‘मोदी के नेतृत्व में भाजपा इंदिरा की कांग्रेस जैसी हो जाएगी’

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के एन गोविंदाचार्य ।71। पूर्व प्रचारक (संघ)
के एन गोविंदाचार्य ।71। पूर्व प्रचारक (संघ)

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने छह महीने बीत गए हैं. आप उनके प्रदर्शन को कैसे देखते हैं?
जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ने खुद को सबसे मेहनती प्रधानमंत्री साबित किया है. वह सर्वाधिक सक्रिय भी हैं. उन्होंने ये दो गुण दिखाए हैं. हालांकि उन्हें केंद्र में शासन के तौर-तरीके सीखने हैं. अब उनको नौकरशाही को थामने और फिर गतिशील बनाने के दुरूह काम को अंजाम देना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरी व्यवस्था अपनी प्रकृति में यथास्थितिवादी, निष्क्रिय, भ्रष्ट और असंवेदनशील है. नौकर से लेकर सचिव स्तर तक के सभी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों को दूसरे के सिर डालने को ही अपने बचाव का सर्वश्रेष्ठ तरीका मानते हैं. इसकी वजह से अनिर्णय का माहौल बनता है जो कि नौकरशाही का एक और गुण है. नई सोच तो बहुत दूर की कौड़ी है. ऐसे में अब मोदी को शासन के इस पहलू का सामना करना पड़ रहा है. यह देखना रोचक होगा कि वह इसका सामना कैसे करते हैं.

इसी तरह, आज आप मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को या फिर पार्टी और सरकार को अलग-अलग करके नहीं देख सकते. फिलहाल वे सब एकमएक हैं. और भविष्य में भी यही क्रम जारी रहेगा क्योंकि शाह को उनसे अलग करके नहीं देख जाएगा. वह मोदी का साया बने रहेंगे.

उन्हें अभी अपनी छाप छोड़नी है. ऐसे माहौल में किसी देवकांत बरुआ के उभर आने की आशंका प्रबल हो जाती है. (बरुआ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष थे, उन्होंने इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया की प्रसिद्ध उक्ति दी थी). इस तरह का एक ही व्यक्ति पूरी प्रतिष्ठा को धूलधूसरित करने के लिए पर्याप्त है. यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इन तमाम पहलुओं से कैसे निपटते हैं.

प्रधानमंत्री की कारोबार समर्थक छवि और उनकी सरकार की कुछ हालिया घोषणाओं, खासतौर पर काले धन से जुड़ी घोषणा को लेकर आप क्या सोचते हैं?
सरकार के इरादों पर किसी तरह का सवाल उठाए बिना मैं कहना चाहूंगा कि सरकार को इन मसलों में और तेजी लानी चाहिए. केवल इच्छा व्यक्त करने से हालात नहीं बदलेंगे, केवल सवाल खड़े करना पर्याप्त नहीं है, उन सवालों के साथ बदलाव के कदम भी उठाने होंगे. राजनीति और कारोबारियों के बारे में हाल ही में मुरली मनोहर जोशी ने भी अपनी राय व्यक्ति की है और मैं उनकी राय से सहमत हूं कि मुकेश अंबानी (रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन) का प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखना पार्टी कैडर के लिए अच्छा संदेश नहीं है. इससे कैडरों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है.

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इस पार्टी में नानाजी देशमुख (भारतीय जनसंघ के संस्थापक) जैसे लोग थे जिनके उद्योगपतियों से मधुर रिश्ते थे लेकिन किसी को उनसे ऐसी नजदीकी हासिल नहीं थी और उनके रहते किसी उद्योगपति को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता तक नहीं दी गई. लेकिन पिछले 20 सालों में कारोबारी घरानों ने अपने कुछ अधिकारियों-पूर्वअधिकारियों के लिए राज्यसभा सीट तक हासिल कर ली हैं. राजनीतिक शक्ति और पैसे की ताकत का यह गठजोड़ निश्चित तौर पर नीति निर्धारण को प्रभावित करेगा. इस माहौल में राजनीतिक दलों के लिए ऐसे कदम उठाना मुश्किल होगा जो कारोबारी घरानों के हित के खिलाफ हों. सरकार चला रहे लोगों को इसकी पूरी जानकारी रहनी चाहिए और उन्हें इस बारे में सतर्कता बरतनी चाहिए. एक तरफ मोदी कहते हैं कि काले धन की एक-एक पाई वापस लाई जाएगी, क्योंकि वह गरीबों का पैसा है और दूसरी तरफ उनके कारोबारी घरानों से मेलजोल की तस्वीरंे दिखती हैं जो कि आपस में विरोधाभासी हैं.

कुछ लोग मोदी को तानाशाही प्रकृति का मानते हैं. आप उनकी प्रशासनिक शैली को कैसे देखते हैं?
मोदी बेहद चतुराई से काम कर रहे हैं. कहा जा सकता है कि वह छवि, संदेश, संकेत और राजनीति के मामले में बेहद सधे हुए व्यक्ति हैं. उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता है. उनके जैसा करने के लिए एक समुचित ढांचा, तकनीक और संसाधनों की आवश्यकता होगी. उनमें वे सारे गुण हैं क्योंकि उनका नाता भाजपा और संघ परिवार से रहा है. ऐसे में वह उन तीनों कारकों को मिलाने में सक्षम हैं और यही उनकी काबीलियत है. हमें यह मानना होगा. लेकिन इन बातों को जमीनी स्तर पर उपलब्धियों में बदलना होगा. ऊपर मैंने नौकरशाही को लेकर जो बात कही उसका संबंध इसी से है.

कांग्रेस परेशानी में है. मीडिया का एक धड़ा सरकार की आलोचना करता नहीं नजर आ रहा है. न्यायपालिका में सुधार की आवश्यकता है. इन हालात में आपको क्या लगता है कि विपक्ष की सही भूमिका कौन अदा कर सकता है?
विपक्षी राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं. उनकी अपनी स्थिति खराब है. वे अपनी हार को पचा नहीं पा रहे हैं, वे इस हकीकत को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने का समय है, उन्हें यह भी पता नहीं है कि यह काम कैसे होगा. उन्हें भी समझ नहीं आ रहा है कि भविष्य की राजनीति क्या होनी चाहिए. विपक्ष तो नजर ही नहीं आ रहा है. मीडिया की बात की जाए तो उसने नई सरकार का आकलन करने या उसकी आलोचना करने के पहले उसे समय देकर सही काम किया है. मुझे लगता है कि मीडिया का काम निष्पक्ष है. जहां तक न्यायपालिका की बात है तो उसने खुलकर काले धन समेत कई विषयों पर कड़ी टिप्पणियां की हैं. वह पर्याप्त मुखर और आक्रामक रही है. मुझे लगता है कि मीडिया और न्यायपालिका अपनी भूमिका निभा रहे हैं. लेकिन विपक्ष के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती है.

क्या आम आदमी पार्टी (आप) सरकार के बजाय विपक्ष की भूमिका में अधिक प्रभावी साबित हो सकती है?
उनको लोगों के हितों का संरक्षण करने और उनको आगे बढ़ाने के लिए और अधिक कौशल की आवश्यकता पड़ेगी. जहां तक मुझे लगता है कि आप की अप्रत्याशित सफलता के लिए जनता के मन में तत्कालीन शासन के प्रति व्याप्त निराशा अधिक बड़ी वजह थी. ऐसा उन्होंने खुद भी महसूस किया होगा. उनको खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में विकसित करना होगा. उनका आंदोलन सफल जरूर रहा लेकिन उसमें मजबूती नहीं थी. ऐसे में धीमे-धीमे आगे बढ़ने की नीति अधिक बेहतर होती लेकिन अपना आकलन तो वही बेहतर कर सकते हैं.

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