‘50 रुपये में जीवन-भर का सबक मिला’

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मनीषा यादव

अतीत के पन्नों में कई किस्से ऐसे दर्ज होते हैं जिन्हें हम ताउम्र नहीं भूल पाते हैं. ये किस्से जिंदगी के वे आईने होते हैं जो इंसान को उसकी असलियत से रूबरू कराते हैं और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाते हैं. ऐसा ही एक किस्सा मेरे जेहन में आता है जिसने मुझे एक बेहतर इंसान बनने का रास्ता दिखाया. साल 2001 की बात है. जिंदगी कुछ बेतरतीब-सी चल रही थी. मैंने बारहवीं कक्षा की परीक्षा दी थी. पर्चे बहुत अच्छे नहीं हुए थे. जिंदगी मानों ठहर गई थी. मन बहुत उदास था और उस उदासी की लकीरें चेहरे पर भी नजर आने लगीं थीं. पिताजी ने मेरी हालत देखी तो कहा कि कहीं घूम-फिर आओ, मन बदल जाएगा. अगले ही दिन उन्होंने मेरा देहरादून जाने का रिजर्वेशन करा दिया. मेरे पास भी करने को कुछ और नहीं था तो मैंने भी बैग उठाया और निकल पड़ा सफर पर. जीवन में पहली बार ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों और वादियों को देखकर यह एहसास हुआ की खूबसूरती आकार की मोहताज नहीं होती. यही बात शायद जिंदगी पर भी लागू होती है.

देहारादून, हरिद्वार और ऋषिकेश घूमने के बाद मेरा आखिरी पड़ाव था मसूरी. मैंने देहरादून से मसूरी जाने के लिए बस पकड़ी. सफर शुरू हुआ. मेरे बगल की सीट पर मुझसे उम्र में थोड़ा ही बड़ा एक लड़का बैठा हुआ था. शायद वह वहीं आस-पास का रहनेवाला था. उसके पहनावे को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह किसी साधारण परिवार से था. वह हमारे देश की उस भीड़ का हिस्सा था जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता है. मुझे भी वह शायद याद नहीं रहता यदि यह घटना न घटी होती. बस मानो तेजी से आकाश की ओर बढ़ती जा रही थी और बाहर के नजारे और मनमोहक होते जा रहे थे. मैं भी उन्हीं में खो गया. जब बस मसूरी पहुंची तो मेरा बस से उतारने का मन नहीं हो रहा था. ऐसा लग रहा था कि यह खूबसूरत सफर कभी खत्म ही न हो. सभी यात्री बस से उतर चुके थे. परिचालक ने आखिरी आवाज लगाई तो मेरी तंद्रा भंग हुई. मैं उतरने के लिए जैसे ही अपनी सीट से उठा तो मेरी नजर नीचे पड़े पचास रुपये के एक नोट पर पड़ी. वह नोट मेरा नहीं था. क्योंकि मेरे अगल-बगल की सीट पर उस लड़के के अलावा और कोई नहीं था, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह नोट उसी साधारण से दिखनेवाले लड़के का था. मैं चाहता तो दौड़कर वह नोट उस लड़के को दे सकता था. पर ऐसा न करते हुए मैंने वह नोट उठाकर अपनी जेब में रख लिया. मैंने उन रुपयों से खूब मौज की. फिर मैं इस बात को भूल गया. सफर बढ़िया रहा था. मन प्रफुल्लित था. अब बस घर पहुंचने की जल्दी थी.

‘मैं चाहता तो जा कर वह नोट उस लड़के को दे सकता था. पर ऐसा न करते हुए मैंने वह नोट उठाकर अपनी जेब में रख लिया’

ट्रेन में आरक्षण था अत: कोई फिक्र नहीं थी. पर जब स्टेशन पहुंचा तो देखा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बड़े किसान नेता की रैली थी और भीड़ इतनी अधिक थी कि आरक्षण होने के बावजूद भी हमें करीब आधा सफर गलियारे में खड़े होकर काटना पड़ा. मुरादाबाद पर भीड़ कुछ कम हुई तो एक भले आदमी ने उतरते वक्त अपनी सीट दे दी. गाड़ी जब हरदोई पहुंची तो मैं ट्रेन के गेट के पास खड़ा हो गया. रिजर्वेशन का टिकट मेरी ऊपर जेब में था. अचानक मैं कुछ देखने के लिए झुका और टिकट मेरी जेब से उड़ गया. चूंकि लखनऊ करीब था सो मैं ज्यादा परेशान नहीं हुआ. ट्रेन जब लखनऊ पहुंची तो मैं चुपचाप उतरकर पीछे के रास्ते से निकलने लगा. तभी एक टीटी ने मुझे रोककर टिकट मांगा. मैंने उसे सारी घटना बताई पर उसने मेरी बात नहीं मानी और मुझे पेनाल्टी भरने को कहा. मेरे पास कुल साठ रुपये थे. उसने वह सारे रुपये ले लिए और मुझे जाने को कहा. मैं भारी मन से बाहर निकलने लगा क्योंकि मेरा घर स्टेशन से लगभग 15 किलोमीटर दूर था, मेरी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी और रात-भर की थकान के बाद पैदल चलने की हिम्मत भी नहीं थी. मैं अभी चंद कदम ही चला था तो उसी टीटी ने पीछे से मुझे आवाज दी और पूछा कि मुझे कहां जाना है. जब मैंने उसे बताया तो उसने उन 60 रुपयों में से जो उसने मुझसे लिए थे 10 रुपए मुझे वापस कर दिये किराए के लिए. इस घटना ने मुझे दो बातें सिखाईं. एक तो यह कि किसी भी गलत काम का फल इंसान को तुरंत ही मिलता है और दूसरी यह कि हर बार आपको सजा गलती के बराबर ही मिलती है. न कम न ज्यादा. यह दोनों बातें मैंने गांठ बांध ली हैं. मैं ईश्वर का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे सही रास्ता दिखाया और मुझे एक बेहतर इंसान बनने की राह पर प्रशस्त किया.

8 COMMENTS

  1. Bhai Waah,
    Kahani dil ko choo gae…..sach kaha hai Harsh mishrajee ne ki doosre ka maal cheen kar khud ka bhala nahin ho sakta,

    sab se guzarish hai ki jeene ki sahi raah khojein aur us par chalein.

    Jai Hind

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