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‘समाज व संगठनों का भी पतन हुआ, छात्र राजनीति इससे अलग नहीं’

यह सही है कि छात्र राजनीति की पहली प्राथमिकता अध्ययन है, लेकिन जो सामाजिक-राजनीतिक समस्याएं हैं, उन पर भी निगाह रखनी चाहिए और सभी विचारधाराओं से परिचित होना चाहिए. छात्रों के अपने कर्तव्य और अधिकार हैं. राष्ट्र या समाज के समक्ष कोई गंभीर समस्या आने पर छात्रों को देश सेवा  

संघ के गले में अटक जाएंगे आम्बेडकर

राष्ट्र निर्माता के रूप में बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर की विधिवत स्थापना का कार्य 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की राजपत्र में की गई घोषणा के साथ संपन्न हुआ. संविधान दिवस संबंधी भारत सरकार के गजट में सिर्फ एक ही शख्सियत का नाम है और वह नाम स्वाभाविक रूप  

‘प्रधानमंत्री जितने का चश्मा पहनते हैं, उतने में तो कितने बच्चों का पेट पल सकता है’

बच्चों की सुरक्षा और परवरिश के लिए सरकार जो कुछ भी कर रही है, वह बिल्कुल पर्याप्त नहीं है. क्योंकि पूरे देश बच्चों की हालत बहुत खराब है. बच्चों के लिए इस बार का बजट बेहद खराब रहा. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट घटाकर आधा कर दिया गया.  

कल कोई 14 साल का बच्चा अपराध करता है तो क्या कानून में फिर से बदलाव करेंगे?

दिल्ली में पिछले दिनों एक ढाई साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना, जिसमें 16-17 के दो युवकों के शामिल होने का आरोप है, के बाद फिर से यह मांग जोर पकड़ने लगी थी कि किशोर न्याय अधिनियम में जघन्य अपराधों में लिप्त किशोर की उम्र 18 से घटाकर  

बेहतर समाज बनाने की जिम्मेदारी हमारी ही है

बच्चों के साथ होने वाले अपराध इन दिनों सुर्खियों में हैं. लोग आक्रोशित होते हैं, राजनीतिक लोगों में इस जनाक्रोश को भुनाने की होड़ लगती है, तरह-तरह की बयानबाजी की जाती है और फिर कुछ दिनों में सब कुछ शांत. यही होता आ रहा है. बात इससे आगे बढ़ ही  

‘बच्चों को न्याय दिलाने के लिए अभी भी बहुत काम बाकी है’

जब मैं बच्चों की सुरक्षा से जुड़े अपने काम के बारे में सोचती हूं तो मेरे मन में तीन अलग-अलग मामले सामने आते हैं जिन्होंने मेरी जिंदगी पर गहरी छाप छोड़ी. इनसे मैंने सीखा कि बाल यौन उत्पीड़न के मामले में खुलासे से लेकर न्यायिक प्रक्रिया तक का माहौल कितनी  

पटेल आरक्षण चाहते हैं या सिर्फ आंदोलन

इस समय पटेल आंदोलन क्यों शुरू हुआ? क्या ये सच में पटेलों के लिए आरक्षण पाने की मुहिम है या ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण को खत्म करने की साजिश? शुक्र है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक फिलहाल इस आंदोलन की आंच नहीं पहुंची. क्या यह आंदोलन नरेंद्र मोदी  

घबराए वामपंथी चला रहे राजनीतिक मुहिम

भारतीय संस्कृति और दर्शन का एक सूत्र-वाक्य है ‘नेति-नेति’, जिसका अर्थ होता है यह भी नहीं वह भी नहीं. अर्थात भारतीय समाज प्रकृति से प्रयोगधर्मी और विमर्शात्मक है. संक्षेप में शास्त्रार्थ हमारी सभ्यताई परंपरा है, इसलिए प्रयोगधर्मिता और विमर्शात्मकता बनी रहनी चाहिए और इस पर चोट करने वाली किसी भी  

मुसलमान-वध वर्णाश्रम की जरूरत है!

ऐसा लग ही नहीं रहा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसी भी मोर्चे पर नाकाम है. न ये कि कोई भी चुनावी वादा ऐसा है जो अधूरा रह गया है. चारों दिशाओं से आ रही मुसलमानों की बेरहम हत्याओं ने जश्न का कुछ ऐसा समां बांधा है, मानो  

संस्थाओं को नष्ट कर रही मोदी सरकार

मुझे लगता है कि देश में अभी जो निजाम है वो संस्थाओं को पोषित या प्रोत्साहित करने की बजाय नष्ट करने में लगा है. जिस दल की अभी सरकार है आप उसका इतिहास देखिए तो उसने एक भी संस्थान नहीं बनाया. जो संस्थाएं पहले से थीं, उनको मिटाने पर लगे