दिल्ली चुनाव: किरण भरोसे भाजपा

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इलस्ट्रेशनः द्वव‍िजथ सीवी
इलस्ट्रेशनः द्वव‍िजथ सीवी

‘डॉक्टर हर्षवर्धन जो भाजपा के नेता हैं, मैं उन्हें जानता हूं. वो बहुत अच्छे इंसान हैं. उनकी पार्टी के बारे में तो नहीं कह सकता, लेकिन डॉक्टर हर्षवर्धन साहब अच्छे इंसान हैं.’

भाजपा नेता और 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार डॉक्टर हर्षवर्धन के बारे में ये विचार अरविंद केजरीवाल के थे. अरविंद ने अपने कट्टर राजनीतिक विरोधी के बारे में ये बयान दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए दिया था. एक साल पहले अरविंद ने अपनी राजनीतिक विरोधी पार्टी भाजपा के जिस एकमात्र नेता की तारीफ की थी वो डॉ. हर्षवर्धन थे. राजनीति में यह दुर्लभ बात है. ऐसी ही धारणा दिल्ली की आम जनता के मन में भी है, जो भाजपा के दिल्ली प्रदेश के नेताओं में सबसे बेहतर हर्षवर्धन को ही मानती है. लेकिन वही हर्षवर्धन 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिदृश्य से पूरी तरह गायब हैं, या फिर उन्हें गायब कर दिया गया है. इस चुनाव में न तो वो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और न उन्हें कोई खास चुनावी जिम्मेदारी सौंपी गई है. 2015 की भाजपा, 2013 की भाजपा से बहुत अलग है. इस चुनाव में पार्टी की तरफ से पूर्व आईपीएस अधिकारी और टीम अन्ना की प्रमुख सदस्य रही किरण बेदी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं. किरण के साथ ही अन्ना आंदोलन और आप की सदस्य रहीं शाजिया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी, आप की ओर से पिछले दिल्ली विधानसभा में स्पीकर रहे एमएस धीर समेत कई और टीम अन्ना और आप के सदस्य भाजपा में शामिल हो चुके हैं. किरण बेदी के भाजपा में शामिल होने के बाद से ही पार्टी में उनका विरोध भी शुरू हो गया है. प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार बनाने के कारण काफी रोष है.

यहां पहला महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है कि आखिर क्यों जो भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव लड़ी, हर राज्य में उसने मोदी के नाम, काम और चेहरे पर भरोसा किया वही भाजपा दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ‘चलो चलें मोदी के साथ’ वाले नारे पर भरोसा नहीं कर पायी. क्या कारण है कि काडरवाली पार्टी ने विधानसभा चुनाव के चंद दिन पहले पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाली गैर काडर सदस्या को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया. जानकार बताते हैं कि जिस तरह से पिछले दो-तीन सालों में अन्ना आंदोलन के बाद दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदला है उसने पुरानी पार्टियों की ढर्रेदार पारंपरिक राजनीति के भविष्य पर प्रश्न खड़ा कर दिया है. उसी अन्ना आंदोलन से निकली हुई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने प्रदेश की राजनीति को पिछले विधानसभा चुनाव में पलटकर रख दिया था. 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को अधिकांश सर्वे 10-12 सीटों पर सीमित कर रहे थे उसने 28 सीटें लाकर सभी को चौंका दिया.

आप की सफलता में यह संदेश छुपा था कि 2010 से 2012 के बीच चले अन्ना के आंदोलन ने दिल्ली के जनमानस पर एक गहरा प्रभाव डाला. उस आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने अपनी सादगी और स्ट्रीट फाइटर वाले अंदाज से लोगों से जुड़ने में सफलता पाई. उस चुनाव ने दिल्ली की राजनीति का चेहरा बदल दिया. वह ऐसा बदलाव था जिसमें अरविंद तो जीते ही साथ में तमाम ऐसे लोग भी जीतने में सफल रहे थे जिनका राजनीति से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं था. एक ऐसी राजनीति की शुरुआत हुई जो दिल्ली शहर को शंघाई नहीं, मुफ्त पानी और बिजली देने की बात कर रही थी. ऑटोवाले और रेहड़ीवालों को पुलिस प्रताड़ना से मुक्त करने की बात कर रही थी. आंदोलन से निकली आप ने प्रदेश की पारंपरिक राजनीति के सामने एक बडा संकट खड़ा कर दिया. कांग्रेस के लिए एकाएक दिल्ली भी यूपी और बिहार हो गया जहां वो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आने लगी. वहीं भाजपा के सामने भी एक बड़ा राजनीतिक संकट था, 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आप को कुछ कॉपी तो किया था लेकिन उसका बड़ा ढांचा और चेहरा पारंपरिक ही बना रहा. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘अन्ना आंदोलन, आप के उदय और अरविंद जैसे चेहरे के कारण प्रदेश की राजनीति 180 डिग्री घूम गई है. जिस तरह की राजनीति पूरे देश में हो रही है, दिल्ली की राजनीति उससे बिलकुल अलग है. यहां राजनीति के सारे तौर-तरीके बदल गए हैं. ऐसे में आपको अपनी रणनीति तो बदलनी ही पड़ेगी.’

बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व जिस किरण बेदी को मास्टर स्ट्रोक समझकर ले आया था उस किरण को लेकर पार्टी के भीतर ही कलह मची हुई है

भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इसी रणनीति के तहत पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ किरण बेदी को अपना चेहरा बनाया है. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बात से लंबे समय से परेशान था कि दिल्ली में उसके पास अरविंद केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए कोई चेहरा नहीं है. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘ ऐसा नहीं है कि हमारे पास दिल्ली में नेता नहीं थे, दिक्कत ये थी कि उनमें से कोई केजरीवाल जैसी अपीलवाला नहीं था. जिस तरह का प्रभाव अरविंद केजरीवाल का है उसकी बराबरी करनेवाला हमारे पास कोई नेता नहीं था. ये एक बड़ा संकट था. इसी कमी को पूरा करने के लिए पार्टी ने किरण बेदी को पार्टी में शामिल किया और उन्हें सीएम पद का उम्मीदवार बनाया.’ पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बात की भी चर्चा करते हैं कि कैसे किरण बेदी को पार्टी में शामिल करना उनकी मजबूरी थी, क्योंकि चुनौती सामने होने के बाद भी प्रदेश भाजपा के नेताओं ने खुद को बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से तैयार नहीं किया. भाजपा के एक पूर्व उपाध्यक्ष कहते हैं, ‘प्रदेश के नेताओं ने कोई काम नहीं किया. बीते तीन सालों में जिस तरह से दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदला है, उसके हिसाब से किसी दिल्ली प्रदेश के नेता ने खुद को तैयार नहीं किया. शीर्ष नेतृत्व ने समय को समझा है और उसके हिसाब से उसने बड़े बदलाव किए.’

दिल्ली की पूर्व मेयर और भाजपा नेता आरती मेहरा किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने को मास्टरस्ट्रोक बताते हुए कहती हैं, ‘पार्टी ने केजरीवाल की टक्कर का चेहरा ही नहीं, बल्कि उससे ज्यादा वजनदार चेहरा उतारा है. अन्ना आंदोलन के बाद गैर-राजनीतिक लोगों की इज्जत और मांग राजनीतिक में बढ़ गई है. दूसरी बात ये कि किरण बेदी को खुद केजरीवाल ने आप की तरफ से मुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया था. इस तरह से यह एक मास्टरस्ट्रोक था. और किरण हमारी विचारधारा के करीब तो पहले से ही हैं.’ तो क्या सिर्फ अरविंद की काट के तौर पर भाजपा किरण बेदी को लाई है? मेहरा कहती हैं, ‘यह कहना गलत है कि हम चुनावों को ध्यान में रखकर बेदीजी को लाए हैं. हम 2009 से ही इन्हें पार्टी में लाने का प्रयास कर रहे थे. मैं खुद उनके घर कई बार इसका प्रस्ताव लेकर गई थी. हम चाहते थे कि वो 2009 का लोकसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ें लेकिन उन्होंने मना कर दिया था. अन्ना आंदोलन के समय जब वो अरविंद से अलग हुईं तब भी हम उनके पास पार्टी में शामिल होने का ऑफर लेकर गए थे, लेकिन उन्होंने कहा कि वो तैयार नहीं हैं. अब जाकर उन्होंने हमसे जुड़ने का मन बनाया है.’ बेदी को लाने के निर्णय को भाजपा कितना सही मानती है उसका पता पार्टी के वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडु के बयान से भी चलता है. नायडु कहते हैं, ‘किरण बेदी एक ब्रांड हैं. उनके जैसा दिल्ली भाजपा में कोई दूसरा नहीं है.’ भाजपा के उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्दे भी बेदी को सीएम पद का उम्मीदवार बनाने को आप को उसी की भाषा में जवाब देने के रूप में देखते हैं.

भाजपा से जुड़े लोग इसे पार्टी नेतृत्व की दूरदर्शिता के रूप में भी देखते हैं. उनके मुताबिक अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी का एकमात्र उद्देश्य चुनाव जीतना है. इसके लिए अगर संगठन के स्तर पर बड़े बदलाव करने की भी जरूरत पड़ती है तो पार्टी इससे पीछे नहीं हटेगी. शायद यही कारण है कि बाहर से एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का वादा करके पार्टी में लाया गया. पार्टी के एक नेता इसकी ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘देखिए बेदीजी की ताजपोशी पार्टी के भीतर एक बड़े बदलाव की भी कहानी कहती है. आप अगर बारीकी में जाएं तो मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने बेदी जैसे तो नहीं, लेकिन उसके आसपास के कई उदाहरण जरूर प्रस्तुत किए हैं. जैसे- पिछले कैबिनेट विस्तार के समय सुरेश प्रभु सुबह ऑनलाइन माध्यम से भाजपा की सदस्यता लेने के कुछ घंटे बाद ही रेल मंत्री बन गए. लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा के कई चुनावों में पार्टी ने बड़ी संख्या में दूसरे दल से आए नेताओं को पार्टी में शामिल किया. इन लोगों को बाद में मंत्री भी बनाया. दोनों (नरेंद्र मोदी-अमित शाह) के नेतृत्व में पार्टी बहुत बदली है और आगे भी इस तरह के बदलाव होंगे. दोनों नेता नए हैं और नई परिस्थिति और चुनौती के हिसाब से रणनीति बनाने में माहिर हैं. इन बदलावों के लिए उन्होंने संघ को भी तैयार कर लिया है.’

1 COMMENT

  1. पुरानी पीढ़ी के भरोसे अमित शाह ५ -१० पार्टी चला लेंगे , उसके बाद पार्टी की वही हालत होगी जैसे आज कांग्रेस की है . लेकिन तब तक तो दोनों विदा हो जायेंगे . और बी जे पी बंजर हो चुकी होगी .

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