‘नक्सलवाद की लड़ाई खत्म हुई तो पैसे आने बंद हो जाएंगे, फिर नेता का जेब कैसे भरेगा?’

0
1137
P_20160309_183933_1_p(1)
फोटोः कृष्णकांत

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म करने की लड़ाई की पहली कीमत जनता चुका रही है. नक्सलियों के साथ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लंबे संघर्ष के बीच जनता का भी अपना संघर्ष है, जिसे सबसे कम महत्व मिलता है. जो लोग इसे कहने की कोशिश करते हैं, उन पर न सिर्फ सरकार नकेल कसती है, बल्कि कई बार उनको पुलिस प्रताड़ना और अदालती कार्रवाई भी झेलनी पड़ती है. राज्यसत्ता और नक्सलवाद की हिंसात्मक लड़ाई के बीच आदिवासी जनता का संघर्ष और उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती साबित होती है. पुलिस प्रताड़ना, नक्सली हिंसा और सत्ता के दमन से दो-दो हाथ करने वाली जनता की रहनुमाई भी बेहद कठिन काम है. उस जनता की आवाज उठाने के लिए प्रतिबद्ध एक आदिवासी महिला भी लगातार प्रताड़ना झेल रही है, जिसका नाम है सोनी सोरी. उनको नक्सल समर्थक होने के आरोप में जेल हुई, जहां उन्हें भयावह प्रताड़ना झेलनी पड़ी. सोनी का आरोप था कि जेल में उनके साथ बलात्कार किया गया और उनके गुप्तांग में पत्थर भर दिए गए. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा किया. उन पर ज्यादातर मुकदमे खारिज हो चुके हैं, एक मामला अब भी अदालत में है. हाल ही में उनपर कुछ युवकों ने हमला किया. उसके बाद उनसे हुई बातचीत:

अभी कुछ दिन पहले आपके ऊपर हमला हुआ था. यह हमला क्याें हुआ, किसने करवाया, कुछ पता चला? जरा विस्तार से इस बारे में बताएं.

मैं गीदम से ईशा खंडेलवाल और शालिनी (दोनों वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो आिदवासियों को कानूनी मदद मुहैया कराती हैं) से मिलने जगदलपुर आई थी. काफी दिन से पुलिस उन्हें परेशान कर रही थी. कई बार धमकी दी थी. उनके मकान मालिक को भी परेशान किया तो वाे कहने लगा कि घर खाली कर दो. उन्हें कोई घर देने को तैयार नहीं था, क्योंकि वहां पर माइक लगाकर ऐलान कर दिया था कि इस तरह के कोई लोग हैं तो तुरंत बताओ और उनको घर मत दो. उस स्थिति में इन लोगों ने जगदलपुर छोड़ने का निर्णय लिया. उन्होंने मुझसे कहा कि हम जा रहे हैं तो आप आकर मिल लो. मैं शाम को वहां पहुंची. अचानक शाम को मुझे एक मैसेज मिला कि उनके एक साथी को अरेस्ट करने की बात सामने आई है. हम सब और घबरा गए. थोड़ा-बहुत बातचीत करके ये लोग बस स्टैंड की ओर निकल गए. इसी बीच वहीं मुझे एक ग्रामीण भाई से मैसेज मिला कि मैडम आप कहां हो. सुरक्षित हो? मैंने पूछा कि क्यों क्या हुआ? उसने बताया कि बैठक में पुलिस वाले बात कर रहे थे कि सोनी सोरी को किस तरह से रोका जाए. उनके घर गुंडे भेजकर अटैक करवा दिया जाए या कुछ और किया जाए, ऐसी बात करते हुए मैंने सुना है. मैंने बात टाल दी और उससे अगले दिन मिलने काे बोला. मैं तभी शालिनी से बोली कि देखो दीदी हमारे लिए इस तरह की प्लानिंग हो रही है. शालिनी ने लिखा भी कि सोनी सोरी पर हमला हो सकता है. फिर भी मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वहां रोज धमकियां मिलती रहती हैं. फिर मैंने अपनी साथी रिंकी को बुला लिया कि वह मुझे छोड़ देगी. हम सबने साथ निकलकर ढाबे में चाय पी, फिर उसके साथ मोटरसाइकिल पर निकल गए.

तीन लड़कों ने हमारी गाड़ी के सामने अपनी गाड़ी लाकर हमें रोका. मुझे एक तरफ खींच लिया और कहने लगे कि आईजी कल्लूरी के खिलाफ बोलना बंद करो, जितने मुद्दे उठाती हो, सब बंद करो, अभी तो सिर्फ आपके चेहरे में काला पोत रहे हैं, आपकी बेटी के चेहरे पर भी ऐसा काला पोतेंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी और मेरे चेहरे पर कोई चीज पोत दी

रास्ते में बास्तानार के पास तीन लड़के साइड में गाड़ी से आ गए और नाम लेकर बोले कि सोनी मैडम रुको, आपसे बात करनी है, लेकिन रिंकी ने गाड़ी नहीं रोकी. उन्होंने अपनी गाड़ी लाकर सामने लगा दी तो गाड़ी रोकनी पड़ी. तुरंत उन्होंने रिंकी को कुछ दूर पर खींच लिया और मुझे दूसरी तरफ खींचकर ले गए कि मैडम इधर आइए. एक लड़के ने मेरे हाथ पीछे से पकड़ लिए. फिर कहने लगे कि आईजी कल्लूरी के खिलाफ बोलना बंद करो, जितने मुद्दे उठाती हो वो सब बंद करो, अभी तो सिर्फ आपके चेहरे में काला पोत रहे हैं, आपकी बेटी के चेहरे पर भी ऐसा काला पोतेंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी और मेरे चेहरे पर कोई चीज पोत दी. छूटते ही हम लोग तुरंत गीदम वापस हो गए. मुझे लगा कि मुझे बेइज्जत करने के लिए चेहरे पर स्याही वगैरह पोती होगी, लेकिन कुछ देर बाद चेहरे पर जलन होने लगी. मैंने कई लोगों को फोन किया. लिंगा कोडोपी को फोन किया और उसे गाड़ी लेकर आने को कहा. लिंगा मुझे गाड़ी में लेकर गीदम अस्पताल गया. फिर वहां से जगदलपुर लेकर आए. तीन दिन बाद मेरी आंखें खुलनी शुरू हुईं.

हमला करने वाले लड़के कौन थे?

नहीं, ये पता नहीं चल पाया.

जिन लड़कों ने ये हमला किया, वे आईजी कल्लूरी का नाम ले रहे थे?

हां, बोल रहे थे कि पुलिस के खिलाफ बोलना बंद करो. मार्डूम के मुद्दे उठाना बंद करो. मार्डूम में अभी एक फेक एनकाउंटर हुआ था. एक आदमी को उठाकर ले गए. कहा कि वह नक्सली है. बाद में उसे मार दिया. उसके सात बच्चे हैं. उसके पास राशन कार्ड है, आधार कार्ड है, उसको अभी इंदिरा आवास का पैसा मिला है. तो हमने ये सारे सबूत लेकर उसकी विधवा के साथ प्रेस कांफ्रेंस की. पुलिस कह रही कि हमारे पास सारे सबूत हैं कि वह नक्सली था, हमने कहा कि मैं सबूत दे रही कि वह साधारण ग्रामीण था. सरकार उसे ये सारे कागज इश्यू कर चुकी है. तुम भी सबूत दो कि वह नक्सली था. अगर वह नक्सली था तो उसे इंदिरा आवास कैसे दिया गया? हमने कई ऐसी घटनाओं का खुलासा किया है, बलात्कार, फर्जी एनकाउंटर… लेकिन ये मुद्दा हमने विशेष तौर से उठाया, इससे ये लोग घबरा गए.

आपके बहन-बहनोई को भी पुलिस ने उठाया था. क्या कारण था?

अटैक के बाद मैं चेहरे का इलाज कराने दिल्ली आई, तभी मेरी बहन के पति को उठा लिया था. मेरे परिवार ने सोचा कि मेरे ऊपर अटैक को लेकर जांच कमेटी बनी थी, पूछताछ के लिए ले गए होंगे. हमें मदद करनी चाहिए, लेकिन उन्होंने शाम तक छोड़ा ही नहीं. दूसरे दिन भी नहीं छोड़ा. मुझे लगा कि मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है. मैं 11 मार्च को छत्तीसगढ़ पहुंची और राजधानी में प्रेस कॉन्फ्रेंस की कि अगर मेरी बहन के पति को नहीं छोड़ा तो हम धरना देंगे. उसी दिन मेरी बहन को भी उठा लिया. उस पर भी हमने सवाल किया कि हमारे परिवार को परेशान कर रहे हैं. जो भी कोशिश हो सकती है वो किया. फिर मैं बस्तर के लिए निकल गई. मेरे बस्तर पहुंचने के पहले दोनों को छोड़ दिया.

उन्हें उठाया क्यों गया था?

उन्हें ये स्वीकार करने का दबाव बनाने के लिए उठाया था कि मुझ पर हुआ अटैक लिंगा कोडोपी, मेरी बहन के पति अजय मरकाम और उसके दोस्त ने मिलकर किया है और ये योजना लिंगा कोडोपी की थी, जिसके लिए उसने  इन दोनों को पैसे दिए थे. ये लोग बोले कि चाहे मारो या जेल भेज दो, जो हमने किया नहीं है वो कबूल नहीं करेंगे.

अापने प्रेस वार्ता में कहा कि आप पर ये हमला आईजी कल्लूरी ने करवाया है!

मुझे पूरा शक है कि ये हमला आईजी कल्लूरी की साजिश में हुआ है. मैं सिर्फ शक कर रही हूं लेकिन जिस तरह मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है, अब तो पूरा यकीन होता जा रहा है कि ये हमला पुलिस और आईजी कल्लूरी के नेतृत्व में हुआ है. आप बताइए, मेरे पर अटैक के अपराधी को पकड़ना है तो मेरे ही परिवार को क्यों परेशान किया जा रहा है? मेरे पिता को धमकी दी है कि तुम्हारा परिवार बर्बाद कर दूंगा. बहन को धमकी दी कि हाथ-पैर तोड़ देंगे.

बस्तर समेत आदिवासी इलाकों में लंबे समय से संघर्ष चल रहा है. वहां की असली समस्या क्या है? लड़ाई किस बात को लेकर है?

वहां की सरकार नक्सल का नाम लेकर लड़ाई छेड़े हुए है. मैं मानती हूं कि बस्तर में एक संगठन है नक्सलियों का, उसकी अपनी गतिविधियां हैं,  लेकिन उसके नाम का सहारा लेकर हम आदिवासियों पर अटैक किया जाता है. अगर आपको नक्सल से लड़ना है तो उन पर अटैक करो. उनको मारो. लेकिन ऐसा नहीं कर रहे. अब हमको भी समझ में आ रहा है कि यह नक्सल की लड़ाई नहीं है. यह आदिवासियों को वहां की जमीन और जंगल से भगाने की साजिश है ताकि वहां बड़ी-बड़ी कंपनियां लगाई जाएं. सरकार का मकसद है आदिवासियों को मारना और नाम लिया जाता है नक्सल का. जब तक आदिवासी वहां पर रहेंगे, इनको जमीन नहीं मिलेगी तो आदिवासियों को नक्सली बता रहे हैं. इतने दिन से लड़ाई चल रही है, सरकार ने कितने नक्सली लीडर को मारा? कितने को पकड़ा? ये पूरे देश के सामने दिखाया जाए. सरकार इतनी फोर्स लेकर वहां लड़ रही है. 2014 में मेरी रिहाई हुई, 2016 तक बता दें कि कितने स्टेट लेवल के नक्सल लीडर को मारा? ये बता दें तो पता चल जाए कि ये लड़ाई नक्सल से है. आदिवासी ग्रामीणों को ही नक्सली बनाकर जेल भेज रहे हैं, उन्हीं को मार रहे हैं, उन्हीं की पत्नी और बहनों के साथ बलात्कार और अत्याचार हो रहा है. कुल मिलाकर आदिवासियों को मारकर जमीन हड़पने की लड़ाई है. नक्सल को भगाने की लड़ाई नहीं है.

मतलब सरकार को जमीन पर कब्जा चाहिए और ग्रामीण जनता  इसका विरोध करती है…

वो तो करेंगे ही. एनएमडीसी माइनिंग कंपनी है. उसके लिए कितनी लड़ाई थी. आज कहां हो रही है? उसको जंगल भी दिया, जमीन भी दिया, कंपनी को सब चीजें दे दीं, उसके बाद हमारे लोगों का विकास कहां होता है? नहीं होता. हां, वहां के लोग चाहते हैं कि विकास हो. विकास चाहिए, जो मूलभूत आवश्यकता है जैसे पानी, बिजली, सड़क, आश्रम (स्कूल), आंगनबाड़ी… ऐसे छोटे-मोटे विकास चाहिए. बड़ी-बड़ी कंपनी लगाकर तो हमारे लोगों को भगा रहे हैं.

कुछ समय पहले आपने नौ महिलाओें के बलात्कार का मामला उठाया था, वहां क्या हुआ था?

पहले पेद्दापारा गांव में हुआ और फिर वेल्लम नेंद्रा गांव में भी. गश्त के दौरान पुलिस बलों द्वारा महिलाओं का बलात्कार हुआ था. महिलाओं से बच्चों को छीनकर फेंक दिया. इस दौरान महिलाओं के पति, पिता, भाई ये सब तो जंगल में भाग गए.

‘न मैं पुलिस के लिए काम करती हूं, न मैं नक्सलियों  के लिए काम करती हूं. मैं काम करती हूं जनता के लिए. हम हथियार की लड़ाई के साथ नहीं हैं’

ऐसा पहले भी हुआ है. कई बार हमने समझाया कि आप लोग भागो मत, सामना करो तो लोगों ने किया. गांव में ही रहे, लेकिन तब इन्हें या तो पकड़कर जेल भेज देते हैं या एनकाउंटर कर देते हैं. इसलिए पुरुष अपने को बचाने के लिए छुप जाते हैं.

उस इलाके में यह संघर्ष और दमन लंबे समय से चल रहा है, इसे रोकने के लिए क्या रास्ता है?