‘शायद आने वाले पांच सालों में डेंगू का टीका तैयार हो जाए’

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Navin Khanna web

पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले तो बढ़े पर इससे होने वाली मृत्यु दर में गिरावट देखी गई. ऐसा कैसे संभव हो पाया?

जी बिल्कुल, ऐसा ही हुआ है. उन देशों में जहां इस रोग की घातक अवस्था के दौरान प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, वहां डेंगू से होने वाली मृत्यु दर घटी है.

ये जानते हुए कि मृत्यु दर में गिरावट आ रही है, इसका टीका विकसित करना क्या वास्तव में महत्वपूर्ण है?

देखिए, मृत्यु दर में कमी लाने के लिए बेहतरीन चिकित्सकीय सुविधाओं की जरूरत होती है, जो तमाम विकासशील देशों में उपलब्ध नहीं है. इसलिए डेंगू पर प्रभावी तरीके से काबू पाने के लिए सस्ता, सुरक्षित और प्रभावी टीका विकसित करने की जरूरत और बढ़ जाती है. इस समय इसे बनाने को लेकर मेरा उत्साह चरम पर है.

ये रोग बहुत तेजी से फैलता है, ऐसे में ये टीका कितना असरकारक होगा?

जैसा मैंने पहले भी कहा कि एक सस्ते, सुरक्षित और प्रभावी टीके का विकास स्थितियों में बदलाव ला सकता है. डेंगू मच्छरों से फैलने वाला रोग है, जो पूरे विश्व में तेजी से फैल रहा है. पिछले 50 सालों में डेंगू के मामलों में 30 गुना से ज्यादा वृद्धि आई है. वर्तमान में दुनिया की आधी आबादी डेंगू के खतरे में जी रही है. एक अनुमान के अनुसार हर साल पूरे विश्व में डेंगू के लगभग 39 करोड़ संक्रमण देखे जाते हैं. इनमें से लगभग 10 करोड़ मामले बीमारी में तब्दील हो जाते हैं और तकरीबन 25 हजार इसकी वजह से दम तोड़ देते हैं. डेंगू के चार तरह के विषाणु अब भारत में भी पाए जाने लगे हैं. एक हालिया शोध के अनुसार भारत डेंगू का केंद्र बनता जा रहा है. यहां हर साल 2-4 करोड़ लोग डेंगू से संक्रमित होते हैं. यह वो संख्या है जो डेंगू संक्रमण के मामले में भारत को विश्व में शीर्ष पर पहुंचा देती है. हालांकि देश में रिपोर्ट हो रहे डेंगू मामलों की संख्या कम करके बताई जाती है. मच्छरों को नियंत्रित करने के सभी प्रयास विषाणु को फैलने से रोकने में विफल साबित हो रहे हैं. बरसात के मौसम के बाद दिल्ली सहित देश के सभी बड़े शहरों में डेंगू के मामले बड़ी संख्या में दर्ज किए गए हैं.

डेंगू के संक्रमण से होने वाला बुखार बढ़कर ‘हैमरेज बुखार’ (एक ऐसा बुखार जिसमें शरीर के कई अंग एक साथ प्रभावित होते हैं. साथ ही खून का प्रवाह करने वाली धमनियों को नुकसान पहुंचता है) और इसके बाद यह संक्रमण और भयानक रूप ले लेता है, जिसमें जान का खतरा बन जाता है. वर्तमान में इसके लिए कोई भी एंटी वायरल या टीका उपलब्ध नहीं है, जो भारत समेत दुनिया के दूसरे देशों की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ी चुनौती है. सहयोगात्मक चिकित्सकीय देखभाल के अलावा इसका कोई विशिष्ट इलाज मौजूद नहीं है. ऐसे देश जो विकासशील हैं और जहां कमतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, वहां स्थितियां और खतरनाक हो जाती हैं. यही कारण है कि डेंगू के टीके की जरूरत और बढ़ जाती है.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी में डेंगू के टीके पर हो रहे शोध के बारे में बताइए?

इस टीके को विकसित करने में कई चुनौतियां हैं. मनुष्यों में डेंगू के चारों वायरस के प्रति होने वाली प्रमुख प्रतिरक्षा क्रॉस रिएक्टिव (प्रतिक्रियाशील) है जबकि इसे क्रॉस प्रोटेक्टिव (सुरक्षात्मक) होना चाहिए. डेंगू के ज्यादातर टीके उसके एक प्रकार के वायरस को निशाना बनाने के लिए बनाए जाते हैं. अब चूंकि डेंगू के चार प्रकार के वायरस हैं इस लिहाज से चार टीके तैयार कर इन्हें आपस में मिलाकर एक डेंगू रोधी टीके में बदल दिया जाता है. डेंगू के तमाम टीके विकास के क्रम है और जल्द ही डेंगू के खिलाफ पहली पीढ़ी का टीका हकीकत में बदल जाएगा. आईसीजीबीई की ओर से विकसित किया जा रहा टीका- सस्ता, सुरक्षित और प्रभावोत्पादक जैसे पैमाने पर खरा उतरते हुए इसे एक आदर्श टीका बनाता है.

डेंगू का टीका विकसित करने में भारतीय वैज्ञानिक किन-किन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं?

भारत में डेंगू का टीका विकसित करने के लिए सबसे पहले चिकित्सकीय परीक्षण के लिए जगह तलाशनी होती है. इसके बाद डेंगू से संबंधित आंकड़े विस्तारपूर्वक जमा करने होते हैं. ‘इंडो-यूएस वैक्सीन एक्शन प्रोग्राम’ और वेलकम ट्रस्ट ‘अफोर्डेबल हेल्थकेयर स्कीम’ डेंगू का टीका विकसित करने में मदद कर रहे हैं. बायोटेक्नोलॉजी विभाग की कोशिशों के जरिये भारतीय वैज्ञानिक विश्व के बड़े डेंगू जानकारों से लगातार मदद ले रहे हैं.

वर्तमान में भारत में चिकित्सकीय परीक्षणों की स्थिति आप जानते हैं, ऐसे में इस टीके को जनता तक पहुंचाने में किस तरह की कठिनाइयां आ सकती हैं?

देखिए, इस तरह के परीक्षणों के लिए एक तेज, फुर्तीला और ऊर्जा से भरा चिकित्सकीय तंत्र होना चाहिए. एक प्रभावी व्यवस्था बनाने के लिए इस क्षेत्र को मिलने वाला अनुदान भी कई गुना बढ़ाना होगा, ताकि प्रभावशाली बुनियादी संरचना विकसित की जा सके. भारत के कई बड़े संस्थान जैसे नई दिल्ली का एम्स, वेल्लोर का क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, पुणे का नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी और नई दिल्ली को इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी हैं, जो डेंगू के विषाणु के संक्रमण का अध्ययन करने के लिए अमेरिका के एमोरी वैक्सीन सेंटर से जुड़े हैं. इस तरह के वैश्विक प्रयासों को अमेरिका के ही नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ से भी सहयोग मिल रहा है.

ये टीका कब तक बाजार में आ जाएगा?

डेंगू के खिलाफ विकसित हो रहे टीके की पहली पीढ़ी 1-2 साल में बाजार में आ जाएगी. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो अगले 5 सालों में इस टीके की अगली पीढ़ी भी बाजार में उपलब्ध हो सकती है.

एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी सनोफी पैस्टर अपना डेंगू रोधी टीका भारतीय बाजार में उतारने की योजना बना रही है. आपका इस पर क्या कहना है?

एक कठिन काम होने के बावजूद डेंगू के लिए सुरक्षित और सस्ता टीका विकसित करने के क्रम में समर्पित शोध प्रयासों के लिए हम सनोफी पैस्टर के शु्क्रगुजार हैं. यह डेंगू के टीके के विकासक्रम में सबसे आगे है और निकट भविष्य में इसकी पहली पीढ़ी उपलब्ध हो सकती है.

हालांकि इसके साथ ही इस टीके के संबंध में कुछ चिंता करने योग्य बातें भी हैं. जैसे- व्यक्तियों में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, क्या तीन खुराक, साल भर तक प्रतिरक्षा प्रदान करेगी, टाइप 2 के वायरस पर इसका कम प्रभाव, टीका लेने के 1-2 साल बाद पांच साल से कम उम्र के बच्चों की अस्पतालों में बढ़ती संख्या आदि. इसीलिए डब्लूएचओ और डेंगू के विशेषज्ञों का कहना है कि इसके साथ डेंगू वैक्सीन की अगली पीढ़ी विकसित करने का काम भी शुरू कर देना चाहिए.

आपके अनुसार आने वाले 5 सालों में विश्व और देश में डेंगू की क्या स्थिति होगी?

रोग नियंत्रित करने में मिली असफलता, अनियोजित शहरीकरण, ग्लोबल वार्मिंग, बेहिसाब बढ़ती आबादी, अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं आदि डेंगू के फैलने के बड़े और वैश्विक कारण हैं. ये खुशी की बात है कि डेंगू नियंत्रण को लेकर जागरूकता बढ़ी है और कई सरकारी व निजी संस्थान शोध में पर्याप्त सहयोग दे रहे हैं. कई संस्थानों की ओर से तेज हो रहीं शोध की कोशिशें और टीके का विकास करने में प्रयासरत लोगों की संख्या में बढ़ोतरी से एक प्रभावशाली टीका जल्द ही उपलब्ध हो जाएगा. इसके लिए उन लोगों का शुक्रिया जो इन शोध प्रयासों से जुड़े हैं. बहरहाल, बायोटेक्नोलॉजी विभाग, ‘अफोर्डेबल हेल्थकेयर इंडिया स्कीम’ और दूसरे सहयोगियों की मदद से भारत भी जल्द ही अपना सस्ता, सुरक्षित और प्रभावशाली टीका बनाने में कामयाब हो सकता है.

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