सीपीआई (एम) : पचास साल में ढाई कोस

cpimभला किसने सोचा होगा कि भारत में वामपंथी राजनीति की हिरावल पार्टी- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपनी स्थापना के पचासवें साल में उससे भी बुरे हाल में खड़ी होगी, जहां से 1964 में उसने अपनी यात्रा शुरू की थी. अपने स्वर्ण जयंती साल में पार्टी न सिर्फ सबसे गहरे और कठिन वैचारिक-राजनीतिक संकट का सामना कर रही है, बल्कि अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद से भी गुजर रही है. राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खतरे में है. सीपीआई (एम) को इतने गंभीर वैचारिक-राजनीतिक संकट से उस समय भी नहीं गुजरना पड़ा था, जब 1964 में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) टूटी थी.

उस समय एक नया हौसला था, ‘क्रांति’ का सपना था और पी सुन्दरैया, एके गोपालन, ईएमएस नम्बूदरीपाद, टी नागी रेड्डी, प्रमोद दासगुप्ता, हरे कृष्ण कोनार, ज्योति बसु जैसे नेताओं-संगठनकर्ताओं का एकजुट और प्रतिबद्ध नेतृत्व था, जो सीपीआई नेतृत्व की संशोधनवादी लाइन के खिलाफ ‘वर्ग संघर्ष’ पर जोर देने की वकालत करते हुए नई राह पर निकला था. लेकिन 50 सालों में सीपीआई (एम) कहां पहुंची? 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने कुल 98 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें से सिर्फ 9 सीटों (अगर केरल में वाम मोर्चा समर्थित दो स्वतंत्र उम्मीदवारों की जीत को जोड़ लिया जाए, तो कुल 11 सीटों) पर उसे जीत मिली और उसे देश में पड़े कुल वोटों का सिर्फ 3.2 फीसदी वोट मिला. यह 1964 में सीपीआई (एम) की स्थापना के बाद से अब तक का सबसे कम वोट प्रतिशत है.
ऐसा लगता है कि पार्टी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तर्ज पर 50 साल में सवा तीन कोस चल पाई है. पार्टी की राजनीतिक ढलान साफ दिख रही है. पश्चिम बंगाल, जहां सीपीआई (एम) के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 1977 से 2011 तक एकछत्र राज किया और जो किसी जमाने में अभेद्य लाल दुर्ग समझा जाता था, वहां की राजनीति में वह क्रमश: अप्रासंगिक होने की ओर बढ़ती दिख रही है. पश्चिम बंगाल में पार्टी के वोटों में जिस तेजी से क्षरण हो रहा है, वह चौंकानेवाला है. पार्टी को राज्य में 2009 के आम चुनावों में 33.1 फीसदी, 2011 के विधानसभा चुनावों में 30 फीसदी और 2014 के आम चुनावों में मात्र 22.7 फीसदी वोट मिले.

इसके उलट राज्य में भाजपा के वोटों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. यह जले पर नमक छिड़कने जैसा है. लेकिन सच यही है कि बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच हो रहे ध्रुवीकरण में सबसे ज्यादा नुकसान सीपीआई (एम) को हो रहा है. इसी के राजनीतिक आधार से समर्थकों के अलावा कार्यकर्ता और स्थानीय स्तर के नेता भी भाजपा की ओर जा रहे हैं. नतीजा, पार्टी 2014 के आम चुनावों में राज्य की 42 सीटों में से मात्र दो सीटें जीत पाई, जितनी सीटें राज्य की राजनीति में हाशिए की पार्टी समझी जानेवाली भाजपा को मिलीं. यहां तक कि पार्टी ने 1964 में स्थापना के बाद 1967 में अपने पहले लोकसभा चुनाव में भी यहां से चार सीटें जीती थीं.

पार्टी के दूसरे गढ़ केरल में भी स्थिति अच्छी नहीं है. वहां की बीस सीटों में से वाम-लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) को कुल 8 सीटें सीपीआई (एम) को पांच) सीटें मिलीं, जबकि पार्टी इस बार वहां से इसकी दुगुनी सीटें जीतने की उम्मीद कर रही थी. केरल में लगभग एक नियम की तरह हर पांच साल में एक बार सीपीआई (एम) के नेतृत्ववाले एलडीएफ और एक बार कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ को सत्ता और सीटें मिलती हैं. इस कारण पार्टी इस बार यहां से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर रही थी, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी. उल्लेखनीय है कि केरल में 2011 के विधानसभा चुनावों में एलडीएफ बहुत मामूली अंतर से हार गया था.

लेकिन राज्य में पार्टी के करिश्माई नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन (1964 में गठित पार्टी के 32 प्रमुख नेताओं में से जीवित बचे दो नेताओं में से एक) और राज्य सचिव पिनराई विजयन के बीच दो धड़ों में बंट गई है. पिछले दस सालों से ज्यादा समय से दोनों नेताओं के बीच तीखे संघर्ष और खींचतान के कारण पार्टी का हाल बेहाल है. इसका नतीजा हाल के आम चुनावों में दिखाई पड़ा. लेकिन पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व इस झगड़े को आज तक सुलझा नहीं सका है. इस कारण भाजपा यहां भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.

सीपीआई (एम) के लिए अगर कोई राहत की बात है तो वह यह कि उत्तर पूर्व के राज्य त्रिपुरा में पार्टी की मजबूत पकड़ बनी हुई है. विधानसभा चुनावों के साथ 2014 के लोकसभा चुनावों में सीपीआई (एम) ने राज्य की दोनों सीटें 64 फीसदी वोट के साथ जीत लीं. लेकिन इसे पार्टी से ज्यादा राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार और उनकी साफ-सुथरी छवि और बेहतर सरकार की जीत माना जा रहा है. यही नहीं, अपने ज्यादा मजबूत गढ़ों में पिट गई सीपीआई (एम) के लिए यह भले सांत्वना पुरस्कार की तरह हो, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में त्रिपुरा की जीत के कोई बहुत मायने नहीं हैं. इस जीत से पार्टी के दिन नहीं
बहुरनेवाले हैं.

सीपीआई (एम) को इतने गंभीर वैचारिक-राजनीतिक संकट से उस समय भी नहीं गुजरना पड़ा था, जब 1964 में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) टूटी थी

असल में, देश के तीन राज्यों- पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा की राजनीति में सबसे प्रभावी और ताकतवर पार्टी होने के कारण राष्ट्रीय राजनीति और खासकर गैर कांग्रेसी-गैर भाजपा तीसरे मोर्चे के अंदर सीपीआई-एम की जो हैसियत रही है, वह पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी की राजनीतिक फिसलन के कारण तेजी से ढलान की ओर है. याद रहे कि पार्टी के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 2004 के आम चुनावों में अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था और उसे कुल 60 सीटें मिलीं थीं. इस कारण उसकी यूपीए सरकार बनवाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही और इस सरकार में शामिल न होते हुए भी वह लगभग ड्राइवर की सीट पर थी.

हालांकि 543 की लोकसभा में 60 सीटें 10 फीसदी से कुछ ही ज्यादा बनती हैं, लेकिन तथ्य यह है कि वास्तविक संसदीय मौजूदगी की तुलना में सीपीआई (एम) और वाम मोर्चे का राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कहीं ज्यादा दिखाई पड़ा. यह एक अवसर था जब पार्टी और उसके नेतृत्व में वाम मोर्चा एक लंबी राजनीतिक छलांग लगा सकता था. इसके लिए जरूरी था कि पार्टी अपने राजनीतिक प्रभाव के प्रमुख तीन राज्यों की सीमा को तोड़कर देश के अन्य हिस्सों खासकर हिन्दी पट्टी में विस्तार करे. पार्टी कांग्रेस में यह फैसला भी  किया गया. पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने खुद आगे बढ़कर इसकी जिम्मेदारी भी ली.

लेकिन 2004 से लेकर 2014 के बीच देश और खासकर हिन्दी क्षेत्रों में पार्टी के विस्तार का लक्ष्य तो दूर रहा, सीपीआई (एम) ने अपने मजबूत किले भी गंवा दिए. आखिर ऐसा क्यों हुआ? कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कोई एक कारण नहीं है, लेकिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारण सीपीआई-एम का राजनीतिक-वैचारिक विचलन और रणनीतिक भूलें हैं. पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में एक ओर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध किया, लेकिन दूसरी ओर, केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार को उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने दिया. यही नहीं, खुद पश्चिम बंगाल में उन्हीं नीतियों को जोर-जबरदस्ती लागू करने की भी कोशिश की.

सिंगुर और नंदीग्राम में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने पार्टी के समर्थन से जिस तरह लाठी-गोली के जरिए जमीन छीनने की कोशिश की, उसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा. यही नहीं, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार की राजनीतिक-प्रशासनिक नाकामियों, जैसे पीडीएस घोटाला, रिजवानुर रहमान हत्याकाण्ड, सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की सबसे बदतर स्थिति का सामने आना और जंगलमहाल इलाके में दमन आदि ने वाम मोर्चे की पहले से ही घटती लोकप्रियता को और नीचे धकेल दिया. यही नहीं, पार्टी में जिस तरह से गुंडे, लम्पट, ठेकेदार, दलाल और भ्रष्ट तत्व घुस आए और जिला मुख्यालय से लेकर ग्राम पंचायत तक पार्टी के चेहरे बन गए और समानांतर सरकार चलाने लगे, उससे आम लोगों में नाराजगी बढ़ी.

हालांकि पार्टी ने ऐसे तत्वों को बाहर निकालने के लिए ‘शुद्धिकरण अभियान’ चलाया, लेकिन वह आंख में धूल झोंकने की कोशिश ही साबित हुई. असल में तीन दशकों से ज्यादा समय तक सत्ता में रही पार्टी में जिस तरह का अहंकार और निश्चिन्तता आ गई, उसने पार्टी में किसी तरह के बदलाव की संभावना खत्म कर दी. यहां तक कि सीपीआई (एम) का राज्य और केन्द्रीय नेतृत्व किसी भी तरह की आलोचना सुनने को तैयार नहीं था, विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया. पार्टी ने उन वाम बुद्धिजीवियों और छोटी पार्टियों की आलोचनाओं और विरोध का जवाब दमन से दिया, जो उनसे सहानुभूति रखते थे. पार्टी नेतृत्व के इस रवैये ने उसे डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

लेकिन सीपीआई (एम) का मौजूदा संकट सिर्फ पश्चिम बंगाल-केरल में पराजय के कारण भर नहीं है. राजनीति में हार-जीत चलती रहती है. भाजपा 1984 के आम चुनावों में सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी, लेकिन अगले डेढ़ दशक में वह गठबंधन के जरिए केंद्र की सत्ता में और तीन दशकों में अकेले दम पर दिल्ली की सरकार में पहुंच गई. सीपीआई-एम का संकट कहीं ज्यादा गहरा और बड़ा है. उसका संकट यह है कि वह इन 50 सालों में वाम राजनीति को तीन राज्यों से बाहर नहीं ले जा पाई. उलटे इन राज्यों के बाहर जैसे आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसका प्रभाव लगातार सिकुड़ता और सिमटता गया है.

सीपीआई-एम की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही

खासकर हिन्दी क्षेत्रों में वह जिस तरह से सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीति को त्यागकर सत्तालोलुप, भ्रष्ट, परिवारवादी-जातिवादी और अवसरवादी राजनीति करनेवाली मध्यमार्गी पार्टियों और उनके नेताओं की पिछलग्गू बन गई, उसके कारण उसका विस्तार तो दूर, जो जनाधार बचा था, वह भी उनका साथ छोड़कर मुलायम-लालू के साथ चला गया. सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर सीपीआई (एम) ने जिस तरह से सामाजिक न्याय के नारे के नीचे जातियों की गोलबंदी और जोड़-गुणा की रणनीति को आगे बढ़ाया, उसकी सीमाएं और अंतर्विरोध शुरू से ही जाहिर थे, लेकिन बुरी तरह पिट जाने के बावजूद वह आज तक इस रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है.

असल में, सीपीआई (एम) की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही. आश्चर्य नहीं कि पार्टी एक पेंडुलम की तरह पहले कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने के लिए गैर कांग्रेसी पार्टियों और यहां तक कि रणनीतिक रूप से भाजपा के साथ गलबहियां करने तक पहुंच गई और उसके बाद भाजपा के उभार को रोकने के नाम पर कांग्रेस के साथ ब्रेकफास्ट/डिनर करने लगी. इस रणनीति पर चलते-चलते एक दौर ऐसा आया कि सीपीआई (एम) और बाकी मध्यमार्गी पार्टियों के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया.

यही नहीं, इस प्रक्रिया में सीपीआई (एम) एक रेडिकल बदलाव की वामपंथी-कम्युनिस्ट पार्टी के बजाय सरकारी वामपंथी पार्टी में बदलती गई, जहां उसका सबसे ज्यादा जोर पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा की सरकारों को बचाए रखने में लगने लगा. सरकार चलाने और उसे बनाए रखने के लिए वह मुद्दों को भी कुर्बान करने लगी. इसके कारण वह धीरे-धीरे अपने रेडिकल एजेंडे और मुद्दों को छोड़कर यथास्थितिवादी सरकारी पार्टी में तब्दील होती चली गई. पार्टी नेतृत्व में ऊपर से लेकर नीचे तक नौकरशाही हावी होने लगी, पार्टी जनसंघर्षों से दूर होने लगी, यहां तक कि खुद के शासित राज्यों में जनान्दोलनों के दमन पर उतर आई.

इसके साथ ही उसमें वह चमक और आकर्षण भी खत्म होने लगा, जो किसी भी वामपंथी/कम्युनिस्ट पार्टी के रेडिकल बदलाव के एजेंडे में सहज रूप से होता है. हैरानी की बात नहीं है कि सीपीआई (एम) की राजनीति और वैचारिकी आज छात्रों-युवाओं को उस तरह से आकर्षित नहीं कर पा रही है, जिस तरह से कुछ दशक पहले तक करती थी. इससे ज्यादा चौंकानेवाली बात क्या हो सकती है कि तीन राज्यों से बाहर उसकी ताकत और प्रभाव का चौथा राज्य माने जानेवाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उसके छात्र संगठन-एसएफआई में पार्टी की राजनीतिक लाइन के खिलाफ खुला विद्रोह हो गया और पार्टी को पूरी यूनिट को भंग करना पड़ा.

इस सबके बीच ज्यादा चिंता की बात यह है कि अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक और वैचारिक रूप से अप्रासंगिक होने के खतरे का सामना कर रहे सीपीआई (एम) के नेतृत्व में इस खतरे को लेकर कोई बेचैनी नहीं दिख रही है और न ही उससे निपटने की रणनीति, तैयारी और उत्साह है. उल्टे लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश-भर में वाम कार्यकर्ताओं के बीच पैदा हुई पस्त-हिम्मत, निराशा और हताशा के बीच वाम मोर्चे खासकर सीपीआई (एम) नेतृत्व की निश्चिन्तता और जैसे कुछ हुआ ही न हो (बिजनेस एज यूजुअल) का रवैया हैरान करनेवाला है.

अफसोस की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विचार और मुद्दे को जिस सिनिकल तरीके से कांग्रेस और दूसरी मध्यमार्गी पार्टियों के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवाद और निक्कमेपन को छुपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, उसके लिए सीपीआई (एम) कम जिम्मेदार नहीं है. इससे आज धर्मनिरपेक्षता का विचार संकट में है. कहने की जरूरत नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के विचार को आम लोगों के रोजी-रोटी और बेहतर जीवन के बुनियादी सवालों और बेहतर प्रशासन की जिम्मेदारी से काटकर सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए जोड़-तोड़ का पर्याय बना देने की सिनिकल राजनीति अब अपने अंत पर पहुंच गई है.

लेकिन अगले साल अप्रैल में पार्टी कांग्रेस की तैयारी कर रही सीपीआई (एम) से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे यह आशंका बढ़ रही है कि भाजपा के जबरदस्त उभार के बाद अपनी गलतियों उर्फ ऐतिहासिक भूलों से सीखने के बजाय वह एक बार फिर चुकी और नकारी हुई कांग्रेस और दूसरी अवसरवादी मध्यमार्गी पार्टियों का गठबंधन बनाने की कोशिशें शुरू कर सकती है. यह आत्महत्या के अलावा और कुछ नहीं होगा. आम चुनावों का साफ सन्देश है कि लोग अस्मिताओं की अवसरवादी, संकीर्ण और सिनिकल राजनीति से ऊब रहे हैं, उनकी आकांक्षाएं बेहतर जीवन की मांग कर रही हैं और वे वैकल्पिक राजनीति को मौका देने के लिए तैयार हैं.

अगर सीपीआई (एम) अब भी नहीं संभली, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुकी थी, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है

यह सीपीआई (एम) के लिए सबक है और आखिरी मौका भी. अगर वे अब भी नहीं संभले, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुके थे, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय राजनीति में वामपंथ के पुनर्जीवन का कोई शार्ट-कट नहीं है. वामपंथ के लिए एकमात्र रास्ता खुद को वामपंथ की स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ा करना ही है. वामपंथ को वामपंथ की तरह दिखना होगा.
वामपंथ की पहचान और ताकत जनान्दोलन रहे हैं और जनान्दोलनों से ही वैकल्पिक राजनीति और विकल्प बने हैं. लेकिन क्या सीपीआई (एम) इसके लिए तैयार है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् हैं)

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