जाट आंदोलन के समय पुलिस ने उपद्रवियों को खुली छूट दे रखी थी : प्रकाश सिंह

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prakashWEBहरियाणा में इस साल फरवरी में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी की घटनाओं के दौरान पुलिस और सिविल प्रशासन के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच के लिए पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन राज्य सरकार ने किया था. कमेटी ने दो मार्च से काम शुरू किया. इसमें आईपीएस केपी सिंह (मौजूदा डीजीपी, हरियाणा) और वरिष्ठ आईएएस विजय वर्द्धन (मौजूदा अतिरिक्त मुख्य सचिव, अभिलेखागार एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग) भी शामिल थे. यह रिपोर्ट अब सार्वजनिक हो चुकी है, जिसे हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव की वेबसाइट पर देखा जा सकता है. (देखें बॉक्स)

कमेटी ने रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद, कैथल, हिसार, भिवानी और पानीपत का दौरा कर वहां के हालात का जायजा लिया. कमेटी ने 13 मई को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. रिपोर्ट में आंदोलन के दौरान आगजनी, लूट और हिंसा के लिए प्रदेश के कुल 90 अफसरों की लापरवाही को जिम्मेदार माना गया है. इनमें आईएएस, आईपीएस, उपायुक्त, एसपी, एडीसी, एसडीएम, नायब तहसीलदार, थाना प्रभारी और एसआई इंचार्ज स्तर के अधिकारी हैं. हरियाणा के आठ जिले जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान सात से 22 फरवरी तक हिंसा और उपद्रव की आग में झुलसते रहे. कानून और व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह चौपट थी. स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए सेना को लगाना पड़ा था. कमेटी के अध्यक्ष प्रकाश सिंह असम और उत्तर प्रदेश के डीजीपी रह चुके हैं. उन्हें 1991 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा वे पुलिस सुधार के प्रयासों में भी लगे रहते हैं. जाट आंदोलन पर कमेटी की रिपोर्ट और पुलिस सुधार समेत तमाम मुद्दों पर प्रकाश सिंह से बातचीत .

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक आपकी रिपोर्ट में 90 अधिकारियों को जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के लिए दोषी माना गया है. इसके अलावा इस रिपोर्ट में क्या खास है?

मुझे हिंसा के दौरान अधिकारियों के कार्यकलापों की जांच करनी थी यानी कि इस दौरान उन्हें जो करना था वह किया था या फिर ऐसा कार्य किया जो नहीं करना चाहिए था. मैंने हर दिन के हिसाब से इन अधिकारियों के कार्यों का विश्लेषण किया. जिन अधिकारियों के कुछ करने से या कुछ न करने से हिंसा और भड़की तो मैंने उसका उल्लेख कर दिया. उदाहरण के लिए, एक जगह उन्होंने बलवाइयों को छह घंटे की खुली छूट दे दी थी. यह बहुत छोटा-सा प्रखंड है जहां एक डीएसपी आराम से एक घंटे के भीतर हिंसा पर रोक लगा सकता है, लेकिन कोई नहीं पहुंचा. हालांकि अधिकारी वहां छह घंटे बाद पहुंचते हैं और हिंसा कर रहे लोगों से कहते हैं कि अब जाओ. आपको काफी वक्त मिल चुका है. बलवाइयों को इस तरह की खुली छूट देने वाले अधिकारियों का उल्लेख हमने अपनी रिपोर्ट में कर दिया है.

 इस रिपोर्ट में सिर्फ अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई है या फिर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं?

इस रिपोर्ट में सिर्फ सिविल और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई है. हमें सिर्फ इनकी भूमिका की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. हमने यही किया है. जनप्रतिनिधियों की भूमिका जानने के लिए दूसरी कमेटी जांच कर रही है.

रिपोर्ट आने के बाद से हरियाणा सरकार ने कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है. क्या आपको लगता है कि सरकार सही दिशा में कदम उठा रही है?

देखिए, रिपोर्ट में इन अधिकारियों के खिलाफ ठीक ढंग से काम नहीं करने की बात कही गई है. अब इन्हें निलंबित किया गया है. यह प्रारंभिक कार्रवाई है. इसके बाद विभागीय स्तर पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है. मैं यह मानकर चल रहा हूं कि इसके बाद इनके खिलाफ विभागीय स्तर पर भी कार्रवाई की जाएगी. रिपोर्ट देने के अाठ दिन के भीतर ही अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है यह संतोष का विषय है. मैं यह मानकर चल रहा हूं कि सरकार सही दिशा में काम कर रही है.

 रिपोर्ट के आने के बाद हरियाणा पुलिस के लिए काम करने वाले संगठन का आरोप था कि हर बार हिंसा होने पर पुलिसवालों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और बड़े नेताओं व उच्च अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. इस पर आपका क्या कहना है?

देखिए, इस रिपोर्ट में बड़े अधिकारियों के खिलाफ भी टिप्पणी की गई है. अभी जो अधिकारी हटाए जा रहे हैं इसमें बड़े अधिकारी ही शामिल हैं. डीजीपी हट गए. आईजी रोहतक के खिलाफ कार्रवाई की गई है तो ऐसा इस बार नहीं है. जहां तक नेताओं की भूमिका का सवाल है तो एक न्यायिक कमेटी का गठन किया गया है जो उनकी भूमिका की जांच कर रही है. रिपोर्ट आने के बाद शायद उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो. मुझे सिर्फ अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का काम सौंपा गया था.

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विपक्ष का कहना है कि आपने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के कहने पर जांच की जिम्मेदारी ली और ऐसा भाजपा समर्थकों को बचाने के लिए किया गया.

मैंने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ एक नेता पर प्रतिकूल टिप्पणी की है वह भी भाजपा का ही है. अब विपक्ष ऐसे आरोप लगा रहा है तो क्या किया जाए. वैसे भी मुझसे कोई जांच करने के लिए कहे तो इसका यह मतलब थोड़े ही है कि मैं चमचागीरी करने लगूंगा. या फिर आप मेरी ईमानदारी और निष्पक्षता को खरीद लेंगे. अब हरियाणा में सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही है तो जांच के लिए वही कहेगी. लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा बिकाऊ नहीं है.

क्या जांच के दौरान आप पर कुछ खास अधिकारियों को बचाने के लिए किसी तरह का दबाव भी डाला गया था?

दबाव इस तरह का आया कि बड़े-बड़े लोग कुछ खास अधिकारियों की सिफारिश लेकर आए. उन्होंने बड़े सम्मान से बात कही. हमने भी बड़े सम्मान से उनकी बात सुनी. लेकिन मेरे काम करने का अपना तरीका है और मैंने वही किया. मैं किसी भी तरह के दबाव में नहीं आया और पूरी तरह से निष्पक्ष रिपोर्ट सौंपी.

कांग्रेस के एक शीर्ष नेता का आरोप है कि आप विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं. इसलिए आपने संघ और भाजपा नेताओं को बचाने का काम किया है?

जिस रणदीप सुरजेवाला ने यह बयान दिया है जब वो पैदा नहीं हुए थे तब से मैं रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद केंद्र से जुड़ा हुआ हूं. यह विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन तो अब बना है. विवेकानंद बचपन से मेरे रोल मॉडल रहे हैं. अब विवेकानंद से जुड़ने पर कोई सवाल उठाता है तो मैं कहूंगा कि भाड़ में जाओ. अब इनकी सोच इतनी विकृत हो गई है कि वे स्वामी विवेकानंद पर सवाल उठाने लगे हैं. जिस देश में विवेकानंद पैदा हुए वहीं उनके नाम पर गठित किसी संस्था में शामिल होने पर सवाल उठे तो यह अफसोसजनक है.

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फोटो : विजय पांडेय

आप लंबे समय से पुलिस सुधार की मांग कर रहे हैं. क्या केंद्र में नई सरकार आने के बाद इस दिशा में कुछ काम हुआ है?

पुलिस सुधार की दिशा में न तो पिछली सरकार ने कदम उठाया था और न ही इस सरकार ने इस दिशा में कोई उल्लेखनीय काम किया है. पुलिस सुधार की दिशा में सभी उदासीन ही हैं. न तो सत्ताधारी नेता पुलिस सुधार चाहते हैं न ब्यूरोक्रेसी. इसलिए इस दिशा में बहुत जबरदस्त रुकावटें आ रही हैं. हालांकि मैं समझत हूं कि जल्द ही ये रुकावटें कम होती जाएंगी और पुलिस सुधार एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर सबका ध्यान जाएगा. आप इसे धीमा कर सकते हैं पर रोक नहीं लगा सकते हैं.

क्या सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद भी सरकारें पुलिस सुधारों को लेकर उदासीन बनी हुई हैं?

नहीं, ऐसा नहीं है कि पुलिस सुधार की दिशा में बिल्कुल भी काम नहीं किया गया है. कुछ काम हुआ है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. इस दौरान कागज पर खूब कार्रवाई हुई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकारें कागज पर यह दिखाती हैं कि इस दिशा में काम किया जा रहा है. हालांकि यह बेहतर है कि एक वैचारिक दबाव सरकारों के ऊपर बन रहा है.

अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करके सरकार ने सही दिशा में पुलिस सुधार किया होता तो क्या जाट आरक्षण या फिर दूसरे मामलों से जुड़ी हिंसा या उपद्रव से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम होती?

­मैं ये नहीं कहता कि पुलिस सुधार कर दिया जाए तो ‘रामराज्य’ हो जाएगा लेकिन हिंसा से निपटने के लिए आपके पास जो मशीनरी है वह बेहतर तरीके से काम करेगी. अभी सत्ताधारी दल के नेताओं का इशारा हो जाता है तो पुलिस कमजोर पड़ जाती है. वैसे पुलिस सुधार का यह मतलब नहीं है कि पुलिस स्वतंत्र हो जाए. दरअसल पुलिस सुधार का मतलब यह है कि नीति नियंता यह तय कर दे कि पुलिस कौन-से कानून से चलेगी, किस सिद्धांत का पालन करेगी, उसकी भूमिका क्या होगी, उसके ऊपर जिम्मेदारी क्या रहेगी. उसके बाद पुलिस अपने हिसाब से काम करेगी. उसके ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जाएगा. उसके कार्य करने की स्वतंत्रता में दखलंदाजी न की जाए. जैसे आपने पुलिस से कहा कि ये घोटाला हो गया अब आप पता करिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है, लेकिन जब पुलिस ने काम करना शुरू कर दिया तो फिर बीच में आकर आप यह नहीं कहेंगे कि इसे छोड़ दो या फिर इसे फंसा दो. यह नहीं होना चाहिए. जांच के दौरान किसी भी तरह का दबाव पुलिस पर न डाला जाए.