‘कश्मीर मसले पर पाक के साथ-साथ हुर्रियत से भी बातचीत जरूरी’

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पिता की तरह क्या आपने भी संस्मरण लिखने के बारे में सोचा है? इसका शीर्षक क्या होगा?

हां, मैं इसे लिख रहा हूं. किताब का शीर्षक ‘माय स्ट्रगल’ (मेरा संघर्ष) है.

अपने संस्मरण के बारे में क्या आप कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं?

फिलहाल नहीं, इसके लिए आपको इसे पढ़ना होगा.

ऐसा कहा जाता है कि राजनीति में आने को लेकर आपकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी?

नहीं, मैं अनिच्छुक नहीं था. पिता (शेख अब्दुल्ला) के राजनीति में लौटने के एक साल बाद 1976 में मैं घाटी में लौटा था. मैंने देखा कि तब मेरे पिता सबसे नहीं मिल पाते थे. अपने सहयोगियों के अलावा उन्हें दूसरी सूचनाओं की भी जरूरत थी. इसलिए, मैं उनसे कुछ ऐसे मुद्दे साझा करना चाहता था जो दूसरे उन्हें बताने में असमर्थ हो रहे थे. तब मैंने उन्हें ये बताना शुरू किया कि क्या होना चाहिए. उस वक्त ‘नई दिल्ली’ और ‘श्रीनगर’ के बीच तमाम सारे मतभेद थे, जिसके चलते 1953 की शेख अब्दुल्ला सरकार के अलावा राज्य की कई सरकारें बर्खास्त हो गईं      थीं. कुछ निहित स्वार्थों के कारण ये मतभेद बनाए गए थे. इसलिए सन 1980 में मैंने अपने पिता को बताया कि मैं राजनीति में शामिल होना चाहता हूं. तब उन्होंने कहा था, ‘राजनीति में मत शामिल हो. राजनीति नदी की तरह है, इसके लिए धारा के खिलाफ तैरने का साहस होना चाहिए.’ उनके पास कभी भी परिवार के लिए वक्त नहीं रहा और उन्हें डर था कि मेरे साथ भी ऐसा ही हो सकता है. मगर मैंने उनसे कहा था कि मैं राजनीति में शामिल होना चाहता हूं और अब आप देख सकते हैं कि मैं कैसे उन विपरीत हालातों से पार पा सका. जितना ज्यादा से ज्यादा मैं कर सकता था, उतनी कोशिश मैंने की. इससे मुफ्ती मोहम्मद सईद और दूसरे लोग खुश नहीं थे. उन्होंने साजिशें रचनी शुरू कर दीं और 1977 में एक बार फिर उन्होंने मेरे पिता की सरकार गिरा दी. राज्यपाल शासन लागू हो गया था, मगर सौभाग्य से हमारे पास एक अच्छे राज्यपाल थे और दिल्ली में कांग्रेस सत्ता में नहीं थी. उस वक्त मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे. मैं दो बातों के लिए मोरारजी देसाई का शुक्रगुजार हूं. पहली, तमाम सलाहों के खिलाफ जाकर उन्होंने जम्मू कश्मीर में चुनाव करवाया और कहा था कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होगा. दूसरी, उन्होंने मेरी भारतीय नागरिकता मुझे वापस दिलवाई. इंग्लैंड में डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान मैं ब्रिटिश नागरिक बन गया था. अगर कांग्रेस की सरकार होती तो मैं अपनी नागरिकता वापस नहीं पा सकता था.

क्या यह सच है कि 1982 में आपकी सरकार की बर्खास्तगी के बाद आपको महसूस हुआ कि केंद्र सरकार के साथ अच्छे ताल्लुकात होने चाहिए? हाल ही में एक ट्वीट के जरिए आपके बेटे उमर अब्दुल्ला ने भी यही बात कही है.

मैं आपसे बिल्कुल स्पष्ट रहूंगा. हमारे पास संसाधन नहीं हैं. अब हमें हर चीज के लिए भीख मांगनी पड़ती है. मेरे कार्यकाल में सरकार को जो कर राजस्व मिला था वह 800 करोड़ रुपये से भी कम था और हमारा वेतन व्यय 5000 करोड़ रुपये था. इस असमानता को देखिए. सड़क, कृषि, बागवानी और पर्यटन क्षेत्र के विकास को तो छोड़ ही दीजिए, हमारे पास तो बुनियादी सुविधाओं के लिए भी पैसे नहीं थे. इसलिए जब तक केंद्र के साथ हमारे ताल्लुक अच्छे नहीं होंगे, तब तक हमें कुछ भी नहीं मिल सकता था. उदाहरण के तौर पर देखें तो जब जम्मू में सूखा पड़ा, तब कृषि मंत्री भजन लाल थे. प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करते वक्त हर कहीं उन्होंने घोषणा की कि वह मुआवजा देंगे. ये रकम तकरीबन 1600 करोड़ थी. आप जानते हैं तब हमें क्या मिला? हमें कुछ भी नहीं मिला. बुनियादी सुविधाओं के विकास से समझौता करते हुए किसानों को 37 करोड़ रुपये देने के लिए मुझे बजट से कटौती करनी पड़ी. इसलिए मैंने किसानों को खाद, बीज और उपकरण मुहैया करवाए. मुफ्ती भी आज उन्हीं मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. जिन लोगों के साथ उन्होंने गठबंधन किया है वे भी उन्हें कुछ नहीं दे रहे. वह यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) लेकर आए, मगर बदले में उन्हें क्या हासिल हुआ? कुछ भी नहीं.

जम्मू और कश्मीर के लिए पीडीपी-भाजपा सरकार क्या मायने रखती है? घाटी में संघ का आना किस तरह से अहम है?

लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि उन्होंने किसे वोट दिया है. एक समय मैं भी भाजपा के साथ था. क्या मैं आरएसएस को यहां लेकर आया? क्या मैं भाजपा को यहां लेकर आया? अब आप सचिवालय में भाजपा के झंडे को देख सकते हैं. उनके साथ हमारे अलग तरह के ताल्लुकात थे.

पीडीपी के अलावा आपकी भी पार्टी सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ बातचीत कर रही थी, जो सफल नहीं हो सकी?

कब..? इस समय..? वे (भाजपा) हमारा साथ चाहते थे. इसके इतर कोई बात नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है कि वे उनके साथ (मुफ्ती) के साथ नहीं बैठना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे सही व्यक्ति नहीं हैं. मगर हम भाजपा से सहमत नहीं थे. उमर ने अपने सहयोगियों और दूसरे सभी लोगों से पूछा था तो सभी ने इसके लिए ‘नहीं’ कहा था. इसलिए मैं लोगों की राय के खिलाफ नहीं जा सका. ये अवाम ही है जो हमारे लिए मायने रखती है. इसलिए हमने भाजपा के साथ सरकार बनाने के खिलाफ फैसला लिया. ‘कुर्सी के पीछे भागना गलत है. कुर्सी खुद आपके पीछे भागेगी अगर आपके तरीके सही हैं’, ये बात नहीं भूलनी चाहिए.

नेशनल कॉन्फ्रेंस चुनाव में इतनी बुरी तरह से क्यों हार गई? ऐसा दोबारा न हो इसके लिए क्या करना चाहिए?

(हंसते हुए) इसके पीछे कई कारण हैं. हम अपनी उपलब्धियों को सही तरीके से अावाम तक नहीं पहुंचा सके. मीडिया के साथ हमारा ताल्लुक बहुत कमजोर था. हमें युवा लोगों को मौका देना चाहिए, जो अभी प्रशिक्षु हैं. उन्हें अपने वरिष्ठों से सीखना होगा. हमने पुराने ‘घोड़ों’ को ही चुनाव में दौड़ा दिया, युवा पीढ़ी ने इसे पसंद नहीं किया.

राजनीतिक परिदृश्य में नरेंद्र मोदी के उभरकर आने को आप किस तरह से देखते हैं?

कांग्रेस की ऐसी-तैसी अपने घोटालों के कारण हुई. कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि वे भ्रष्टाचार से मुक्त हैं. जैसा कि देश में मीडिया बहुत मजबूत है. घोटालों की खबरें जंगल की आग की तरह फैलीं. इस माहौल में एक नया आदमी (नरेंद्र मोदी) ‘गुजरात मॉडल’ के साथ लोगों के बीच आता है. इसके अलावा उन्होंने हिंदुत्व का कार्ड भी बहुत अच्छी तरह से यह संदेश फैलाते हुए खेला कि भारत हिंदुओं का है. इसकी वजह से उनके पक्ष में हिंदुत्व की लहर फैल गई.

भारत के लिए मोदी को प्रधानमंत्री बनना क्या मायने रखता है? आपने एक बार कहा था कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो कश्मीर भारत का अंग नहीं रहेगा?

मोदी ने हिंदुवादी लहर से शुरुआत की. यह भाजपा की जीत नहीं बल्कि मोदी की जीत है. यह मोदी की ही छवि थी जिसकी मदद से भाजपा सत्ता में आई. जो वादा उन्होंने किया वह यह था कि वे अयोध्या और दूसरी जगहों के मंदिरों का पुनर्निर्माण कराएंगे. वे इसे हिंदुओं की समृद्घि के रूप में देखते होंगे, यह भूलकर कि भारत सिर्फ हिंदुओं का नहीं है. जब संविधान लिखा गया था तो यह हिंदू, मुस्लिम, सिख और बौद्घों के लिए लिखा गया था. मेरे पास एक वोट है; हिंदू के पास एक और सिख के पास भी एक वोट है. वर्तमान में दुखद ये है कि आरएसएस घृणा का माहौल तैयार कर चुकी है, जो भारत के धर्म निरपेक्ष ताने-बाने को तबाह कर सकता है.

क्या राहुल गांधी मोदी से दो-दो हाथ कर सकते हैं? क्या कारण है कि वह अब तक कांग्रेस और जनता में अपने लिए भरोसा कायम नहीं कर पाए?

नए लोग पुराने लोगों से बिल्कुल अलग होते हैं. पुराने लोगों को ये समझने में समय लगेगा कि नए लोग आखिर हैं क्या. यही कारण है कि नए और पुराने लोगों के बीच बातचीत की कमी है. राहुल बातचीत की कमी की इस स्थिति को खत्म करने का कोशिश कर रहें हैं. उन्हें राजनीति की बारीकियों को समझना होगा. यह कोई छोटी बात नहीं. आपको आम जनता के स्तर पर आना होगा. युवा लोगों को जनता के दुख को समझकर उनसे बात करनी होगी तभी उन्हें ये महसूस होगा कि आप उनके साथ हैं. जब मैं डॉक्टर था तो मुझे सिखाया गया था कि लोगों का इलाज उन्हें मरीज समझ के मत करो. उनसे बात करो और उनका इलाज शुरू करने से पहले ही उनका भरोसा हासिल कर लो. युवा राजनीतिज्ञों को भी यही करना चाहिए. अावाम को सब्र के साथ सुनें.

क्या अब राहुल इस ओर कोशिश कर रहे हैं?

हां, वह कोशिश कर रहे हैं. आप खुद भी इसे देख रहे हो. पहले वह संसद में कभी नहीं बोलते थे, मगर अब काफी मुखर हो गए हैं.

कश्मीरी पंडितों के लिए टाउनशिप को लेकर आप क्या राय रखते हैं? नेशनल कॉन्फ्रेंस अपनी राय पर बहुत कड़ी रही है और घोषणा कर चुकी है कि समुदाय की समस्या के लिए अलग से निपटारे के वह खिलाफ है.

जब मैं जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री था तब हालात बहुत आसान थे. उनके पास (कश्मीरी पंडित) के पास अपनी जमीनें थीं और उन्होंने उसे बेचा भी नहीं था. आज हालात ये हैं कि कश्मीरी पंडितों ने अपने घर और जमीनें बेच दी हैं. बहुत ही कम ऐसे हैं जो अब भी अपनी जायदाद रखे हुए हैं. मैं उनसे ये नहीं कहने जा रहा कि वे आएं और हब्बा कादल में अपनी समस्याएं सुलझा लें, जहां उन्होंने अपनी जायदाद मुस्लिमों को बेच दी हैं. आप यह नहीं चाहते हो हिंदुओ और मुस्लिमों के बीच कोई मतभेद पैदा हो और न ही आप ये हालात बनाना चाहते हो जहां मुस्लिम ये सोचने लगें कि कश्मीरी पंडित उन पर हावी हो रहे हैं या फिर कश्मीरी पंडित ये सोचने पर मजबूर हों कि मुस्लिम उन पर हावी हो रहे हैं, इसलिए मेरा मानना है कि यहां हमें मुस्लिम नेताओं, दिल्ली में कश्मीरी पंडितों और सिखों से बातचीत करनी चाहिए. फिर किसी समाधान की तलाश करें क्योंकि उन्हें ही साथ रहना है. अगर आप अलग तरीके से मामले को सुलझाना चाह रहे हो तो आपको हमेशा परेशानी में रहना होगा.  क्या आप चाहते हैं कि आप सेना के जवान के पहरे के बीच किसी  मुस्लिम इलाके से गुजरें? इसलिए आपको एक ऐसा रास्ता खोजना है, जहां आप सम्मान के साथ इस मसले को सुलझा सकें. किसी कौम विशेष के लिए टाउनशिप बसाने के बारे में सोचने से पहले आपको इन सब बातों का ध्यान रखना होगा.

क्या आपको किसी तरह का अफसोस है? क्या कुछ ऐसा है जिसके बारे में आप सोचते हैं कि आप इसे अलग तरीके से कर सकते थे?

मुझे नहीं लगता कि मुझे कोई अफसोस है. मैंने वह सबकुछ किया जो मैं करना चाहता था. हालांकि कुछ मामलों में मैं नाकाम रहा तो कुछ मामलों में मुझे कामयाबी भी मिली. आखिरकार गलतियां इंसान से ही होती हैं. मुझसे भी कुछ गलतियां हुई हैं, जिसके लिए मैं अल्लाह से माफी देने के लिए दुआ करता हूं.

क्या कश्मीर को लेकर आपके पास कोई ऐसा ख्वाब है जो अधूरा रह गया? अब आप इसे लेकर क्या तब्दीली करना चाहते हो?

हां, कश्मीर को लेकर मेरा एक ख्वाब है, मगर इसे मैं आपको नहीं बताऊंगा. जब मेरी किताब आ जाए तो आप इसे पढ़ लें.

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अब्दुल्ला मानते हैं कि हुर्रियत से भी बात करनी होगी, क्योंकि वे भी कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं

लगता है कश्मीर मसला पहले से कहीं ज्यादा पेचीदा हो गया है क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल रहा है. दिल्ली में भी बहस सिर्फ धारा 370 को हटाने को लेकर ही हो रही है, स्वायत्तता बहाल करने पर नहीं. सरकार भी अलगाववादियों से बात नहीं करना चाहती. इस बारे में आपकी क्या राय है?

भारत और पाकिस्तान दोनों को मिल-बैठकर इस समस्या का ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिसे सभी, यहां तक कि कश्मीर के लोग भी स्वीकार करें. इसके अलावा कोई भी उपाय काम नहीं कर सकता. युद्घ इसका समाधान नहीं है- वे (भारत-पाक) इस तरह से कई बार कोशिश कर चुके हैं. महज बातचीत ही रास्ता है. इसके साथ ही आपको हुर्रियत से भी बात करनी होगी क्योंकि वे भी कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि उनके खयालात बिल्कुल अलग हो सकते हैं. आखिर में आम जनता की राय ही अहम होगी. इसलिए अपने दरवाजे खोलिए, उन्हें बंद मत रखिए. आप ये नहीं कह सकते कि आप उनसे बात नहीं करने जा रहे. मुझे गृहमंत्री का बयान पढ़कर बुरा लगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार अलगावावादियों से बात नहीं करेगी और मुफ्ती से भी वह ऐसा ही चाहती है. मुफ्ती क्या कर सकते हैं, जब फैसला दिल्ली से होना है? इसलिए बातचीत के दरवाजे खोलिए. उन्हें (अलगाववादियों) पाकिस्तान से बातचीत करने दीजिए. भाई! ‘राज्य’ कहीं नहीं जा रहा. अगर चार लोग बातचीत के लिए पाकिस्तान जाते हैं तो हमें भी जाकर बातचीत करनी होगी. इससे आसमान नहीं टूट पड़ेगा. अगर आप बातचीत नहीं करते हो तो फिर इसका हल कैसे निकालोगे? इसका हल निकालने के लिए खुदा जमीं पर नहीं आएगा. हम यह पहले भी कह चुके हैं कि बीच-बचाव के लिए हम कोई तीसरी पार्टी नहीं चाहते. इस मसले पर मिलकर बातचीत करनी होगी.

क्या आपको लगता है कि भाजपा इसे और पेचीदा बना रही है?

एक बात मैं आपसे कहूंगा. अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान गए थे. क्या वो फारूक अब्दुल्ला को अपने साथ ले गए थे? नहीं न! क्यों? क्योंकि भाजपा की सोच थी कि ‘फारूक अब्दुल्ला जाएगा, अपनी बात कहेगा तो हम फिर क्या मुंह दिखाएंगे.’ एक तरफ तो आप कहते हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ इतनी हिम्मत भी नहीं कि आप कश्मीरियों को वहां (पाकिस्तान) ले जा पाएं. तब आप ये दावा कैसे कर सकते हो कि कश्मीर आपका है? आपके दिल में चोर है. पहले इसे निकालो. जब आप ऐसा कर लोगे तब आप इसके हल तक पहुंच जाओगे. दिल साफ कर बातचीत कीजिए, हर समस्या का एक हल होता है.

क्या आपको लगता है कि असहमतियों के लिए भी एक आजाद लोकतांत्रिक मंच होना चाहिए, जहां अलगाववादियों तक को भी अपनी बात रखने का मौका मिले?

मुझे लगता है कि मुफ्ती सबके लिए एक मंच बनाने में कामयाब होंगे. उमर फारूक या सईद अली शाह गिलानी या किसी और को गिरफ्तार कर वह ऐसा मंच तैयार नहीं कर सकते. आजादी का माहौल होना जरूरी है.

लेकिन जब आपकी हुकूमत थी तो नेशनल कॉन्फ्रेंस भी ऐसा ही कर रही थी.

नहीं, ऐसा नहीं है. जब तक कि वो पाकिस्तान का झंडा नहीं दिखाते, मुझे उन्हें मंच देने में कोई दिक्कत नहीं है. साथ ही उनसे बात करने में कोई दिक्कत नहीं, लेकिन क्या वे मुझसे बात करेंगे? गिलानी मुझसे बात नहीं करेंगे. गिलानी का उद्देश्य क्या है? पाकिस्तान! जो कभी नहीं होने जा रहा और जब ऐसा नहीं होने जा रहा तब आप मुझे बताइए कि आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आपका (गिलानी) कोई भी सगा नहीं मरा है. अगर कोई मरा है तो वह है गरीब या कोई लाचार. आप लोगों पर बंदूक उठाने के लिए दबाव बनाते हो, नतीजन हजारों लोग मारे गए. हमें क्या मिला? क्या सरहद बदल गई? अगर सरहद एक भी इंच इधर-उधर हुई है तो मैं मान जाऊंगा. कुछ नहीं बदला. तो फिर ये तमाशा क्यों? मुझे लगता है कि पाकिस्तान को जवाब देने का सिर्फ यही (बातचीत) रास्ता है.

हाल ही में घाटी में पाकिस्तान का झंडा लहराने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा करना जायज था?

कश्मीर में हमेशा से झंडे लहराए जाते रहे हैं. अहम ये है कि क्या इससे किसी तरह की तब्दीली आई या नहीं? क्या सरहद बदल गई? नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों तरफ सेनाएं अब भी तैनात हैं. क्या बदला? आप सिर्फ एक झंडा दिखा रहे हो और उसके बाद मीडिया में खूब हो-हल्ला मच जाता है. आम भारतीय सोचते हैं कि वे (जो पाकिस्तान का झंडा लहराता है) सीमा के उस पार के लोग हैं. इसकी वजह से हमें काफी नुकसान पहुंच रहा है. आज हिमाचल प्रदेश के पास एक भी ऐसी जगह नहीं जहां पर्यटक ठहर सकें. इसके अलावा दिल्ली से श्रीनगर की हवाई यात्रा के टिकट की कीमत तो देखिए. ये बहुत महंगे हैं. अफसोस है कि भारत सरकार इसे लेकर कुछ नहीं कर पा रही है. दिल्ली में कोई भी शख्स इस पैसे को दुबई और बैंकॉक जाने में खर्च कर सकता है. अगर टिकटों के दाम इतने महंगे होंगे तो कोई भी कश्मीर क्यों आएगा. यही समय है जब कश्मीर के लोगों को मदद की दरकार है. आपको हवाई यात्रा के किराए में 4000 से 3000 रुपये की कटौती करनी चाहिए ताकि आम लोग भी कश्मीर आ सकें.

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