स्वास्थ्य मंत्री के ‘स्वस्थ’ विचार

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imgस्कूलों में यौन शिक्षा को लेकर एतराज जताने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन अकेले नहीं हैं. हमारे यहां बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इसे ‘गंदी बात’ जैसा कुछ मानते हैं और बच्चों को इससे बाहर रखना चाहते हैं. वे जैसे मान कर चलते हैं कि जैसे परंपरा से अब तक पीढ़ियां यह सब सीखती आई हैं, उसी तरह अब भी सीख लेंगी. लेकिन क्या वह परंपरा बहुत स्वस्थ परंपरा रही है? अक्सर अपने समवयस्कों या अपने से कुछ बड़े भैयानुमा मित्रों की फुसफुसाती बातों और कोकशास्त्र की ढकी-छुपी प्रतियों के मार्फत मिलने वाला यह ज्ञान, ज्ञान से ज्यादा अज्ञान होता है जो अपने साथ बच्चों में एक अवांछित अपराध बोध भी लाता है कि वे अपने बड़ों से छुपा कर कुछ कर रहे हैं. इससे ज्यादा खतरनाक बात यह होती है कि ये लड़के अपने आसपास की लड़कियों को लेकर एक अजब से कुंठित दृष्टिकोण के बीच बड़े होते हैं जिससे मुक्त होने में वक्त लगता है. कुछ तो जीवन भर मुक्त नहीं हो पाते.

फिर इन दिनों लैपटॉप से लेकर मोबाइल तक इंटरनेट की जो बजबजाती-बेकाबू दुनिया है, उसके पोर्न साइट इन बच्चों के गुरु और मार्गदर्शक बनते हैं जिनकी मार्फत मिलने वाली फिसलन भरी गलियां और ज्यादा खतरनाक होती हैं. यह आधुनिकता और उसके पहले वाली परंपरा दोनों अपने स्वभाव में ऐसे स्त्री विरोधी हैं कि वे स्त्री को ज्यादा से ज्यादा सामान में बदल रहे हैं. मनोरंजन उद्योग से लेकर पर्यटन उद्योग तक का पूरा कारोबार जैसे स्त्री देह पर टिका हुआ है. ऐसी भीषण दुनिया का सामना करने के लिए क्या हमारे बच्चे-बच्चियां तैयार हैं? अगर नहीं तो सभ्यता और संस्कृति पर इस हमले का हम कैसे सामना कर सकते हैं?

डॉ हर्षवर्द्धन इसका जवाब योग और सेहत संबंधी शिक्षाओं में खोजते हैं. इससे भी शायद किसी को एतराज न हो. मुश्किल यह है कि योग, सेहत या संयम की इन कक्षाओं से उस जटिल यथार्थ का सामना नहीं किया जा सकता जिन्हें इन स्थितियों ने बनाया है. दरअसल यह उस यौन-विस्फोट से एक तरह से आंख चुराना है जो नई पीढ़ी के सामने है. इससे जब आंख मिलाएंगे तभी इसको लेकर एक स्वस्थ नजरिया विकसित कर पाएंगे, जिसमें शायद यह समझ भी शामिल होगी कि स्त्री पुरुष के बीच बराबरी और न्याय का रिश्ता आपसी सम्मान से भी विकसित होगा.

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