राहत का अल्पविराम

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12 नवंबर, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद रिहा हुई 36 वर्षीया सोनी सोरी की कहानी जितनी माओवादियों और पुलिस के अत्याचारों के बीच फंसे एक आम आदिवासी की मुश्किलें दिखाती है उतनी ही ‘माओवादी या माओवादी समर्थक’ होने के धुंधले आरोपों के तहत छत्तीसगढ़ की जेलों में न जाने कितने लंबे समय के लिए धकेल दिए गए सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों की त्रासदी भी. माओवादी संघर्ष के सबसे सघन गढ़ के तौर पर पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में बसे जलेबी गांव में एक प्राइमरी स्कूल शिक्षक के तौर पर लगभग 100 बच्चों को पढ़ाने वाली सोनी सोरी नई पीढ़ी के उन पढ़े-लिखे आदिवासियों में से हैं जिन्हें अपने राजनीतिक रूप से सचेत होने की भारी कीमत चुकानी पड़ी है.

बीते पखवाड़े सोनी अपनी गिरफ्तारी के बाद से शुरू हुई यंत्रणा भरी यात्रा के साक्षी और सह-यात्री रहे लिंगाराम कोडोपी के साथ राजधानी दिल्ली पहुंचीं. यह यात्रा चार अक्टूबर, 2011 को शुरू हुई थी. तहलका से विस्तृत बातचीत के दौरान सोनी छत्तीसगढ़ की जेलों में फंसे सैकड़ों आदिवासियों की वास्तविक स्थिति के साथ-साथ भविष्य को लेकर अपनी शंकाएं और आशाएं हमसे साझा करती हैं. राजधानी स्थित एक गैरसरकारी संगठन के दफ्तर में हुई इस मुलाकात के दौरान सोनी के साथ लिंगाराम और सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार भी मौजूद थे. सोनी की रिहाई पर खुशी जाहिर करते हुए हिमांशु कुमार कहते हैं, ‘पिछले दो सालों के संघर्ष के बाद आखिरकार सोनी सोरी और लिंगाराम कोडोपी को जमानत मिल गई. लेकिन मैं जब से इन्हें दिल्ली लेकर आया हूं दिल्ली पुलिस ने हमें परेशान करना शुरू कर दिया है. सोनी हमारे घर में रह रही हैं. जब से हम दिल्ली आए हैं, हमारे मकान मालिक को स्थानीय थाने से लगातार फोन आ रहे हैं. पुलिस घर भी आई और फिर हमें थाने बुलाया गया. खैर, यह तो अपेक्षित ही था पर अब हमारा पूरा ध्यान दिसंबर में सोनी की अगली सुनवाई पर है. सोनी पर दर्ज हुए कुल सात मामलों में से छह में वे बरी हो चुकी हैं और हमें विश्वास है कि जल्दी ही दोनों बचे हुए आखिरी केस में भी बरी कर दिए जाएंगे.’

दरअसल अक्टूबर 2011 में पुलिस ने सोनी को दंतेवाड़ा में गिरफ्तार किया था. उन पर माओवादी समर्थक होने, पुलिस-बल पर हमला करने, ट्रकों को उड़ाने का प्रयास करने के साथ-साथ उगाही की रकम वसूलने में माओवादियों की मदद करने जैसे गंभीर आरोप लगे. अपनी गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले तहलका के दफ्तर में दिए अपने विस्तृत साक्षात्कार के दौरान सोनी बार-बार यह कहती रहीं  कि वे छत्तीसगढ़ के गांव में बच्चों को पढ़ाती थीं और उन्हें अपने क्षेत्र में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से फंसाया गया है. सोनी के साथ-साथ लिंगाराम भी माओवादियों और स्थानीय पुलिस के बीच जारी तनावपूर्ण संघर्ष की भेंट चढ़े. अपनी गिरफ्तारी से पहले  लिंगाराम दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके दंतेवाड़ा के गांवों में माओवादी और पुलिसिया हिंसा का सामना कर रहे आदिवासी परिवारों के बयान दर्ज कर रहे थे. नौ सितंबर, 2011 की शाम अचानक उनको उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया. यहां से शुरू हुए हिंसा के दुश्चक्र को याद करते हुए लिंगाराम बताते हैं, ‘उन्होंने मुझ पर लाला से माओवादियों के लिए पैसे लेने का आरोप लगा दिया. थाने में मुझे टायलेट में बंद कर दिया गया. गालियां और पिटाई तो आम बात थी. फिर जेल पहुंचते ही पहले दिन जेलर ने मुझसे कहा कि मैं बहुत बोलता हूं  इसलिए मुझे इतना पीटा जाएगा कि मैं वापस खड़ा न हो पाऊं. शुरू-शुरू में तो मैं बाहर निकलने की पूरी उम्मीद खो चुका था. अब जब बाहर आया हूं तो सोच रहा हूं कि वापस गांव नहीं जाऊंगा. वहां वे लोग अब हमें रहने नहीं देंगे. लेकिन मैं अपनी जमीन और अपने लोगों के लिए कुछ करना चाहता हूं…सोचता हूं… जब पूरी तरह रिहा हो जाऊंगा तब दिल्ली या किसी दूसरे शहर में रहकर दंतेवाड़ा के लोगों की समस्याएं बाहर लाने के लिए काम करूंगा.’

लेकिन सोनी सोरी किसी भी कीमत पर दंतेवाड़ा से अलग नहीं होना चाहतीं. भयानक शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना और माओवादियों के साथ-साथ स्थानीय पुलिस के निशाने पर रहने जैसे खतरों के बावजूद वे अपना जीवन दंतेवाड़ा के जंगलों में बच्चों को पढ़ाते हुए बिताना चाहती हैं.

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‘सैकड़ों मासूम आदिवासियों को जेलों में रखा गया है, उन्हें न अपने जुर्म का कुछ पता है न भविष्य का’

लगभग दो साल बाद जगदलपुर जेल से जमानत पर रिहा हुई सोनी सोरी से बातचीत के प्रमुख अंश: 

 

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