‘नक्सलवाद की लड़ाई खत्म हुई तो पैसे आने बंद हो जाएंगे, फिर नेता का जेब कैसे भरेगा?’

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फोटोः कृष्णकांत

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म करने की लड़ाई की पहली कीमत जनता चुका रही है. नक्सलियों के साथ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लंबे संघर्ष के बीच जनता का भी अपना संघर्ष है, जिसे सबसे कम महत्व मिलता है. जो लोग इसे कहने की कोशिश करते हैं, उन पर न सिर्फ सरकार नकेल कसती है, बल्कि कई बार उनको पुलिस प्रताड़ना और अदालती कार्रवाई भी झेलनी पड़ती है. राज्यसत्ता और नक्सलवाद की हिंसात्मक लड़ाई के बीच आदिवासी जनता का संघर्ष और उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती साबित होती है. पुलिस प्रताड़ना, नक्सली हिंसा और सत्ता के दमन से दो-दो हाथ करने वाली जनता की रहनुमाई भी बेहद कठिन काम है. उस जनता की आवाज उठाने के लिए प्रतिबद्ध एक आदिवासी महिला भी लगातार प्रताड़ना झेल रही है, जिसका नाम है सोनी सोरी. उनको नक्सल समर्थक होने के आरोप में जेल हुई, जहां उन्हें भयावह प्रताड़ना झेलनी पड़ी. सोनी का आरोप था कि जेल में उनके साथ बलात्कार किया गया और उनके गुप्तांग में पत्थर भर दिए गए. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा किया. उन पर ज्यादातर मुकदमे खारिज हो चुके हैं, एक मामला अब भी अदालत में है. हाल ही में उनपर कुछ युवकों ने हमला किया. उसके बाद उनसे हुई बातचीत:

अभी कुछ दिन पहले आपके ऊपर हमला हुआ था. यह हमला क्याें हुआ, किसने करवाया, कुछ पता चला? जरा विस्तार से इस बारे में बताएं.

मैं गीदम से ईशा खंडेलवाल और शालिनी (दोनों वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो आिदवासियों को कानूनी मदद मुहैया कराती हैं) से मिलने जगदलपुर आई थी. काफी दिन से पुलिस उन्हें परेशान कर रही थी. कई बार धमकी दी थी. उनके मकान मालिक को भी परेशान किया तो वाे कहने लगा कि घर खाली कर दो. उन्हें कोई घर देने को तैयार नहीं था, क्योंकि वहां पर माइक लगाकर ऐलान कर दिया था कि इस तरह के कोई लोग हैं तो तुरंत बताओ और उनको घर मत दो. उस स्थिति में इन लोगों ने जगदलपुर छोड़ने का निर्णय लिया. उन्होंने मुझसे कहा कि हम जा रहे हैं तो आप आकर मिल लो. मैं शाम को वहां पहुंची. अचानक शाम को मुझे एक मैसेज मिला कि उनके एक साथी को अरेस्ट करने की बात सामने आई है. हम सब और घबरा गए. थोड़ा-बहुत बातचीत करके ये लोग बस स्टैंड की ओर निकल गए. इसी बीच वहीं मुझे एक ग्रामीण भाई से मैसेज मिला कि मैडम आप कहां हो. सुरक्षित हो? मैंने पूछा कि क्यों क्या हुआ? उसने बताया कि बैठक में पुलिस वाले बात कर रहे थे कि सोनी सोरी को किस तरह से रोका जाए. उनके घर गुंडे भेजकर अटैक करवा दिया जाए या कुछ और किया जाए, ऐसी बात करते हुए मैंने सुना है. मैंने बात टाल दी और उससे अगले दिन मिलने काे बोला. मैं तभी शालिनी से बोली कि देखो दीदी हमारे लिए इस तरह की प्लानिंग हो रही है. शालिनी ने लिखा भी कि सोनी सोरी पर हमला हो सकता है. फिर भी मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वहां रोज धमकियां मिलती रहती हैं. फिर मैंने अपनी साथी रिंकी को बुला लिया कि वह मुझे छोड़ देगी. हम सबने साथ निकलकर ढाबे में चाय पी, फिर उसके साथ मोटरसाइकिल पर निकल गए.

तीन लड़कों ने हमारी गाड़ी के सामने अपनी गाड़ी लाकर हमें रोका. मुझे एक तरफ खींच लिया और कहने लगे कि आईजी कल्लूरी के खिलाफ बोलना बंद करो, जितने मुद्दे उठाती हो, सब बंद करो, अभी तो सिर्फ आपके चेहरे में काला पोत रहे हैं, आपकी बेटी के चेहरे पर भी ऐसा काला पोतेंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी और मेरे चेहरे पर कोई चीज पोत दी

रास्ते में बास्तानार के पास तीन लड़के साइड में गाड़ी से आ गए और नाम लेकर बोले कि सोनी मैडम रुको, आपसे बात करनी है, लेकिन रिंकी ने गाड़ी नहीं रोकी. उन्होंने अपनी गाड़ी लाकर सामने लगा दी तो गाड़ी रोकनी पड़ी. तुरंत उन्होंने रिंकी को कुछ दूर पर खींच लिया और मुझे दूसरी तरफ खींचकर ले गए कि मैडम इधर आइए. एक लड़के ने मेरे हाथ पीछे से पकड़ लिए. फिर कहने लगे कि आईजी कल्लूरी के खिलाफ बोलना बंद करो, जितने मुद्दे उठाती हो वो सब बंद करो, अभी तो सिर्फ आपके चेहरे में काला पोत रहे हैं, आपकी बेटी के चेहरे पर भी ऐसा काला पोतेंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी और मेरे चेहरे पर कोई चीज पोत दी. छूटते ही हम लोग तुरंत गीदम वापस हो गए. मुझे लगा कि मुझे बेइज्जत करने के लिए चेहरे पर स्याही वगैरह पोती होगी, लेकिन कुछ देर बाद चेहरे पर जलन होने लगी. मैंने कई लोगों को फोन किया. लिंगा कोडोपी को फोन किया और उसे गाड़ी लेकर आने को कहा. लिंगा मुझे गाड़ी में लेकर गीदम अस्पताल गया. फिर वहां से जगदलपुर लेकर आए. तीन दिन बाद मेरी आंखें खुलनी शुरू हुईं.

हमला करने वाले लड़के कौन थे?

नहीं, ये पता नहीं चल पाया.

जिन लड़कों ने ये हमला किया, वे आईजी कल्लूरी का नाम ले रहे थे?

हां, बोल रहे थे कि पुलिस के खिलाफ बोलना बंद करो. मार्डूम के मुद्दे उठाना बंद करो. मार्डूम में अभी एक फेक एनकाउंटर हुआ था. एक आदमी को उठाकर ले गए. कहा कि वह नक्सली है. बाद में उसे मार दिया. उसके सात बच्चे हैं. उसके पास राशन कार्ड है, आधार कार्ड है, उसको अभी इंदिरा आवास का पैसा मिला है. तो हमने ये सारे सबूत लेकर उसकी विधवा के साथ प्रेस कांफ्रेंस की. पुलिस कह रही कि हमारे पास सारे सबूत हैं कि वह नक्सली था, हमने कहा कि मैं सबूत दे रही कि वह साधारण ग्रामीण था. सरकार उसे ये सारे कागज इश्यू कर चुकी है. तुम भी सबूत दो कि वह नक्सली था. अगर वह नक्सली था तो उसे इंदिरा आवास कैसे दिया गया? हमने कई ऐसी घटनाओं का खुलासा किया है, बलात्कार, फर्जी एनकाउंटर… लेकिन ये मुद्दा हमने विशेष तौर से उठाया, इससे ये लोग घबरा गए.

आपके बहन-बहनोई को भी पुलिस ने उठाया था. क्या कारण था?

अटैक के बाद मैं चेहरे का इलाज कराने दिल्ली आई, तभी मेरी बहन के पति को उठा लिया था. मेरे परिवार ने सोचा कि मेरे ऊपर अटैक को लेकर जांच कमेटी बनी थी, पूछताछ के लिए ले गए होंगे. हमें मदद करनी चाहिए, लेकिन उन्होंने शाम तक छोड़ा ही नहीं. दूसरे दिन भी नहीं छोड़ा. मुझे लगा कि मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है. मैं 11 मार्च को छत्तीसगढ़ पहुंची और राजधानी में प्रेस कॉन्फ्रेंस की कि अगर मेरी बहन के पति को नहीं छोड़ा तो हम धरना देंगे. उसी दिन मेरी बहन को भी उठा लिया. उस पर भी हमने सवाल किया कि हमारे परिवार को परेशान कर रहे हैं. जो भी कोशिश हो सकती है वो किया. फिर मैं बस्तर के लिए निकल गई. मेरे बस्तर पहुंचने के पहले दोनों को छोड़ दिया.

उन्हें उठाया क्यों गया था?

उन्हें ये स्वीकार करने का दबाव बनाने के लिए उठाया था कि मुझ पर हुआ अटैक लिंगा कोडोपी, मेरी बहन के पति अजय मरकाम और उसके दोस्त ने मिलकर किया है और ये योजना लिंगा कोडोपी की थी, जिसके लिए उसने  इन दोनों को पैसे दिए थे. ये लोग बोले कि चाहे मारो या जेल भेज दो, जो हमने किया नहीं है वो कबूल नहीं करेंगे.

अापने प्रेस वार्ता में कहा कि आप पर ये हमला आईजी कल्लूरी ने करवाया है!

मुझे पूरा शक है कि ये हमला आईजी कल्लूरी की साजिश में हुआ है. मैं सिर्फ शक कर रही हूं लेकिन जिस तरह मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है, अब तो पूरा यकीन होता जा रहा है कि ये हमला पुलिस और आईजी कल्लूरी के नेतृत्व में हुआ है. आप बताइए, मेरे पर अटैक के अपराधी को पकड़ना है तो मेरे ही परिवार को क्यों परेशान किया जा रहा है? मेरे पिता को धमकी दी है कि तुम्हारा परिवार बर्बाद कर दूंगा. बहन को धमकी दी कि हाथ-पैर तोड़ देंगे.

बस्तर समेत आदिवासी इलाकों में लंबे समय से संघर्ष चल रहा है. वहां की असली समस्या क्या है? लड़ाई किस बात को लेकर है?

वहां की सरकार नक्सल का नाम लेकर लड़ाई छेड़े हुए है. मैं मानती हूं कि बस्तर में एक संगठन है नक्सलियों का, उसकी अपनी गतिविधियां हैं,  लेकिन उसके नाम का सहारा लेकर हम आदिवासियों पर अटैक किया जाता है. अगर आपको नक्सल से लड़ना है तो उन पर अटैक करो. उनको मारो. लेकिन ऐसा नहीं कर रहे. अब हमको भी समझ में आ रहा है कि यह नक्सल की लड़ाई नहीं है. यह आदिवासियों को वहां की जमीन और जंगल से भगाने की साजिश है ताकि वहां बड़ी-बड़ी कंपनियां लगाई जाएं. सरकार का मकसद है आदिवासियों को मारना और नाम लिया जाता है नक्सल का. जब तक आदिवासी वहां पर रहेंगे, इनको जमीन नहीं मिलेगी तो आदिवासियों को नक्सली बता रहे हैं. इतने दिन से लड़ाई चल रही है, सरकार ने कितने नक्सली लीडर को मारा? कितने को पकड़ा? ये पूरे देश के सामने दिखाया जाए. सरकार इतनी फोर्स लेकर वहां लड़ रही है. 2014 में मेरी रिहाई हुई, 2016 तक बता दें कि कितने स्टेट लेवल के नक्सल लीडर को मारा? ये बता दें तो पता चल जाए कि ये लड़ाई नक्सल से है. आदिवासी ग्रामीणों को ही नक्सली बनाकर जेल भेज रहे हैं, उन्हीं को मार रहे हैं, उन्हीं की पत्नी और बहनों के साथ बलात्कार और अत्याचार हो रहा है. कुल मिलाकर आदिवासियों को मारकर जमीन हड़पने की लड़ाई है. नक्सल को भगाने की लड़ाई नहीं है.

मतलब सरकार को जमीन पर कब्जा चाहिए और ग्रामीण जनता  इसका विरोध करती है…

वो तो करेंगे ही. एनएमडीसी माइनिंग कंपनी है. उसके लिए कितनी लड़ाई थी. आज कहां हो रही है? उसको जंगल भी दिया, जमीन भी दिया, कंपनी को सब चीजें दे दीं, उसके बाद हमारे लोगों का विकास कहां होता है? नहीं होता. हां, वहां के लोग चाहते हैं कि विकास हो. विकास चाहिए, जो मूलभूत आवश्यकता है जैसे पानी, बिजली, सड़क, आश्रम (स्कूल), आंगनबाड़ी… ऐसे छोटे-मोटे विकास चाहिए. बड़ी-बड़ी कंपनी लगाकर तो हमारे लोगों को भगा रहे हैं.

कुछ समय पहले आपने नौ महिलाओें के बलात्कार का मामला उठाया था, वहां क्या हुआ था?

पहले पेद्दापारा गांव में हुआ और फिर वेल्लम नेंद्रा गांव में भी. गश्त के दौरान पुलिस बलों द्वारा महिलाओं का बलात्कार हुआ था. महिलाओं से बच्चों को छीनकर फेंक दिया. इस दौरान महिलाओं के पति, पिता, भाई ये सब तो जंगल में भाग गए.

‘न मैं पुलिस के लिए काम करती हूं, न मैं नक्सलियों  के लिए काम करती हूं. मैं काम करती हूं जनता के लिए. हम हथियार की लड़ाई के साथ नहीं हैं’

ऐसा पहले भी हुआ है. कई बार हमने समझाया कि आप लोग भागो मत, सामना करो तो लोगों ने किया. गांव में ही रहे, लेकिन तब इन्हें या तो पकड़कर जेल भेज देते हैं या एनकाउंटर कर देते हैं. इसलिए पुरुष अपने को बचाने के लिए छुप जाते हैं.

उस इलाके में यह संघर्ष और दमन लंबे समय से चल रहा है, इसे रोकने के लिए क्या रास्ता है?

ये रुकेगा नहीं क्योंकि अगर सच में नक्सलवाद की लड़ाई है, सरकार नक्सलवाद को खत्म करना चाहती है तो जो बस्तर और छत्तीसगढ़ के जनप्रतिनिधि हैं, वे एक मंच पर क्यों नहीं आते? कई बार मैंने कहा कि छत्तीसगढ़ के जनप्रतिनिधि और पार्टी सब एक मंच पर आकर बात करें कि नक्सलवाद की लड़ाई को कैसे खत्म किया जाए. एक मंच पर आने से कोई रास्ता निकल सकता है लेकिन नेता नहीं चाहते कि ये लड़ाई खत्म हो क्योंकि इसके नाम पर कई करोड़ रुपये आते हैं, वो आने बंद हो जाएंगे. सब एक मंच पर आ जाएं तो निश्चित है कि ये लड़ाई साल भर के अंदर खत्म हो जाएगी. ये मेरा दावा है, लेकिन उसके बाद पैसे आने खत्म हो जाएंगे फिर नेता का जेब कैसे भरेगा. फिर जो इतना ऐशोआराम है, वह सब नहीं होगा.

आप लोगों पर नक्सली होने का आरोप लगता है, क्या आप नक्सल समर्थक हैं?

नक्सलियों को सपोर्ट करने की जरूरत क्या है? वे तो पहले से ही अपने को शक्तिशाली बताते हैं. उनके पास बंदूकें हैं, अपना संगठन है, उनको हमारे समर्थन की जरूरत क्यों है? कहते हैं कि सोनी सोरी नक्सलियों की मदद करती है, हम उनकी मदद क्यों करें? हमने स्पष्ट कहा है कि न मैं पुलिस के लिए काम करती हूं, न मैं नक्सलियों के लिए काम करती हूं. मैं काम करती हूं जनता के लिए. नक्सलियों के पास भी बंदूक है, वो बंदूक की लड़ाई लड़ते हैं. सरकार के पास भी बंदूक है, सेना है. तो हम हथियार की लड़ाई के साथ नहीं हैं. हथियार की लड़ाई हम देख चुके हैं. सलवा जुडूम के समय भी देखा है. उसमें क्या हुआ. कई आदिवासी भाइयों के घर जल गए. कई अनाथ हो गए. कई मारे गए. कई महिलाओं के साथ बलात्कार हुए. तो मैं इस लड़ाई के साथ नहीं हूं. मैं सिर्फ जनता की लड़ाई के साथ हूं. शांति के साथ हूं. लीगल सिस्टम के तहत लड़ाई है, जो हमारा सिस्टम है, उस लड़ाई के साथ हूं. इसीलिए मैं बोलती हूं कि न मुझे नक्सल का डर है, न मुझे सरकार का डर है.

जब आप कहती हैं कि हम इनके भी साथ नहीं हैं, उनके साथ भी नहीं हैं, तो क्या पुलिस की तरह नक्सली भी आप पर दबाव डालते हैं कि आप हमारे लिए काम कीजिए?

वार्तालाप होता है तो हम हमेशा शांति के लिए वार्ता करते हैं. जैसे एक आंदोलन हुआ, सुकड़ी (आदिवासी ग्रामीण) को पुलिस घर से उठाकर ले गई. तीन दिन तक हम 12-13 हजार लोग मिलकर थाना घेराव करके शांति के साथ लड़े. अंत में प्रशासन को सुकड़ी को वापस देना पड़ा. कहीं न कहीं हमारे सामने ये बात आती है कि आप हथियार का विरोध क्यों करती हैं? तो हम साफ बोलते हैं कि हम हथियार की लड़ाई में भरोसा नहीं करते. जो भी हथियार पकड़ेगा, हम उसके साथ नहीं हैं. अब बंदूक की गोली किसी के भी सीने में लगेगी तो क्या होगा? उसकी तो हत्या हो गई! वह हिंसात्मक होगा. हम ही हथियार उठाकर लड़ेंगे और कहेंगे कि हम मानवता को बचा रहे हैं तो कैसे बचाएंगे? मैं इसमें विश्वास नहीं करती. शांति, शिक्षा और कलम ही हमारा हथियार है.

‘अगर आपको नक्सलियों से लड़ना है तो उन पर अटैक करो. उनको मारो, लेकिन ऐसा नहीं कर रहे. यह आदिवासियों को वहां से भगाने की साजिश है’

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फोटोः विजय पांडेय

आप कहती हैं कि आप लाेग हथियार की लड़ाई का समर्थन नहीं करते, समाज में शांति के लिए लड़ते हैं तो सरकार या पुलिस से क्या लड़ाई है? बार-बार आप पर कार्रवाई क्याें होती हैै?

वही तो बात है. ऐसा इसलिए होता है कि सरकार जो दमन कर रही है आदिवासियों के साथ, महिलाओं के साथ. जैसे अभी हुआ, वेल्लम नेंद्रा में बलात्कार हुआ, रेवाली में बीमा नाम के व्यक्ति का एनकाउंटर हुआ. नीलाबाई में एक एनकाउंटर हुआ. फोदिया का नाहड़ी में एनकाउंटर हुआ. वो ग्रामीण आदिवासी था. तो हम इस तरह की बातों को सामने लाते हैं. बीमा मारा गया तो उसके खिलाफ सोनी सोरी क्यों लड़ रही है यह कोई नहीं देखना चाहता. बीमा एक आदिवासी किसान है, उसके लिए मैंने लड़ा. वो ये है कि बीमा को नक्सली बनाकर इन्होंने मार दिया. उसके लिए हमने लड़ा तो इनको लगता है कि ये नक्सली के साथ है. हर बार हमने सबूत दिया कि देखो ये ग्रामीण है, नक्सली नहीं है, लेकिन हमको नक्सल का समर्थक बताते हैं. अगर हूं तो मुझे भी बताएं कि मैं नक्सली कैसे हूं. ऐसे मुद्दे उठाने के लिए मुझे नक्सली करार दिया जा रहा है.

‘नक्सली संविधान पर भरोसा नहीं करते. पर सरकार किस पर भरोसा करती है? वह संविधान में भरोसा करती है तो हिंसात्मक लड़ाई क्यों कर रही है?’

कई बार मैं लोकल मीडिया में बोली कि अगर एक फोदिया का, बीमा का या बेल्लम नेंद्रा का मुद्दा उठाया, तो ये कहते थे कि सोनी सोरी झूठ बोलती है. मैं गांव में जाती थी, लोग बताते थे तो मैं प्रेस कॉन्फ्रेंस करती थी. लोकल मीडिया भी मुझसे सवाल करने लगे कि मैडम हम तो गए थे, वहां कुछ नहीं हुआ आप आकर चिल्लाते हो. फिर हमने अपना तरीका बदल दिया. अब गांववालों से कहती हूं कि सिर्फ मुझे मत बताओ कि तुम्हारे साथ बलात्कार हुआ है. यह बात तुम खुद बोलो. मीडिया को बताओ. मैं कलेक्टर के पास, अधिकारी के पास ले जाऊंगी, तुम खुद बोलो. आज महिलाएं खुद से बता रही हैं. जिस दिन पेद्दापारा की घटना हुई, महिला ने अपना स्तन निचोड़कर, दूध की धार बहाते हुए खुद मीडिया को बताया कि देखो ऐसा हुआ. तब मीडिया ने एक पल के लिए सिर झुका लिया. मैंने मीडिया भाई से बोला कि आप भी मत शर्माइए. ये भी नहीं शर्मा रही हैं. हम शर्म बोलकर कब तक चुप रहें? इस तरह की आवाज मैं उठा रही हूं तो कहते हैं कि मैं नक्सली हूं.

पुलिस या सैन्य बल ये क्यों चेक करना चाहेंगे कि महिला शादीशुदा या बच्चे वाली है या नहीं? सेना के लोगों को इससे क्या मतलब?

एक तो ये महिलाओं को कमजोर समझ रहे हैं. पुरुष तो चले जाते हैं. महिलाओं से यौन शोषण, बलात्कार आदि करते हैं. जैसे बच्चे वाली महिला बोली कि आप लोग हमारे घरों में खाना बनाकर खा रहे हो. निकलो हमारे घर से. हम अपने बच्चों को क्या खिलाएंगे? आप हमारे घर में घुसकर हमारा राशन-पानी,  मुर्गे सब खा जाते हैं. सब महिलाएं एकजुट होकर उनसे बहस करने लगीं. बेचारे दस-पंद्रह किलोमीटर दूर से बाजार जाकर राशन-पानी लेकर आते हैं, फोर्स वाले सब खा जाते हैं. दाल, चावल, मुर्गे-वुर्गे सब. तो वही ये महिलाएं कह रही थीं कि हमारे घर का सामान मत इस्तेमाल करो. गश्त पर आए हो तो अपना गश्त करो. महिला ने अपने बच्चों का वास्ता दिया कि हम अपने बच्चे को क्या खिलाएंगे. तो बोले हम कैसे मानेंगे कि आपका बच्चा है. हम चेक करेंगे कि दूध आता है कि नहीं. अगर दूध आता है तो समझेंगे तुम्हारा बच्चा है. उसके गोद से एक ने बच्चा छीन लिया और एक-दो ने मिलकर उसके स्तन को निचोड़ा. जब उसका दूध निकला तो बस हंसने लगे, मजाक उड़ाने लगे.

पहली बार कब आप पर नक्सल समर्थक होने का आरोप लगा?

2011 में. जब बहुत लंबा इश्यू चला था. बोला नक्सली है. कोई ये नहीं बोला कि टीचर है. सीधा नक्सली बनाकर जेल में डाल दिया. एक केस में अभी जमानत पर हूं तो नौकरी भी नहीं कर रही. मैं तो स्पष्ट बोल रही हूं कि आपने मुझसे मेरा जीवन छीना. मेरे पति को भी मार दिया गया. जेल में तीन साल रखा फिर पैरालाइज हुआ. फिर बहुत प्रताड़ित किया और मार दिया. मेरी अच्छी-खासी जिंदगी थी. मैं टीचर थी. बच्चे थे, पति था. आपने सब कुछ छीन लिया. मेरे बच्चों का जीवन बर्बाद किया. आज वे एक-एक चीज के लिए, दो वक्त की रोटी के लिए भी परेशान होते हैं. तो आपने हमें इस हालत में ला दिया तो हम आमने-सामने लड़ेंगे. मैदान में लाने वाले आप हैं तो लड़ेंगे. मेरी लड़ाई तो सच्चाई की है.

जो आरोप लगे थे, उस केस का क्या हुआ?

चल रहा है और चार साल हुए, पर अब तक गवाह भी पेश नहीं हुए हैं. जिसके लिए इतना प्रोपेगेंडा बनाया, दुनिया भर की बातें कीं. हम भी चाहते हैं कि सरकार रफ्तार से काम करे. एक केस में चार साल लगा दिया. सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी है जिसने जमानत दी. न दिया होता तो चार साल से हम जेल में पड़े रहते. उसी केस में बीके लाला (ठेकेदार) और वर्मा (एस्सार कंपनी के महाप्रबंधक डीएस वर्मा) को हाई कोर्ट ने जमानत दे दी लेकिन सोनी सोरी और लिंगाराम को नहीं दी. वर्मा को सरकार ने जमानत क्यों दी? क्योंकि वे एस्सार के मालिक (महाप्रबंधक) थे. दूसरा ठेकेदार था. सरकार को बहुत पैसा दिया होगा. सोनी और लिंगा पैसा कहां से लाएंगे? वो तो गरीब हैं, आदिवासी हैं. वो तो अच्छी बात है कि इस देश में ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने मदद की और आज हम बाहर हैं. लेकिन मुझ पर जितना अत्याचार किया गया, मुझमें उतनी ताकत पैदा होती गई.

क्या हमले के बाद आपके बच्चों को भी धमकी मिली है?

मेरे अस्पताल में भर्ती होने के बाद घर पर एक पर्चा आया जिसमें लिखा है, ‘मैडम बहुत खुश न हो अपनी बेटी को सुरक्षा दिलवा के. आपका एक बेटा भी तो है.’ बच्चों ने अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मुझे बताया. हालांकि, मेरे बच्चों ने कहा कि हम डरने वालों में से नहीं हैं. हम नहीं डरेंगे, आप भी मत डरिए. मेरे बच्चे तो खुद कहते हैं कि मेरी मां जनता की लड़ाई के लिए है.

इस तरह का हमला पहले भी कभी हुआ था?

हां, छोटी-मोटी तो कई चीजें होती रहती हैं. गांववालों के बीच पुलिस ने कई बार कहा कि सोनी सोरी को आज नहीं तो कल मार देंगे, जेल भेज देंगे. तुम्हारी नेता कितने दिन की है? मेरे पिता को भी आईजी ने 4-5 बार बुलाया और बोले अपनी लड़की को समझाओ. मेरे पिता भी नक्सल से पीड़ित हैं. नक्सल ने उनके पैर में गोली मार दी थी. वो भी परेशान हैं.

पिता को गोली क्यों मारी थी?

उस समय कई बार आईजी वगैरह मेरे पिता के पास जाते थे. पिता सरपंच और मुखिया होने के नाते काफी सम्मान और नाम वाले थे. वो सब बैठते थे. कुछ शिकायत रही होगी, अभी तक कुछ स्पष्ट पता नहीं चला. पिता जी की जमीन भी थी नक्सल के अंडर में. मेरे जेल जाने के बाद उस जमीन की आजादी हुई. फिर हम बोले कि जब हम सरकार से लड़ते हैं तो नक्सल से क्यों नहीं लड़ेंगे. हम नक्सल से भी लड़ेंगे. उस समय भी आईजी कल्लूरी और पुलिसवालों ने कहा कि सोनी सोरी नक्सलियों से मिली है और पिता की जमीन उनको दे दी है. उन पर मुकदमा चलाएंगे. मैंने पूछा कि ये काम सरकार का है. मेरे पिता की जमीन नक्सल ने क्यों रखी, पर आज तक सरकार ने बात नहीं की.

आपकी बातों से लगता है कि आपकी लड़ाई दोतरफा है- नक्सल से भी और सरकार से भी.

हां, नक्सल का तो स्पष्ट है कि उनका अपना संगठन है, उनकी अपनी लड़ाई है. मैं तो ये भी सवाल करती हूं कि नक्सली कहते हैं कि हम व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते, हम संविधान पर भरोसा नहीं करते, कानून-कायदे कुछ नहीं मानते, लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करते. पर सरकार किस पर भरोसा करती है? सरकार कहती है कि वे संविधान में रहने वाले लोग हैं, वे लोकतंत्र की और सिस्टम की लड़ाई कर रहे हैं, तो ये कैसी सिस्टम की लड़ाई है? सरकार सिस्टम और संविधान में भरोसा करती है तो हिंसात्मक लड़ाई क्यों कर रही है?