मुक्ति का मिथक

बाद इसके उसी लोकेशन पर एक शीतलपेय का शूट था. युवतियां बदल गईं. फिल्म निर्देशक माॅडलों को भद्र भाषा में गंभीर-चिंतनपरक मुद्रा बनाकर समझा रहा था- ‘मैडम लिप्स को ऐसे गोल करिए कि ‘ओरल’ का ‘जेस्चर’ लगे और ‘फेस पर फक्ड का एक्सप्रेशन’ (दैहिक आनंद के चरम की चेहरे पर अभिव्यक्ति) आना चाहिए.’ अंग्रेजी में दिए जाने वाले अश्लील निर्देश भी गूढ़ता अर्जित कर लेते हैं.

बहरहाल, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फैशन अपने अभीष्ट में परंपरागत और पूर्व निर्धारित सामाजिकता के ध्वंस पर अपना आकाश रचता है. वह जहां एक ओर स्त्री की देह की उत्तेजना का दोहन करता है, वहीं दूसरी ओर पुरुष को ‘सांस्कृतिक’ नहीं, ‘शिश्न-केंद्रित’ बनाता है. याद करें, पुरुष में यौनिकता की ‘प्रदर्शन प्रियता’ जो पूर्व में व्यक्ति की सरासर लंपटई लगती थी, अब वह विज्ञापन की दुनिया के ‘माचो मैन’ की अदा में बदल गई है. वस्त्रों में हेर-फेर करके ‘पुरुष’ को नया बनाने में वक्त जाया नहीं होता, जितना स्त्री को नया बनाने में. अब ‘ब्यूटी ऐंड बीस्ट’ का फंडा यहां भी गढ़ा जा रहा है. ‘ब्यूटी’ का अर्थ ‘चेहरे की सुंदरता’ और ‘कमनीयता’ से कम, उसकी अनावृत्त की जाने वाली ‘यौनिकता’ से ज्यादा है. इसलिए, कुछ ही वर्ष पूर्व जिन कपड़ों में ‘स्त्री’ घर के बाथरूम से बाहर नहीं आ पाती थी – वह उन्हीं कपड़ों में अब, चौराहों पर चहचहा रही है. अब देह पर वस्त्रों की न्यूनता स्त्री को ‘हॉट’ के विशेषण से अलंकृत करती है. उन्हें बताया जा रहा है कि माल के खरीदने में ‘चयन की स्वतंत्रता’ ही ‘स्त्री स्वतंत्रता’ है. फैशन के सिद्धांतकार कहते हैं ‘पर्सोना’ पढ़ाई नहीं, ‘परिधान’ से प्रकट होता है. इसलिए युवती जो परिधान पहनती है, वह उसका वक्तव्य है. मसलन वह रोमांटिक है. वह सेक्सी है. वह मैन-ईटर है. वैसे फैशन बाजार ने स्त्री के कई और भी वर्गीकरण और नाम आविष्कृत कर रखे हैं.

शशि थरूर ने एक बार अपने स्तंभ में लिख दिया था कि बाजार साड़ी को इसलिए बाहर कर रहा है चूकि उसमें स्त्री देह की ‘सनसनाती उद्दीप्तता’ िछप जाती है. जबकि बाजार के लिए ‘सेक्सुुएलिटी’ ही प्रधान है. साथ ही उन्होंने साड़ी को भारतीय स्त्री की ‘सांस्कृतिक गरिमा’ से भी जोड़ दिया था. नतीजतन, तमाम ‘नारीवादी समूह’ संगठित हो कर शशि थरूर पर पिल पड़े. यह ‘बाजार-दृष्टि’ का प्रायोजित आक्रमण था. स्त्री की गरिमा की परिभाषा तय करने वाला ये कौन? कहने की जरूरत नहीं कि अब इस ‘फैशन-बाजार समय’ में युवतियों के लिए साड़ी एक निहायत ही ‘लज्जास्पद’ परिधान है. वह ‘इथनिक’ है. वह सेक्सी फीगर वाली युवती को भी ‘भैनजी’ बना देती है.

आज स्त्री यह नहीं जानती कि अंतत: वह पुरुषवादी व्यवस्था का विरोध करती हुई पुरुष के इशारे पर ‘पुरुष’ के लिए पुरुष के अनुरूप खुद ही खुल और खोल रही है. आज स्त्री के ‘निजता’ के क्षेत्र को तोड़कर उसे ‘सार्वजनिक संपदा’ में बदल दिया गया है. मसलन, भारतीय स्त्री के वक्ष पर रहने वाले दुपट्टे या पल्ले को देखें. जो दुपट्टे से ढांका जाता था वह स्त्री की ‘यौनिक निजता’ को बचाता था. अब दुपट्टे के विस्थापन ने उसकी ‘निजता’ को पूरी तरह खोलकर ‘पुरुष दृष्टि’ के उपभोग के अनुकूल और सुलभ बना कर रख दिया है. यह प्रकट ‘यौनिकता’ है जो पब्लिक प्रदर्शन के परिक्षेत्र में है. यह प्रकारांतर से पुरुष की ‘यौन-आकांक्षा के’ अनुरूप स्त्री की ‘यौनिक निजता’ का खुशी-खुशी करवा लिया गया नया लोकार्पण है. पहले चरण में उसने स्थान बदला. वह वक्ष से थोड़ा उठा और गले से लिपटा रहने लगा. फिर वह गले के बजाय कंधे पर आ गया. बाद में वह कंधे से भी उड़ गया.

यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि खुले समाजों में  फैशन व्यवसाय का ‘स्पेस’ कम हुआ है. चूंकि जो पहले से ही पर्याप्त खुला हुआ है उसके खोलने में ‘थ्रिल’ नहीं है, वहां अब न्यूडिटी में वृद्धि की मांग है. थ्रिल तो अब एक ‘बंद समाज’ को खोलने में है. भारतीय समाज में अभी भी ‘वस्त्रों’ के जरिए स्त्री की ‘सामाजिकता’ परिभाषित होती है. दुर्भाग्यवश वह अभी भी ‘मां’, ‘बहन’, ‘बेटी’ की पहचान से मुक्त नहीं है. फैशन तभी अपना विस्तार कर पाता है, जब स्त्री को इन पहचानों से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाए. तभी वह अपनी सेक्सुएलिटी का संकोचहीन प्रदर्शन कर सकता है. भारतीय समाज में लोग अभी ‘बहन’ या ‘मां’ को ‘सेक्सी’ नहीं कह पा रहे हैं, लेकिन जिस तरह फैशन ‘परंपरागत सांस्कृतिक संकोच’ का ध्वंस कर रहा है, जल्दी पिता कह सकेगा, ‘वाउ! यू आर लुकिंग वेरी सेक्सी माय डॉटर. भाई अपनी बहन को कह सकेगा, ‘यू आर वेरी हॉट!’. कहना न होगा कि मीडिया से मिलकर ‘बाजार’ भारतीय पिताओं और भाइयों को इन संभावनाओं के लिए धीरे-धीरे तैयार कर ही रहा है. हालांकि महानगरीय अभिजन समाज में मां को बिच कहने का सांस्कृतिक साहस कुलदीपकों में आ चुका है.

बहरहाल, यह भारतीय समाज का पश्चिम के वर्जनाहीन खुलेपन की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया का पूर्वार्द्ध है. परिधानों में खुलापन आया है, तो निश्चय ही धीरे-धीरे देह और दिमाग दोनों का भी खुलापन आ जायेगा और जब दोनों के खुलेपन बराबर हो जाएंगे, तब उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे यहां जल्द ही कस्बों में भी क्लासमेट्स सेक्समेट्स हो सकने की सामाजिक वैधता पा लेंगे.  बस थोड़े-से धैर्य की जरूरत है. अभी तो हमारे भीतर उन्होने पश्चिम के सांस्कृतिक फूहड़पन (यूरो- अमेरिकी ट्रेश) के लिए केवल वस्त्रों के क्षेत्र में ही जबरदस्त भूख बढ़ाई है.

मुलत: 31 जुलाई 2011 को प्रकाशित

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