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थप्पड़ों ने लौटाया आत्मविश्वास

रत्नदीप नौटियाल, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और मुंबई में रहते हैं  

‘कभी नहीं भूल सकता वो मंजर’

मुझे याद आ रहा है, वह जून महीने की 14 तारीख थी और एफआरआई देहरादून में हम इस चर्चा में मुब्तिला थे कि अगर हम प्रकृति को नहीं समझेंगे तो प्रकृति हमें अपने तरीके से समझाएगी. इस बात को तीन ही दिन बीते थे कि रुद्रप्रयाग से पापा का फोन आया,  

‘स्वर्णा की कहानी नौकरानी से उघमी होने की कहानी है’

हम दोनों एक ही उम्र के थे और साथ-साथ बढ़े हुए थे. बचपन में हम आधी बनी इमारत के सामने मौजूद रेत के टीलों पर खेला करते थे.11 साल की स्वर्णा बिलकुल मेरी तरह थी. हर सुबह वह मुझे रेत के टीलों के पास बच्चा-गाड़ी को खींचते हुए एक बच्चे