दर्द के निशां

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दिल्ली से लगभग 70 किमी दूर हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव की एक उजाड़ सड़क पर एक बड़ा-सा फ्रीजर टूटा पड़ा है. यह अहमद का है, जिनकी कन्फेक्शनरी की दुकान को 25 मई की शाम हुई सांप्रदायिक हिंसा में तोड़-फोड़ के बाद लूट लिया गया. उस शाम के बाद से अहमद किसी अनजान जगह पर अपने रिश्तेदार के यहां छिपे हुए हैं.

हमेशा की तरह, ये दंगे भी हिंदू-मुस्लिमों के बीच आपसी भरोसे की कमी और बढ़ती अफवाहों के बाद ही शुरू हुए. उस शाम तक सब कुछ ठीक ही था जब हिंदू समुदाय के लगभग 2000 लोगों की भीड़ ने मामले को आर या पार करने की ठान ली. इस भीड़ पर आरोप है कि इसने मुसलमानों पर हमला किया और उनके घरों को आग लगा दी. अटाली के घटनाक्रम को अयोध्या में हुए मंदिर-मस्जिद मामले जैसा ही समझा जा रहा है पर यहां मंदिर के पास मस्जिद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की अनुमति के साथ बनाई जा रही थी. इन सब के बीच राहत की बात ये है कि इतनी बड़ी हिंसा में कोई मौत नहीं हुई हालांकि 50 से ज्यादा लोग घायल और चोटिल हुए, मगर इससे मिला सदमा कभी न भूलने वाला है. गांव के सभी मुस्लिम परिवारों के साथ कुछ हिंदू परिवार भी घर छोड़कर चले गए थे.

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क्या था विवाद
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ये जानना दिलचस्प है कि ये मामला 70 के दशक से चला आ रहा है, कैसे धीरे-धीरे बात बिगड़ती रही जब एक विवादित जमीन पर हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार दिया गया. हिंदू इस जगह को राम जन्मभूमि कहते हैं और उनका कहना है ये गांव की पंचायत की संपत्ति है. वहीं मुस्लिमों का कहना है ये जमीन वक्फ बोर्ड की है जिस पर कोर्ट द्वारा उन्हें मस्जिद बनाने की आज्ञा भी मिल चुकी है. लगभग चार दशकों से ये मुद्दा जस का तस बना हुआ है.

गांव के हिंदुओं का कहना है कि सत्तर के दशक की शुरुआत तक उस जमीन पर मुस्लिमों का एक कब्रिस्तान हुआ करता था. चूंकि पास ही एक प्राचीन मंदिर था तो ऐसा सोचा गया कि कब्रिस्तान को यहां से हटा कर किसी दूसरी जगह बना दिया जाए. इसके लिए 1972 में, मुस्लिमों को कब्रिस्तान बनाने के लिए गांव के पास ही एक एकड़ जमीन भी दी गई. (हिंदुओं के अनुसार मस्जिद भी यहीं बनाई जानी थी) हालांकि मुस्लिम अब तक उसी विवादित जगह पर ही इबादत किया करते थे. बीते समय में हिंदुओं द्वारा इस मुद्दे को अधिकारियों की नजर में भी लाया गया पर बात कभी इतनी नहीं बिगड़ी कि दोनों संप्रदायों के बीच संघर्ष या टकराव कि स्थितियां बन जाएं.

स्थानीय निवासी तिलक कुमार शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘वो दी गई जमीन पर मस्जिद क्यों नहीं बना रहें हैं जबकि वो तो इससे काफी बड़ी भी है!’ तिलक ये भी चाहते हैं कि गांव में मुस्लिम सुरक्षित लौट आएं. ‘ये हम सभी के लिए अच्छा होगा, हम कोई हिंसा नहीं चाहते. हम सब इतने समय से साथ रह रहे हैं पर वो (मुस्लिम) आज भी विवादित जगह पर ही मस्जिद बनाए जाने के लिए अड़े हुए हैं. कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं.’

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अटाली के घटनाक्रम को अयोध्या के बाबरी मामले जैसा ही समझा जा रहा है. यहां मंदिर के पास मस्जिद कोर्ट की अनुमति से बनाई जा रही थी
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हालांकि मुस्लिमों का कुछ और ही कहना है. वे कहते हैं कि अलग से दी गई जमीन सिर्फ कब्रिस्तान के लिए थी मस्जिद के लिए नहीं. इसके अलावा ये जमीन गांव से बहुत दूर है. उनके अनुसार वो विवादित जगह पर बने एक अस्थायी भवन में ही इबादत किया करते थे पर 1992 में हिंदुओं द्वारा उसे जला दिया गया, जिसके बाद वहां एक टिन शेड बनाया गया जहां 2009 तक वे लोग नमाज पढ़ते थे.

हालिया संघर्ष में चोटिल 50 वर्षीय सुलेमान कहते हैं, ‘आखिर क्यों हमें नमाज पढ़ने के लिए दूर जाना चाहिए? ये हमारी जमीन है और मस्जिद यहीं बनेगी. कोर्ट ने भी हमारे ही पक्ष में फैसला दिया है. उन्हें (हिंदुओं) कोर्ट का फैसला मानना चाहिए.’ 31 मार्च को फरीदाबाद कोर्ट ने मुस्लिमों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें मस्जिद बनाने कि अनुमति दी थी. सुलेमान आगे बताते हैं, ‘हमने हरियाणा के वक्फ बोर्ड से संपर्क किया था और उन्होंने हमें आगे बढ़ने को कहा. साथ ही मस्जिद के निर्माण के लिए 2 लाख रुपये की मदद भी दी.’

2009 में दोनों संप्रदायों के बीच गुस्सा तब बढ़ने लगा जब मुस्लिमों ने विवादित भूमि पर मस्जिद और बाउंड्री बनाने का काम शुरू किया. हिंदुओं ने इसका विरोध किया और मस्जिद के निर्माण पर कोर्ट से स्टे आॅर्डर ले लिया. हिंदुओं का कहना है कि इसी वक्त, ग्राम प्रधान राजेश चौधरी ने, जो उस वक्त सरपंच के चुनाव में प्रत्याशी थे, मुस्लिमों से वादा किया कि यदि वे जीत गए तो मस्जिद बनवाने में मदद करेंगे. उस समय गांव में 500 के लगभग मुस्लिम मतदाता थे जो 3000 हिंदू मतदाताओं के अलग-अलग गुटों के बंटे होने के कारण उस चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते थे. इस बार कोर्ट का ये फैसला गलत समय पर आया है. गांव में इस साल पंचायत के चुनाव होंगे जो अगस्त या सितंबर के बीच किसी भी समय हो सकते हैं.

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‘लव जिहाद’ कनेक्शन
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हालांकि एक तरह से देखा जाए तो दोनों संप्रदायों के बीच पनपी दुश्मनी अंतरधार्मिक विवाहों के कारण और बढ़ गई हैं. अगर आजकल की राजनीतिक ध्रुवीकरण की भाषा में कहें तो इसे ‘लव जिहाद’ का नाम भी दिया जा सकता है. ये सुनने में अतिरंजित शब्द लग सकता है पर फिर भी ये ग्रामीणों को उत्तेजित करने के लिए काफी है.

लगभग साल भर पहले, अहमद के 23 साल के बेटे नौशाद ने गांव की ही एक हिंदू लड़की के साथ भाग कर शादी कर ली. ग्रामीणों ने इस शादी का कड़ा विरोध किया. उसके बाद दोनों संप्रदायों में कई दौर की बातचीत के बाद गांव वालों ने इस शादी को स्वीकार कर लिया पर फिर भी स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं के डर से इस दंपति ने एक पड़ोसी गांव में रहना ही उचित समझा. हाल ही में इनके यहां बेटा भी हुआ है. इनकी शादी का मामला लोगों के ध्यान से उतर ही रहा था कि मस्जिद निर्माण का विवाद उठ खड़ा हुआ. दोनों की भागकर की गई शादी करने की बात दोनों समुदायों के लोगों के लिए एक-दूसरे पर तंज कसने और छींटाकशी करने का मुद्दा बन गई. इन सब विवादों के बाद ये दंपति अपने नवजात बच्चे के साथ कहीं छिप गए हैं.

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ये सुनने में हास्यास्पद है पर गांव में इस शादी को लेकर होने वाली व्यर्थ चर्चाओं ने तनाव को और बढ़ाया था. 53 वर्षीय फूलवती चूल्हे पर खाना बनाते हुए बताती हैं, ‘मुसलमान औरतें बोलती थीं कि हिंदुओं की लड़कियां तो ऐसे ही भागेंगी. हिंदुओं से अपनी लड़कियां नहीं संभल रहीं.’ संयोग से इस झगड़े के कारण गांव की पाइपलाइन से होने वाली गैस सप्लाई बंद हो गई है. लोग या तो चूल्हे पर खाना बना रहे हैं या ब्लैक में एलपीजी सिलेंडर खरीद रहे हैं. यहां छोचक एक रस्म होती है, जिसमें बेटी के यहां बच्चे के जन्म पर उपहार भेजे जाते हैं. ऐसा बताया गया कि इसे लेकर भी तानाकशी हुई जिसने तमाम प्रौढ़ महिलाओं में खासा गुस्सा भर दिया. वैसे पुरुषों ने इन सब को सिरे से ही नजरअंदाज किया. पर शायद उन्हें ध्यान देना चाहिए था.

मस्जिद निर्माण कार्य में साथ दे रहीं मुस्लिम महिलाएं उस रास्ते से मंदिर आने-जाने वाली हिंदू औरतों पर ताने कसती थीं. ऐसे एक मौके पर तो पथराव भी हुआ था. ‘शुरुआत उन्होंने की थी,’ आठ महिलाओं के दल के साथ नियमित रूप से मंदिर जाने वाली फूलवती आरोप लगाती हैं, ‘पहले तो हमने उनके उलाहनों पर ध्यान नहीं दिया पर जब हद पार हो गई तो हम सभी ने इसका विरोध किया, जिसके जवाब में उन्होंने हम पर पत्थरों से हमला कर दिया.’ भारत के शहरों में ऐसा अमूमन तब होता है जब किसी एक समुदाय का कोई धार्मिक जुलूस किसी दूसरे समुदाय के बाहुल्य वाले इलाके से होकर गुजरता है.

खैर, पुरानी ग्रामीण परंपराओं के अनुसार मामला पंचायत में पहुंचा और दोनों संप्रदायों के लोगों के बीच बातचीत भी हुई. पर आखिरकार हिंदुओं ने ये फैसला लिया कि वो उस प्राचीन मंदिर के पास हो रहे मस्जिद निर्माण का विरोध करेंगे. 25 मई की सुबह मस्जिद निर्माण के विरोध में रैली निकाल रही हिंदू महिलाओं पर पथराव भी हुआ था.

शाम तक ये मामला चरम तक पहुंच गया. जैसे ही हिंसा और आगजनी बढ़ी, गांव के लगभग 200 मुस्लिम परिवारों ने रातों-रात अटाली से 12 किमी. दूर बल्लभगढ़ पुलिस थाने में शरण ली. इस बीच अटाली गांव में प्रशासन ने धारा 144 लगा दी. बड़ी संख्या में पुलिस के जवान और कमांडो मस्जिद निर्माण स्थल सहित पूरे गांव की चौकसी में तैनात हो गए.

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थाने में जिंदगी
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संघर्ष के बाद थाने में रहे सुलेमान अपने टूटे घर के फोटो देख के रो पड़े. ‘जैसे ही हमें हिंसा और झगड़े के बढ़ने का पता चला, हमने जरूरी सामान बांधा और भाग निकले. इससे पहले कि हमलावर हम तक पहुंच पाते, हम गांव से बाहर निकल चुके थे.’ उनका घर मस्जिद के ठीक सामने है. वो आज उस जगह जाने में डरते हैं, जहां वो पले-बढ़े, जिसे वो घर कहते थे. उन्होंने मीडिया से निवेदन भी किया था कि वे उन्हें वहां से उनकी धार्मिक किताबें लाकर दे दें. दंगों के बाद लगभग 500 मुस्लिम बल्लभगढ़ थाने में रहे. ये किसी आपदा के बाद बने रिलीफ कैंप के जैसा दृश्य था. कुछ लोगों के बहुत अधिक गर्मी की शिकायत के बाद एसडीएम ने यहां तीन कूलरों की व्यवस्था भी करवाई.

रिलीफ कैंप में मदद कर रहे 21 साल के मो.जहीर ने बताया, ‘अभी तक तो खाने की कोई किल्लत नहीं हुई है. कभी हम घर से कुछ ले आते हैं तो कभी किसी एनजीओ के लोग दान करते हैं. प्रशासन ने कई शिकायतों के बाद यहां कुछ कूलर भी लगवा दिए हैं. पर इन सब के बावजूद, ये कोई जीने का तरीका तो नहीं है.’ गांव की ही एक शिक्षिका ने बताया, ‘ज्यादातर औरतों के पास अतिरिक्त कपड़े नहीं थे. खाने के लिए, मदद के लिए हम किसी और पर निर्भर थे. हमने भिखारियों जैसी जिंदगी जी. मुझे तो ये भी नहीं पता कि मैं अपनी नौकरी पर दोबारा जा भी पाऊंगी या नहीं.’ बहरहाल स्थितियां अब सामान्य होने लगी हैं. लगभग दस दिनों के बाद प्रशासन द्वारा सुरक्षा का आश्वासन देने पर मुस्लिम घर लौटे हैं पर मुश्किलें अभी भी बनी हुई हैं.

फोटो फीचर : देखें अटाली दंगे के बाद का मंजर

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