प्यार पूंजीवादी नहीं चाहिए…

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1964
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िफल्म » हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया
निर्देशक» शशांक खेतान
लेखक » शशांक खेतान
कलाकार » वरुण धवन, आलिया भट्ट, आशुतोष राणा, सिद्धार्थ शुक्ला

हमारी फिल्मी प्रेम कहानियों में, ज्यादातर में, परतें नहीं होती, परत-दर-परत खुलते-बनते-बिगड़ते-सिसकते रिश्ते नहीं होते. वे सतह पर ही टहलती हैं, वहीं बिखरे पड़े पॉपकार्न खाने में व्यस्त रहती हैं. हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया, जो अपने कुछ हिस्सों में मजेदार है, प्यार को पूंजीवाद का शिकार बना देती है, ऐसा प्यार जो हमें नहीं चाहिए. हीरोइन को हीरो से प्यार होता है तब जब हीरो हीरोइन की शादी, जो हीरो के साथ नहीं किसी और के साथ होनी है, के लिए ‘हीरोइन का सपना’ लाखों का महंगा डिजाइनर लहंगा खरीदने के वास्ते पैसों का बंदोबस्त कर देता है, और जब हीरोइन की झोली में हीरो उन लाखों रुपयों को डालता है प्रेम परवान चढ़ता है. जब हीरोइन हृदय परिवर्तन के बाद उन पैसों से लहंगा न खरीद हीरो के घर तोहफे में ‘हीरो का सपना’ लाखों की कार पहुंचवाती है, और खुद किसी और से शादी के लिए निकल जाती है, कार देख हीरो रोता है और अपना प्यार वापस पाने अंबाला निकलता है. रास्ते में अगर वह, मीटर पर न चढ़ सका यह गाना भी गा देता तो फिल्म का संदेश ज्यादा स्पष्ट हो जाता, ‘प्यार पूंजीवादी ही चाहिए, कार मिल चुकी है, अब अंबाला में एक बंगला चाहिए’.

हमारी फिल्मी प्रेम कहानियों में, ज्यादातर में, एक चीज है जो प्रेम को सफल बनाती है. हास्य. हास्य अच्छा हो तो प्रेम कहानी सफल लगती है. है यह प्लेसिबो इफेक्ट, लेकिन जब से होम्योपेथी ने प्लेसिबो प्रभाव से आशातीत सफलता हासिल की है, अफसानानिगारों को लगता है हास्य भी प्रेम को वैसी ही सफलता दिला देगा. फिल्म ऐसे ही हास्य की टेक लेकर मनोरंजन करती है. दर्शक खुश भी होते हैं, लेकिन इस त्वरित तृप्ति में प्रेम अपना अस्तित्व खो देता है, रोता है, हंसी-ठहाकों में वह रोना भी दर्शकों को हंसना लगता है. फिल्म प्रेम की टेक भी लेती है, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ से, और श्रद्धा से आदरांजलि देते हुए उसे पूरी तरह आत्मसात करती है. ऐसा करना फिल्म के सिर्फ पहले एक घंटे को दिलचस्प बनाता है, हास्य यहां भी उसका संकटमोचन है, लेकिन दूसरा हिस्सा, जहां (मेलो) ड्रामा शुरू होता है, और ‘मैंने प्यार किया’,‘प्यार किया तो डरना क्या’ बीच-बीच में पॉप-अप विंडो की तरह फुदकते हैं, संकटमोचन भी मोच का शिकार होता है.

हास्य, चतुर संवाद और छद्म प्रेम ने जिस शुरुआती हिस्से को मजेदार बनाया है, वहां, और बाकी की फिल्म में भी, आलिया-वरुण के बीच की केमिस्ट्री ही इस फिल्म की खूबसूरत रंगोली है. वरुण अगर अपनी ऊर्जा के साथ थोड़ा मितव्यय हो जाएं, ताकि ठहराव आए और गोविंदा उनपर से जाएं, तो वे बेहतर अभिनेता बनेंगे. फिल्म बेहतर नहीं है इसलिए उनके बेहतरीन अभिनय की उसे जरूरत नहीं है, लिहाजा जो वे करते हैं, अच्छे लगते हैं. आलिया जाहिर है हर फिल्म के साथ बेहतर हो रही हैं, और वे हमारी फिल्मों का भविष्य हैं, दोबारा लिखना जरूरी है. आलिया के पास करीना वाला तोहफा भी है, कम मेहनत में स्क्रीन पर नेचुरल लगना, लेकिन कुछ दृश्यों में जब वे लापरवाह होती हैं, अभिनय में लगने वाली मेहनत से जी चुराने की कोशिश साफ दिखती है. आशुतोष राणा फिल्म में साधारण हैं, यह लिखना और उनका जिक्र करना सिर्फ इसलिए आवश्यक है कि वे एक असाधारण अभिनेता हैं.

फिल्म असाधारण नहीं है क्योंकि जिन प्रेम कहानियों में इश्क लहंगे, पैसे और कार पर निर्भर हो, कुछ अरसे बाद उन कहानियों में प्रेम का अंत ही होता है. और ऐसा प्रेम हमें नहीं चाहिए. फिल्मों में भी नहीं.

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