377 गिरहों वाली धारा | Tehelka Hindi

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377 गिरहों वाली धारा

आईपीसी की एक ऐसी धारा जिसे समाज और व्यवस्था के जिस भी हिस्से ने छुआ और भी जटिल बनाने का काम किया

वैवाहिक बलात्कार. भारतीय कानून में अभी इसकी कोई सजा नहीं है. यानी अपनी ही पत्नी से यदि कोई पुरुष बलात्कार करता है तो कानून उसे बलात्कारी नहीं मानता. बलात्कार संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार यदि पत्नी की उम्र 15 वर्ष से अधिक है तो उसके साथ जबरदस्ती के यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता. काफी समय से धारा 375 में मौजूद इस प्रावधान का विरोध होता रहा है. कई महिला अधिकार कार्यकर्ता वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय घोषित करने की मांग करते रहे हैं. पिछले साल महिला संबंधी कानूनों में जब बदलाव हुए, तब भी यह मांग जोरों से उठी थी. लेकिन उल्टा ये बदलाव ही एक लिहाज से विवाहित महिलाओं के विरोध में चले गये.

पहले धारा 375 में मौजूद बलात्कार की परिभाषा सीमित थी. तब यदि कोई पुरुष किसी महिला के साथ जबर्दस्ती एनल या ओरल सेक्स करता था तो उसे प्रकृति विरुद्ध अपराध माना जाता था. हालांकि तब भी पत्नी के साथ बलात्कार दंडनीय नहीं था लेकिन वह इस तरह के जबरन सेक्स के लिए अपने पति को धारा 377 के तहत सजा दिलवा सकती थी. नए कानून में एनल और ओरल सेक्स को भी बलात्कार की परिभाषा में शामिल कर लिया गया. साथ ही इस परिभाषा में पत्नी के साथ जबर्दस्ती को बलात्कार न मानने वाले प्रावधान में भी कुछ मामूली बदलाव कर दिया गया. इसके बाद से पत्नी के साथ जबर्दस्ती के कैसे भी यौन संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता. ऐसे में धारा 377 की जो उपयोगिता पहले पीड़ित पत्नियों के लिए ‘अप्राकृतिक’ यौन उत्पीड़न को लेकर थी अब कानूनी विरोधाभास में उलझ कर रह गई है. दूसरी तरफ यह धारा सहमति से संबंध बनाने वाले समलैंगिकों को आजीवन कारावास तक की सजा दिलाने के लिए पर्याप्त है.

धारा 377 से जुड़ा यह विवाद तो ऐसा है जिस पर अभी चर्चा तक शुरू नहीं हुई है. इससे पहले ही यह धारा आज ऐसे विमर्श को जन्म दे चुकी है जिसके संवैधानिक, विधिक, धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक पहलू भी हैं. इन पहलुओं को टटोलने से पहले जानते हैं कि आखिर धारा 377 है क्या? भारतीय दंड संहिता की धारा 377 प्रकृति-विरुद्ध अपराध को परिभाषित करते हुए कहती है कि ‘जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीव-जंतु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इंद्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा.’ इसी धारा में आगे एक स्पष्टीकरण भी है जो कहता है कि ‘इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इंद्रिय भोग करने के लिए प्रवेशन(पेनिट्रेशन) पर्याप्त है.’

आम तौर पर यौन अपराध तभी अपराध माने जाते हैं जब वे किसी की सहमति के बिना किए जाएं. लेकिन धारा 377 में कहीं भी सहमति का जिक्र नहीं है. इस कारण यह धारा समलैंगिक पुरुषों के सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को भी अपराध की श्रेणी में पहुंचा देती है. इस धारा के विवादस्पद होने का मुख्य कारण भी यही है. 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस धारा को उस हद तक समाप्त कर दिया था, जहां तक यह सहमति से बनाए गए संबंधों पर रोक लगाती थी. लेकिन दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे दोबारा से इसके मूल स्वरुप में पहुंचा दिया है.

इस धारा के बनने, संशोधित होने और दोबारा से वही बन जाने के सफर को उसी क्रम में देखते हैं.

दिल्ली की एक संस्था है ‘नाज़ फाउंडेशन’. यह संस्था काफी समय से एड्स की रोकथाम और इसके प्रति जागरूकता फ़ैलाने का काम कर रही है. 2001 में इसी संस्था ने दिल्ली उच्च न्यायालय से धारा 377 को गैर-संवैधानिक घोषित करने की मांग की थी. इसके बारे में संस्था की संस्थापक अंजलि गोपालन बताती हैं, ‘समलैंगिक संबंध बनाने वाले पुरुष एड्स होने पर भी सामने नहीं आते. उन्हें डर होता है कि धारा 377 के तहत उन्हें सजा न हो जाए. ऐसे में एड्स की रोकथाम तो क्या संक्रमित लोगों की पहचान भी नहीं हो पाती.’ अंजलि आगे बताती हैं, ‘पुलिस अधिकारियों द्वारा समलैंगिक लोगों के उत्पीड़न के भी कई मामले हुए हैं. ऐसे में वे लोग सुरक्षित यौन संबंध बनाने के लिए चिकित्सकीय सामग्री खरीदते वक्त भी घबराते थे. हमारी संस्था के लोग यह सामग्री उन्हें बांटते थे. ऐसे में हम पर यह आरोप लगता था कि हम धारा 377 के अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं. कई बार हमारे कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया.’

इन्हीं कारणों से नाज़ फाउंडेशन दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंची. फाउंडेशन की ओर से दाखिल की गई याचिका में कहा गया कि धारा 377 कई लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है. साथ ही यह भी कहा गया कि यह धारा समलैंगिक लोगों के एक समूह को ही निशाना बना रही है. इस समूह को अमूमन एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाईसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) कहा जाता है. इस याचिका के समर्थन में कई अन्य लोग भी उच्च न्यायालय पहुंचे. इनमें एलजीबीटी समुदाय के लोग और उनके अभिभावकों का एक संगठन भी शामिल था. इसी मामले में समलैंगिक लोग पहली बार खुल कर अपने अधिकारों के लिए सामने आए. हालांकि इससे पहले भी एलजीबीटी छोटे-छोटे स्तर पर अपनी पहचान बना रहे थे. मुंबई में 1990 में ही ‘बॉम्बे दोस्त’ नाम से समलैंगिक लोगों का एक अखबार निकलने लगा था. इन लोगों ने 1994 में एलजीबीटी अधिकारों के लिए ‘हमसफ़र’ ट्रस्ट भी बनाया था. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर कभी भी एलजीबीटी के अधिकारों की बात पहले नहीं हुई थी.

अब न्यायालय को यह तय करना था कि क्या धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21, 14 और 15 का अतिक्रमण करती है अथवा नहीं. यह फैसला करने में न्यायालय ने लगभग नौ साल का समय लिया. इस बीच धारा 377 के हर पहलू और उसकी संवैधानिक मान्यता पर बहस हुई. नाज़ फाउंडेशन ने अपनी याचिका में यह तर्क भी दिया कि विधि आयोग भी अपनी 172वीं रिपोर्ट में धारा 377 को हटाने की संस्तुति कर चुका है. दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस सन्दर्भ में केंद्र सरकार से जवाब मांगा. केंद्र की तरफ से दो विरोधाभासी जवाब दाखिल किए गए. केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने शपथपत्र दाखिल करते हुए कहा कि यह धारा एड्स की रोकथाम में बाधा उत्पन्न करती है लिहाजा इसे हट जाना चाहिए. दूसरी तरफ गृह मंत्रालय ने इसे बनाए रखने की बात कही. गृह मंत्रालय ने अपने शपथपत्र में कहा कि धारा 377 बच्चों पर होने वाले अपराध एवं बलात्कार संबंधी कानून की कमियों को भरने का काम करती है. हालांकि केंद्र सरकार के इस तर्क का आज कोई महत्व नहीं रह गया है. बच्चों के लिए 2012 में अलग से ‘बच्चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम, 2012′ बन चुका है. साथ ही बलात्कार की परिभाषा की जिन कमियों को धारा 377 पूरा करती थी उन कमियों को भी अब हटाया जा चुका है. जैसा कि जिक्र किया जा चुका है 2013 के संशोधन में बलात्कार की नई परिभाषा बन चुकी है.  बहरहाल, अभी लौटते हैं गृह मंत्रालय के शपथपत्र पर. गृह मंत्रालय ने इस धारा को बनाए रखने का दूसरा तर्क दिया, ‘भारतीय समाज इसकी अनुमति नहीं देता और यह कारण ही इस कानून को बनाए रखने के लिए काफी है. कानून समाज से अलग नहीं चल सकता.’

दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा तर्क था कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करती है. उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी भी व्यक्ति से ‘सेक्स’ के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता जिसमें उस व्यक्ति की ‘सेक्शुअल ओरिएंटेशन’(यौन अभिरुचि) भी शामिल है. लिहाजा किसी के यौन झुकाव के आधार पर भेदभाव करना भी मौलिक अधिकारों का हनन है. इस तर्क ने एक नई बहस को जन्म दिया कि क्या किसी व्यक्ति की यौन अभिरुचि जन्म से ही निर्धारित होती है और क्या उसे बदला जा सकता है अथवा नहीं. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि समलैंगिक लोग प्राकृतिक रूप से समलैंगिक लोगों के प्रति ही आकर्षित होते हैं. इस तर्क के समर्थन में उन्होंने कई मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों और यौन-विज्ञानियों की रिपोर्टें पेश की. जिनके अनुसार समलैंगिकता को प्राकृतिक माना गया था. याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि दुनिया की सबसे बड़ी मनोचिकित्सक संस्थाएं भी अब समलैंगिकता को कोई मानसिक रोग नहीं बल्कि एक प्राकृतिक लक्षण मान चुकी हैं जिसे बदला या सुधारा नहीं जा सकता. दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि समलैंगिकता प्राकृतिक नहीं बल्कि एक मानसिक बीमारी है और इसे सुधारा जा सकता है. हालांकि इसे सुधारे जाने के कोई भी वैज्ञानिक तथ्य प्रतिवादी पक्ष ने पेश नहीं किए.

याचिकाकर्ताओं का दूसरा बड़ा तर्क था कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करती है. अनुच्छेद 21 के अनुसार हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है. इस अधिकार में सम्मान से जीवन जीना और गोपनीयता/ एकांतता का अधिकार भी शामिल है. इसी अनुच्छेद का सहारा लेते हुए याचिकर्ताओं ने कहा कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा से एकांत में जो भी करते हैं उसका उन्हें पूरा अधिकार है. साथ ही उन्होंने यह तर्क भी दिया कि इस अधिकार पर तभी रोक लगाई जा सकती है जब किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य राष्ट्रहित के लिए नुकसानदेह हो.

संविधान के अनुच्छेद 14 के अतिक्रमण की बात भी याचिकाकर्ताओं द्वारा कही गई. उनके अनुसार हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के पूरा कानूनी संरक्षण मिलने का अधिकार है. लेकिन समलैंगिक व्यक्ति एड्स जैसी जानलेवा बीमारी होने पर भी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं ले पाते क्योंकि धारा 377 उन्हें अपराधी घोषित कर देती है. ऐसे में उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं लेने के अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है. इस तर्क के विरोध में प्रतिवादी पक्ष ने कोर्ट को बताया कि समलैंगिकता स्वयं में भी एड्स जैसी बीमारी को न्योता देती है. लेकिन कोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष के इस तर्क को नकारते हुए माना कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी धारा 377 को एड्स की रोकथाम में एक बाधा मानता है. साथ ही कोर्ट में ऐसे कोई भी वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत नहीं किए गए थे जिनसे साबित होता हो कि समलैंगिकता के कारण एड्स को बढ़ावा मिलता हो.

इन तर्कों के साथ ही याचिकाकर्ता ने धारा 377 के मूल की भी बात कही. उन्होंने बताया कि इस धारा को 1860 में अंग्रेजों द्वारा भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया था. उस वक्त इसे ईसाई धर्म में भी अनैतिक माना जाता था. लेकिन 1967 में ब्रिटेन ने भी समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता दे दी है.

केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय में धारा 377 को बनाए रखने के तीन मुख्य कारण बताए थे. वह थे सार्वजनिक नैतिकता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वस्थ वातावरण. इस पर उच्च न्यायालय ने माना कि ‘समलैंगिकता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वस्थ वातावरण को कैसे नुकसान पहुंचाएगी इसके कोई भी तथ्य केंद्र ने पेश नहीं किए हैं. न कोई शपथपत्र ही दाखिल किया है. और यदि किसी तरह की नैतिकता व्यापक राष्ट्रहित के पैमानों पर खरी उतर सकती है तो वह ‘संवैधानिक नैतिकता’ है ‘सार्वजनिक नैतिकता’ नहीं.’ इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 377 पहली नज़र में तो किसी विशेष समुदाय को नुकसान पहुंचाती नहीं दिखती लेकिन वास्तव में यह समलैंगिकों के उत्पीड़न का काम करती है.

दो जुलाई 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में दे दिया. 105 पन्नों के इस फैसले का सार बताते हुए न्यायालय ने कहा ‘हम घोषित करते हैं कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377, जिस हद तक वह वयस्क व्यक्तियों द्वारा एकांत में सहमति से बनाए गए यौन संबंधों का अपराधीकरण करती है, संविधान के अनुच्छेद 21, 14 और 15 का उल्लंघन है.’ इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इस धारा के प्रावधान बिना सहमति के बनाए गए यौन संबंधों पर पहले की तरह ही लागू होंगे.

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