‘दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में’ | Tehelka Hindi

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‘दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में’

राजस्थान के भीलवाड़ा, राजसमंद, बांसवाड़ा, बाड़मेर, अजमेर सहित कई जिलों में आजादी के लगभग सात दशक बीत जाने के बाद भी देश की घुमंतू जनजातियों के साथ जातिगत भेदभाव का सिलसिला जारी है. कालबेलिया समुदाय के मृतकों को दफन करने के लिए जमीन मयस्सर न होने की स्थिति में वे शव को घर में ही मिट्टी डालने को मजबूर है.

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दिल्ली के अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था और जब वे अंग्रेजों की पकड़ में आए तो उन्हें सजा के तौर पर म्यामार (तत्कालीन वर्मा) की राजधानी यंगून (रंगून) में जेल की काल कोठरी में गुजारनी पड़ी थी. उनका इंतकाल जेल में हो गया था. अपनी बेदिनी और बेवतनी पर जफर ने एक गजल लिखी थी जिसका अंतिम अशआर कुछ इस तरह था, ‘कितना बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में.’  इतिहास के पन्नों में दर्ज जफर के संघर्ष और उसकी पीड़ा से गुजरते हुए किसी की भी आंखें नम हो जाती होंगी. लेकिन हकीकत आज भी यही है कि भारत की लाखों की आबादी वाली कालबेलिया जनजाति को दफ्न के लिए दो गज जमीन की खातिर मारा-मारा फिरना पड़ रहा है. प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत दर्ज कराने पर भी ज्यादातर समय उन्हें न्याय नहीं मिलता हो तब स्वभाविक है कि पीड़ित समुदाय कुछ इस तरह ही खुद को अभिव्यक्त करना चाहेगा- ‘हम सारी जिंदगी भटकते रहते हैं और नसीब ऐसा कि मरने के बाद भी मिट्टी नहीं मिलती है.’

इस हकीकत को टटोलने के लिए हम भीलवाड़ा जिले के कुछ गांवों में पहुंचे. हम सबसे पहले ज्ञानगढ़ ग्राम पंचायत पहुंचे. इस गांव में कालबेलिया समुदाय के लगभग 15 घर हैं. भीलवाड़ा जिले का यह गांव गुर्जर बहुल है. यहां हम कालबेलिया समुदाय के एक परिवार के घर गए जिनके यहां दो सदस्यों की मृत्यु पिछले कुछ वर्षों में हुई और जब उन्हें दफनाने के लिए गांव की सामूहिक शमशान भूमि पहुंचे तो दूसरी जातियों के लोगों ने शव को दफ्न नहीं करने दिया. अंततः स्वादी देवी ने घर के आंगन में पहले अपने ससुर और बाद में घर से दो किलोमीटर दूर अपने पति को समाधि दे दी. भीलवाड़ा जिले के कलेक्टर रवि कुमार सुरपुर से कालबेलिया समाज के लोगों का दूसरी जातियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न और उन्हें मृतकों को दफन करने के लिए भूमि आवंटन नहीं किए जाने की बात पूछी तो उनका जवाब था-’जिस भी गांव में इस तरह की दिक्कत हो, उस गांव के लोग आवेदन दें, हम कार्रवाई करेंगे. ‘इस इलाके में सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहनेवाले मजदूर किसान शक्ति संगठन के महत्वपूर्ण सदस्य भंवर मेघवंशी को हमने जिला कलेक्टर की बात बताई और कहा कि आप पीड़ित गांव के लोगों के लिए आवेदन दीजिए. भंवर मेघवंशी ने बीच में टोकते हुए कहा है, ‘कालबेलिया समुदाय का उत्पीड़न भीलवाड़ा के सिर्फ तीन-चार गांव में नहीं हो रहा है. कालबेलियों का उत्पीड़न भीलवाड़ा के ज्यादातर गांवों में हो रहा है. यह समस्या राज्य के दूसरे जिलों मसलन बाड़मेर, पाली, जोधपुर, अजमेर, बांसवाड़ा, राजसमंद आदि में भी है.’

रोजी-रोटी के लिए भिक्षावृत्ति

स्वादी देवी की उम्र 50 के करीब है. लगभग तीन वर्ष पूर्व इनके ससुर नैनूनाथ कालबेलिया की मौत हो गई थी और जाट समुदाय के लोगों ने उनकी लाश को गांव के खेत-खलिहान और सरकारी जमीन में भी दफ्न नहीं करने दिया। हाल ही में उनके पति की भी मौत हो गई. स्वादी देवी ने बताया, ‘हम घुमंतू जाति से आते हैं. जिंदगीभर हम रोजी-रोटी के लिए भटकते रहते हैं. हमारे पास रहने को कोई ठिकाना नहीं. सरकार द्वारा बीपीएल, राशन कार्ड सहित कोई सुविधा नहीं. पानी भी खरीदना पड़ता है. घर है तो उसका पट्टा, गांव के एक दबंग भैरों सिंह के पास है.’ स्वादी देवी के चार बेटे हैं. दो बेटों की शादी हो चुकी है. घर में एक ही मिट्टी का कमरा है जिसमें इतनी जगह नहीं है कि हाल ही में मां बनी बहू को सोने की जगह मिल सके. दोनों बहुएं खुले में सोती हैं. पूरा परिवार खुले में शौच निपटान के लिए जाते हैं. आर्थिक उपार्जन के नाम पर परिवार के पास कुछ बकरियां और कुछ मुर्गियां बची हैं. पिछले महीने ओला गिरने से छह बकरियां मर गईं.

स्वादी देवी का बड़ा बेटा उगमनाथ कालबेलिया कुछ महीने पहले जोधपुर से बहुत बीमार हालत में घर लौटा है. 23 वर्षीय उगमनाथ जोधपुर में एक फार्म हाउस में बंधुआ मजदूर के बतौर काम करता था. उगम छठी जमात पास है और अपने गांव के कालबेलिया समाज का वह सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा लड़का है. उगमनाथ समेत राज्य की कई लाख आबादीवाले कालबेलिया समाज के बारे में घुमंतू, अर्द्घ-घुमंतू एवं विमुक्त जाति परिषद के प्रदेश अध्यक्ष रत्ननाथ कालबेलिया चिंता भरे स्वर में कहते हैं- ‘इस समाज का पारंपरिक पेशा सांप पकड़ना, बीन बजाना, मनोरंजन करना, हाथ चक्की चलाना आदि खत्म सा हो चला है. इनके पास भीख मांगने और बीन बजाने जैसे काम ही बचे हैं. भीख मांगने के पेशे को न अपनाना पड़े इसलिए उगमनाथ बंधुआ मजदूरी करने जोधपुर चला गया था लेकिन तीन साल के दौरान ही उसका स्वास्थ्य पूरी तरह चौपट हो गया. अब मुश्किल से उसकी जान बच पाई है.’

गांव भीतर गांव

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