सोच के सांचे बदलने का सबक

0
65

पिछले कुछ सालों में देश की राजनीति जिस तेजी से बदली है उसने नेताओं से लेकर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों तक को चौंका दिया है. जाहिर सी बात है, जनता की रग-रग से वाकिफ होने का दावा करने वाले नेता, समाजशास्त्री और विश्लेषक इस बदलाव को भांपने में पीछे रह गए. सतह के नीचे बहुत कुछ बहुत तेजी से बदल रहा था, लेकिन लोग इसे पकड़ पाने, महसूस कर पाने में असफल रहे. यही कारण है कि आजकल आने वाले चुनाव परिणाम सभी को चौंका देते हैं. जिस पार्टी को बहुमत मिलता है वह भी हैरान रह जाती है क्योंकि उसने भी इस प्रचंड बहुमत की कल्पना नहीं की होती और जिसकी जमानत जब्त हो जाती है वह भी अवाक और हैरान रह जाता है.

हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ही देखें तो 224 सीटों के साथ भले ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने खुद को सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित किया है लेकिन पार्टी के किसी नेता को इतने बड़े बहुमत की उम्मीद नहीं थी. उसी प्रकार कांग्रेस को भी इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि इतना बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ेगा.

पंजाब में तो 46 साल से चला आ रहा इतिहास ही बदल गया. यहां राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं आई थी. यानी जो पार्टी सत्ता में होती थी उसे अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ता था. लेकिन इस बार एक नया इतिहास रचा गया. शिरोमनि अकाली दल (बादल)-भाजपा गठबंधन न सिर्फ दोबारा सत्ता में आने में सफल रहा बल्कि शिरोमनि अकाली दल तो पिछले चुनाव के मुकाबले अपनी सीटें बढ़ाने में भी कामयाब रहा. उसे पिछले चुनाव के मुकाबले सात सीटें अधिक मिलीं. इससे पहले राज्य में आलम यह था कि सत्तासीन पार्टी इस बात के लिए तैयार रहती थी कि अगली बार उसे विपक्ष में बैठना है. खैर, इस ऐतिहासिक क्षण ने सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इनकमबेंसी को इतिहास की बात बना दिया. अब का समय प्रो इनकमबेंसी का है. यानी जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा वह दोबारा सत्ता में आएगा.

एंटी इनकमबेंसी युग के सबसे बड़े उदाहरण रहे पंजाब ने भले ही 46 साल से यहां की राजनीति का स्थायी भाव रही एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदला है लेकिन अन्य राज्यों में एंटी इनकमबेंसी नामक कारक के अप्रभावी होने की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. पिछले कुछ समय के चुनाव परिणामों को अगर हम देखें तो देश की बदली राजनीति और जनता के बदले मानस को समझना आसान हो जाएगा. बिहार, हरियाणा, दिल्ली तथा गुजरात जैसे राज्यों से एक नई राजनीति की शुरुआत हुई है. इन राज्यों में सरकारें एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदलते हुए दोबारा चुनकर सत्ता में आईं. अलग-अलग कारणों से यहां की सरकारें भले ही विवादों में रही हों लेकिन लोगों ने उस पर ध्यान न देकर उन सरकारों के विकास और गवर्नेंस पर अपनी मोहर लगाई. अब पूरे देश में उसी विकास और गवर्नेंस की बयार है. चारों तरफ विकास और सुशासन की चर्चा है. जनता के मन में विकास और सुशासन के प्रति इसी आग्रह ने वर्तमान राजनीतिक दलों को अपने चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति में बदलाव करने पर मजबूर किया. जो बदल गए हैं या बदल रहे हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह अखाड़े में चित पड़ा हुआ है.

बदलाव की इस बयार में सबसे अधिक परिवर्तन उन क्षेत्रीय दलों में आया है जो पिछले कुछ समय तक संकीर्णता के दायरे में जी रहे थे. किसी खास धर्म, पंथ, जाति, मुद्दे या पहचान के आधार पर राजनीति करने वाले इन दलों के राजनीतिक दृष्टिकोण में सबसे अधिक विस्तार आया है. बहुत तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी राजनीति से समाज के बाकी तबकों को जोड़ने की कोशिश की है या फिर यह कह सकते हैं कि अपनी राजनीति को उन्होंने कुछ इस ढंग से विस्तार दिया है कि उसमें अब अपने परंपरागत आधार के अलावा बाकी के लिए भी स्थान है. इन दलों ने अपने आप को सर्वग्राही बनाते हुए समाज के सभी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बनाने की कोशिश की है. बीते कुछ समय में इन क्षेत्रीय दलों ने जहां अपनी राजनीति करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाया है वहीं अपनी क्षेत्रीय पहचान और दृष्टि को राष्ट्रीय तथा सर्वसमावेशी बनाने की कोशिश की है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिस तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने खुद को राष्ट्रीय बनाने की शुरुआत की है शायद उस गति से राष्ट्रीय दल अपना क्षेत्रीयकरण नहीं कर पाए हैं.
विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों ने साबित किया है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां जनता की नब्ज पर जिस तरह की पकड़ उनकी है उससे राष्ट्रीय दल बहुत दूर हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में राष्ट्रीय दलों की स्थिति इतनी दयनीय है. इन राज्यों में जनता ने पिछले सालों में क्षेत्रीय दलों पर अपना विश्वास दिखाते हुए राष्ट्रीय दलों को लगातार नकारा है. उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम इसका ताजा उदाहरण है.

क्षेत्रीय दलों में खुद को समाज के सभी वर्गों से जोड़ने की जो बेचैनी दिखाई दे रही है उसके पीछे बड़ा कारण उनके भीतर अपने जनाधार का विस्तार करने की इच्छा है. चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार या फिर पंजाब. अभी तक स्थिति यह थी कि पार्टियां अपने सीमित वोट बैंक को ही लेकर आगे चलती थीं. उनके सीमित लेकिन समर्पित वोटर थे. इससे बड़ी समस्या इन दलों को यह हुई कि ये कभी भी अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाए, इन्हें हमेशा दूसरे दलों या अधिकांश परिस्थितियों में राष्ट्रीय दलों का सहयोग लेना पड़ता था.

समय की मांग है कि राजनीतिक दल चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति बदलें. जो बदल गए हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह चित पड़ा है

उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने सिर्फ दलितों की राजनीति की. दलित आंदोलन से उपजी इस पार्टी ने न सिर्फ दलित हितों की बात की वरन दलितों के मन में इस बात को अच्छी तरह बैठा दिया कि वही उनकी एकमात्र हितैषी पार्टी है. अगर वे सुखी, सुरक्षित तथा सवर्णों के अत्याचार से मुक्त रहते हुए एक सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं तो उन्हें उसका साथ देना होगा.

सदियों से सवर्णों के हाथों प्रताड़ित दलित बड़ी संख्या में बसपा के साथ जुड़े. सवर्णों को ललकारने एवं गरियाने की बसपा की रणनीति ने उसे दलितों के हृदय में स्थापित कर दिया. लेकिन दलितों के इस अपार और स्थायी समर्थन के बावजूद भी पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आने में सफल नहीं हो पाई. हर बार उसे किसी न किसी दल से गठबंधन करना पड़ता. यही कारण है कि पार्टी ने अपनी रणनीति बदली. उसने सोचा कि अगर अपने दम पर यूपी में सत्ता में आना है तो उसे दलितों के साथ ही अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त करना होगा. इसी के तहत पार्टी ने दूसरी जातियों को लुभाना शुरू किया. उसने बहुजन की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का नारा दिया. जो पार्टी ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ सरीखे नारे दिया करती थी उसका नारा बदल गया. अब वह ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ सरीखे जुमलों का सहारा लेती दिखने लगी. पार्टी ने चुनावों में न सिर्फ बड़ी संख्या में सवर्णों को टिकट दिया बल्कि बड़ी संख्या में उन्हें मंत्री भी बनाया. पार्टी ने दूसरे वर्गों को अपनी राजनीतिक मजबूरी के चलते खुद से जोड़ने को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here