मजबूत भी मजबूर भी

nitish kumar

बिहार में विधानसभा चुनाव सामने है. हालांकि इसमें अभी तकरीबन तीन महीने का समय है लेकिन चुनाव की खुमारी अभी से परवान चढ़ने लगी है. पोस्टर वार और बयानों की जंग से राज्य का माहौल गरमा रहा है. चुनाव आयोग ने बिहार के चुनाव को ‘मदर आॅफ इलेक्शन’ कहा है. इस बार होने वाला बिहार का चुनाव अब तक हुए सभी चुनावों में दिलगोचस्प होने जा रहा है. दो ध्रुव में बंटकर जिगरी दोस्त रहे कई दल, कई नेता आपस में भिड़ने को तैयार हैं, या यूं कहें कि भिड़ना शुरू कर चुके हैं. केंद्र में नीतीश कुमार हैं. सब से ज्यादा निगाहें उन पर ही हैं कि उनका क्या होगा? यह सवाल सहज और स्वाभाविक भी है. नीतीश कुमार हालिया दिनों में बिहार में सिर्फ एक नेता, एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं उभरे, बल्कि अंधेरे में उम्मीदों की तरह भी नजर आए. उनका राजनीतिक कद इस कदर बढ़ गया था कि वे देश के प्रधानमंत्री पद तक के दावेदार माने जाने लगे थे. परोक्ष तौर पर उस रेस में उनके चहेतों ने, उनके लोगों ने शामिल भी करवा दिया. हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से हुए उनके विवाद से उनकी छवि भी काफी प्रभावित हुई.

बहरहाल इन दिनों नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक पारी की सबसे मुश्किल लड़ाई में फंस गए हैं. बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर उन्हें मिल सकेगी या नहीं, यही उनकी लड़ाई और  उनकी राजनीतिक कमाई का सबसे प्रमुख एजेंडा हो गया है. उन्हें भी मालूम है कि इस बार के बिहार चुनाव में अगर वे परास्त हुए तो फिर परिस्थितियां ऐसी हैं या होने वाली हैं कि उन्हें दोबारा इस तरह दम लगाने और खम ठोंकने का मौका आसानी से नहीं मिलने वाला. नीतीश की जो तैयारियां हैं, संभव है वे चुनाव जीत भी जाएं, लेकिन क्या वे इस बार का चुनाव जीतकर भी जीतने जैसा अनुभव करेंगे? संभव है कि वे मुख्यमंत्री फिर से बन जाएं, लेकिन क्या वे दुबारा वही नीतीश कुमार बन पाएंगे, जिनकी राजनीति, सोच और कार्यप्रणाली की वजह से बदनाम बिहार ने देश को उम्मीद की एक किरण दिखाई थी और यह संभावना बनी थी कि इस जमाने में भी नेताओं के बीच से स्टेटसमैन पैदा होने की गुंजाइश शेष बची हुई है. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर दसवें साल में प्रवेश कर चुके हैं. बीच में कुछ माह को छोड़कर, जब उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री का पद सौंपा. नीतीश कुमार ने जब मांझी को पद सौंपा तब भी और जब मांझी से पद ले लिया तब पहले प्रशंसा हुई, बाद में उन्हें चौतरफा आलोचना भी झेलनी पड़ी. प्रशंसा की भी वजह थी. यह राजनीति की एक जरूरत थी. दोनो ही कदम नीतीश कुमार ने मजबूरी में और खुद को मजबूत बनाने के लिए भी उठाए. फिलहाल राज्य में एक अदद नेता की तलाश में भटकती भाजपा और दूसरे दलों में विकल्पहीनता वाले इस दौर में विकल्पहीन नेता बनकर नीतीश कुमार पूरे दम-खम के साथ मैदान में हैं और विकल्पहीनता की स्थिति ही उनके लिए जीत की सबसे बड़ी उम्मीद भी दे रही है. लेकिन सवाल यही है कि क्या वे जीतकर भी नायक बन पाएंगे?

सत्ता में एकाध पारी और खेलकर भी क्या नीतीश कुमार अपनी उसी प्रतिष्ठा को वापस अर्जित कर सकेंगे, जिसकी उम्मीद उनसे की जाती थी या एक सामान्य मुख्यमंत्री भर बनकर रह जाएंगे, जैसा कि देश के दूसरे राज्यों में हैं और पारी दर पारी सत्ता संभाल रहे हैं. यह सवाल बिहार में और बिहार के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि पिछले एक साल में ही नीतीश कुमार की साख तेजी से गिरी है. सत्ता के समीकरण साधने और भविष्य में संभावनाओं को बनाने के लिए वे पल-पल इतने पाले बदलते नजर आए कि वैसा खेल राजनीति में बहुत ही सामान्य माना जाता है. बिहार में नीतीश के लिए यह चुनाव सिर्फ जीत-हार के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इस बार उनके व्यक्तित्व-कृतित्व का आकलन खुद उनके मुकाबले ही होना है. अब तक उनका आकलन लालू और लालू-राबड़ी शासनकाल के मुकाबले किया जाता था. तब नीतीश अतुलनीय लगते थे, लेकिन अब वह लालू यादव के साथ हैं. लोकसभा चुनाव में तो नरेंद्र मोदी की आंधी की वजह से नीतीश दूसरे राज्यों की तरह भहराकर गिर गए.

अब विधानसभा चुनाव में असली परीक्षा होनी है कि क्या वे बिन भाजपा के भी उतने ही मजबूत हैं, जितने पिछले एक दशक से रहे हैं! जीत-हार के साथ ही कई और चीजों का आकलन भी होगा, मसलन क्या विनम्र नीतीश में जब-तब जो अहंकार हावी होता है, वह अब नहीं दिखेगा! क्या अब तक कई बार कथनी और करनी का जो फर्क दिखता रहा है, वह नहीं दिखेगा! क्या सिर्फ खुद की छवि साफ रखते हुए भी गलत किस्म के लोगों से छुटकारा नहीं पा सकने की विडंबना से वे मुक्ति पाने की कोशिश करेंगे! क्या अब तक नीतीश कुमार के जो संगी-साथी एक-एक कर उन्हें छोड़कर जाते रहे हैं या छोड़ने को मजबूर होते रहे हैं, वह सिलसिला रुक जाएगा!

ऐसे ही कई और सवाल हैं, जो नीतीश कुमार के लिए अब उठ रहे हैं और आगे भी उठते रहेंगे. इस चुनाव में पाॅपुलर पॉलिटिक्स करने के बावजूद ये सवाल उनके सामने बने रहेंगे और वही चुनौती भी होगी, जिससे उन्हें पार पाना होगा. संभव है नीतीश जीत हासिल कर लें, यह भी संभव है कि पहले से भी बड़ी जीत हासिल कर लें, लेकिन पिछले दस साल में जो सवाल उनसे जुड़े हुए हैं, जो चूक उनसे हुई है या वे करते रहे हैं, वे सारे के सारे इस चुनाव में भी उनके सामने आ सकते हैं.

भाजपा :  तब क्यों जुटे-अब क्यों हटे!

नीतीश कुमार इस चुनाव में सीधे-सीधे भाजपा से लड़ रहे हैं. लोकसभा चुनाव में भी वे भाजपा से लड़े थे लेकिन साथ ही लालू प्रसाद यादव से भी लड़ाई जारी रखे हुए थे. कायदे से यह पहला मौका ही होगा, जब उनकी पूरी ऊर्जा अपने उस जिगरी दोस्त से लड़ने में लगेगी, जिससे करीब डेढ़ दशक का साथ रहा और करीब आठ साल तक उन्होंने सत्ता का सुख भी भोगा. अब उसी भाजपा की वजह से अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ने को मजबूर हुए नीतीश कुमार के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि आज अगर राज्य में भाजपा उन्हें चुनौती देने की स्थिति में है तो इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार तो नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि नीतीश से जुड़ने से पहले तक भाजपा का दायरा दक्षिण बिहार, जो अब झारखंड है, में सिमटा रहता था. नीतीश से मिलने के बाद ही भाजपा का बिहार में दायरे का विस्तार शुरू हुआ. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा से गठजोड़ के बाद ही नीतीश कुमार बिहार में सत्ता पाने लायक नेता बनने की ओर अग्रसर होना शुरू हुए.

‘नीतीश कुमार को भोज रद्द नहीं करना चाहिए था. यह तो ऐसे भी बहुत भद्दी बात थी कि किसी को अपने घर खाने पर बुलाकर उसे अपमानित कर भोज रद्द कर देना. और फिर जब एक बार इतनी तल्खी बढ़ा ही दी थी तो फिर भाजपा के साथ बने रहने का कोई औचित्य नहीं था, उसे छोड़ देना चाहिए था’

शिवानंद तिवारी, पूर्व जदयू नेता

अब जब वह भाजपा को देश तोड़ने वाली पार्टी से लेकर सांप्रदायिकता का जहर फैलाने वाली पार्टी तक बोल रहे हैं, और बार-बार यह भी बता रहे हैं कि कैसे जनता पार्टी से लेकर बीपी सिंह सरकार तक को गिराने का खेल भाजपा करती रही है, तब यह सवाल उठता है कि क्या नीतीश यह सब पहले से नहीं जानते थे. क्या भाजपा एकबारगी से ऐसा हो गई. भाजपा के साथ नीतीश का जुड़ाव तब हुआ था जब भाजपा एक तरीके से अछूत सी थी. बाबरी विध्वंस के बाद तक भाजपा अछूत ही मानी जाती थी. लेकिन उसके पक्ष में हिंदुत्व की लहर का उभार हुआ था. तो क्या यह माना जाना चाहिए कि नीतीश भी उसी हिंदुत्व की लहर पर सवार होने के लिए भाकपा माले जैसे वामपंथी सहयोगी का एक झटके में साथ छोड़कर सीधे नब्बे डिग्री पर पाला बदलते हुए दक्षिणपंथी भाजपा के साथ हो गए थे. बात सिर्फ तब जुड़ने की भी होती तो एक बात होती. उसके पक्ष में नीतीश के पास तर्क रहता है कि भाजपा से उन्होंने एजेंडे पर सहमति बना ली थी तब भाजपा को सांप्रदायिकता से दूर कर दिया था. लेकिन गोधरा कांड के बाद इसे लेकर खूब आलोचना हुई.

भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा फिर से उजागर हुआ लेकिन नीतीश तब भी साथ बने रहे. इसका जवाब नीतीश के पास अब तक नहीं होता. भाजपा से राहें अलग करने की बात इतनी ही नहीं रही. उनका अलगाव भाजपा के नाम पर नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के नाम पर शुरू हुआ. इसके लिए वे आडवाणी को ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने में ऊर्जा लगाने लगे, जैसे आडवाणी भाजपा के विचारों से अलग कोई दूसरे नेता हो. बाबरी विध्वंस के लिए रथ यात्रा के जरिए माहौल बनाने वाले आडवाणी, नीतीश कुमार के लिए बेहतर नेता बनते गए, मोदी से उनकी दूरी बनती गई और एक समय ऐसा आया जब मोदी के नाम पर उन्होंने पटना में भाजपा नेताओं को दिए भोज तक रद्द कर दिया. हालांकि उसके बाद भी नीतीश के लोग यह बताने की कोशिश करते रहे कि भाजपा के साथ वे इसलिए जुड़े हैं, क्योंकि उन्हें देश बनाना है, बिहार बनाना है और लालू-राबड़ी के आतंक राज से बिहार को मुक्त रखना है. धीरे-धीरे वह भाजपा को छोड़ नरेंद्र मोदी से दुश्मनी जैसा रिश्ता निभाने लगे. भाजपा से रिश्ते का यह एक टर्निंग पॉइंट था. नीतीश कुमार के साथ रहे नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि भोज रद्द ही नहीं करना चाहिए था.

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अपने से दूरी नीतीश कुमार के कभी बहुत करीबी रहे जीतन राम मांझी ही अब उनके सबसे बड़े दुश्मन हो गए

इससे पूरे बिहार में संदेश गया कि नीतीश व्यक्तिगत तौर पर अहंकारी नेता हैं और दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरक्की से उन्हें सौतिया डाह हो गया है, इसलिए उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के सहायतार्थ आए पैसे भी लौटाए और भोज भी रद्द कर दिया. तिवारी कहते हैं, ‘यह तो ऐसे भी बहुत भद्दी बात थी कि किसी को अपने घर खाने पर बुलाकर उसे अपमानित कर भोज रद्द कर देना. और फिर जब एक बार इतनी तल्खी बढ़ा ही दिया था तो फिर भाजपा के साथ बने रहने का कोई औचित्य नहीं था, उसे छोड़ देना चाहिए था.’

यह बात सही है कि नीतीश कुमार को इतनी तल्खी के बाद भाजपा का साथ छोड़ देना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने दूसरे रास्ते निकाले. वे नरेंद्र मोदी को अछूत साबित करने में लगे रहे. वे मोदी से हाथ मिलाने और उनके साथ फोटो खिंचवाने से भी बचते रहे. यह नीतीश कुमार की बड़ी भूल थी. ऐसा व्यावहारिक तौर पर होता नहीं कि आप एक पूरे परिवार से मेल रखने की कोशिश करें और उसके सबसे प्रिय सदस्य को ही गालियां देते रहे. भाजपा नीतीश को तब ही समझ चुकी थी, जब वह उनके साथ जुड़ी थी. इसलिए वह शुरू से ही अपने दायरे के विस्तार के अभियान में लगी रही जबकि नीतीश भाजपा से जुड़कर इतने निश्चिंत हुए कि अपनी पार्टी के विस्तार तक की चिंता छोड़ पूरी तरह भाजपा पर आश्रित होते चले गए. नतीजा यह हुआ कि नीतीश द्वारा भोज वगैरह रद्द होने और मोदी से दुश्मनी का रिश्ता शुरू करने के बाद 2010 में जब बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो 141 सीटों पर चुनाव लड़कर नीतीश की पार्टी ने 115 पर जीत हासिल की जबकि भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 को अपने खाते में कर लिया था. उसके एक साल पहले जब लोकसभा चुनाव हुआ था तो भी भाजपा ने नीतीश के साथ रहते ही 40 में से 12 सीटों पर कब्जा जमा लिया था. यह नीतीश के लिए खतरे की घंटी थी.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी को अछूत साबित करने में लगे रहे. वे मोदी से हाथ मिलाने और उनके साथ फोटो खिंचवाने से भी बचते रहे. यह नीतीश कुमार की बड़ी भूल थी 

नीतीश के साथ रहते ही भाजपा ने अपनी यह ताकत दिखा दी थी. बाद में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद वह भाजपा से अलग ही हो गए. तब बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में क्या परिणाम आया, यह सबने देखा-जाना. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में नीतीश को वहां पहुंचा दिया, जहां पहुंचने के बाद लालू यादव तक ने भी उनसे बढ़त ले ली और उनकी राह में सिर्फ और सिर्फ रोड़े ही रोड़े बच गए. उनके पास सिर्फ एक विकल्प बचा कि वे राजनीतिक जिंदगी में एक बार फिर से यू टर्न लें और उन्हीं लालू यादव से जा मिले, जिनका विरोध कर और जिन्हें एक जिंदा खलनायक के तौर पर मजबूत कर वे वर्षों खुद को मजबूत करने की सियासत करते रहे थे. इस स्थिति तक पहुंचने में भाजपा के समानांतर ही नीतीश की भी भूमिका रही.

मांझी प्रयोग : क्यों बनाया, क्यों हटाया

2014 में लोकसभा चुनाव के पहले अपने सबसे बड़े दुश्मन नरेंद्र मोदी की वजह से वर्षों के प्यार के बाद यार से दुश्मन बनी भाजपा से जब नीतीश का अलगाव हुआ तो उन्हें भरोसा था कि वे खुद के दम पर लोकसभा चुनाव की नैया पार कर लेंगे. इतना ही भरोसा नहीं, उन्हें यह भी विश्वास था कि वे भाजपा और लालू  दोनों को एक साथ परास्त कर देंगे. लेकिन भाजपा भारी जीत हासिल करने में कामयाब रही और हाशिये की ओर जाते लालू भी नीतीश की पार्टी से ज्यादा बढ़त हासिल करने में सफल हो गए. यह नीतीश के लिए दोहरा झटका था. नए दुश्मन से भी हार और पुराने दुश्मन से भी हार. तब उन्होंने नैतिकता की दुहाई दी, एक बड़ा प्रयोग किया. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और बहुत सोच-विचारकर, कई उपलब्ध विकल्पों में से सबसे भरोसेमंद और आसानी से हैंडल किए जाने लायक नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया.

नीतीश तब भी गलती कर रहे थे. पार्टी के अंदर खूब हो-हल्ला मचा. इसके बावजूद नीतीश लोकसभा चुनाव हारकर भी बड़ी जीत हासिल करते दिखे. अपने इस साहसिक और ऐतिहासिक फैसले से वे बडे़ नायक बने. नीतीश ने लगे हाथ उत्साह में ऐलान किया कि वे अब संगठन का काम देखेंगे और सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. तब दुनिया में नीतीश की तारीफ हो रही थी. तारीफ सुनने के आदि और अभ्यस्त हो चुके नीतीश तब फूले नहीं समा रहे थे. बेशक यह एक बड़ा प्रयोग था. बड़े साहस का काम भी लेकिन नीतीश तब कुछ बातों को भूलकर यह प्रयोग कर रहे थे. जीतनराम मांझी के बारे में उन्हें जानकारी थी कि वे अच्छे दिनों का साथ देने वाले नेता रहे हैं. जब कांग्रेस के बेहतर दिन थे, मांझी कांग्रेस के साथ थे. राजद के अच्छे दिन आए थे तो मांझी राजद वाले थे और जब नीतीश कुमार के अच्छे दिन आने वाले थे तब मांझी उनके पाले में आ गए थे. यानी मांझी अच्छे दिनों में साथ रहने के अभ्यस्त नेता थे. नीतीश यह भूल गए थे कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश की बजाय बेहतर संभावनाओं को ज्यादा तरजीह देंगे. इसमें कोई बुराई भी नहीं थी, क्योंकि यही काम नीतीश भी करते रहे थे. जब उन्हें जरूरत थी तब वाम दलों के साथ राजनीति करते और जब जरूरत पड़ी थी भाजपा के साथ आ गए थे. मांझी ने वही किया, जो होना तय था. इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी कि मांझी एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे लेकिन नीतीश कुमार लगातार मांझी मामले को डील करने में चुकते गए.

मांझी उस समुदाय के नेता थे या हैं, जिस समुदाय को राजनीतिक स्वर देने का काम लालू यादव के बाद नीतीश ने ही किया. नीतीश ने ही दलितों में से भी ‘महादलितों’ को अलग कर एक नई धारा बहाई. मांझी उसी धारा के एक प्रमुख नेता थे. नीतीश ने जब उन्हें राजपाट सौंपा था तो हटाने की प्रक्रिया अलग होनी चाहिए थी लेकिन नीतीश ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया. और खुद मौन साधकर अपने लोगों से लगातार मांझी पर बयानों के हमले करवाते रहे. मांझी को एक अराजक राज कायम करने वाला नेता और कुशासन का प्रतीक बताते रहे. यह एक बड़ी भूल की तरह रही. एक तरीके से नीतीश खुद को ही कटघरे में खड़े करते रहे. बिहार को फिर से कुशासन की ओर जाने की बात करते रहे और जनता के बीच यह संदेश जाता रहा कि यह उन्हीं की वजह से हो रहा है. ना वे  मांझी का प्रयोग करते और ना ऐसा होता.

बीते लोकसभा में नीतीश कुमार को दोहरा झटका लगा. भाजपा की भारी जीत हुई. हाशिये की ओर बढ़ चले लालू भी नीतीश की पार्टी से ज्यादा बढ़त बनाने में सफल हुए. वे नए दुश्मन से भी हारे और पुराने दुश्मन से भी

दूसरी ओर मांझी इस बात का प्रचार करते रहे, जो बहुत स्वाभाविक भी था कि एक दलित को कुर्सी पर बैठाकर नीतीश फिर से सत्तासीन होने के लिए ऐसे आरोप लगा रहे हैं. दलित का अपमान कर रहे हैं. वे उन्हें कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे. मांझी लगातार आक्रामक होते रहे और नीतीश लगातार अपने लोगों से उन पर वाक प्रहार करवाते रहे. कभी नीतीश के दल के अनंत कुमार ने मांझी को पागल करार दिया तो कभी किसी दूसरे ने भस्मासुर की उपाधि दे दी. ऐसा करके नीतीश एक ऐसी भूल करती रहे, जिसका हिसाब-किताब शायद बहुत जल्दी चुकता नहीं होने वाला, इस विधानसभा में जीत हासिल करने के बाद भी. मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने, फिर हटाने और उसके पहले जदयू नेताओं ने जिस तरह से मांझी की फजीहत की, उसमें भाजपा की भूमिका होते हुए भी नीतीश की गरिमा कम हुई. यह माना गया कि दरअसल नीतीश ने तब जिस कुर्सी का त्याग किया था वह नैतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि मोदी की हार से व्यक्तिगत अहंकार और भ्रम के टूटने का फौरी असर था. साथ ही मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर वे किसी दलित को सत्ता के शीर्ष पर उभरने का मौका नहीं दे रहे थे बल्कि एक बेहतर कठपुतली चाहते थे.

बेशक तब नीतीश की मजबूरी थी, क्योंकि अगर वे मांझी को सत्ता से नहीं हटाते तो भाजपा राज्य में राष्ट्रपति शासन की स्थिति पैदा करवाती और फिर विधानसभा चुनाव में अपने अनुकूल माहौल तैयार करती. फिलहाल मांझी भाजपा के साथ गठजोड़ कर चुके हैं. कल को उनका कितना असर होगा, अभी कहना मुश्किल है. लेकिन यह तय है कि नीतीश कुमार की गिनती अब सदा-सदा कांग्रेसी परंपरा वाले उन नेतृत्वकर्ताओं की श्रृंखला में होगी, जिन्होंने समय-समय पर दलित नेतृत्व को कठपुतली की तरह शीर्ष पर बैठाकर इस्तेमाल करने की कोशिश की. मांझी कल को क्या कर पाएंगे, कहना कठिन है. वे चुनाव में दलितों का कितना वोट अपने, भाजपा या गंठबंधन की ओर पक्ष में करवा पाएंगे, यह अनुमान लगाना मुश्किल है. लेकिन मांझी प्रकरण से संभावनाओं के एक नए द्वार बिहार की राजनीति मे भी खुले हैं.

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘बिहार की सियासत अब उत्तर प्रदेश की राह पर आ चुकी है. दलित और पिछड़ों की राजनीति अलग होगी. आज दस्तक पड़ी है, कल इसका असर दिखेगा. जब ऐसा होगा तो नीतीश कुमार को इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति तो की लेकिन जाने-अनजाने पिछड़ों तक ही राजनीतिक नेतृत्व को समेटे रखने में ऊर्जा लगाए रहे. नीतीश कुमार कहते हैं, मांझी विभीषण साबित हुए, पीठ में खंझर भोका. उधर, मांझी कह रहे हैं, लालू को हटाने के लिए नीतीश टीम बनाकर भाजपा की गोदी में बैठ गए थे और वर्षों सत्ता सुख भोगा तो वह सही और मैं गलत!’

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