‘महाराष्ट्र-हरियाणा की तर्ज पर हम दिल्ली में भी बिना किसी चेहरे के चुनाव लड़ेंगे’ | Tehelka Hindi

इन दिनों A- A+

‘महाराष्ट्र-हरियाणा की तर्ज पर हम दिल्ली में भी बिना किसी चेहरे के चुनाव लड़ेंगे’

दिल्ली के प्रस्तावित विधानसभा चुनावों में भाजपा की रणनीति, उसकी चुनौतियां और खुद के साथ जुड़े विवादों का जवाब दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय दे रहे हैं.
अतुल चौरसिया 2014-11-22 , Issue 22 Volume 6
फोटोः विकास कुमार

फोटोः विकास कुमार

चुनाव का सामना करने से भाजपा इतना हिचक क्यों रही थी. क्या अरविंद केजरीवाल से पार्टी में किसी तरह का डर था?
हमारे मन में चुनाव को लेकर कोई हिचक नहीं है. भाजपा कभी भी दिल्ली में गलत तरीके से सरकार बनाने की पक्षधर नहीं थी. हमारे मन में यह कभी नहीं था कि हमें गलत तरीके से, जोड़-तोड़ करके या खरीद फरोख्त करके दिल्ली में सरकार बनानी है. अगर हमारी ऐसी मंशा होती तो उस समय ही करते जब हमारे पास 32 विधायक थे. लेकिन तब भी हमने इन चीजों से दूरी बनाए रखी.

दिल्ली में भाजपा का इतिहास रहा है कि वह मुख्यमंत्री पद का एक चेहरा घोषित करके चुनाव में उतरती आई है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि भाजपा बिना किसी चेहरे के चुनाव में उतर रही है.
हरियाणा और महाराष्ट्र में सबने देखा कि कैसे पार्टी बिना किसी चेहरे के भी जीत हासिल कर सकती है. हम इस बार किसी चेहरे की बजाय विचारधारा के ऊपर चुनाव लड़ने जा रहे हैं. पर दिल्ली में हमारे पास पर्याप्त बड़ी संख्या में नेता हैं. हमारा चेहरा इस बार पार्टी का चुनाव चिन्ह, विचारधारा और केंद्र सरकार का कामकाज होगा. मोदी जी के आने के बाद जो विश्वास जनता के मन में पैदा हुआ है वह इस चुनाव में हमारा चेहरा बनेगा. और निश्चित रूप से मोदी जी का नेतृत्व भी इसमें हमारी मदद करेगा.

सवाल वही है कि नरेंद्र मोदी के चेहरे पर देश ने भाजपा को इतना बड़ा जनादेश दिया तो फिर दिल्ली में एक चेहरे से परहेज क्यों कर रही है भाजपा. अगर भाजपा अपने पिछले रुख से पीछे हट रही है तो इसके पीछे कोई तो वजह होगी. अगर मोदी से देश में फायदा हुआ तो क्या दिल्ली में सतीश उपाध्याय या किसी और चेहरे के साथ जाने में नुकसान होता?

हम पीछे नहीं हट रहे हैं. ये कोई नई बात नहीं है. हमने महाराष्ट्र और हरियाणा में इसी रणनीति पर चुनाव जीता है. रणनीति तो पार्टियां बदलती रहती हैं और यह हमारा अधिकार है कि हम चुनाव दर चुनाव उत्पन्न स्थितियों के मुताबिक अपनी रणनीति तैयार करें. हमने साथ मिलकर यह तय किया है कि चुनाव में हमें किस तरह से उतरना है. हमारा विधायक दल तय करेगा कि कौन नेता बनेगा.

पिछले विधानसभा चुनावों में हमने देखा कि आम आदमी पार्टी रणनीति के मामले में भाजपा से इक्कीस सिद्ध हुई थी. इस बार भी हम ऐसा ही कुछ देख रहे हैं. उन्हें अपनी वेबसाइट तक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं होता है. कुछ लोगों का आकलन था कि आप को हल्के में लेने का खामियाजा भी भाजपा को पिछले चुनाव में भुगतना पड़ा था. तो इस बार आप से निपटने की क्या कोई अलग रणनीति होगी आपकी?
ऐसा है कि जिस अभियान की बात आप कर रहे हैं तब की स्थितियां बिल्कुल अलग थीं. आज की स्थितियां एकदम बदली हुई हैं. तब दिल्ली में मनमोहन सिंह की सरकार थी, तब भाजपा की सरकार नहीं थी. तब अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली में कुछ नहीं थे. उनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं थी. अनजाने में दिल्ली के लोगों ने उनसे एक उम्मीद लगा ली थी कि शायद वे कुछ अलग और नया करेंगे. लोगों को उनसे आशाएं थीं. उन्होंने इतने बड़े-बड़े वादे कर डाले थे जिससे जनता भुलावे में आ गई. फिर दिल्ली और पूरे देश की जनता ने उनकी सत्ता लोलुपता भी देखी. वे दिल्ली की सरकार से 49 दिनों में ही भाग गए और देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे थे. अपने लालच के चक्कर में उन्होंने दिल्ली की जनता से किए गए वादे तक नहीं निभाए. उनकी घोषणाएं खोखली सिद्ध हुईं. मुफ्त पानी की घोषणा की और सिर्फ तीन महीने तक के लिए ऐसा करके भूल गए. उसका फायदा भी ऐसे लोगों को हुआ जिनके पास पानी के मीटर थे. गरीब और कमजोर आदमी को इसका कोई लाभ नहीं मिला. ऐसे तमाम कारण हैं जिनकी वजह से आज अरविंद केजरीवाल की विश्वसनीयता दिल्ली की जनता के बीच खत्म हो चुकी है.

पिछले चुनाव के दौरान ही कुछ वादे भाजपा ने भी किए थे मसलन बिजली की कीमतें 30 फीसदी तक कम करने की, लोगों को मुफ्त पानी देने की आदि. इन चुनावों में भाजपा उन लोकलुभावन वादों पर कायम रहेगी?
जो वादे हमने जनता के से किए थे उन्हें पूरा करने की कोशिश हम आगे भी करेंगे. चाहे वह बिजली की कीमतें घटाने का मामला हो, चाहे बिजली चोरी रोकने का मामला हो, गैरकानूनी कॉलोनियों को नियमित करने की बात हो, पानी का मुद्दा हो या फिर महिला सुरक्षा का मुद्दा, इन सभी वादों को हम पूरा करंेगे. बिजली पर हमने पहले ही केंद्र सरकार की तरफ से सब्सिडी दिलवाई है.

आज के दौर में चुनाव निर्वाचन क्षेत्रों के अलावा सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर भी लड़े जाते हैं. इस मामले में अरविंद केजरीवाल हमेशा बहुत तेज सिद्ध हुए हैं. उनकी तुलना में देखें तो सोशल मीडिया पर आपकी पहुंच बहुत सीमित दिखती है. यह सोची-समझी रणनीति है या फिर आप उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे?
सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया, वेबसाइट आदि बहुत जरूरी तकनीकें हैं और इनका हर स्तर पर इस्तेमाल होना चाहिए. अब तक हमारी कोशिश यह थी कि पहले अपने संगठन को अच्छी तरह से मजबूत कर लिया जाय. इसके आगे की रणनीति हमने बना ली है. इसके तहत हम अपनी इंटरैक्टिव वेबसाइट को अगले एक या दो दिनों में शुरू करने वाले हैं. जहां तक आप अरविंद केजरीवाल के अभियान का जिक्र कर रहे हैं तो कई बार हमने देखा कि वे सिर्फ मीडिया का अटेंशन पाने के लिए गलत-सही ट्वीट करते रहते हैं, ऐसी-ऐसी बातें जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता. उदाहरण के लिए वे खुद लिख रहे हैं कि मोदीजी फॉर पीएम, केजरीवाल फॉर सीएम. यह किस मानसिकता की राजनीति है. इसी तरह एक दिन उन्होंने ट्वीट कर दिया कि आज साढ़े ग्यारह बजे दिल्ली के उपराज्यपाल भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. मुझे लगता है कि सोशल मीडिया का इस तरह ओछा इस्तेमाल करना गलत है. अगर इसका इस्तेमाल उसके सही अर्थों में हो तो बात ठीक है और मैं हमेशा यही कोशिश करता हूं.

Pages: 1 2 Single Page

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 22, Dated 22 November 2014)

Type Comments in Indian languages