‘उसने कहा, मैं इतनी खूबसूरत हूं कि उसे खुद को याद दिलाना पड़ता है कि वो शादीशुदा है’

ये साल 2011 की बात है. दिल्ली में एक सहयोगी के जन्मदिन पर ग्रीनपीस के गेस्टहाउस में पार्टी थी. स्टाफ के लोगों को बुलाया गया था. मैं भी वहां पहुंची. उदय कुमार वहां पहले से मौजूद था. वह शराब के नशे में था. पूरा स्टाफ साथ में ही बैठा था, दिव्या रघुनंदन और समित एच भी थे. अचानक उदय कुमार उठा और उसने ने मुझ पर भद्दी टिप्पणी करनी शुरू कर दी. वो सब के सामने ये कह रहा था कि मैं कितनी खूबसूरत हूं कि जब उसने मुझे पहली बार देखा तब वो खुद पर काबू ही नहीं कर पाया, उसे खुद को बार-बार ये याद दिलाना पड़ा कि वो शादीशुदा है!

मेरे लिए ये सब सहना बहुत असहज था. इतना सब हुआ पर लोग उसकी ऐसी बात पर हंस रहे थे. मेरे पक्ष में किसी ने भी उठकर एक शब्द भी नहीं कहा. तब मैंने अपने एक सहकर्मी से मुझे घर छोड़ देने के लिए कहा. इस पर उदय कुमार मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला कि ऐसे भाग क्यों रही है, चलो बाहर घूमने चलते हैं! इसके बाद मैं वहां नहीं रुकी. अगले दिन मैंने दिव्या से इस बारे में बात की तब उसने सलाह दी कि मुझे उदय कुमार को चेतावनी देनी चाहिए. मैंने ऐसा ही किया पर उदय कुमार ने ऐसे व्यवहार के लिए कभी माफी नहीं मांगी. इस घटना के बाद मैंने ग्रीनपीस की किसी भी पार्टी में जाना बंद कर दिया क्योंकि मुझे डर था कि अगर कभी फिर ऐसा या इससे अधिक कुछ भी हुआ तब भी कोई मेरा साथ नहीं देगा, पर ये ऐसी किसी समस्या का हल नहीं है.

इस घटना के अलावा भी मैंने कई बार ऑफिस में भद्दे, अश्लील मजाक सुने हैं, जिन्हें साफ तौर पर स्त्री विरोधी कह सकते हैं. ग्रीनपीस में ‘मिसोजिनी’ (स्त्री जाति से द्वेष) का कल्चर है. वो घटिया लोग हैं. मैं दुनिया भर में ग्रीनपीस के कई दफ्तरों में गई हूं, वहां काम किया है पर ऐसा घटिया माहौल कहीं भी नहीं है. उनके घटियापन का पता आपको इस बात से चल सकता है कि जब मेरी एक सहयोगी मेघना ने एक पुरुष सहकर्मी पर बलात्कार का आरोप लगाया तो कुछ लोगों का कहना था कि उस लड़की का तो बलात्कार होना ही चाहिए था (शी डिजर्व्ड टू बी रेप्ड)!

सीमा

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