हुर्रियत: प्रासंगिकता पर प्रश्न

0
136

syed geelani(Left) with Umar Farooq at a protest. Photo by Javed Dar/Tehelkaपिछले साल नवंबर में जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय अलगाववादियों ने हमेशा की तरह चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया था. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा और भाजपा अपने आक्रामक चुनाव प्रचार के कारण एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आई वैसे ही कुछ अलगाववादी धड़ों ने अपनी प्राथमिकता बदल दी. इतना ही नहीं इन्हें शह देने वाला पड़ोसी मुल्क भी घाटी में बदले माहौल से हैरत में है. इन धड़ों के कुछ नेताओं को पाकिस्तान की तरफ से हमेशा से ही उकसाया जाता रहा है. जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव पर हर बार पाकिस्तान की पैनी नजर बनी रहती है. बहरहाल अलगाववादी किसी भी सूरत में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को राज्य में नहीं आने देना चाहते थे. सूत्रों ने दावा किया है कि यही वजह है जिससे घाटी में अलगाववादियों के सबसे बड़े संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने चुनाव बहिष्कार करने के साथ राज्य के एक बड़े समुदाय को वोट न देने के लिए षडयंत्रपूर्ण तरीके से अभियान चलाया.

हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के एक शीर्ष नेता कहते हैं, ‘इस बात की निहित समझ बनी हुई थी कि अगर चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी कुछ प्रतिशत बढ़ती भी है तो हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है. माना गया था कि मतों में बढ़ोतरी भाजपा को सत्ता से दूर ले जाएगी.’ कुछ हद तक ऐसा हुआ भी. घाटी में भाजपा के एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका. इसके उलट जम्मू संभाग में भगवा परचम लहराते हुए भाजपा को 25 सीटें मिल गईं. यह राज्य में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. इसके बाद राज्य में 28 सीटें जीतने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से गठबंधन कर भाजपा जम्मू कश्मीर की सत्ता में जगह पाने में कामयाब हो गई. इसके अलावा भाजपा को राज्य में पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के रूप में एक नया और महत्वपूर्ण साथी मिल गया. अलगाववादी से राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हुए सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है.

विधानसभा चुनाव के बाद गठबंधन को लेकर भाजपा और पीडीपी में कई दौर की बातचीत चली. कुछ मुद्दों पर सहमति बनती थी तो कुछ मुद्दों पर नाराजगी. आखिरकार तमाम मुद्दों पर दोनों दल एक हुए और मुफ्ती मोहम्मद सईद ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. तब गठबंधन को लेकर हो रही बातचीत के बीच मुफ्ती मोहम्मद सईद की दिग्गज हुर्रियत नेता अब्दुल गनी भट्ट से मुलाकात ने सबको हैरत में डाल दिया था. 1989 में अलगाववादी आंदोलन शुरू होने के बाद यह पहली बार था जब हुर्रियत का कोई नेता मुख्यधारा के किसी राजनीतिज्ञ को चुनाव में मिली सफलता पर बधाई देने के लिए उसके घर पहुंचा था.

[box]

वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिये पर रहे अलगाववादी परेशान हैं कि पल-पल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बनकर रह जाएं

[/box]

वास्तव में इस बार के विधानसभा चुनाव में लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी और मुख्यधारा की राजनीति में विस्तार के चलते राज्य में भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई थी, जिसके चलते अलगाववादियों के हौसले पस्त हो गए. वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिये पर रहे अलगाववादी इस बात से परेशान नजर आ रहे हैं कि पल-पल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बनकर रह जाएं. इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि इन स्थितियों ने अलगाववादियों को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर फिर से सोचने और आत्मावलोकन करने पर मजबूर कर दिया है. यह आत्मावलोकन इसलिए ताकि राज्य में न सिर्फ उनका अस्तित्व बचा रहे बल्कि वे राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकें.

अब सवाल ये है कि जम्मू कश्मीर में बढ़ती हुई अप्रासंगिकता के खिलाफ खुद को बचाने के लिए अलगाववादियों को कौन सी राह पकड़नी होगी? अभी इस सवाल का जवाब दे पाना थोड़ा मुश्किल है. हालांकि इसके इतर इस सवाल का जवाब ढूंढना उनके लिए अब कुछ ज्यादा ही जरूरी हो गया है. बीते कुछ हफ्तों में विभिन्न अलगाववादी धड़ों के नेताओं ने नई रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया है. वहीं इनमें से कुछ समाज के दूसरे प्रतिनिधियों से सलाह लेने से भी नहीं चूक रहे हैं. सलाह के लिए इन्हें बाकायदा अपने यहां खाने पर भी बुलाया गया था. कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये दिख रहा है कि हुर्रियत को राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए जिसका अलगाववादी लंबे समय से बहिष्कार करते रहे हैं. अलगाववादी आंदोलन की शुरुआत होने के बाद से ही हुर्रियत के सभी धड़ों ने चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार किया है. चुनावी प्रक्रिया को लेकर इन धड़ों की सोच में आया बदलाव भारत सरकार में विश्वास प्रकट करने के समान है.

लंबे समय से आतंकवादियों के जरिए जब तक सशस्त्र अभियान चलाए जाते रहे तब तक अलगाववादियों का राजनीतिक प्रभाव घाटी में मजबूत रहा है. हाल के समय में आतंकी गतिविधियों में आई कमी से वहां अलगाववादियों की स्थिति कमजोर हुई है. इन स्थितियों की वजह से तमाम अलगाववादी नेता यह सोचने को मजबूर हुए हैं कि आतंकी गतिविधियों की बजाय उन्हें खुद के राजनीतिक और वैचारिक ताकत के दम पर अपनी प्रासंगिकता फिर से कायम करनी होगी और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने का यह लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता है जब तक हुर्रियत को वह राह न मिल जाए जिसकी बदौलत वो कश्मीरियों के हर दिन की समस्या को उठा सके.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here