यूं दोहराया इतिहास ने खुद को हिमाचल में

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यह २४ मार्च, १९९८ की बात है। हिमाचल में भाजपा-हिमाचल विकास कांग्रेस की गठबंधन सरकार का शपथ ग्रहण समारोह था। जगह थी राजभवन का लॉन और मंच पर अन्य नेताओं के अलावा मौजूद थे तब भाजपा के महासचिव और हिमाचल मामलों के प्रभारी नरेंद्र मोदी। प्रेम कुमार धूमल जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो मोदी के चेहरे पर एक ”विजयी मुस्कराहट” थी। आखिर उस समय के कद्दावर नेता शांता कुमार के मुकाबले उन्होंने ही धूमल को तरजीह दी थी। धूमल ने मोदी के इस भरोसे का सम्मान रखा और सिर्फ बहुमत लायक विधायकों और हिमाचल विकास कांग्रेस के मुखिया और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुख राम के असंख्य दबावों के बावजूद पूरे पांच साल सरकार चलाई। इससे पहले शांता कुमार के नेतृत्व वाली जनता पार्टी (१९७७) और भाजपा (१९९०) सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थीं।
और इसके बाद की तस्वीर २७ दिसंबर, २०१७ की है। जगह रिज मैदान, शिमला। इस बार भी भाजपा का ही मुख्यमंत्री शपथ ले रहा है। बस चेहरा अलग है और मंच पर बैठे नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री हो चुके हैं। और कभी मोदी के प्रिय रहे धूमल अन्य नेताओं के साथ बैठे भाजपा के बीच सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया को देख रहे हैं। भाग्य ने साथ दिया होता तो मोदी के सामने वे ही २७ दिसंबर को शपथ ले रहे होते। लेकिन चुनाव में हार ने उनके लिए सारे समीकरण बदल दिए। भाजपा की अगली पीढ़ी ने सत्ता का आरोहण कर लिया है और धूमल के राजनीतिक भविष्य के विकल्प अब सिर्फ आलाकमान के हाथ में हैं।
खुद धूमल का कहना है कि उन्होंने हमेशा वही किया जो आलाकमान ने सौंपा।  ‘भविष्य में भी ऐसा ही होगा। मेरे लिए पार्टी सबसे ऊपर है। मुझे खुशी है हिमाचल के लोगों ने भाजपा को इतना मजबूत बहुमत दिया। जयराम सरकार को मेरा पूरा सहयोग रहेगा, धूमल ने तहलका से बातचीत में कहा।
जयराम ने ११ अन्य मंत्रियों के साथ शपथ ली और इस तरह ६८ सदस्यीय विधानसभा में अधिकतम  १२ मंत्री होने का कोटा पूरा कर लिया। दिलचस्प यह है कि जो १२ मंत्री बने उनमें मुख्यमंत्री सहित ६ राजपूत हैं। शायद प्रदेश में राजपूत मतदाताओं की ज्यादा तादाद को ध्यान में रखकर ऐसा किया गया है। और भी दिलचस्प यह है कि ११ में से ६ धूमल के समर्थक या उनकी पसंद के हैं। पहले १० मंत्री बनाने की सूची राज्यपाल को भेजी गयी थी लेकिन बाद में धूमल के जोर देने पर वरिष्ठ विधायक किशन कपूर का नाम भी शपथ से महज आधा घंटा पहले सूची में जोड़ा गया। यह भी ध्यान देने योग्य है कि केंद्रीय स्वास्थय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के बिलासपुर जिले और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के जिले हमीरपुर से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया।
सौम्य और ईमानदार छवि वाले जय राम ठाकुर को अब भाजपा की भविष्य की चुनौतियों को झेलना है। सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती २०१९ में आएगी जब लोक सभा के चुनाव होंगे और सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती तत्काल रूप से उनके सामने खड़ी है और वह है प्रदेश के ऊपर ५०,००० करोड़ रूपये का क़र्ज़। प्रदेश के सीमित आर्थिक संसाधनों में से उन्हें सूबे की माली हालत को पटरी पर लाने की जुगत भिड़ानी है और साथ ही केंद्र से प्रदेश के लिए बड़ी परियोजनाओं का भी इंतजाम करना है। धूमल के २००७-२०१२ के सत्ता काल के विपरीत जय राम के सामने सुखद स्थिति यह है कि केंद्र में उनकी अपनी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार है लिहाजा पैसे और परियोजनाओं का आना खुद जय राम के प्रबंध कौशल पर निर्भर करेगा।
मुख्यमंत्री २९ दिसंबर को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले। जयराम मोदी के अलावा कुछ अन्य केंद्रीय मंत्रियों से भी मिले। सूत्रों के मुताबिक जयराम ने मुलाकात में प्रदेश की योजनाओं की जानकारी भी दी और आर्थिक संकट को लेकर भी चर्चा की ताकि इस संकट से उबरने का रास्ता निकाला जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि हिमाचल में भाजपा सरकार बनेगी तो यहां पर विकास डबल इंजन के सहारे होगा और विकास में और गति आएगी। राज्य की मौजूदा स्थिति ऐसी है कि राज्य के पास कर्मचारियों को वेतन और पेंशनरों को पेंशन देने के लिए भी क़र्ज़ लेना पड़ रहा है।    हालात उस समय और खराब होंगे, जब पंजाब में नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होंगी। नया पे-स्केल लागू होने पर राज्य पर और ज्यादा आर्थिक भार पड़ेगा। वहीं, विकास की गति को भी बनाए रखना है और लोगों ने नई सरकार से जो उम्मीदें लगा रखी है, उसे भी पूरा करना है। ऐसे में वित्त प्रबंधन के साथ-साथ आय के और स्रोत खोजना समय की मांग है। सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती पिछली कांग्रेस सरकार की घोषणाएं और शिलान्यास हैं। इनके लिए पैसे का प्रबंधन करना भी अहम है।
जय राम के पास ४४ विधायकों का अच्छा ख़ासा बहुमत है और प्रदेश की चारों लोक सभा सीटों पर भाजपा के ही सांसद हैं जिनके जरिये वे केंद्र सरकार तक अपनी आवाज आसानी से पहुंचा सकते हैं। ”पिछली सरकार ने केंद्र से मिली आर्थिक मदद का इस्तेमाल ही नहीं किया और परियोजनाओं को भी ठीक से लागू नहीं किया। हम ऐसा नहीं होने देंगे। केंद्र के पैसे का पूरा उपयोग होगा और ज्यादा से ज्यादा परियोजनाएं लाने की कोशिश होगी ताकि हमारे युवाओं को इससे रोजगार का रास्ता भी निकल सके, तहलका से बातचीत में मुख्यमंत्री जय राम ने कहा।
उनके सामने रोजगार दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है। हिमाचल में निजी क्षेत्र सीमित सा है और सरकार के पास इतना पैसा नहीं कि बड़े पैमाने पर युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे खोल सके। ऐसे में जय राम के सामने प्रदेश के अपने संसाधनों को विकसित करने की चुनौती रहेगी खासकर पर्यटन के क्षेत्र में, जिसके विकास के प्रदेश में सर्वाधिक सम्भावना है। पिछली सरकार ने बेरोजगारों को भत्ता देने का वादा किया था और सत्ता के अंतिम महीनों में इस पर अमल की अपर्याप्त सी कोशिश भी  की। इसका न तो युवाओं को सही लाभ मिल पाया न राजनीतिक रूप से कांग्रेस को फायदा मिला।
जय राम के सामने अफशर शाही के साथ भी उचित तालमेल बिठाना होगा ताकि सरकार की योजनाएं सही से अपने अंजाम तक पहुँच सकें। भाजपा के बीच बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि जय राम की शराफत इसमें आड़े आ सकती है। हिमाचल में अफशरशाही को ”बेलगाम घोड़े” की तरह माना जाता है। यहाँ ज्यादातर अफसर किसी न किसी दाल के ख़ास रहे हैं।  पुराने सरकारों में यह साफ़ दीखता रहा है। हर मुख्यमंत्री के अपने चाहते अफसर रहे हैं। जयराम को निश्चित ही इससे बाहर निकलना होगा। नहीं तो सरकार में बदलाव की बात हवा में ही रह जाएगी।
सरकाघाट से शपथ ग्रहण समारोह में आये राहुल राणा हालांकि कहते हैं कि जयराम को प्रशासन का अनुभव है।  ” वे मंत्री रह चुके हैं। ठीक है अफशरशाही को लगाम में रखना ज़रूरी है लेकिन उन्हें बिना भेदभाव साथ लेकर चलना ज्यादा हितकर है। आखिर योजनाओं का खाका अफसरों ने ही बनाना है, राणा का कहना था।
जय राम मंत्रिमंडल में ६० फीसदी नए चेहरे यह इशारा करते हैं कि भाजपा आलाकमान ने पार्टी के भीतर अगली पंक्ति तैयार करने की रणनीति पर काम किया है। इन नए चेहरों में ज्यादातर किसी गुट विशेष से नहीं जुड़े हैं लिहाजा उन्हें जयराम के साथ माना जा सकता है। इस तरह जयराम प्रदेश भाजपा में अपना एक समर्थक वर्ग बना पाएंगे। हो सकता है दो -ढाई साल के बाद पुराने चेहरों को विदा कर और नए चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल किये जाएँ। वैसे मंत्रिमंडल में संतुलन दिखता है और भविष्य में असंतोष की गुंजाइश न के बराबर है। इसमें जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन साधने की पूरी कोशिश की गयी है।
नड्डा के बिलासपुर जिले को प्रतिनिधित्व न देने के पीछे सोच यह हो सकती है इस जिले का केंद्र  सरकार में नड्डा के जरिये प्रतिनिधित्व है। हाँ, धूमल के हमीरपुर जिले से किसी को न लेना थोड़ा हैरानी भरा ज़रूर है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि हो सकता है आने वाले समय में धूमल को मोदी सरकार में मंत्री पद मिले। या उनके सांसद बेटे अनुराग ठाकुर को मंत्री बना दिया जाए। वैसे धूमल को राज्यपाल बनाने के चर्चा चुनाव से पहले ही उनके विरोधी गुट ने चला रखी थी।
नतीजे आने के बाद बाद जैसी उठापटक भाजपा में देखने को मिली उसके पीछे कारण था धूमल का चुनाव हार जाना। सम्भवता भाजपा में धूमल के हारने की उम्मीद किसी को नहीं रही होगी। दिलचस्प यह है कि चुनाव हार जाने के बाद भी ४४ विधायकों में से २६ का समर्थन धूमल के साथ था। उन्हें मुख्यमंत्री मनोनीत करने की मांग भी हुई। यही कारण था कि १८ दिसंबर को नतीजे निकलने के बाद विधायक दल का नेता चुनने में भाजपा को एक हफ्ता लग गया। बीच में नाम नड्डा का भी चला लेकिन फैसला यही हुआ की चुने विधायकों में से ही नेता चुना जाए। जय राम के पक्ष में धूमल भी हुए और नड्डा भी लेकिन असल दबाव बनाया संघ ने। संघ ने यदि जोर न दिया होता तो सम्भवता जयराम मुख्यमंत्री न बनते। जयराम के नाम का प्रस्ताव प्रेम कुमार धूमल ने रखा और शांता कुमार व जेपी नड्डा ने उसका अनुमोदन किया। दरअसल संघ का पूरे घटनाक्रम के दौरान बराबर दखल रहा। हिमाचल में संघ के नेता इस दौरान काफी सक्रिय रहे।
आम लोगों का मानना है कि नए मुख्यमंत्री जय राम की अच्छी छवि उनकी काम आएगी। ”उन्हें क्षेत्रीय संतुलनों और जातीय समीकरणों के जाल से बचना होगा और अफसरों पर भी नजर रखनी होगी। यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो सफल रहेंगे, यह कहना था एक सरकारी कर्मचारी सुभाष पटियाल का। सुजानपुर के रहने वाले सुभाष वालिया ने कहा कि परिवर्तन के रूप में भाजपा ने जयराम का चयन करके समझदारी वाला फैसला किया है  युवा है और उनकी छवि साफ़ है।  ”जय राम कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं, सुभाष का आकलन था।

कांग्रेस के सामने चुनौती
सरकार भाजपा की बनी है और नया मुख्यमंत्री भी उसने चुना है लेकिन चुनौती कांग्रेस के सामने खड़ी हुई है। पिछले तीन दशक से हिमाचल में कांग्रेस की सारी राजनीति वीरभद्र सिंह के इर्द गिर्द घूम रही थी। जय राम जैसा युवा नेतृत्व भाजपा में ने आने से कांग्रेस को अब वीरभद्र सिंह, जो ८४ साल के हो चुके हैं, से बाहर निकलकर कुछ सोचना होगा। पार्टी में युवा नेताओं की कमी नहीं। आशा कुमारी को अब मौका मिल सकता है हालांकि वे ६० पार कर रही है। मुकेश अग्निहोत्री से लेकर सुखविंदर सुक्खू तक ५५ साल से काम के हैं लिहाजा उनके लिए अवसर बन सकते हैं। पार्टी के बीच बड़े दावेदार माने  जाने वाले गुरमुख सिंह बाली और कौल सिंह जैसे दिग्गज चुनाव हार चुके हैं। यही नहीं युवा तुर्क और कांग्रेस में भावी मुख्यमंत्री माने जाने वाले सुधीर शर्मा भी धर्मशाला में हार गए।
कांग्रेस के सामने संबसे बड़ी चुनौती २०१९ का लोक सभा चुनाव होगा। उसकी सरकार रहते ही प्रदेश की चारों सीटें २०१४ में भाजपा जीत गयी थी। अब तो केंद्र और प्रदेश दोनों में भाजपा की सरकार हैं लिहाजा कांग्रेस के सामने अपने पिछले प्रदर्शन को सुधारना बड़ी चुनौती जैसा होगा।
राजनीतिक विश्लेषक एसपी शर्मा मानते हैं कि वीरभद्र सिंह के प्रदेश कांग्रेस के पटल से बाहर होते ही पार्टी के सामने सवाल मुहं बाए खड़ा होगा। ”उसके पास प्रदेश में कोइ भी ऐसा नेता जिसकी प्रदेशव्यापी छवि हो। पार्टी के लिए २०१९ का चुनाव ही नहीं २०२२ का विधानसभा चुनाव भी बड़ी चुनौती होगा। उसके पास अच्छा मौक़ा उसी स्थिति में होगा यदि प्रदेश भाजपा सरकार अपनी लोकप्रियता खो दे या केंद्र में मोदी सरकार कमजोर हो जाए, शर्मा ने कहा।

राहुल पहुंचे शिमला
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी २९ दिसंबर को शिमला पहुंचे और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर हार से उपजी स्थिति की जानकारी ली। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू और अन्य नेता मौजूद थे। अभी चुने विधायकों को अपना नेता चुनना है और वीरभद्र सिंह खेमा कोशिश कर रहा है कि नेता प्रतिपक्ष के लिए सिंह का ही चुनाव हो। हालांकि उनके विरोधी इस पद के लिए किसी दूसरे को चुने जाने की वकालत कर रहे हैं. युवा कांग्रेस ने आरोप लगया कि उन्हें राहुल से मिलने नहीं दिया गया।