भागलपुर दंगा : नृशंसता के छह माह

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पिछली 24 अक्टूबर को भागलपुर का माहौल बहुत बोझिल था. शहर की चहल-पहल वैसी ही थी. लोग उसी तरह की भागदौड़ में व्यस्त थे. भागलपुर से ही सटे नाथनगर और चंपानगर में हैंडलूम और पावरलूम के करघे भी हर रोज की तरह अहलेसुबह से ही एकसुर में खटखट-खटखट किए जा रहे थे. मंदिरों में घंटियां और मस्जिदों की अजान भी तयशुदा वक्त पर हो रही थी, लेकिन इस सामान्य से दिखते माहौल के बीच शहर के कुछ कोने ऐसे भी थे जहां उदासी और निराशा फैली हुई थी. कुछ नए मोहल्ले ऐसे भी थे जहां मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. 24 अक्तूबर को इस शहर के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग माहौल की कुछ खास वजह थी. ये निराश और उदास लोग इस शहर के दामन पर चिपकी उस घटना के भुक्तभोगी हैं, जिससे इनका सामना 25 साल पहले हुआ था. 24 अक्टूबर को अखबारों की सुर्खी थी कि भागलपुर दंगे के 25 साल पूरे हो रहे हैं, इस मौके पर फलां-फलां जगह फलां-फलां आयोजन होंगे. इन उदास मोहल्लों के लिए ये खबर पुराने घाव को कुरेदने वाली थी. नब्बे के बाद जवान हुई पीढ़ी के लिए यह सिर्फ आयोजन-भर थे लेकिन भागलपुर शहर के परवती, तातरपुर, आसानंदपुर से लेकर नाथनगर तक ऐसे कई मोहल्ले थे, जहां के पुराने निवासी उन खबरों को पढ़-सुन कर 25 साल पुरानी यादों में डूब गए थे, उनकी आंखों में आंसू उतर आया था.

भागलपुर में तहलका ने सबसे पहले नाथनगर और चंपानगर मुहल्ले की यात्रा की. भागलपुर से लगे ये दो ऐसे मोहल्ले हैं, जो इस शहर को न जाने कितने सालों से सिल्क नगरी के रूप में स्थापित किये हुए हैं. सिर्फ बिहार में ही नहीं, देश और दुनिया के तमाम कोनों में. नाथनगर और चंपानगर में किसी से बातचीत किए बिना ही यह साफ अहसास हो जाता है कि यह इलाका कभी भागलपुर की बड़ी पहचान रहा होगा. घरों के चौखट-दरवाजों की नफासत बताती है कि यह शौकीनों और पैसेवालों का इलाका रहा होगा. गलियों को देखकर लगता है कि यह कभी तो गुलजार रही होंगी. वहां मोहम्मद इरशाद से भेंट होती है. बातचीत के दौरान वे आग्रह करते हैं कि पुराने दिनों की याद न दिलाएं, अब हमारी पहचान इतनी-भर है कि हम एक मजदूर हैं, जिन्हें आसामियों से काम मिलता है. हम मजदूरों के भरोसे ही यह भागलपुर सिल्क नगरी कहलाता है. इरशाद यह बताते-बताते रोने लगते हैं. वह कहते हैं, ‘यहां हर घर में अपने लूम चलते थे. हर कोई यहां हुनरमंद बुनकर था और मालिक भी.’ इरशाद बहुत सारी बातें बताते हैं. उनसे बातचीत के दौरान वह आंकड़ा आंखों के सामने तैरने लगता है जिसे हमने अब तक सिर्फ पढ़ा और सुना था कि 25 साल पहले एक दंगे ने सिल्क नगरी भागलपुर के 600 पावरलूम, 1700 हैंडलूम को आग के हवाले कर राख कर दिया था. बुनकरों के घर-परिवार में हर किसी के पास अथाह पीड़ा होती है. सभी घरों के अपने स्वर्णिम इतिहास और अंधेरे भविष्य के पन्ने होते हैं.

इसके बाद आगे की यात्रा शुरू होती है. बुनकरों का मोहल्ला छोड़ हसनपुर, डुमरागांव, सलमपुर जैसी बस्तियों में जाना होता है. सलमपुर में नूरजहां, इदरीस जैसे लोग मिलते हैं, जिन्हें अपनी पीड़ा और बीते कल को साझा करने में भी संकोच होता है. इदरीस, जो अब एक पैर के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं, कहते हैं, ‘मुझे छर्रा लगा था. एक साल तक छर्रे के घाव वाला पैर लेकर घूमता रहा. वहां सड़न हो गई, तो डॉक्टरों ने मेरा एक पैर काटकर अलग कर दिया. मैंने कई बार सरकार से कहा कि दंगे ने मुझे जिंदगी-भर के लिए अपाहिज इंसान बना दिया, मैं अपनी जिंदगी गुजारने लायक काम-धाम कर सकता हूं, लेकिन सरकार मुझे दंगा पीड़ित नहीं मानती इसलिए मैं मुआवजे का हकदार भी नहीं बन सका.’ नूरजहां के पति इजराइल भी इस दंगे में मारे गए थे. नूरजहां कहती हैं, ‘मैं साबित नहीं कर पायी कि मेरे पति को भी दंगे में मारा गया है, इसलिए सरकार ने मुझे किसी मुआवजे के लायक ही नहीं माना.’

इन बस्तियों में इदरीस, नूरजहां के जैसी कहानियां तमाम लोगों की हैं. सबकी पीड़ा अंतहीन है, अंदर तक हिला देनेवाली है. मुआवजे और सरकारी सहायता का अपना खेल होता है, उसकी अपनी राजनीति होती है. लिहाजा मुआवजे को छोड़कर दूसरी बातों पर ध्यान देते हैं. भागलपुर घूमते हुए, वहां के लोगों से बात करते हुए साफ महसूस होता है कि 25 साल पहले हुए उस दंगे ने शहर को इस कदर, इतने रूपों में तोड़ा है कि शहर आज तक संभल नहीं पाया है. शहर उन दंगों के बाद कभी भी अपनी पुरानी रवायत और लय में लौट ही नहीं सका.

25 साल पहले हुआ दंगा यूं ही इतना पीड़ादायी नहीं है भागलपुरवालों के लिए. कहा जाता है कि आजाद भारत में यानी 1947 के बाद यह सबसे लंबे समय तक चला दंगा है, जिसमें अनगिनत लोगों की जान गई थी. आजाद भारत में भी भागलपुर की तरह दंगे बहुत कम हुए हैं. सरकारी आंकड़े कहते हैं कि इस दंगे में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. सामाजिक कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संस्थाओं व स्थानीय लोगों का मानना है कि इस दंगे में कम से कम दो हजार लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. वह भी ऐसे नहीं कि सिर्फ मार दिए गए, कहीं मारे गए, कहीं काटे गए, कहीं मारकर कुएं में फेंक दिया गया, कहीं तालाब में डाल दिया गया, तो कहीं खेत में डालकर उन पर हल चला दिया गया. लाशों के ऊपर खेती का अमानवीय कृत्य भी यहां हुआ. यह दंगा इसलिए भी एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है कि जब देश में सांप्रदायिक उन्माद का माहौल बनना शुरू ही हुआ था, तब उसके समानांतर अपराधियों, गिरोहबाजों, राजनेताओं और अधिकारियों ने आपसी गठजोड़ से दंगा भड़काकर इस तरह सरेआम लोगों का कत्लेआम करवाया था. लगभग छह महीने तक यह अराजकता भागलपुर की पहचान बनी रही.

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