क्राउड फंडिंग : काम का नया फंडा

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Crowd Funding‘चंदा’ या कहें ‘क्राउड फंडिंग’ अब कोई नया शब्द नहीं रह गया है. देश में इसकी परंपरा काफी पुरानी है. हिंदू धर्म में सत्संग, दुर्गा पूजा जैसे कार्यक्रमों के सफल आयोजन का आधार चंदा ही रहा है. इसके अलावा दूसरे धर्मों में भी चंदा मांगकर सार्वजनिक कार्य पूरे किए जाते हैं. गांवों में अब भी शादी से लेकर अंतिम संस्कार तक आपसी मदद से ही हो रहे हैं. गांवों में किसी आयोजन को लेकर लिए जाने वाले ‘चंदे’ का चलन शहरों में ‘क्राउड फंडिंग’ के रूप में तेजी से बढ़ रहा है. पुल बनवाना, मोहल्ले की सफाई कराना, सड़क बनवाना या फिर फिल्म बनाने का काम हो, क्राउंड फंडिंग का इस्तेमाल अब आम हो गया है. अपनी अर्थपूर्ण फिल्मों के लिए मशहूर श्याम बेनेगल से लेकर दूसरे कई फिल्मकार भी चंदे के पैसों से फिल्में बना चुके हैं और कुछ बना रहे हैं.

क्राउड फंडिंग का ताजा उदाहरण हरियाणा के सिरसा जिले के एक गांव में देखने को मिला. गांववाले क्राउड फंडिंग के जरिए 1 करोड़ रुपये इकट्ठा कर एक पुल का निर्माण करा रहे हैं. घग्गर नदी पर बन रहा यह पुल 250 फुट लंबा और 14 फुट चौड़ा है. यह पुल अकीला और पनिहारी गांवों को जोड़ेगा, जिससे सिरसा की दूरी 30 किलोमीटर तक घट जाएगी. गांव के बाशिंदे इस पुल के उद्घाटन किसी नेता से नहीं करवाना चाहते क्योंकि क्षेत्र के नेताओं ने पुल के निर्माण के नाम पर दो दशक से उन्हें सिर्फ बेवकूफ बनाया है.

क्राउड फंडिंग एक परंपरा है जिसके तहत किसी परियोजना या व्यवसाय के लिए लोग एक साथ मिलकर आर्थिक सहयोग करते हैं. आम तौर पर इसका प्रयोग वो लोग करते हैं जिनके पास पैसों की कमी होती है. आज के दौर में इंटरनेट के माध्यम से सबसे ज्यादा क्राउड फंडिंग हो रही है. 2008 में अमेरिका में आई आर्थिक मंदी के दौरान वहां के लोगों ने जोर-शोर से क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल शुरू किया. फिल्म निर्माता, संगीतकार से लेकर निवेशकों तक ने अपनी परियोजनाओं के लिए इंटरनेट के जरिए लोगों से पैसा जमा किया. दुनिया की सबसे बड़ी क्राउड फंडिंग कंपनी ‘किकस्टार्टर’ कमोबेश हर क्षेत्र जैसे फिल्म, पत्रकारिता, संगीत, कॉमिक, वीडियो गेम से लेकर विज्ञान और तकनीक के लिए क्राउड फंडिंग करती है. किकस्टार्टर ने वर्ष 2014 तक 224 देशों के 58 लाख लोगों से तकरीबन तक दस अरब रुपये जुटाए हैं. इसका इस्तेमाल दो लाख लोगों ने विभिन्न योजनाओं के लिए किया. आज के समय में क्राउड फंडिंग एक ऐसा मंच माना जा रहा है, जिसके जरिए उन होनहार कलाकारों को अपनी कला की नुमाइश करने का भी मौका मिलता है, जो पैसों की कमी के कारण कुछ कर पाने से रह जाते हैं. भारत में भी ऐसे कई उदाहरण हैं जहां लोगों ने क्राउड फंडिंग के जरिए फिल्म बनाने से लेकर कई दूसरे सार्वजनिक काम सफलतापूर्वक किए हैं.

हालांकि सरकार की ओर से इसे अभी उतनी तवज्जाे नहीं मिल रही जितनी की ये हकदार है. भाजपा सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी की कटौती की है. अब स्वास्थ्य का बजट 352 अरब से घटाकर 297 अरब रुपये कर दिया गया है. भारत में स्वास्थ्य की स्थिति पहले से ही चिंताजनक है. निजी अस्पतालों में इलाज कराना काफी महंगा है. निचले तबकों के लिए तो यह और भी मुश्किल हैै. ऐसे में बेंगलुरु के रघुराम कोटे ने क्राउड फंडिंग के लिए ‘राइट टू लिव’ नाम की एक संस्था की शुरुआत की. यह संस्था अब तक कई लोगों की जान बचाने में सफल रही है, जो पैसों के कमी की वजह से इलाज कराने में अक्षम थे. स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘राइट टू लिव’ भारत का पहला क्राउड फंडिंग संस्थान है. अभी तक इस संस्था ने क्राउड फंडिंग के जरिए तकरीबन दो करोड़ रुपये जुटाए हैं. इन पैसों से 51 लोगों की गंभीर बीमारियों जैसे, कैंसर, कार्डियक सर्जरी, किडनी ट्रांसप्लांट, बोन मैरो ट्रांसप्लांट से लेकर ओपन हार्ट सर्जरी जैसे इलाज करवाए गए हैं. यह संस्था अपनी वेबसाइट पर लोगों की बीमारियों के साथ उनका नाम और आर्थिक स्थिति प्रदर्शित करता है, ताकि लोग उनकी मदद कर सकें.

राइट टू लिव के निदेशक रघुराम कोटे के मुताबिक, ‘कोई भी इंसान जिसके पास इलाज के पैसे नहीं हैं, वह हमारे संस्थान से संपर्क कर सकता है. हम पहले उसकी आर्थिक स्थिति की जांच करते हैं फिर उसकी सारी जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालते हैं. इलाज कराने में लगने वाले पैसे और समय की जानकारी भी वेबसाइट पर डाली जाती है. राइट टू लिव की खास बात यह है कि लोगों के दिए गए पैसे शत-प्रतिशत मरीजों के इलाज में खर्च किए जाते हैं. मरीजों के हाथ में पैसा नहीं दिया जाता है हम सीधे इलाज करवाते हैं.’

बकौल कोटे, ‘सरकार हमारे तमाम मसले नहीं सुलझा सकती और अगर बेंगलुरु जैसे शहर की बात करें तो यहां के मध्य और उच्च वर्ग के लोग स्वास्थ्य क्षेत्र में दान करना चाहते हैं. यहां के लोग एक-दूसरे की मदद भी करना चाहते हैं. यही वजह है कि हम गरीबों का इलाज कराने के लिए क्राउड फंडिंग कर पाने में सक्षम हैं. यहां के लाखों लोग महीने में 250 रुपये भी दान करें तो इससे ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज कराया जा सकता है.

पत्रकारिता में क्राउड फंडिंग

अमेरिकी संस्था ‘बीकन’ क्राउड फंडिंग के जरिये पत्रकारों की मदद करती है. पत्रकार वहां विषयवार स्टोरी आइडिया भेजते हैं. बीकन के सदस्य उनमें से अच्छे आइडिया का चयन कर उसे क्राउड फंडिंग के लिए वेबसाइट पर डालते हैं. लोग अपनी पसंद के अनुसार स्टोरी के लिए क्राउड फंडिंग करते हैं. इस तरह पत्रकारों को भी अपनी स्टोरी करने में इस माध्यम से मदद मिल जाती है.

ब्रिटेन में ‘जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर’ खिताब से दो बार नवाजे गए खोजी पत्रकार जॉन पिल्गर क्राउड फंडिंग के जरिए ‘द कमिंग वॉर’ नाम की डॉक्युमेंट्री फिल्म बना रहे हैं. उन्होंने इस फिल्म के निर्माण के लिए इंडिगो गो क्राउड फंडिंग वेबसाइट का सहारा लिया. क्राउड फंडिंग से पिल्गर इससे पहले भी तीन फिल्में बना चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘ग्लोबल इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ खोजी पत्रकारों के लिए क्राउड फंडिंग करवाती है. यह पत्रकारों को प्रशिक्षण देने से लेकर खोजी पत्रकारिता से जुड़े तमाम संसाधन भी मुहैया कराती है. ये संस्था 54 देशों में 118 एनजीओ के साथ मिलकर पत्रकारों के लिए क्राउड फंडिंग करती है.

हालांकि भारत में अभी पत्रकारिता के लिए क्राउड फंडिंग की शुरुआत नहीं हुई है. हां, मगर हमारे यहां भी कुछ समाचार वेबसाइट्स हैं, जो जनता से पैसे लेकर जनहित में खबर चलाने का दावा करती हैं. इनमें से एक ‘न्यूज लॉन्ड्री’ है जो लोगों से जुटाए गए पैसों पर चलने का दावा करती है. बहरहाल ऐसी स्थिति में जब लोग खुद पत्रकारों को क्राउड फंडिंग के जरिए योगदान करेंगे तो पत्रकार निष्पक्ष होकर पत्रकारिता कर सकेंगे.

वैसे इसकी कुछ सीमाएं भी हैं. क्राउड फंडिंग को लेकर अभी कोई साफ दिशा-निर्देश नहीं हैं. भारत में मीडिया हाउस और पत्रकारों पर कॉरपोरेट हाउसों के दबाव में आकर खबर लिखने का आरोप लगता रहता है. ऐसे में क्राउड फंडिंग से कितनी निष्पक्ष पत्रकारिता हो पाएगी, यह बड़ा सवाल है. बीकन के संस्थापक डैन फ्लेचर का मानना है, ‘क्राउड फंडिंग के जरिए कोई भी मनचाहे पत्रकार की आर्थिक मदद करना चाहता है तो वह सीधे कर सकता है. हमारी वेबसाइट ऐसी सुविधा मुहैया कराती है जिससे पत्रकारों को निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करने की आजादी हो.’

फिल्मों में भी क्राउड फंडिंग

देश में वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में आई दुग्ध क्रांति पर 1975 में श्याम बेनेगल ने ‘मंथन’ नाम की फिल्म क्राउड फंडिग के माध्यम से ही बनाई थी. फिल्म बनाने के लिए उन्होंने पांच लाख लोगों से दो-दो रुपये इकट्ठा किए थे. इसके बाद 1987 में बेनेगल ने एक और फिल्म ‘सुस्मन’ क्राउड फंडिंग के माध्यम से बनाई. बुनकरों के जीवन पर आधारित इस फिल्म के निर्माण के लिए उन्होंने बनारस और कर्नाटक के कुछ शहरों में स्थित हैंडलूम केंद्रों से पैसा इकट्ठा किया. इसी तरह फिल्म निर्माता ओनीर ने 2010 में क्राउड फंडिंग के जरिए एक बहुचर्चित फिल्म ‘आई एम’ का निर्माण किया. फिल्म समीक्षकों ने इसकी काफी तारीफ की थी. ओनीर के मुताबिक उनके लिए क्राउड फंडिंग करने वाले तमाम लोग उनकी फिल्म आई एम के सह मालिक हैं. कुछ साल पहले कन्नड़ फिल्मकार पवन कुमार ने बिना स्टार कास्ट और बिना किसी फिल्मी मसाले के फिल्म बनाने की सोची तो उनके लिए निर्माता ढूंढना मुश्किल हो गया. ‘लुसिया’ नाम की इस फिल्म के लिए उन्होंने ब्लॉग के जरिये 50 लाख रुपये जमा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हुआ कि एक महीने के भीतर ही उन्होंने यह लक्ष्य पा लिया. 20 जुलाई 2013 को यह पहली कन्नड़ फिल्म बन गई जिसका प्रीमियर लंदन में हुआ.

इसी तरह से पवन कुमार श्रीवास्तव क्राउड फंडिंग से ‘नया पता’ नाम की फिल्म बना चुके हैं. इसे भी समीक्षकों की खूब सराहना मिली. क्राउड फंडिंग के जरिए अब वो एक नई फिल्म ‘हाशिये के लोग’ का निर्माण करने जा रहे हैं. उनके मुताबिक, ‘भारत में क्राउड फंडिंग को बढ़ावा देना चाहिए. सरकार को भी चाहिए कि वह क्राउड फंडिंग के लिए सुनियोजित तरीके से गाइडलाइन बनाए और बढ़ावा दे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग चंदा देकर समाज में कला को बढ़ा सकें’.

विज्ञान और तकनीक में क्राउड फंडिंग

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है. पुणे के कुछ युवाओं ने इसके लिए ‘इग्नाइट इंटेंट’ नाम की वेबसाइट बनाई है. इसके संस्थापक रींकेश शाह ने ‘तहलका’ से बातचीत में बताया कि ‘हमारी वेबसाइट पर विज्ञान और तकनीक से जुड़ी परियोजनाओं के लिए क्राउड फंडिंग की जाती है. मेरा मानना है कि सरकार को भारत में क्राउड फंडिंग के लिए नियम बनाने चाहिए और इसे बढ़ावा देना चाहिए. पहले भारत में ऑफलाइन क्राउड फंडिंग होती थी पर अब समय बदल रहा है लोग ऑनलाइन क्राउड फंडिंग को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं.’ चंदे से हुई शुरुआत भले ही आज के समय में क्राउड फंडिंग के रूप में विकसित हो गई है, लेकिन भारत जैसे देश में बिना जागरूकता इसकी राह अभी बहुत आसान नजर नहीं आ रही है.

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‘भारत सरकार को क्राउड फंडिंग के लिए नीति बनानी चाहिए’

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‘राइट टू लिव’ की वाइस प्रेसिडेंट शेरिल ओबल से बातचीत

भारत में राइट टू लिव के सफर के बारे में बताएं?

राइट टू लिव भारत का पहला क्राउड फंडिंग संस्थान है. 2012 में जब इसकी शुरुआत हुई तब यहां ऐसा कोई संस्थान नहीं था. हम सिर्फ उन लोगों के लिए पैसे जमा करते हैं, जो गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं. इससे मिली शत-प्रतिशत रकम को इलाज पर खर्च करते हैं. भारत जैसे देश में ऐसे संस्थानों की जरूरत है.

इलाज के लिए जरूरतमंद लोगों की आर्थिक स्थिति के बारे में कैसे जानते हैं?

हम आवेदक के घर जाकर उनकी आर्थिक स्थिति और आय प्रमाण पत्र की समीक्षा करते हैं. उनकी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी अस्पताल से लेते हैं. उसके बाद उनका इलाज शुरू करवाते हैं.

सरकार से कोई मदद मिलती है ?

हमें सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती है मगर हम इलाज के लिए सरकारी मदद मरीजों को दिलाते हैं. जरूरतमंद लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े कागजात बनवाते हैं ताकि उन्हें सरकार से भी मदद मिल सके.

क्या सरकार से कोई योजना चाहती हैं ?

सरकार को क्राउड फंडिंग के लिए योजना बनानी चाहिए. सरकार ने जीवन बीमा व दुर्घटना बीमा योजना शुरू की पर स्वास्थ्य बीमा जैसी कोई सुविधा नहीं दी. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में जीडीपी का 5 प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की है, लेकिन भारत में सिर्फ एक प्रतिशत ही खर्च किया जाता है.

किस तरह की मुश्किलों का सामना होता है?

क्राउड फंडिंग में मुश्किलें आती हैं. लोग जिन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते उनके लिए दान करना नहीं चाहते हैं. इस स्थिति में लोगों को दान कराने के लिए राजी करना चुनौती भरा होता है.

क्राउड फंडिंग को किस रूप में देखती हैं?

क्राउड फंडिंग भारत में काफी सफल होगा. यहां अमीर-गरीब के बीच गहरी खाई है. यह उसे पाटने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके जरिए अमीर मिलकर गरीबों की मदद कर सकते हैं. इससे उन लोगों की की जिंदगी में बदलाव आएगा, जो पैसों की कमी की वजह से इलाज से महरूम रह जाते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक के मामले में भारत की दुनिया में अलग पहचान है. भारत के सुनहरे भविष्य के लिए क्राउड फंडिंग अहम भूमिका निभा सकती है.

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‘देश में क्राउड फंडिंग को सिर्फ गरीबों की मदद करना समझा जाता है…’

क्राउड फंडिंग से बनी फिल्म ‘आई एम’ के निर्माता ओनीर ने कई ऑफबीट फिल्में बनाई हैं. ‘माई ब्रदर निखिल’, ‘बस एक पल’, ‘सॉरी भाई’ जैसी फिल्में बनाने वाले ओनीर से बातचीत

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फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग कैसे की?

जब मैं ‘आई एम’ बना रहा था तो भारत में क्राउड फंडिंग की कोई वेबसाइट नहीं थी. मैंने सोशल मीडिया साइट्स के जरिए फिल्म के लिए पैसे जुटाए. सिर्फ फेसबुक, ट्विटर और ईमेल का इस्तेमाल किया. लगभग 400 लोगों ने इस फिल्म को बनाने में आर्थिक मदद की. जिन लोगों ने इसे बनाने में सहयोग किया है वो सभी इस फिल्म के सह मालिक हैं.

क्राउड फंडिंग की राह में किस तरह की मुश्किलें आईं?

भारत में लोग दान का मतलब सिर्फ गरीबों और लाचारों की मदद करना समझते हैं. दूसरे देशों में ऐसा नहीं है वहां लोग कला और मनोरंजन के लिए भी क्राउड फंडिंग करते हैं. जब सवाल लोगों से पैसा लेकर फिल्म बनाने का हो तो भारत में इसकी राह बहुत आसान नहीं है. ‘आई एम’ के लिए क्राउड फंडिंग जरूरत बन गई थी. फिल्म में अलग-अलग कहानियां हैं, पैसों की कमी की वजह से हमें सभी कहानियों को एक फिल्म में समेटना पड़ा. भारत में आप डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए क्राउड फंडिंग करने की सोच भी सकते हैं. अगर फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग करेंगे तो लोग उतनी मदद नहीं करते. भारत में लोग कला फिल्मों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना दूसरे देशों में देते हैं.

क्या क्राउड फंडिंग स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए उपयोगी है ?

भारत में धीरे-धीरे बहुत से फिल्म निर्माता क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब आप कोई फीचर फिल्म न बना रहे हों, किसी और काम के लिए पैसे जुटाना भारत में आसान है.

क्या आगे भी क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाएंगे ?

नहीं, मेरा मकसद सिर्फ फिल्म बनाना है इसलिए ‘आई एम’ के बाद मैंने क्राउड फंडिंग से फिल्म बनानी बंद कर दी. जैसा कि मैंने पहले भी कहा भारत में क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाना मुश्किल भरा काम है.

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‘अगर लोग मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो सामाजिक फिल्में बननी बंद हो जाएंगी’

पवन कुमार श्रीवास्तव ने 2012 में क्राउंड फंडिंग के जरिए ‘नया पता’ नाम की फिल्म बनाई थी. अब एक बार फिर इसी विधा के इस्तेमाल से वह ‘हाशिये के लोग’ नाम की फिल्म बना रहे हैं

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क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने के बारे में कैसे सोचा?

जब मैंने ‘नया पता’ फिल्म बनाने की सोची तब मुझे क्राउड फंडिंग की कोई जानकारी नहीं थी. मैं फिल्म को लेकर मुंबई के निर्माताओं से मिला पर सभी ने पैसे लगाने से इनकार कर दिया. तभी मैंने क्राउड फंडिंग से बनी ओनीर की फिल्म ‘आई एम’ देखी. मैंने तब सोच लिया कि अगर ओनीर क्राउड फंडिंग से फिल्म बना सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. मैंने भाई से 50 हजार रुपये लेकर फिल्म पर शोध करना शुरू किया. एक महीने तक क्राउड फंडिंग के बारे में जानकारी इकट्ठा की. फिर मैंने फिल्म से जुड़े कुछ फोटो और सारांश ईमेल से कुछ लोगों को भेजे. सोशल मीडिया पर भी फिल्म की जानकारी साझा की. पहले मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने मुझे 500 से 3000 रुपये तक चंदे के रूप में देना शुरू किया. फिर दूसरे लोगों ने मदद की.

क्राउड फंडिंग क्यों आैैर इससे क्या मिलेगा?

हम जहां रहते हैं वहां एक-दूसरे की मदद के बिना समाज नहीं चल सकता. अगर लोग इस तरह की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो पैसों की कमी के चलते सामाजिक फिल्में बननी कम हो जाएंगी और सिर्फ बाजार आधारित फिल्में ही बना करेंगी. क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हम हर कदम उनके बारे में सोचकर उठाते हैं, जिन्होंने हमें मदद की है. वो हम पर नजर रखते हैं. अगर हम किसी निर्माता के पैसों से फिल्म बनाते हैं तो हमें लोगों की चिंता शायद ही होती.

लोगों से पैसे जुटाने में क्या मुश्किलें आईं?

भारत में क्राउड फंडिंग से कम ही लोग वाकिफ हैं. हमारे समाज में अगर फिल्म बनाने के लिए पैसे मांगो तो लोग पहले समझते है कि यह पैसा लेकर भाग जाएगा या बेवकूफ बना रहा है. वैसा ही मेरे साथ हुआ, लोगों को समझाना मुश्किल था. इसलिए मैंने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिले पैसों से फिल्म की शूटिंग शुरू की. फिल्म मैंने कई चरणों में बनाई ताकि इसका कुछ हिस्सा लोगों को दिखा कर क्राउड फंडिंग की जा सके. धीरे-धीरे लोग मदद को आगे आए और फिल्म का निर्माण पूरा हुआ.

आपने फिल्म को सिर्फ पीवीआर में रिलीज किया. ऐसे में वो तबका इससे महरूम रह गया जिसके लिए आपने यह फिल्म बनाई?

आपने मेरा इंटरव्यू क्यों लेना चाहा? इसलिए क्योंकि आपको ‘नया पता’ फिल्म की जानकारी है. अगर मेरी फिल्म रिलीज ही नहीं होती तो इसके बारे में किसी को पता भी न चलता. ऐसे तमाम स्वतंत्र फिल्म निर्माता हैं जो सरोकारी फिल्में तो बनाते हैं पर उसे रिलीज नहीं करा पाते. मेरा मानना है कि फिल्म का प्रदर्शन महत्वपूर्ण है. मेरे पास पैसे की कमी थी और ‘पीवीआर डायरेक्टर्स कट’ स्वतंत्र फिल्म निर्देशकों की फिल्म बगैर पैसे के रिलीज करता है इसलिए मैंने इसे पीवीआर में रिलीज कराया. सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स में फिल्म रिलीज कराने के लिए पैसों की जरूरत होती है. मैं अकेला इस फिल्म को उन लोगों तक नहीं पहुंचा सकता जिनके लिए इसे बनाया है. विदेशों में कई संस्थान हैं जो ऐसी फिल्मों को बिना पैसा लिए प्रदर्शित करते हैं. ऐसी व्यवस्था भारत में भी लागू होनी चाहिए.

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इस फिल्म को बनाने में किसी क्राउड फंडिंग वेबसाइट या संस्था का सहारा लिया?

2012 में भारत में क्राउड फंडिंग कराने वाली वेबसाइट नाममात्र की ही थी. मैंने तब ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था. मेरी फिल्म लगभग बन चुकी थी तो ‘विशबेरी’ क्राउड फंडिंग वेबसाइट ने मदद देने की बात कही पर मैंने इनकार कर दिया. अब ‘हाशिये के लोग’ फिल्म का निर्माण क्राउड फंडिंग वेबसाइट के जरिये कर रहा हूं. लोगों ने इसके लिए क्राउड फंडिंग शुरू कर दी है. मैं किसी बड़े अभिनेता को फिल्म में नहीं रख सकता इसलिए मैं अलग-अलग शहरों में फिल्म संस्थानों की मदद से पात्रों के लिए ऑडिशन करूंगा.

भारत में क्राउड फंडिंग का भविष्य क्या है?

इन दिनों भारत में भी क्राउड फंडिंग पकड़ बना रहा है. क्राउड फंडिंग के लिए नई वेबसाइट और संस्थान खुल रहे हैं. अगले कुछ वर्षों में ऐसे फिल्म निर्देशकों को भी मौका मिलने लगेगा जिनकी सामाजिक फिल्में पैसों की कमी की वजह से खटाई में पड़ जाती है.

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