‘मेरी नाप के जूते लेकिन मेरे नहीं !’

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मनीषा यादव

यह करीब 40-42 साल पुरानी बात है. देश को अंग्रेजों से आजाद हुए कुछ वक्त हो गया था लेकिन आंटी और अंकल जैसे अंग्रेजी संबोधन आम नहीं थे. उस वक्त मां की सहेलियां हमेशा मौसी हुआ करती थीं और पिता के मित्र ताऊ जी या चाचाजी. मां स्कूल में पढ़ाती थीं इसलिए स्वाभाविक तौर पर सभी अध्यापिकाएं मेरी मौसी हुआ करती थीं. मेरा ननिहाल कानपुर था और संयोगवश उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका का मायका भी कानपुर ही था.

गर्मी की छुट्टियों के अलावा दीपावली की छुट्टियों में भी मम्मी के साथ कानपुर जाना होता था. गड़रिया मोहल्ले में नानी का घर था. रिक्शा जैसे ही मोहल्ले में दाखिल होता, मोहल्ले के रहने वाले मामा, मामी, मौसी और भैया लोग ऐसी खुशी से भर जाते जैसे हमारा रिश्ता बिल्कुल सगे-सम्बंधियों का हो. नानी ने भी हम भाई-बहनों को बता रखा था, ये गोपाल मामा हैं, ये रामदास मामा हैं, ये तिलकू मामा हैं. ऐसे रिश्तों की अब स्मृतियां ही बाकी हैं.

उसी उम्र की एक घटना याद आती है तो आज भी हंसी आ जाती है. फिर मन को समझाता हूं कि वह बालसुलभ ललक थी जो किसी को भी हो सकती है. हुआ यह कि दीपावली की छुट्टियों में कानपुर जाने का कार्यक्रम बन रहा था. मम्मी के स्कूल की प्रधानाध्यापिका यानी हमारी मौसी कानपुर जा रही थीं मम्मी कुछ दिन बाद जाने वाली थीं. उन्होंने मौसी जी से बात करके मुझे साथ भेज दिया. उनका घर गोविन्द नगर में था. मौसी ने मम्मी को बतला दिया था कि सुनील को हम दो-तीन दिन अपने साथ रखेंगे, गांव भी ले जाएंगे फिर सुरेश (उनके छोटे भाई) से नानी के यहां छुड़वा देंगे. मां ने हामी भर दी.

हम कानपुर पहुंचे और सुरेश मामा हमें गोविन्द नगर वाले घर ले गए जहां मौसी जी के माता-पिता थे, मौसी ने बताया कि ये नाना-नानी हैं, हमने उनके पांव छुए. और भी दूसरे मामा-मामी से परिचय कराया, मुन्ना मामा जिनका नाम दिनेश था, रक्कू मामा जिनका नाम राकेश था. बड़े मामा तो सुरेश थे ही. अगले दिन सुरेश मामा हमें गांव ले गए.

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