दिल्ली चुनाव: किरण भरोसे भाजपा

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इलस्ट्रेशनः द्वव‍िजथ सीवी
इलस्ट्रेशनः द्वव‍िजथ सीवी

‘डॉक्टर हर्षवर्धन जो भाजपा के नेता हैं, मैं उन्हें जानता हूं. वो बहुत अच्छे इंसान हैं. उनकी पार्टी के बारे में तो नहीं कह सकता, लेकिन डॉक्टर हर्षवर्धन साहब अच्छे इंसान हैं.’

भाजपा नेता और 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार डॉक्टर हर्षवर्धन के बारे में ये विचार अरविंद केजरीवाल के थे. अरविंद ने अपने कट्टर राजनीतिक विरोधी के बारे में ये बयान दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए दिया था. एक साल पहले अरविंद ने अपनी राजनीतिक विरोधी पार्टी भाजपा के जिस एकमात्र नेता की तारीफ की थी वो डॉ. हर्षवर्धन थे. राजनीति में यह दुर्लभ बात है. ऐसी ही धारणा दिल्ली की आम जनता के मन में भी है, जो भाजपा के दिल्ली प्रदेश के नेताओं में सबसे बेहतर हर्षवर्धन को ही मानती है. लेकिन वही हर्षवर्धन 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिदृश्य से पूरी तरह गायब हैं, या फिर उन्हें गायब कर दिया गया है. इस चुनाव में न तो वो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और न उन्हें कोई खास चुनावी जिम्मेदारी सौंपी गई है. 2015 की भाजपा, 2013 की भाजपा से बहुत अलग है. इस चुनाव में पार्टी की तरफ से पूर्व आईपीएस अधिकारी और टीम अन्ना की प्रमुख सदस्य रही किरण बेदी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं. किरण के साथ ही अन्ना आंदोलन और आप की सदस्य रहीं शाजिया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी, आप की ओर से पिछले दिल्ली विधानसभा में स्पीकर रहे एमएस धीर समेत कई और टीम अन्ना और आप के सदस्य भाजपा में शामिल हो चुके हैं. किरण बेदी के भाजपा में शामिल होने के बाद से ही पार्टी में उनका विरोध भी शुरू हो गया है. प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार बनाने के कारण काफी रोष है.

यहां पहला महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है कि आखिर क्यों जो भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव लड़ी, हर राज्य में उसने मोदी के नाम, काम और चेहरे पर भरोसा किया वही भाजपा दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ‘चलो चलें मोदी के साथ’ वाले नारे पर भरोसा नहीं कर पायी. क्या कारण है कि काडरवाली पार्टी ने विधानसभा चुनाव के चंद दिन पहले पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाली गैर काडर सदस्या को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया. जानकार बताते हैं कि जिस तरह से पिछले दो-तीन सालों में अन्ना आंदोलन के बाद दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदला है उसने पुरानी पार्टियों की ढर्रेदार पारंपरिक राजनीति के भविष्य पर प्रश्न खड़ा कर दिया है. उसी अन्ना आंदोलन से निकली हुई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने प्रदेश की राजनीति को पिछले विधानसभा चुनाव में पलटकर रख दिया था. 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को अधिकांश सर्वे 10-12 सीटों पर सीमित कर रहे थे उसने 28 सीटें लाकर सभी को चौंका दिया.

आप की सफलता में यह संदेश छुपा था कि 2010 से 2012 के बीच चले अन्ना के आंदोलन ने दिल्ली के जनमानस पर एक गहरा प्रभाव डाला. उस आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने अपनी सादगी और स्ट्रीट फाइटर वाले अंदाज से लोगों से जुड़ने में सफलता पाई. उस चुनाव ने दिल्ली की राजनीति का चेहरा बदल दिया. वह ऐसा बदलाव था जिसमें अरविंद तो जीते ही साथ में तमाम ऐसे लोग भी जीतने में सफल रहे थे जिनका राजनीति से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं था. एक ऐसी राजनीति की शुरुआत हुई जो दिल्ली शहर को शंघाई नहीं, मुफ्त पानी और बिजली देने की बात कर रही थी. ऑटोवाले और रेहड़ीवालों को पुलिस प्रताड़ना से मुक्त करने की बात कर रही थी. आंदोलन से निकली आप ने प्रदेश की पारंपरिक राजनीति के सामने एक बडा संकट खड़ा कर दिया. कांग्रेस के लिए एकाएक दिल्ली भी यूपी और बिहार हो गया जहां वो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आने लगी. वहीं भाजपा के सामने भी एक बड़ा राजनीतिक संकट था, 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आप को कुछ कॉपी तो किया था लेकिन उसका बड़ा ढांचा और चेहरा पारंपरिक ही बना रहा. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘अन्ना आंदोलन, आप के उदय और अरविंद जैसे चेहरे के कारण प्रदेश की राजनीति 180 डिग्री घूम गई है. जिस तरह की राजनीति पूरे देश में हो रही है, दिल्ली की राजनीति उससे बिलकुल अलग है. यहां राजनीति के सारे तौर-तरीके बदल गए हैं. ऐसे में आपको अपनी रणनीति तो बदलनी ही पड़ेगी.’

बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व जिस किरण बेदी को मास्टर स्ट्रोक समझकर ले आया था उस किरण को लेकर पार्टी के भीतर ही कलह मची हुई है

भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इसी रणनीति के तहत पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ किरण बेदी को अपना चेहरा बनाया है. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बात से लंबे समय से परेशान था कि दिल्ली में उसके पास अरविंद केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए कोई चेहरा नहीं है. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘ ऐसा नहीं है कि हमारे पास दिल्ली में नेता नहीं थे, दिक्कत ये थी कि उनमें से कोई केजरीवाल जैसी अपीलवाला नहीं था. जिस तरह का प्रभाव अरविंद केजरीवाल का है उसकी बराबरी करनेवाला हमारे पास कोई नेता नहीं था. ये एक बड़ा संकट था. इसी कमी को पूरा करने के लिए पार्टी ने किरण बेदी को पार्टी में शामिल किया और उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार बनाया.’ पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बात की भी चर्चा करते हैं कि कैसे किरण बेदी को पार्टी में शामिल करना उनकी मजबूरी थी, क्योंकि चुनौती सामने होने के बाद भी प्रदेश भाजपा के नेताओं ने खुद को बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से तैयार नहीं किया. भाजपा के एक पूर्व उपाध्यक्ष कहते हैं, ‘प्रदेश के नेताओं ने कोई काम नहीं किया. बीते तीन सालों में जिस तरह से दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदला है, उसके हिसाब से किसी दिल्ली प्रदेश के नेता ने खुद को तैयार नहीं किया. शीर्ष नेतृत्व ने समय को समझा है और उसके हिसाब से उसने बड़े बदलाव किए.’

दिल्ली की पूर्व मेयर और भाजपा नेता आरती मेहरा किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने को मास्टरस्ट्रोक बताते हुए कहती हैं, ‘पार्टी ने केजरीवाल की टक्कर का चेहरा ही नहीं, बल्कि उससे ज्यादा वजनदार चेहरा उतारा है. अन्ना आंदोलन के बाद गैर-राजनीतिक लोगों की इज्जत और मांग राजनीतिक में बढ़ गई है. दूसरी बात ये कि किरण बेदी को खुद केजरीवाल ने आप की तरफ से मुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया था. इस तरह से यह एक मास्टरस्ट्रोक था. और किरण हमारी विचारधारा के करीब तो पहले से ही हैं.’ तो क्या सिर्फ अरविंद की काट के तौर पर भाजपा किरण बेदी को लाई है? मेहरा कहती हैं, ‘यह कहना गलत है कि हम चुनावों को ध्यान में रखकर बेदीजी को लाए हैं. हम 2009 से ही इन्हें पार्टी में लाने का प्रयास कर रहे थे. मैं खुद उनके घर कई बार इसका प्रस्ताव लेकर गई थी. हम चाहते थे कि वो 2009 का लोकसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ें लेकिन उन्होंने मना कर दिया था. अन्ना आंदोलन के समय जब वो अरविंद से अलग हुईं तब भी हम उनके पास पार्टी में शामिल होने का ऑफर लेकर गए थे, लेकिन उन्होंने कहा कि वो तैयार नहीं हैं. अब जाकर उन्होंने हमसे जुड़ने का मन बनाया है.’ बेदी को लाने के निर्णय को भाजपा कितना सही मानती है उसका पता पार्टी के वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडु के बयान से भी चलता है. नायडु कहते हैं, ‘किरण बेदी एक ब्रांड हैं. उनके जैसा दिल्ली भाजपा में कोई दूसरा नहीं है.’ भाजपा के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्दे भी बेदी को सीएम पद का उम्मीदवार बनाने को आप को उसी की भाषा में जवाब देने के रूप में देखते हैं.

भाजपा से जुड़े लोग इसे पार्टी नेतृत्व की दूरदर्शिता के रूप में भी देखते हैं. उनके मुताबिक अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी का एकमात्र उद्देश्य चुनाव जीतना है. इसके लिए अगर संगठन के स्तर पर बड़े बदलाव करने की भी जरूरत पड़ती है तो पार्टी इससे पीछे नहीं हटेगी. शायद यही कारण है कि बाहर से एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का वादा करके पार्टी में लाया गया. पार्टी के एक नेता इसकी ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘देखिए बेदीजी की ताजपोशी पार्टी के भीतर एक बड़े बदलाव की भी कहानी कहती है. आप अगर बारीकी में जाएं तो मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने बेदी जैसे तो नहीं, लेकिन उसके आसपास के कई उदाहरण जरूर प्रस्तुत किए हैं. जैसे- पिछले कैबिनेट विस्तार के समय सुरेश प्रभु सुबह ऑनलाइन माध्यम से भाजपा की सदस्यता लेने के कुछ घंटे बाद ही रेल मंत्री बन गए. लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा के कई चुनावों में पार्टी ने बड़ी संख्या में दूसरे दल से आए नेताओं को पार्टी में शामिल किया. इन लोगों को बाद में मंत्री भी बनाया. दोनों (नरेंद्र मोदी-अमित शाह) के नेतृत्व में पार्टी बहुत बदली है और आगे भी इस तरह के बदलाव होंगे. दोनों नेता नए हैं और नई परिस्थिति और चुनौती के हिसाब से रणनीति बनाने में माहिर हैं. इन बदलावों के लिए उन्होंने संघ को भी तैयार कर लिया है.’

खैर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जिस किरण बेदी को मास्टरस्ट्रोक समझकर ले आया था उस किरण को लेकर पार्टी के भीतर ही कलह मची हुई है. किरण बेदी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही ऐसी खबरें आनी शुरू हो गईं कि तमाम प्रदेश भाजपा के नेता किरण को पार्टी में शामिल करने और उन्हें तत्काल मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से दुखी हैं. नाखुशी जाहिर करने की शुरुआत उत्तर पूर्व दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने की. उनका कहना था कि जो दो दिन पहले पार्टी में शामिल हुआ वो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कैसे हो सकता है. तिवारी ने कहा, ‘मुझे किरण बेदी के व्यवहार से आपत्ति है. हमारे दिल्ली के कई कार्यकर्ताओं ने कहा कि वो एक डिक्टेटर की तरह बात करती हैं. दिल्ली को नेता चाहिए थानेदार नहीं.’ मनोज तिवारी ने ये बयान किरण बेदी के मुख्यमंत्री घोषित होने से पहले दिया था.

केजरीवाल ने एक ऐसी राजनीति की शुरुआत हुई की दिल्ली शहर को शांघाई बनाने की नहीं बल्कि मुफ्त पानी और बिजली देने की बात कर रही थी

दिल्ली भाजपा के कई नेता किरण बेदी के मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाने से इस कारण भी नाराज थे क्योंकि इस निर्णय के लिए न तो उनसे सलाह ली गई थी और न ही उन्हें सूचित किया गया था. प्रदेश भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हम लोगों को भी टीवी से ही पता चला कि वो आ रही हैं. शीर्ष नेतृत्व ने न तो प्रदेश के नेताओं से सलाह-मश्विरा किया और न ही हमें कोई सूचना दी थी. प्रदेश नेतृत्व को इस पूरे निर्णय से बाहर रखा गया.’ मीडिया से बातचीत में पार्टी के वरिष्ट नेता जगदीश मुखी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि किरण बेदी के बारे में प्रदेश भाजपा से कोई सलाह नहीं ली गई. मुखी के मुताबिक अब पार्टी की प्राथमिकताएं बदल गई हैं. जगदीश मुखी वही नेता हैं जिनको भाजपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बताते हुए आप ने ऑटो के पीछे अरविंद से तुलना वाले विज्ञापन लगवाए थे. एक तरफ जहां किरण के मुख्यमंत्री घोषित होने के बाद नेताओं में नाराजगी है, उसी दौरान जारी हुई भाजपा के प्रत्याशियों की सूची ने कोढ़ में खाज का काम किया. सूची सामने आने के बाद प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के समर्थकों ने उन्हें महरौली से टिकट देने व मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाने की मांग करते हुए प्रदेश कार्यालय में हंगामा किया. इसी तरह के विरोध प्रदर्शन अभय वर्मा, शिखा राय, जय भगवान अग्रवाल, नकुल भारद्वाज सहित कई नेताओं के समर्थकों ने भाजपा मुख्यालय पर किया.

टिकट न मिलने से नाराज पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘ये तो गलत बात है. एक कार्यकर्ता अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए लगाता है. दरी बिछाने, कुर्सी लगाने और पोस्टर चिपकाने से वो शुरुआत करता है. जिस समय उसकी उम्र वाले नौकरी कर रहे होते हैं, अपने जीवन को दिशा दे रहे होते हैं, कार्यकर्ता घरवालों से गाली सुनते हुए भी पार्टी के लिए लगा रहता है. दूसरों को जिताने में ही उसके जीवन का 90 फीसदी हिस्सा खर्च हो जाता है. देश की राजनीति को देखते हुए एक आम राजनीतिक कार्यकर्ता को उसके बाल सफेद होने के बाद ही कुछ बनने का मौका मिलता है. अब आपको पता चले कि 40 साल से जो तपस्या आप कर रहे थे उस पर पार्टी ने किसी बाहरी को लाकर बिठा दिया है, तो आपके शरीर में क्या आग नहीं लगेगी. बात टिकट कि नहीं है. सीएम बनने की नहीं है. यह अनैतिक है और अमानवीय है. आप ऐसा करेंगे तो फिर कौन नया लड़का पार्टी की दरी बिछाने आएगा. पैराशुट से जब नेता आने लगते हैं तो फिर कार्यकर्ता पैदा करनेवाली भूमि बंजर हो जाती है.’ आगामी विधानसभा चुनाव में बूथ संगठन का काम देख रहे स्थानीय भाजपा नेता हरबंस डंकल कहते हैं, ‘नाराजगी तो स्वाभाविक है. हर आदमी सोचता है कि भाई इतने सालों से पार्टी में लगे हुए हैं, इसलिए मुझे मौका मिलना ही चाहिए.’

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आरती मेहरा इसे अलग तरीके से देखती हैं. वो कहती हैं, ‘कुछ लोग नाराज हो सकते हैं. मैं भी सोच रही थी कि मालवीय नगर से लड़ूंगी लेकिन पार्टी ने टिकट नहीं दिया. कोई बात नहीं. मैंने अपने कार्यकर्ताओं को मना लिया. सभी को परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए.’ किरण बेदी को लेकर नेता-कार्यकर्ता तो नाराज हैं ही खुद किरण बेदी के लिए उनका गुजरा हुआ कल बशीर बद्र के शेर ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों’ की याद दिला रहा है. बीते वर्षों में कई मौकों पर किरण ने ट्विट करते हुए भाजपा और नरेंद्र मोदी को लेकर तमाम ऐसी बातें कहीं हैं जो आज उनके लिए शर्मिंदगी का सबब बन रही हैं. जैसे- 16 अप्रैल 2013 को किरण बेदी ने ट्वीट किया था कि, ‘भले ही कोर्ट ने नमो (मोदी) को क्लीनचिट दी है पर एक दिन उन्हें दंगों को लेकर लोगों के सामने अपनी सफाई पेश करनी ही होगी.’ अन्ना आंदोलन के समय का उनका एक ट्वीट था कि ‘दोनों (कांग्रेस और बीजेपी) ही पार्टी देश को शर्मसार करनेवाली हैं, ये पार्टियां इस लायक भी नहीं की हम इन्हें वोट करें.’ आज मीडिया समेत विपक्षी दल बेदी से इस हृदय परिवर्तन का कारण पूछ रहे हैं. सबसे ज्यादा सवाल आप के लोग कर रहे हैं, क्योंकि किरण बेदी ने यही कहते हुए उनसे किनारा किया था कि वे राजनीति में कभी नहीं आएंगी और अब दो साल के भीतर ही वो सक्रिय राजनीति में पूरी तरह से घुस गई हैं. उन्हें इन सवालों का सामना करने में पसीने छूट रहे हैं.

भाजपा के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं में किरण बेदी को कमान देने और टिकट न मिलने से निराशा और सिर फुटौव्वल जारी है. इस कठिन घड़ी में संघ ने मोर्चा संभाल लिया है. संघ के एक प्रचारक कहते हैं, ‘क्या किया जाए. अब ये सब अपने में ही मारकाट मचाए हुए हैं. केंद्रीय भाजपा की तरफ से मदद की गुहार आई है. हमें भी पता है कि इस बार आप की वजह से नहीं, बल्कि जिस तरह से आपस में ही जूतमपैजार मची हुई है, उसकी वजह से भाजपा की हालत खराब होनेवाली है. इसलिए संघ कार्यकर्ताओं ने कमान संभाली है. तमाम सीटों पर पुराने भाजपाई पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ काम कर रहे हैं.’

संघ के साथ ही विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गावाहिनी ने भी महिलाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए अभियान शुरू किया है. पार्टी के एक विधानसभा उम्मीदवार कहते हैं, ‘यह सही है कि दुर्गावाहिनी को महिलाओं को जोड़ने के लिए प्रचार में उतारा गया है. इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में ऐसा देखने में आया कि कई घरों में पुरुषों ने तो भाजपा को वोट किया था, लेकिन उसी घर कि महिलाओं और लड़कियों ने आप को अपना मत दिया था. ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ भाजपा को वोट देने के लिए कहती हैं, बल्कि वो समाज की एक बड़ी समस्या लव जिहाद जैसे मसलों पर उनका वैचारिक जागरण भी कर रही हैं.’ हालांकि भाजपा इस बार के चुनाव में बिना किसी अड़ंगे के आसमान छूने का ख्याब देख रही थी. इसकी एक वजह यह भी थी कि दिल्ली की लोकसभा की सातों सीटें उसकी झोली में हैं. इसके साथ ही विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 60 पर वह पहले नंबर पर थी. भाजपा किसी भी कीमत पर दिल्ली फतह करना चाहती है. जीत की इस बेचैनी के पीछे एक कारण यह है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी विधानसभा चुनाव जीते हैं, इसमें जम्मू कश्मीर भी है जहां सरकार भले ही नहीं बनी हो, लेकिन इतिहास में उसे पहली बार 25 सीटें हासिल हुईं हैं और सबसे अधिक वोट मिले हैं. तो फिर भाजपा दिल्ली को हारने का जोखिम नहीं ले सकती, वरना पूरी तरह से ध्वस्त विपक्ष के हाथ अरविंद केजरीवाल के रूप में एक बड़ा हथियार लग जाएगा.

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद ये चर्चा शुरू हो जाएगी की मोदी को इस देश में कोई आदमी चुनौती दे सकता है तो वो केजरीवाल हैं

दिल्ली की जीत से भाजपा यह भी साबित करना चाहती है कि जनता में मोदी के प्रति दीवानगी अभी बरकरार है. पार्टी की यही सोच उसके लिए चुनौती भी है. अगर कहीं वो दिल्ली विधानसभा हार गई तो विरोधी मोदी लहरवाले नारे की हवा निकालने में जुट जाएंगे. इसका बुरा असर आगामी यूपी और बिहार विधानसभा चुनाव पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा. यानी यह मामला सिर्फ दिल्ली जीतने का नहीं उससे कहीं बड़ा है. यह मोदी की छवि से भी जुड़ा है. हालांकि भाजपा के आलोचक यह भी कहने लगे हैं कि किरण बेदी को भाजपा ने बली का बकरा बनाया है. आलोचकों के मुताबिक अगर भाजपा जीतती है जीत का श्रेय मोदी के खाते में जाएगा और हार मिलती है तो ठीकरा किरण बेदी के सिर फोड़ दिया जाएगा. यानी भाजपा में भी कांग्रेसी संस्कृति पनपने लगी है.

एक महत्वपूर्ण कारण और भी है जिसकी वजह से भाजपा किसी भी कीमत पर दिल्ली को हासिल करना चाहती है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘देखिए पार्टी एक-एक कर सभी राज्यों में जीतती जा रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में दलित राजनीति से लेकर समाजवादियों की राजनीति को हमने पटखनी दे दी है. बाकी राज्यों में भी कमोबेश वैसा ही हाल था. लालू-नीतीश सभी की राजनीति को हमने पंक्चर कर दिया. दिल्ली की गद्दी छोड़कर पिछले लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल, मोदी को हराने बनारस पहुंच गए थे. ये आदमी हार तो गया लेकिन जिस शहर में पहली बार गया था वहां दो लाख से अधिक वोट पा गया था. बात यह है कि जहां मोदी लगभग सभी पार्टियों और नेताओं को चित करते जा रहे हैं वहां अगर दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल जीतने में सफल रहा तो फिर से वही लड़ाई शुरू हो जाएगी जो बनारस में अरविंद की हार के साथ खत्म हो गई थी. दिल्ली में भाजपा की हार को हर हाल में मोदी विरोधी केजरीवाल के हाथों मोदी की हार के रूप में प्रचारित करेंगे. इससे एक और चर्चा शुरू होने की पूरी उम्मीद है कि इस देश में अगर कोई मोदी को चुनौती दे सकता है तो वह केजरीवाल ही हैं. मोदी किसी भी हाल में यह तो नहीं चाहेंगे. पार्टी की कोशिश केजरीवाल को सिर्फ हराना नहीं, बल्कि पूरी तरह से समाप्त कर देना है ताकि वो दोबारा से चुनौती देने के लिए खड़ा ही न हो सकें.’ जो डर मोदी-शाह के मन में बैठा है उसकी ताकीद मीडिया में आ रहे सर्वेक्षण भी कर रहे हैं. यानी पनघट की डगर कठिन है. बेदी कितना पानी भर पाती हैं, इस पर भाजपा और मोदी दोनों की निगाहें टिकी हुई हैं.

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  1. पुरानी पीढ़ी के भरोसे अमित शाह ५ -१० पार्टी चला लेंगे , उसके बाद पार्टी की वही हालत होगी जैसे आज कांग्रेस की है . लेकिन तब तक तो दोनों विदा हो जायेंगे . और बी जे पी बंजर हो चुकी होगी .

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