चूक गए तो चुक गए

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फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

‘यहां जितने विधायक बैठे हैं. मैं उन सभी से हाथ जोड़कर कहूंगा कि घमंड में कभी मत आना. अहंकार मत करना. आज हम लोगों ने भाजपा और कांग्रेसवालों का अहंकार तोड़ा है. कल कहीं ऐसा न हो कि किसी आम आदमी को खड़ा होकर हमारा अहंकार तोड़ना पड़े. ऐसा न हो कि जिस चीज को बदलने हम चले थे कहीं हम उसी का हिस्सा हो जाएं.’

यह उस भाषण का हिस्सा है जो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा का चुनाव परिणाम आने के बाद जंतर-मंतर पर पार्टी के सभी विधायकों और समर्थकों को संबोधित करते हुए दिया था. आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक की इस हिदायत का उनके विधायकों, नेताओं और खुद उन्होंने कितना पालन किया यह तो वही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन जो पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में सफलता के सातवें आसमान पर थी वह आज अपने सियासी अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है.

पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी को 28 सीटें और 29 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी को दिल्ली से एक भी सीट हासिल नहीं हुई. हालांकि उसका वोट प्रतिशत जरूर बढ़कर 32.92 फीसदी पर पहुंच गया. सबसे ज्यादा जिस बात ने पार्टी के माथे पर चिंता की लकीर खींची वह थी कि भाजपा विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 60 पर सबसे आगे रही.

एक बार फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव का रास्ता साफ हो चुका है. सभी पार्टियां अपनी व्यूह रचना में जुट गई हैं. एक तरफ कांग्रेस है जो लगता है मानो हार के अंतहीन सफर पर निकल चुकी है वहीं भाजपा लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में अपना जलवा दिखाने के बाद एक-एक कर सभी राज्यों में कमल खिलाने की आक्रामक फिराक में है. महाराष्ट्र और हरियाणा की तर्ज पर भाजपा दिल्ली में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘करिश्मे’ के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की योजना पर आगे बढ़ रही है.

आप के लिए यह चुनाव बाकी पार्टियों की तरह सिर्फ एक चुनाव-भर नहीं है. यह उसके लिए करो या मरो वाला चुनाव है. ऐसा माना जा रहा है कि आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम ‘आप’ का राजनीतिक भविष्य तय करेंगे.

फोटोः विजय पांडे
फोटोः विजय पांडे

‘आप’ के साथ कितने आम आदमी?

‘आप’ के लिए यह चुनाव उसके अस्तित्व की लड़ाई है. यह खतरा उस पार्टी के सामने है जिससे लोगों का जुड़ाव स्वस्फूर्त था. इनमें सबसे बड़ी तादाद युवाओं की थी. ऐसे भी बहुत से लोग थे जो पार्टी के सदस्य नहीं बने लेकिन उसके कट्टर समर्थक थे. वे अरविंद और आप के खिलाफ एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं थे और उन्हें भारत की तमाम समस्याओं का शर्तिया इलाज बताते थे. देश के एक बड़े तबके में आशा व उम्मीद का संचार पार्टी और उसके नेता अरविंद ने किया था. इस आशा, उत्साह और समर्थन का असर पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में तब दिखा जब तमाम राजनीतिक सर्वेक्षणों को झूठलाते हुए पार्टी विधानसभा की 28 सीटों पर जीती. कई सीटों पर वह मामूली अंतर से हारी. आम आदमी पार्टी अब फिर चुनावी मैदान में उतरने जा रही है लेकिन साल-भर पहलेवाली ताकत अब उसके पास नहीं है. पार्टी की हालत बिगड़ने की शुरुआत तो 49 दिन की सरकार से त्यागपत्र देने के बाद ही शुरू हो गई थी लेकिन बीते लोकसभा चुनाव के बुरे प्रदर्शन ने आग में घी का काम किया. आम चुनाव में हार के बाद बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने पार्टी से मुंह मोड़ लिया. यह वे लोग थे जो अन्ना-अरविंद आंदोलन के समय से ही इस मुहिम से जुड़े और बाद में आम आदमी पार्टी के पक्के समर्थक बन गए. पार्टी की जान यही स्वयंसेवक या वॉलेंटियर थे. लेकिन आज इन लोगों में वह उत्साह दिखाई नहीं देता. जिन कार्यकर्ताओं से पार्टी और अरविंद की तारीफ के सिवाय कुछ सुनाई नहीं देता था उनके मन में आज गुस्सा और पीड़ा है.

पार्टी के भीतर के लोग बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद लगभग 30 से 40 फीसदी के करीब कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. निराशा और नाउम्मीदी को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है. कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि पार्टी में 3.50 लाख वॉलेंटियर की तुलना में अब केवल 50 हजार ही बचे हैं. दिल्ली में ही 15 हजार शुरुआती कार्यकर्ताओं में से आधे से अधिक पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. जो अभी पार्टी के साथ हैं उनमें से लगभग 80 फीसदी से अधिक ने पूरा समय पार्टी के लिए देना बंद कर दिया है.

आईआईटी दिल्ली में पढ़ रहे और पार्टी से जुड़े प्रिंस कहते हैं, ‘पहले लगता था कि हर दिन कोई न कोई परिवर्तन हो रहा है. मंजिल बहुत पास दिख रही थी. लेकिन लोकसभा में भयानक हार के बाद ज्यादातर कार्यकर्ताओं के मन में यह बात घर कर गई कि आगे लड़ाई बहुत लंबी होनेवाली है. पार्टी को शून्य से शुरूआत करनी है. सफलता कब तक मिलेगी पता नहीं. इसमें 2, 5, 10 साल लगेंगे या उससे भी अधिक पता नहीं. ऐसे में कई कार्यकर्ता जो अपनी नौकरी या पढ़ाई छोड़कर आए थे वे वापस चले गए हैं.’ प्रिंस ने पिछले विधानसभा चुनाव के समय दिल्ली के कई इलाकों में पार्टी के लिए प्रचार किया था. वे घर-घर जाकर लोगों को आम आदमी पार्टी से जोड़ने का काम कर रहे थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. प्रिंस पार्टी से जुड़े जरूर हैं लेकिन अब उनकी प्राथमिकता अपनी इंजीरियरिंग की पढ़ाई है.

दिल्ली के वसंत विहार में पार्टी के लिए पिछले डेढ़ साल से वॉलेंटियर का काम कर रहे अनुराग राय बताते हैं, ‘मैंने बीटेक फर्स्ट ईयर की पढ़ाई छोड़कर पार्टी के लिए काम करना शुरू किया था. परिवार के लोग मेरे इस फैसले से बहुत नाराज थे. उनका कहना था कि मुझे पहले बीटेक पूरा करना चाहिए. मैं नहीं माना. पिछले एक साल तक पार्टी के लिए बिना कुछ सोचे काम करता रहा लेकिन लोकसभा में जिस तरह से पार्टी ने गलत लोगों को टिकट दिया. कार्यकर्ताओं की सुनवाई खत्म हुई. आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता का जिस तरह से मजाक बनाया गया उससे मैं बहुत दुखी हुआ. मैंने पार्टी छोड़ दी. अब फिर से अपनी बीटेक की पढ़ाई शुरू करने की तैयारी कर रहा हूं. इस बीच घरवाले उस खबर की कतरनें सैकड़ों बार दिखा चुके हैं जिनमें लिखा है कि अरविंद केजरीवाल की बेटी का आईआईटी में सलेक्शन हो गया है. घरवाले यह कहते हुए कोसते हैं कि देखो तुम बीटेक की पढ़ाई छोड़कर क्रांति कर रहे थे वहीं तुम्हारे नेताजी की बेटी आईआईटी में दाखिले की तैयारी कर रही थी.’ पार्टी कार्यकर्ता चंद्रभान कहते हैं, ‘ऐसे कार्यकर्ताओं की अब बड़ी तादाद है जो नौकरी के साथ पार्टी के लिए जितना बन पड़ता है उतना कर रहे हैं पर पार्टी के लिए फुलटाइम काम करनेवाले पार्टी में तेजी से कम हुए हैं.’

‘आप’ के समर्थकों का एक बड़ा तबका उस समय हैरान रह गया जब अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वे दिल्ली चुनाव में नरेंद्र मोदी को निशाना नहीं बनाएंगे

पार्टी कार्यकर्ता बताते हैं कि अरविंद के मुख्यमंत्री पद छोड़ने का सबसे अधिक खामियाजा कार्यकर्ताओं को ही भुगतना पड़ा. चांदनी चौक में पार्टी के लिए काम कर चुके अनुपम कहते हैं, ‘कार्यकर्ता ही जमीन पर लोगों के बीच में था. जो लोग अरविंद के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के निर्णय से खफा थे उन्होंने कार्यकर्ताओं पर ही गुस्सा निकालना शुरू कर दिया. इस कारण से भी कई कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए. कौन हर रोज सुबह-शाम लोगों की गालियां सुनता. जिस निर्णय में आपका कोई रोल नहीं है उसके लिए कोई आपको कोसे तो बुरा लगना स्वभाविक है.’ ऐसी राय रखनेवाले अनुपम अकेले नहीं हैं. दिल्ली के ही मालवीय नगर में पार्टी का काम देखनेवाले एक कार्यकर्ता कहते हैं, ‘अरविंद जी को चंद रैलियों और कार्यक्रर्मों में इस सवाल का जवाब देना पड़ा तो वे कहते नजर आए कि उनसे गलती हो गई. आगे ऐसा नहीं करेंगे. अब आप कल्पना कीजिए कि जो कार्यकर्ता जनता के बीच 24 घंटे रहता है उसकी क्या फजीहत हुई होगी.’

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

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  1. aap आप तो बस “आप” है जी | भारतीय राजनीती का “टर्निंग पॉइंट “है आप |आप के खाश कर केजरीवाल को यदि आज के दौर के भारतीय राजनीती के सिपहसालार भी कहें तो कोई अतिस्योक्ति नहीं होगी | सत्ता तो नहीं भोग सका लेकिन इसने भ्रस्टाचार पर जो प्रहार किया वो ही आज की परस्थितियों के लिए जाना जायेगा |सम्भव है की दिल्ली इनके लिए दूर की कौड़ी साबित हो लेकिन “भारतीय समय “इन्हे हमेश याद रखेगा “आज का गांधी “भी आप कह सकतें हैं |लोकसभा चुनाब में तो इसे हारना ही था इसका हर कदम एक अच्वमेंट है जी |

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