‘पर्यावरणविद यह कहते हैं कि ये न करो, वो न करो, लेकिन यह भी तो बताओ कि हम करें क्या’

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Harish rawat by Amarjeet Singh 03web
फोटोः अमरजीत सिंह

उत्तराखंड में आई आपदा के दो साल बाद भी सरकार के ऊपर सही तरीके से काम न करने के आरोप लगते रहे हैं. अभी आरटीआई के जरिये खुलासा हुआ है कि केंद्र द्वारा भेजे गए 1,509 करोड़ रुपये का हिसाब-किताब नहीं मिल रहा है. क्या कहना है आपका?

पिछले साल के आखिर में इससे बड़ा कोई मजाक नहीं हो सकता है. बजट एस्टीमेट और रिवाइज्ड एस्टीमेट में फर्क होता है. उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 7980.13 करोड़ मंजूर किए थे. यह राशि तीन चरणों में मिलनी है. इस मद में अब तक 2367.74 करोड़ ही मिले हैं. शेष राशि के लिए हम केंद्र से अनुरोध कर रहे हैं. यह राशि मंत्रालयों के जरिये हमारे पास आई है. किसी ट्रक या ट्रेन की बोगी में भरकर नहीं आई है. मजेदार बात यह है कि न तो हमसे यह पूछा गया कि हमें कितनी राशि मिली और न ही संबंधित मंत्रालय से पूछा गया कि उन्होंने कितनी राशि राज्य सरकार को जारी की. सिर्फ 154 करोड़ रुपये की राशि हमें प्रधानमंत्री राहत कोष के जरिये सीधे मिली है. बाकी सारा पैसा मंत्रालयों के जरिये आया है. अब भाजपा वालों का सिद्धांत है कि झूठ बोलो, सब मिलकर बोलो, बार-बार बोलो और खूब जोर से बोलो. जब तक हम समझते हैं कि मामला क्या है, तब तक वो इतना चिल्ला चुके होते हैं कि लूट हो गई है, सीबीआई जांच कराओ. अब केंद्र में उनकी सरकार है. पैसा केंद्र ने जारी किया है तो वित्त मंत्री अरुण जेटली उत्तराखंड सरकार पर मुकदमा दायर करें कि हमने केंद्र के 1,509 करोड़ रुपये खा लिए. और बात अगर केदारनाथ की करें तो हमने बहुत ही बढ़िया काम किया है. हमने वहां हेलीपैड विकसित कर दिया है. अब वहां एमआई-26 हेलीकॉप्टर लैंड कर रहा है. हमने जेसीबी से लेकर सारे बड़े यंत्र पहुंचा दिए हैं. अब वहीं टाइल्स से लेकर ईंटें बन रही हैं. पुनर्निर्माण के दौरान हम यह ख्याल रख रहे हैं कि अगर उसी तीव्रता या उससे ज्यादा तीव्रता की आपदा आए तो हमारा निर्माण बचा रहे.

प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह राज्यों के साथ बेहतर संबंध बनाकर चलेंगे. हालांकि कुछ कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भेदभाव का आरोप लगाया है. आपका अनुभव कैसा रहा है?

प्रधानमंत्री जी का सहयोग संघवाद वैसा ही है, जैसा कि वकील जज के यहां कहे कि मैं कभी गलत तर्क दूंगा ही नहीं. असल में यह सिर्फ एक स्लोगन है. इसका उदाहरण आप अरुणाचल प्रदेश में देख सकते हैं. अब प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि वह हर राज्य को विकास का सहयोगी मानते हैं, लेकिन आप अपने हर सहयोगी को अस्थिर भी करना चाहते हैं. आपने केंद्र-राज्य संबंधों का जो तंत्र था, उसे खत्म कर दिया. योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद की कोई चर्चा ही नहीं है. नीति आयोग है तो वहां केवल एक ही नीति है, जिसे ‘मोदी नीति’ कह सकते हैं.

अर्द्धकुंभ को भी लेकर केंद्र से सहयोग न मिलने का आरोप राज्य सरकार ने लगाया था. कितनी राशि केंद्र द्वारा इस आयोजन के लिए दी गई है?

हमने पहले केंद्र सरकार से पांच सौ करोड़ रुपये की मांग की, लेकिन नीति आयोग ने 168 करोड़ रुपये देने का सुझाव दिया और कहा कि ये अर्द्धकुंभ है. बाकी जगहों पर आप कहते हैं कि कितने लोग आएंगे, उस आधार पर पैसा दिया जाएगा. अब अर्द्धकुंभ में आठ करोड़ लोगों के आने की उम्मीद है. इस हिसाब से हमें पैसा मिलना चाहिए. लेकिन केंद्र सरकार तैयार नहीं हुई. हम फिर भी तैयार हो गए कि चलो जितना भी पैसा देना हो, दीजिए. अब ये राशि नीति आयोग से प्रधानमंत्री के दफ्तर तक पहुंची है या नहीं, मुझे नहीं पता है.

अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर आपका क्या कहना है?

अरुणाचल प्रदेश में जो हुआ है, वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. सबसे बड़ी बात यह कि शुरुआत से ही राज्यपाल की जो नीयत रही है वह संविधान की भावनाओं के अनुरूप नहीं है. विधानसभा का एजेंडा राज्यपाल कैसे तय कर सकता है कि स्पीकर को हटाने पर चर्चा होगी. चलो ठीक है कि स्पीकर को विधानसभा सत्र में नहीं आने दिया गया तो आपको उसका रास्ता निकालना चाहिए था. न कि पांच सितारा होटल में बैठकर उसे विधानसभा का दर्जा दे दिया जाए. अगर वहां पर कुछ चीजें असंवैधानिक थीं, तो उसका संवैधानिक हल खोजा जाना चाहिए था.

‘आप कह रहे हैं कि हरिद्वार, ऋषिकेश में पानी की बोतल लेकर नहीं जाओगे, लेकिन दिल्ली में इस पर प्रतिबंध क्यों नहीं है? सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर ही है’

स्मार्ट सिटी की पहली सूची में देहरादून को शामिल नहीं किया. इसके अलावा चाय बागान को भी लेकर विवाद हो गया है.

देखिए, केंद्र सरकार ने पहली सूची में ग्रीन फील्ड वाली किसी भी परियोजना को शामिल नहीं किया है. इसमें मुझे कोई दुर्भावना नहीं नजर आ रही है. दरअसल स्मार्ट शहर के विकास के लिए केंद्र ने तीन विकल्प दिए थे. राज्य चाहते तो रेट्रोफिटिंग (वर्तमान शहर में ही उपलब्ध संरचनाओं का विकास कर स्मार्ट शहर बनाना), रीडेवलपमेंट (वर्तमान शहर को स्मार्ट बनाना) करते या फिर ग्रीन फील्ड (खाली क्षेत्र में स्मार्ट शहर बसाना) का विकल्प चुनते. हमने तीसरे विकल्प को चुना. क्योंकि पहले दो विकल्प हमारे लिए ज्यादा कठिन थे. उससे शहर की पहचान खो जाती और हमें ज्यादा फायदा नहीं होता. इसके चलते हमने देहरादून से सटी चाय बागान की भूमि को इसके लिए चुना. यह हमारे लिए अंतिम विकल्प था. इसमें हमने 350 एकड़ जमीन ली है. इसमें सवा सौ एकड़ एफआरआई (फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट) को हरित क्षेत्र के लिए दिया है. हमने इसमें दोनों बातों-पर्यावरण और स्मार्ट सिटी का ध्यान रखा है. अब अगर मोदी सरकार को चाय बागान से ज्यादा प्यार है तो वह मना कर दें. अभी गेंद उनके पाले में है.

गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने को लेकर लगातार बयानबाजी होती रही है. क्या सरकार इस दिशा में विचार कर रही है?

जब मैंने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला तो विधानसभा और सचिवालय का शिलान्यास किया जा चुका था. मुझे जो भी सौंपा गया है, उसे लेकर मैं आगे बढ़ रहा हूं. आज मुझसे कोई कहे कि गैरसैंण में एक हजार लोगों के रहने की व्यवस्था करनी है, तो मैं नहीं कर सकता. इसलिए मैं वहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कर रहा हूं. इसके लिए गैरसैंण विकास प्राधिकरण बना दिया गया है. वहां पानी की समस्या थी, उसे दूर करने की कोशिश सरकार द्वारा की जा रही है. अब जो लोग पक्ष में हैं, वे जल्दी में हैं. जो विपक्ष में हैं वो कह रहे हैं, इसकी जरूरत नहीं है. मैं वहां पर सिर्फ विकास कर रहा हूं. जब लोगों को लगेगा कि नहीं अब यह पूरा हो गया है, तो वही तय करेंगे कि राजधानी कहां होगी. वैसे भी यह इतनी बड़ी चुनौती है कि उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए अपने दम पर इसे जल्दी पूरा करना कठिन है. इसके लिए हमने केंद्र से सहयोग मांगा है कि अगर वह अमरावती को राजधानी बनाने के लिए पैसा दे सकते हैं, तो हमें भी कुछ राशि मुहैया कराई जाए.

भांग की खेती को अनुमति देने को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठ रहे हैं. इसके अलावा ग्रामीण विकास और रोजगार के लिए सरकार क्या कर रही है?

हमारी खेती को दो हिस्सों में बांट सकते हैं. उधमसिंह नगर, हरिद्वार आदि जगहों पर खेती अच्छी है, लेकिन पिछले बीस-पच्चीस सालों से ध्यान न दिए जाने के चलते पहाड़ पर खेती पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी. वहां पर कई तरह की समस्याएं थीं. हमें सबसे पहले खेती को पुनर्जीवित करने की जरूरत थी. उसके लिए हमने 200 से ज्यादा प्रस्ताव रखे हैं. इसी में से एक भांग की खेती को लेकर हो रहा बवाल है. लेकिन अगर आप उत्तरी चीन को देखें तो भांग की खेती के जरिये उन्होंने खुद को पूरी तरह से बदल दिया है. अब हमारे उत्तराखंड में इस खेती के लिए सबसे बढ़िया संभावना है, तो हमने वही पहल की. एक हमारे यहां नैटल कंडारी घास होती है, जिससे बने कपड़े बहुत गरम होते हैं. इसके अलावा भीमल, रामबास जैसी खेती को बढ़ावा दिया. इसके लिए सरकार द्वारा बोनस दिया जा रहा है. साथ ही पर्यटन को सरकार बढ़ावा दे रही है. पहले सिर्फ कुछ बड़े शहरों में लोग जाते थे पर अब दूरदराज के इलाकों में भी लोग पहुंच रहे हैं. हमने शीतकालीन चार धाम यात्रा शुरू की है. हर जगह हेलीपैड बनाया गया है. हम तीन एयरफील्ड भी विकसित कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य पर्वतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देकर 2019 तक राज्य से पलायन पर रोक लगाना है.

उत्तराखंड में पावर प्रोजेक्ट को लेकर लगातार बवाल होता रहता है. इस पर सरकार किस तरह आगे बढ़ रही है?

पावर प्रोजेक्ट पर जो रुख उत्तराखंड सरकार का है, कमोबेश वही केंद्र सरकार ने भी अपना रखा है. हमारा मानना है कि पावर प्रोजेक्ट पर रोक गलत है और इसके चलते कोई आपदा नहीं आई है. यही बात अभी वाडिया इंस्टीट्यूट ने भी अपनी रिपोर्ट में कही है. हमारा सुप्रीम कोर्ट, एनजीटी, भारत सरकार के विशषेज्ञों और पर्यावरणविदों से सीधा कहना है कि आप हमें यह तो कहते हो कि ये न करो, वो न करो, लेकिन आप हमें यह भी तो बताओ कि हम करें क्या. अब पर्यावरण और विकास के बीच बैलेंस बनाए रखने की जिम्मेदारी आप उस राज्य को सौंप रहे हैं, जिसने आज भी अपने भौगोलिक क्षेत्रफल का 70 प्रतिशत जंगल क्षेत्र बचाकर रखा है. पिछले सालों के अंदर हमारा छह प्रतिशत जंगल क्षेत्र बढ़ गया है. अब हमने ग्रीन बोनस की मांग की है. जिससे हम अपने लिए पर्यावरण के अनुकूल रास्ते निकालें. अब हम पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं तो आप कह रहे हैं कि हरिद्वार, ऋषिकेश में पानी की बोतल लेकर नहीं जाओगे, लेकिन दिल्ली में इस पर प्रतिबंध क्यों नहीं है? सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर ही है. अब यहां दिल्ली में बैठे लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जंगलों की रक्षा वे नहीं कर सकते हैं. जंगलों की रक्षा स्थानीय लोग ही कर सकते हैं.

जानकारों का कहना है कि अगले विधानसभा चुनाव में आपको भाजपा के साथ पार्टी के भीतर के लोगों से भी पार पाना होगा. इसके अलावा एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भी रहेगा?

मैं अपने लोगों को बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा कि अभी एंटी इनकम्बेंसी जैसा सवाल राज्य के भीतर नहीं है. भाजपा इसी से बौखलाई है. पार्टी के भीतर किसी भी तरह का असंतोष नहीं है. मैं पार्टी के लोगों का बहुत शुक्रगुजार हूं कि मुझे मुख्यमंत्री रहते हुए किसी भी तरह की समस्या नहीं आई है. बाकी परिवार के भीतर थोड़ा-बहुत चलता रहता है.

अल्मोड़ा के नैनीसार में जीएस जिंदल समूह की हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी इंटरनेशनल स्कूल बना रही है. गांव के लोग इसे गैरसंवैधानिक बताकर इसका विरोध कर रहे हैं. उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नेता इसी के चलते जेल में हैं. आपने उस स्कूल का शुभारंभ भी किया था. क्या सरकार पर लग रहे आरोप सही हैं? 

जब मैं पहली बार 1980 में सांसद था तब भी उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नेता जो अभी जेल में हैं, वह ऐसी लड़ाई लड़ते रहते थे. उनकी इस आदत का मैं अभ्यस्त भी हूं और सम्मान भी करता हूं. यह हमने एक नीति के तहत किया है. दरअसल हमारे पहाड़ों में निवेश नहीं आता है और शिक्षा की बड़ी समस्या है. पलायन का यह एक बहुत बड़ा कारण है. शिक्षा संस्थान और अस्पताल अगर आएंगे तो इससे हमारा भला होगा. अब इसमें तीस प्रतिशत सीटें राज्य के लोगों के लिए होंगी. इससे स्थानीय लोगों और पहाड़ों में काम करने वाले अधिकारियों के बच्चों की पढ़ाई हो सकेगी. इसके निकट के गांवों के चार प्रधानों की इसमें सहमति है. ये विरोधी पार्टी के कार्यकर्ता हैं जो प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं.