‘बिहार में अब भी सामंती ताकतें हैं और सरकार उन्हें संरक्षण देती रही है’ | Tehelka Hindi

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‘बिहार में अब भी सामंती ताकतें हैं और सरकार उन्हें संरक्षण देती रही है’

बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन को ऐतिहासिक जीत हासिल हुई तो वहीं नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले राजग को करारी हार का सामना करना पड़ा. दो ध्रुवीय मुकाबला होने के बावजूद भाकपा माले एक सीट से बढ़कर तीन सीटें जीतने में कामयाब रही. 243 में से मात्र तीन सीटों पर मौजूदगी दर्ज कराने के बावजूद इसे पार्टी की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. इस कामयाबी पर भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से निराला की बातचीत

निराला November 24, 2015
Dipankar by Vijay Pandeydddddd

फोटोः विजय पांडेय

बिहार के चुनाव परिणाम को आप किस तरह से देखते हैं?

बिहार की जनता को बधाई. यह भाजपा के खिलाफ एक जरूरी जनादेश है. यह चुनाव राष्ट्रीय संदर्भ में लड़ा गया था. राष्ट्रीय संदर्भ ही इसमें प्रधान बन गया था. 17 माह की सरकार में ही केंद्र की सरकार ने जो माहौल बना दिया है, उसमें सामंती और सांप्रदायिक ताकतों का परास्त होना जरूरी था.

भाजपा के खिलाफ जनादेश पर आप ज्यादा जोर दे रहे हैं. इसे नीतीश और लालू के पक्ष में भी तो कहा जा सकता है?

यह लालूजी या नीतीशजी के पक्ष में नहीं बल्कि भाजपा के खिलाफ जनादेश है. लालूजी और नीतीशजी का गठजोड़ बेहतर बन गया तो जनता ने फिर से मोहलत दे दी.

कुछ लोग अभी से ही यह बात करने लगे हैं कि नीतीश और लालू चूंकि बिल्कुल अलग-अलग तरीके के लोग हैं, इसलिए पांच साल साथ रह नहीं पाएंगे.

कुछ गड़बड़ियां तो हैं. नीतीश दस सालों से सरकार में हैं और गरीबों व मजदूरों की जो समस्या है, वह बढ़ी ही है.

जब भाजपा के खिलाफ यह जनादेश है तो फिर वामपंथ को और मजबूत विकल्प बनना चाहिए था. छह वाम दल एक साथ मिलकर चुनाव तो लड़े लेकिन जीत तो सिर्फ आपकी पार्टी की हुई.

वामपंथ विकल्प बनने की स्थिति में अभी नहीं था. ऐसे ध्रुवीकरण के बीच तीन सीटें हमें मिली हैं, इसे इस तरह से देखिए कि वामपंथ पर लोगों का भरोसा जगा है.

वामपंथियों ने आपस में गठजोड़ तो किया, लेकिन वे सही तरीके से साथ नहीं चल सके, ऐसा भी कहा जा रहा है.

गठजोड़ पहले से हो जाता तो प्रचार की धार को और मजबूत किया जा सकता था. लेकिन बिहार ने दिशा दी है. वामपंथियों में इससे उत्साह बढ़ेगा.

आप लोगों का वोट प्रतिशत तो घटा है, सीट भले ही तीन मिल गईं?

जिन महत्वपूर्ण सीटों पर हम 2010 में चुनाव लड़े थे या 2014 के लोकसभा में लड़े, उन सीटों पर हमारा वोट प्रतिशत बढ़ा है और संख्या के हिसाब से वोट भी. आप देखिए कि मीडिया जिसे दिन रात एक कर तीसरा मोर्चा बनाने में लगी हुई थी, उनका क्या हुआ? यह तो साफ हुआ कि यहां तीसरी ताकत वामपंथी हैं. वामपंथी तत्काल विकल्प देने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन हम लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे और जनता की आवाज बनने की कोशिश करेंगे.

आपकी पार्टी तो बिना विधायक के होने के बावजूद विपक्ष की भूमिका निभाती रही है. इस बार फिर नीतीश सत्ता में आए हैं. आपकी रणनीति क्या रहेगी?

बिहार में अब भी सामंती ताकतें हैं. सरकार उन्हें संरक्षण देती रही है. निश्चित तौर पर हम योजना बनाकर लड़ेंगे लेकिन ऐसा नहीं करने वाले कि नीतीश को समय दिया जाएगा कि अभी तो सरकार बनी है, एक साल का समय दिया जाए. नीतीश का यह ग्यारहवां साल है और लालू का भी सोलहवां साल है. बिहार का आंदोलन हम तुरंत शुरू करेंगे. भूमि सुधार के सवाल पर, कृषि में सरकारी निवेश के लिए, वेतनमान के लिए. ऐसे कई मसले हैं, जिन पर आंदोलन तुरंत शुरू किया जाएगा.

बिहार में तो सभी वामदल साथ मिलकर चुनाव लड़े. आगे भी कई राज्यों में चुनाव हैं. वामदलों का यह गठजोड़ अभी बना रहेगा या फिर इस पर पुनर्विचार होगा?

नहीं, यह गठजोड़ अभी बिहार के लिए था. इस पर फिर से विचार होगा. कुछ मसलों पर हमारी एकता रही है, वह रहेगी लेकिन चुनावी गठजोड़ पर विचार होगा. अब देखिए कि पश्चिम बंगाल में भी चुनाव है. वहां सिंगुर-नंदीग्राम जैसे मसले रहे हैं, जिस पर सीपीएम ने अभी तक माफी भी नहीं मांगी है. अफसोस तक नहीं जताया है. आत्म आलोचना तक नहीं की है. यह सब देखते हुए आगे विचार होगा.

क्या इस चुनाव परिणाम को इस नजरिये से भी देखें कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के कल्चर में भी बदलाव हुआ है क्योंकि दलितों की राजनीति के एक बड़े चेहरे के तौर पर जीतनराम मांझी उभरे, लेकिन दलित उनके साथ नहीं गए.

आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की भी कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भारतीय जनता पार्टी के साथ चले गए. उस पार्टी के साथ जो रणवीर सेना के हत्यारों की संरक्षक रही है. यह तो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दिवालियापन की तरह था. जीतनराम मांझी एक बड़े नेता हैं, महत्वपूर्ण नेता हैं तो लोगों ने उनका सम्मान किया. उन्हें एक सीट पर जनता ने विजयी बना दिया लेकिन भाजपा के साथ जाना लोगों को अच्छा नहीं लगा था तो उन्हें सबक भी सिखाया. रही बात रामविलास पासवान या मांझी की ओर से वोट ट्रांसफर नहीं करवा पाने की तो यह भाजपा खुद कितना वोट ट्रांसफर करवा सकी.

एक बात परिणाम के दिन से ही कही जा रही है कि अब नीतीश या लालू के लिए राष्ट्रीय राजनीति में संभावना बन गई है और 2019 के लोकसभा चुनाव पर इसका गहरा असर पड़ेगा.

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. अभी देखा जाएगा. भाजपा के साथ क्या हो रहा है. भाजपा ने जो नहीं कहा था, वह कर रही है और जो कहा था, वह नहीं कर रही. इसलिए भाजपा के खिलाफ अभी सिर्फ लेखक, कलाकार नहीं, मजदूर-छात्र-नौजवान और किसान सब लड़ रहे हैं. हां, बिहार के चुनाव परिणाम से उन्हें लड़ने की ताकत मिलेगी. यह साफ हो गया कि संसद के अंदर अब सरकार को मुश्किल होगी. लेकिन नीतीश कुमार और लालूजी काे अभी देखा-परखा जाना है इसलिए अभी से ही 2019 के चुनाव के बारे में बोलना जल्दबाजी है.

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