समलैंगिकता की विषमता

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उच्च्तम न्यायालय के फैल्ले के खिलाफ प्रदर्श
उच्च्तम न्यायालय के फैल्ले के खिलाफ प्रदर्शन. फोटो:विजय पांडे

समलैंगिकों की इस मांग को कि वे जो अपने दोस्तों के साथ करते हैं वह कानूनी अपराध नहीं माना जाए, समझा जा सकता है. लेकिन अत्याचार से पीड़ित होने का उनका त्रास कानूनी उतना नहीं है जितना सामाजिक और सांस्कृतिक. वे कानूनी रूप से लगातार तंग किए जा रहे हों इसके कोई असंख्य उदाहरण तो कहीं नहीं हैं.

लॉड मैकॉले की अध्यक्षता में चले विधि आयोग द्वारा कोई एक सौ उनचास साल पहले बनाए गए इस कानून के तहत अब तक जो कार्रवाई हुई है उसके आंकड़ों से इतना तो साफ है कि अपने देश की पुलिस समलैंगिकों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने में कोई बहुत सक्रिय नहीं रही है. उन अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं जिनने अपने विक्टोरियन युग की नैतिकता के चलते भारत में यह कानून बनाया. और आजाद भारत में भी नहीं जिसने हिजड़ों की चली आ रही पुरानी संस्था और अनैसर्गिक मैथुन व्यवहार को सम्मान नहीं तो एक तरह की सामाजिकता जरूर दी है. चूंकि यह कानून सख्ती से और व्यापक रूप से कभी लागू ही नहीं किया गया इसलिए कानूनी उत्पीड़न की शिकायत नहीं की जा सकती.

हां, यह हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए कानून यानी धारा 377 का होना ही उत्पीड़न का पर्याप्त कारण हो. लेकिन यह भी उत्पीड़न तभी बन सकता है जब सामाजिक और पारंपरिक मान्यताओं का दबाव भी बहुत ज्यादा हो. मेरा निवेदन है कि न्यायालय के ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बताए जाने वाले फैसलों से समाज की पारंपरिक मान्यताएं नहीं बदलती. समलैंगिकता पर अदालती फैसला तो भारत के बहुत छोटे से छोटे वर्ग को प्रभावित करता. शारदा एक्ट और दहेज विरोधी कानून तो लगभग हर परिवार को प्रभावित करता है. फिर भी न दहेज प्रथा रुकी है व बाल विवाह.

यह दलील कानून और अदालती फैसलों को अप्रभावी बताने के लिए नहीं है. कहना बस यही है कि कानून और अदालती फैसलों से सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं और पूर्वाग्रह नहीं बदलते. जो कानून सामाजिक चलन को कानूनी मंजूरी देता है वही सचमुच और बिना बड़ी कोशिश के लागू हो जाता है. कानून को समाज के पीछे चलना चाहिए. कानून के जरिए समाज को बदलने की कोशिशें सफल नहीं होती. साम्राज्य चलाने वाले कानून से तब ही समाज को बदलने की कोशिश करते हैं जब वे उसे नहीं जानते और या उसमें बदलाव लाने के आंतरिक उपाय उनकी समझ से बाहर होते हैं.

धारा 377 से सहमति की निजी समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने की कोशिशों में लगे लोग समाज के रवैये और पूर्वाग्रह को बदलने का बुनियादी सामाजिक कार्य नहीं कर रहे. अगर उनके ध्यान में ऐसा बुनियादी बदलाव लाना होता तो वे अपने समर्थन में आए अदालत के फैसले पर इतना जश्न नहीं मनाते. आप सच पूछें तो उनका जश्न समाज की संवेदनशीलता पर चोट ही करता है. चोट करना भी बदलाव लाने का एक तरीका है. लेकिन वह तभी असर करता है जब उसकी प्रेरणा अंदर से आती है.

समलैंगिकता को कुल समाज स्वीकार करे इसकी प्रेरणा भारतीय समाज से निकल कर नहीं आई है. समलैंगिक लॉबी के व्यवहार और तौर-तरीके से ही साफ दिखता है कि इसकी प्रेरणा यूरोपीय या पश्चिमी समाज से आई है. उनके व्यवहार से साफ लगता है कि यह एक ऐसे समाज से आई है जिसमें विषमता और असमानता के ज्यादा बुनियादी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलू लगभग हल कर लिए गए हैं. यह एक ऐसे समाज की समस्या लगती है जो सहज उपभोग से अघाया हुआ समाज है और स्वाभाविक संवेदनों से इतना ऊब गया है कि उसे नित नए और सनसनीखेज उपायों की जरूरत होती है. यूरोप का विकसित और परमिसिव समाज समलैंगिकों की समानता की लड़ाई लड़ सकता है. लेकिन भुखमरी, बेरोजगारी और सब तरह की वंचनाओं में किसी प्रकार जीते हुए रोटी, कपड़ा और मकान की लड़ाई लड़ने वाले अधिसंख्य भारतीय समाज में समलैंगिकों की समानता तो कोई बड़ा मुद्दा नहीं बनती. भारत के अंदर से अगर यह लड़ाई निकली होती तो हिजड़ों की दयनीय हालत पर ध्यान गया होता. अदालतों में जाने वाले और हवाई यात्राओं से प्रदर्शनों में भाग लेने वाले भारत के समलैंगिक कौन हैं यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है.

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