कश्मीर मसले पर पाक के साथ-साथ हुर्रियत से भी बातचीत जरुरी

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‘कश्मीर मसले पर पाक के साथ-साथ हुर्रियत से भी बातचीत जरूरी’

नेशनल काॅन्फ्रेंस को विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मिली नाकामयाबी, कश्मीर मसले, नरेंद्र मोदी, पीडीपी और कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास समेत तमाम मुद्दों पर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला से रियाज वानी की खास बातचीत

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पिता की तरह क्या आपने भी संस्मरण लिखने के बारे में सोचा है? इसका शीर्षक क्या होगा?

हां, मैं इसे लिख रहा हूं. किताब का शीर्षक ‘माय स्ट्रगल’ (मेरा संघर्ष) है.

अपने संस्मरण के बारे में क्या आप कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं?

फिलहाल नहीं, इसके लिए आपको इसे पढ़ना होगा.

ऐसा कहा जाता है कि राजनीति में आने को लेकर आपकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी?

नहीं, मैं अनिच्छुक नहीं था. पिता (शेख अब्दुल्ला) के राजनीति में लौटने के एक साल बाद 1976 में मैं घाटी में लौटा था. मैंने देखा कि तब मेरे पिता सबसे नहीं मिल पाते थे. अपने सहयोगियों के अलावा उन्हें दूसरी सूचनाओं की भी जरूरत थी. इसलिए, मैं उनसे कुछ ऐसे मुद्दे साझा करना चाहता था जो दूसरे उन्हें बताने में असमर्थ हो रहे थे. तब मैंने उन्हें ये बताना शुरू किया कि क्या होना चाहिए. उस वक्त ‘नई दिल्ली’ और ‘श्रीनगर’ के बीच तमाम सारे मतभेद थे, जिसके चलते 1953 की शेख अब्दुल्ला सरकार के अलावा राज्य की कई सरकारें बर्खास्त हो गईं      थीं. कुछ निहित स्वार्थों के कारण ये मतभेद बनाए गए थे. इसलिए सन 1980 में मैंने अपने पिता को बताया कि मैं राजनीति में शामिल होना चाहता हूं. तब उन्होंने कहा था, ‘राजनीति में मत शामिल हो. राजनीति नदी की तरह है, इसके लिए धारा के खिलाफ तैरने का साहस होना चाहिए.’ उनके पास कभी भी परिवार के लिए वक्त नहीं रहा और उन्हें डर था कि मेरे साथ भी ऐसा ही हो सकता है. मगर मैंने उनसे कहा था कि मैं राजनीति में शामिल होना चाहता हूं और अब आप देख सकते हैं कि मैं कैसे उन विपरीत हालातों से पार पा सका. जितना ज्यादा से ज्यादा मैं कर सकता था, उतनी कोशिश मैंने की. इससे मुफ्ती मोहम्मद सईद और दूसरे लोग खुश नहीं थे. उन्होंने साजिशें रचनी शुरू कर दीं और 1977 में एक बार फिर उन्होंने मेरे पिता की सरकार गिरा दी. राज्यपाल शासन लागू हो गया था, मगर सौभाग्य से हमारे पास एक अच्छे राज्यपाल थे और दिल्ली में कांग्रेस सत्ता में नहीं थी. उस वक्त मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे. मैं दो बातों के लिए मोरारजी देसाई का शुक्रगुजार हूं. पहली, तमाम सलाहों के खिलाफ जाकर उन्होंने जम्मू कश्मीर में चुनाव करवाया और कहा था कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होगा. दूसरी, उन्होंने मेरी भारतीय नागरिकता मुझे वापस दिलवाई. इंग्लैंड में डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान मैं ब्रिटिश नागरिक बन गया था. अगर कांग्रेस की सरकार होती तो मैं अपनी नागरिकता वापस नहीं पा सकता था.

क्या यह सच है कि 1982 में आपकी सरकार की बर्खास्तगी के बाद आपको महसूस हुआ कि केंद्र सरकार के साथ अच्छे ताल्लुकात होने चाहिए? हाल ही में एक ट्वीट के जरिए आपके बेटे उमर अब्दुल्ला ने भी यही बात कही है.

मैं आपसे बिल्कुल स्पष्ट रहूंगा. हमारे पास संसाधन नहीं हैं. अब हमें हर चीज के लिए भीख मांगनी पड़ती है. मेरे कार्यकाल में सरकार को जो कर राजस्व मिला था वह 800 करोड़ रुपये से भी कम था और हमारा वेतन व्यय 5000 करोड़ रुपये था. इस असमानता को देखिए. सड़क, कृषि, बागवानी और पर्यटन क्षेत्र के विकास को तो छोड़ ही दीजिए, हमारे पास तो बुनियादी सुविधाओं के लिए भी पैसे नहीं थे. इसलिए जब तक केंद्र के साथ हमारे ताल्लुक अच्छे नहीं होंगे, तब तक हमें कुछ भी नहीं मिल सकता था. उदाहरण के तौर पर देखें तो जब जम्मू में सूखा पड़ा, तब कृषि मंत्री भजन लाल थे. प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करते वक्त हर कहीं उन्होंने घोषणा की कि वह मुआवजा देंगे. ये रकम तकरीबन 1600 करोड़ थी. आप जानते हैं तब हमें क्या मिला? हमें कुछ भी नहीं मिला. बुनियादी सुविधाओं के विकास से समझौता करते हुए किसानों को 37 करोड़ रुपये देने के लिए मुझे बजट से कटौती करनी पड़ी. इसलिए मैंने किसानों को खाद, बीज और उपकरण मुहैया करवाए. मुफ्ती भी आज उन्हीं मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. जिन लोगों के साथ उन्होंने गठबंधन किया है वे भी उन्हें कुछ नहीं दे रहे. वह यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) लेकर आए, मगर बदले में उन्हें क्या हासिल हुआ? कुछ भी नहीं.

जम्मू और कश्मीर के लिए पीडीपी-भाजपा सरकार क्या मायने रखती है? घाटी में संघ का आना किस तरह से अहम है?

लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि उन्होंने किसे वोट दिया है. एक समय मैं भी भाजपा के साथ था. क्या मैं आरएसएस को यहां लेकर आया? क्या मैं भाजपा को यहां लेकर आया? अब आप सचिवालय में भाजपा के झंडे को देख सकते हैं. उनके साथ हमारे अलग तरह के ताल्लुकात थे.

पीडीपी के अलावा आपकी भी पार्टी सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ बातचीत कर रही थी, जो सफल नहीं हो सकी?

कब..? इस समय..? वे (भाजपा) हमारा साथ चाहते थे. इसके इतर कोई बात नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है कि वे उनके साथ (मुफ्ती) के साथ नहीं बैठना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे सही व्यक्ति नहीं हैं. मगर हम भाजपा से सहमत नहीं थे. उमर ने अपने सहयोगियों और दूसरे सभी लोगों से पूछा था तो सभी ने इसके लिए ‘नहीं’ कहा था. इसलिए मैं लोगों की राय के खिलाफ नहीं जा सका. ये अवाम ही है जो हमारे लिए मायने रखती है. इसलिए हमने भाजपा के साथ सरकार बनाने के खिलाफ फैसला लिया. ‘कुर्सी के पीछे भागना गलत है. कुर्सी खुद आपके पीछे भागेगी अगर आपके तरीके सही हैं’, ये बात नहीं भूलनी चाहिए.

नेशनल कॉन्फ्रेंस चुनाव में इतनी बुरी तरह से क्यों हार गई? ऐसा दोबारा न हो इसके लिए क्या करना चाहिए?

(हंसते हुए) इसके पीछे कई कारण हैं. हम अपनी उपलब्धियों को सही तरीके से अावाम तक नहीं पहुंचा सके. मीडिया के साथ हमारा ताल्लुक बहुत कमजोर था. हमें युवा लोगों को मौका देना चाहिए, जो अभी प्रशिक्षु हैं. उन्हें अपने वरिष्ठों से सीखना होगा. हमने पुराने ‘घोड़ों’ को ही चुनाव में दौड़ा दिया, युवा पीढ़ी ने इसे पसंद नहीं किया.

राजनीतिक परिदृश्य में नरेंद्र मोदी के उभरकर आने को आप किस तरह से देखते हैं?

कांग्रेस की ऐसी-तैसी अपने घोटालों के कारण हुई. कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि वे भ्रष्टाचार से मुक्त हैं. जैसा कि देश में मीडिया बहुत मजबूत है. घोटालों की खबरें जंगल की आग की तरह फैलीं. इस माहौल में एक नया आदमी (नरेंद्र मोदी) ‘गुजरात मॉडल’ के साथ लोगों के बीच आता है. इसके अलावा उन्होंने हिंदुत्व का कार्ड भी बहुत अच्छी तरह से यह संदेश फैलाते हुए खेला कि भारत हिंदुओं का है. इसकी वजह से उनके पक्ष में हिंदुत्व की लहर फैल गई.

भारत के लिए मोदी को प्रधानमंत्री बनना क्या मायने रखता है? आपने एक बार कहा था कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो कश्मीर भारत का अंग नहीं रहेगा?

मोदी ने हिंदुवादी लहर से शुरुआत की. यह भाजपा की जीत नहीं बल्कि मोदी की जीत है. यह मोदी की ही छवि थी जिसकी मदद से भाजपा सत्ता में आई. जो वादा उन्होंने किया वह यह था कि वे अयोध्या और दूसरी जगहों के मंदिरों का पुनर्निर्माण कराएंगे. वे इसे हिंदुओं की समृद्घि के रूप में देखते होंगे, यह भूलकर कि भारत सिर्फ हिंदुओं का नहीं है. जब संविधान लिखा गया था तो यह हिंदू, मुस्लिम, सिख और बौद्घों के लिए लिखा गया था. मेरे पास एक वोट है; हिंदू के पास एक और सिख के पास भी एक वोट है. वर्तमान में दुखद ये है कि आरएसएस घृणा का माहौल तैयार कर चुकी है, जो भारत के धर्म निरपेक्ष ताने-बाने को तबाह कर सकता है.

क्या राहुल गांधी मोदी से दो-दो हाथ कर सकते हैं? क्या कारण है कि वह अब तक कांग्रेस और जनता में अपने लिए भरोसा कायम नहीं कर पाए?

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