विश्वंभर मानव जैसे रचनाकार भी थे. हिंदी के अलावा उर्दू के भी बड़े नाम जैसे फिराक गोरखपुरी, प्रोफेसर एहतेशाम हुसैन, अकील रिजवी और शम्सुर्रहमान फारुकी भी थे. उन दिनों का इलाहाबाद एक बहुत ही जीवंत और धड़कता हुआ शहर था. हम लोग छात्रावास में रहते थे और परिवेश नाम से एक साहित्यिक संस्था चलाते थे. हमारी गोष्ठियां छात्रावासों में होती थीं और ऊपर बताए गए लेखकों में से शायद ही कोई होगा जो हमारे कार्यक्रमों में शरीक न हुआ हो. उन दिनों पूरा शहर जैसे साहित्य जीता था. दिन-रात कॉफी हाउस, चाय खानों तथा हॉस्टलों में साहित्यिक बहसें हुआ करतीं थीं. किसी पत्रिका का नया अंक आता या कहीं कोई महत्वपूर्ण कहानी या कविता पढ़ी जाती, शहर भर में उसी की चर्चा होती.

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अाप छात्र जीवन में भी काफी सक्रिय रहे हैं. उसके बारे में कुछ बताइए. इलाहाबाद विश्वविद्यालय को राजनीति की पाठशाला कहा जाता है. क्या यहीं से आपकी राजनीतिक चेतना का निर्माण हुआ?

मैं छात्र जीवन में कई तरह की गतिविधियों में लिप्त रहा. पिता ऐसी सरकारी नौकरी में थे जिसमें हर दूसरे-तीसरे वर्ष उनका स्थानांतरण होता रहता था. हाई स्कूल पास करने के बाद मुख्य रूप से बनारस और इलाहाबाद में पढ़ाई-लिखाई हुई. इंटरमीडिएट मैंने बनारस के यूपी कॉलेज से किया, जहां दो वर्षों में कम से कम दो सौ फिल्में देखीं. हर दूसरे दिन एक फिल्म का औसत. वहां से बीएचयू गया बीए करने. यह मेरे जीवन में समाज और राजनीति समझने का दौर बना. उस समय पूरे उत्तरी भारत में अंग्रेजी विरोधी आंदोलन चल रहे थे. समाजवादी युवजन सभा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और स्टूडेंट फेडरेशन का जमाना था. पहले मैं डॉ. लोहिया की तरफ आकर्षित हुआ. उनकी पुस्तक जाति प्रथा पढ़कर मैंने अपना जनेऊ जला दिया था. बीए में पढ़ते हुए ही मैं गोरख पांडेय के संपर्क में आया और उन्होंने मुझे समाज को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने में मदद की. यद्यपि गोरख के साथ मैंने बहुत समय नहीं बिताया किंतु उनका असर जीवन भर मेरे ऊपर रहा. यह वह दौर था जब देश में एक तरफ तो गैर-कांग्रेसवाद की चुनावी बयार बह रही थी जिसमें एक के बाद एक राज्यों से कांग्रेस का सफाया होता जा रहा था और दूसरी तरफ नक्सलबाड़ी में सशस्त्र प्रतिरोध की शुरुआत हो चुकी थी जिसमें कम्युनिस्टों का एक धड़ा यह घोष कर रहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. मेरे व्यक्तित्व और लेखन पर जो कुछ समय और समाज में घट रहा था सबका असर पड़ रहा था. एमए करने मैं इलाहाबाद चला आया. यह शहर बनारस के मुकाबले राजनीति से ज्यादा साहित्य में सक्रिय था और मैं जल्दी ही यहां रच-बस गया.

आज के समय में अभिव्यक्ति के खतरे लगातार बढ़ते जा रहे हैं. आपकी पीढ़ी ने तो आपातकाल को भी करीब से देखा है. इस दौर को हमारे इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है. क्या आज का समय भी उसी तरह के किंतु अघोषित आपातकाल की ओर बढ़ रहा है?

हमारा समय बहुत दिलचस्प है. इसे परिभाषित करते समय मुझे डिकेंस के उपन्यास ‘अ टेल आफ टू सिटीज’ की शुरुआत याद आती है. डिकेंस अपने समय के लिए लिखता है- यह सबसे बेहतरीन और सबसे बदतरीन समय था, यह विवेक का युग था, यह मूर्खताओं का युग था, यह आस्था का दौर था, यह अविश्वास का दौर था. विरोधाभासों से भरे इस युग में डिकेंस के अनुसार लोगों के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं था. हमारा समय भी इसी तरह के भयानक अंतर्विरोधों से भरा हुआ है. खास तौर से भारतीय राज्य को लें. न तो इसे आप क्लासिक अर्थों में फासिस्ट राज्य कह सकते हैं और न ही यह पूरी तरह से लोकतंत्र बन पाया है, लोकतंत्र बनाने की प्रक्रिया जरूर चल रही है. आजादी के फौरन बाद इस बात पर एक लंबी जद्दोजहद हुई थी कि नया स्वतंत्र हुआ देश धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनेगा या पाकिस्तान की तर्ज पर हिंदू राज्य. प्रगतिशील तथा मध्यमार्गीय नेतृत्व के कारण यह तय हो गया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनेगा. 26 जनवरी, 1950 को लागू हुए संविधान पर 1950 के पहले आम चुनावों ने अपनी मुहर भी लगा दी. पर जो शक्तियां देश को हिंदू राज्य बनाना चाहती थीं उन्होंने आसानी से हार नहीं मानी और वे लगातार इस प्रयास में लगे रहे कि धर्मनिरपेक्षता समाप्त कर भारत को हिंदू राज्य बनाया जाए. सौभाग्य से पिछले 50-60 वर्षों में भारत में ऐसी संस्थाएं मजबूत हुई हैं जिनके चलते अब किसी धर्म आधारित राज्य की कल्पना करना असंभव हो गया है. उदाहरण के लिए, इन दशकों में न्यायपालिका, मीडिया और गैर-सरकारी संस्थाओं के रूप में ऐसी शक्तियों के सामने जबरदस्त बाधा उत्पन्न हुई है जो धर्म पर आधारित राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं.

लोहिया की पुस्तक जाति प्रथा पढ़कर मैंने जनेऊ जला दिया. बाद में गोरख पांडेय के संपर्क में आया जिससे समाज को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने में मदद मिली

अपने दौर के अधिकांश प्रतिष्ठित लेखकों से आपकी घनिष्ठता रही है. आप जहां भी रहे हैं वहां आपने लेखकों और संस्कृतिकर्मियों से लगातार निकटता रखी. फैज अहमद फैज जैसे नामचीन शायर की मेजबानी भी की है आपने. यह सिलसिला कब से शुरू हुआ?

मैं इस अर्थ में बहुत सामाजिक प्राणी हूं कि मुझे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. इस मामले में सिर्फ मैंने एक अघोषित पाबंदी अपने ऊपर लागू कर रखी थी कि मैं हमेशा शाम में अपने हमपेशा लोगों के साथ बिताने से बचता रहा हूं. मेरा यह मानना है कि नौकरशाही खास तौर से पुलिस तंत्र में आपके मनुष्य से पशु बनने की प्रक्रिया धीमे-धीमे चलती रहती है. आपको पता भी नहीं चलता कि कब आप मनुष्य से पशु में तब्दील हो गए हैं. इस प्रक्रिया को रोकने का एक ही उपाय है कि नौकरी के अलावा आप दूसरे क्षेत्रों में भी दिलचस्पी रखें. दिलचस्पी का यह क्षेत्र साहित्य, फोटोग्राफी, पर्यटन कुछ भी हो सकता है. मैंने साहित्य को चुना और मुझे खुशी है कि साहित्य ने मुझे कुछ हद तक ही सही मनुष्य बने रहने में मदद की.

अपने प्रिय लेखकों के बारे में बताएं.

हिंदी के लेखकों में मुझे सबसे अधिक प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु और राही मासूम रजा हैं. विदेशी लेखकों में मोपासां, मैक्सिम गोर्की, चेखव, हेमिंग्वे और मार्खेज रहे हैं.

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पुलिस सेवा में रहते हुए आपने उसकी भूमिका को प्रश्नांकित करने वाली  ‘शहर में कर्फ्यू’  तथा  ‘सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’  जैसी किताबें लिखीं. प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा होते हुए भी ऐसे लेखन का साहस कैसे कर पाए?

दरअसल मैं लगातार दोहरी जिंदगी जीता रहा. मैंने अक्सर यह देखा था कि हमारे बहुत सारे लेखक अफसर लेखकों के बीच में अफसर और अफसरों के बीच लेखक बन जाते थे. मैंने इससे बचने की कोशिश की. मेरे ज्यादातर पेशेवर सहकर्मी आम तौर पर यह नहीं जानते थे कि मेरा लिखने-पढ़ने से कोई संबंध है और न ही जब मैं लेखकों के बीच रहता था, मैंने उन्हें यह एहसास कराने की कोशिश की कि मैं एक पुलिस अफसर हूं. मुझे पता नहीं मैं कितना सफल रहा पर मैंने पूरी जिंदगी यही कोशिश की. मुझे हमेशा लगता था कि किसी डॉक्टर ने मुझे लिखने के लिए नहीं कहा है इसलिए अगर लिखूंगा तो जो कुछ देख या अनुभव कर रहा हूं वही लिखूंगा, नहीं तो नहीं लिखूंगा. मेरी एक दिलचस्पी भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्तों को समझने में भी थी और तंत्र का सदस्य बन जाने के कारण मुझे इसमें मदद ही मिली.

आप जहां भी सेवारत रहे वहां आपने हमेशा एक साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल बनाने की कोशिश की. पुलिस अधिकारी की व्यस्त दिनचर्या के बीच यह कैसे संभव हो पाया?

इसका जवाब मैं ऊपर दे चुका हूं. मैं जिन शहरों में भी तैनात रहा मैंने वहां के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों से भिन्न संबंध रखने का प्रयास किया. मैंने हमेशा यह कोशिश की कि किसी नए शहर में पहुंचने पर मैं वहां के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों से स्वयं जाकर उनके घरों पर पहले मिलूं. जैसा कि मैंने बताया मैं लगातार दोहरी जिंदगी जीता रहा. एक बार दफ्तर से घर आ जाने के बाद मैं भूल जाता था कि मैं पुलिस अधिकारी हूं, इसी तरह अपनी नौकरी में मैंने साहित्यकार होने का ग्रेसमार्क लेने का कभी प्रयास नहीं किया. यह अलग बात है कि पुलिस और साहित्य दोनों ने मुझे किसी न किसी रूप में मदद ही की.

मेरे ज्यादातर सहकर्मी यह नहीं जानते थे कि मेरा लिखने-पढ़ने से कोई संबंध है. ऐसे ही ज्यादातर लेखक नहीं जानते थे कि मैं पुलिस अफसर हूं

प्रशासनिक क्षेत्र से एक कुलपति के रूप में आप अकादमिक दुनिया में आए. पुलिस सेवा से बिल्कुल अलग विश्वविद्यालयी दुनिया में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में मेरी नियुक्ति मेरे लिए भी अप्रत्याशित थी. दरअसल जब सुदीप बनर्जी ने यह प्रस्ताव मेरे सामने रखा मैं खुद हक्का-बक्का रह गया था. उस समय मंत्रालय एक ऐसा कुलपति तलाश रहा था जिसका हिंदी भाषा और साहित्य से तो संबंध हो ही उसे प्रशासनिक अनुभव भी हो. वे इस कसौटी पर मुझे खरा पा रहे थे. कुछ अन्य लोगों के साथ मेरा नाम भी प्रस्तावित किया गया और अंतत: राष्ट्रपति ने मेरे नाम पर मुहर लगा दी. मेरे लिए यह एक नई दुनिया थी और यद्यपि आईपीएस से रिटायर होने में अभी कई वर्ष बाकी थे मैंने इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार किया. हिंदी संसार यह जानता था कि विश्वविद्यालय के पहले कुलपति पांच वर्षों तक दिल्ली में ही पड़े रहे और विश्वविद्यालय कागजों पर ही बना रहा. मेरे पूर्वाधिकारी जरूर विश्वविद्यालय वर्धा लेकर आए और उनके जमाने में विश्वविद्यालय के निर्माण की प्रक्रिया शुरू भी हुई पर जब मैं वर्धा पहुंचा सब कुछ आरंभिक अवस्था में ही था. मुझे 200 एकड़ भूमि मिली जो काफी हद तक उजाड़ थी. न सड़कें थीं, न स्ट्रीट लाइट, न सीवर, न प्रशासनिक भवन. कक्षाएं शहर भर में फैले किराये के असुविधाजनक भवनों में अतिथि शिक्षक लेते थे. मैंने इसे चुनौती के रूप में लिया और मुझे संतोष है कि जब मैं वहां से विदा हुआ यह एक हरे-भरे परिसर में तब्दील हो चुका था जिसमें पर्याप्त आवासीय, शैक्षणिक और प्रशासनिक भवन बन चुके थे और जिसमें बड़ी संख्या में देशी और विदेशी छात्र पठन-पाठन और शोध कार्य कर रहे थे. स्वाभाविक है कि यह सब कुछ बिना विघ्न-बाधाओं के नहीं हुआ. पिछले पेशे से भिन्न चुनौतियां आईं और मैं यही कह सकता हूं कि कुछ में मैं सफल हुआ और कुछ में अंत तक उलझा रहा. उन्हें लेकर मेरे मन में अब कोई कटुता नहीं है. जीवन उनसे बहुत आगे निकल गया है.

हाशिमपुरा नरसंहार 1987 में पीएसी के सामने समर्पण कर रहे हाशिमपुरा के निवासी.

हाशिमपुरा नरसंहार 1987 में पीएसी के सामने समर्पण कर रहे हाशिमपुरा के निवासी.

हिंदी विश्वविद्यालय आपके सेवाकाल का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. एक तरह से आपके आने के बाद ही हिंदी समाज में इस विश्वविद्यालय को गंभीरता से लिया जाना शुरू हुआ. आप जिस विजन के साथ आए थे, उसमें खुद को कितना सफल मानते हैं?

द्यपि अकादमिक दुनिया मेरे लिए सर्वथा ग्रीक और लैटिन की तरह थी किंतु हिंदी भाषा और साहित्य से अनुराग होने के कारण इसे लेकर कहीं न कहीं मेरे मन में कुछ सपने भी थे. मैं इसे सिर्फ एक प्रकाशन गृह या कहानी-कविता का विश्वविद्यालय नहीं बनने देना चाहता था. मेरे मन में एक सपना था कि उच्चतर ज्ञान के सभी अनुशासनों की शिक्षा हिंदी माध्यम से दी जाए और हिंदी विश्वविद्यालय इसके लिए आवश्यक पाठ्य सामग्री तैयार कराए. मेरा मानना है कि विश्वविद्यालयों का काम सिर्फ डिग्रियां बांटना नहीं है बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण उनकी भूमिका ज्ञान का उत्पादन करने और उसे सर्व साधारण तक पहुंचाने की होनी चाहिए. न सिर्फ सामाजिक विज्ञान के क्षेत्रों में बल्कि मेडिसिन और इंजीनियरिंग जैसे विषयों की पढ़ाई हिंदी माध्यम से हो सके इसके लिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय इन अनुशासनों में मौलिक लेखन के साथ-साथ विदेशी भाषाओं में उपलब्ध बेहतरीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी कराए. मैंने इस विषय में कई योजनाएं बनाई थीं और उनमें से कुछ जैसे हिंदी में विश्वकोश, वर्धा शब्दकोश और डायस्पोरा अध्ययन पर पाठ्य सामग्री जैसी पुस्तकें प्रकाशित भी हुईं. मैंने www.hindisamay.com के नाम से विश्वविद्यालय की एक वेबसाइट बनवाई जिस पर एक लाख से अधिक पृष्ठों की सामग्री देशी-विदेशी पाठकों को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराई गई थी. योजना थी कि हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण छपा है, सब कुछ इस पर उपलब्ध हो सके. मैं बहुत-सा काम बीच में छोड़कर आया था जिसे मेरे उत्तराधिकारियों को आगे बढ़ाना चाहिए.

कुलपति के रूप में आपके कार्यकाल को लगातार विवादित करने के प्रयास हुए, जबकि विश्वविद्यालय से जुड़े हुए लोग इस बात को आज भी स्वीकार करते हैं कि आपने एक मृतप्राय टीले को ऊर्जावान विश्वविद्यालय में बदलने की भरपूर कोशिश की और उसमें काफी हद तक सफल भी रहे. क्या इन विवादों ने आपके रास्ते को अवरुद्ध किया या आप इनसे विचलित हुए?

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अपने जन्म से ही विवादों से घिरा रहा है. दुर्भाग्य से मेरा कार्यकाल भी उससे नहीं बच पाया. इनमें से कुछ मेरी अपरिपक्वता की उपज थे तो कुछ न्यस्त स्वार्थों ने उत्पन्न किए थे. बहरहाल अब जब मैं विश्वविद्यालय से चला आया हूं तो उन पर टिप्पणी कर मैं बदमजगी नहीं पैदा करना चाहता.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 16, Dated 31 August 2016)

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