मुंबई के परेल पुल पर हुआ हादसा छाई रही राजनीति?

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मुंबई के लोगों को लोकल ट्रेन पर जितना भरोसा रहा है, उतना शायद ही किसी व्यवस्था पर। लेकिन पिछली 29 सितंबर को अचानक यह भरोसा हट गया जब 23 लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी और 30 बुरी तरह जख्मी हो गए। एलफिंस्टन रोड़ और परेल को जोडऩे वाले संकरे उडऩ पुल पर सुबह दस बजे के आसपास भारी बारिश से बचने के लिए जमा हुए लोगों में भगदड़ इस शोर पर मचा कि पुल गिर गया। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे और उन्होंने एक-दूसरे को कुचल डाला। एलफिंस्टन रोड़ और परेल को जोडऩे वाला यह पुल पुराना है और संकरा है। संकरे पुल पर जमा लोगों की संख्या इतनी ज्य़ादा थी कि लोगों को हिलने की जगह भी नहीं मिल रही थी।

परेल की इस भगदड़ में मरने वालों और घायलों की सूची पर नज़र डालने से पता चलता है कि ये सामान्य लोग थे, मध्य और निम्न मध्य वर्ग के, जिनके लिए लोकल ट्रेन एक ऐसी जीवन रेखा है जिसके बगैर उनकी जि़ंदगी बेमानी है। यह उन्हें काम पर पहुंचाती हैं, रिश्तेदारों से मिलाती हैं और प्रेम तथा सहयोग करना सिखाती है। इस जीवन रेखा ने मौत की रेखा का रूप कैसे धारण कर लिया इसकी पड़ताल हमें शहरीकरण की दुनिया के भयावह सच की ओर ले जाती है।

परेल भगदड़ को लेकर खबरों पर नज़र डालें तो इससे अंदाजा होता है कि इस सच पर बहुत कम लोगों ने उंगली रखी है। हादसे से संबंधित सारी बहस को पुल के जर्जर होने और इसके संकरेपन पर केंद्रित कर दिया गया। यह एक अधूरा सच है। इस सच के साथ मुंबई के वर्तमान सच को जोड़े बगैर हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। इस महानगर की जि़ंदगी में अलगाव और निराशा की जो बीमारी घुस आई है उसे समझे बिना हम इस हादसे के पीछे के मनोविज्ञान को नहीं देख सकते। इसके साथ ही, लोकल रेल की व्यवस्था में आए परिवर्तनों ने इसे यहां की ज़रूरतों को पूरा करने में अक्षम बना दिया है। रेलवे मंत्रालय अपने बाकी हिस्सों की तरह इसे भी बदल देना चाहता है।

रेलवे का सारा ध्यान इस पर लगा हुआ है कि इस सस्ती सेवा को कैसे महंगी सेवा में कैसे बदला जाए। रेलवे मंत्रालय हर साल यह बहस करता है कि मुंबई उपनगरीय रेल सेवा में किराए का ढ़ांचा क्या होना चाहिए। जहां तक परेल-एलफिंस्टन रोड़ पुल पर मची भगदड़ का सवाल है तो इस इलाके में आए भौगोलिक परिवर्तनों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। लोअर, परेल, एलफिंस्टन रोड़ लालबाग का जो इलाका पहले मज़दूरों का इलाका हुआ करता था, आज गगनचुंबी इमारतों भरा इलाका है और इसमें चालों के रूप में गरीबी के द्वीप हैं। यही वे इलाके हैं जिसमें मुंबई के साथीपन और दूसरों के लिए अपनी जान देने के सिनेमाई मिथक ने असली जि़ंदगी में भी वास्तविक रूप लिया। ख्वाजा अहमद अब्बास की कलम से निकल कर यह राजकपूर की फिल्मों में दिखाई देता है। फटे-चीथड़े लिबासों मेें लिपटा व्यक्ति जो मूल्यों पर अडिग है और संवेदनाओं से लबालब। वह मानवीय कसौटियों पर सदैव खरा उतरता है। परेल-लालबाग और एलफिंस्टन रोड़ वाली वह मुंबई धीरे-धीरे खत्म हो गई और उसकी जगह 21 वीं सदी की मुंबई ने ले ली है जहां आदमी सिर्फ अपने लिए जीता है। परेल-एलफिंस्टन रोड़ पुल की भगदड़ इस नए ज़माने की मुंबई की कहानी कहती है।

अब भगदड़ से जुड़ी राजनीति पर ज़रा अपनी नज़र दौड़ा लें। केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने आनन-फानन में सुरक्षा पर उच्चस्तरीय एक बैठक बुलाई और अनगिनत फैसले ले लिए। इनमें एक फैसला यह लिया गया कि पैदल पार करने वाले पुलों और प्लेटफार्म तक पहुंचने के रास्तों को सुरक्षा की श्रेणी में रखा जाए। विभाग ने यह भी तय किया कि उन स्थानों पर जहां लोगों की ज्य़ादा संख्या आती-जाती है, वहां एस्केलेटर (स्वचालित सीढिय़ां) लगाई जाएं। गोयल का सबसे दिलचस्प फैसला यह है कि मंत्रालय के 200 अधिकारियों को अपने प्लान से हटा कर क्षेत्रों में काम करने के लिए भेज दिया जाए और देश के 75 स्टेशनों पर ”मेधावी पदाधिकारीÓÓ तैनात किए जाएं। गोयल ने यह भी कह डाला कि अभी तक पुलों की मरम्मत को प्राथमिकता का काम नहीं माना जाता था। यानि उन्होंने पहले के मंत्रियों को कटघरे में खड़ा कर दिया।

किसी हादसे को राजनीति में बदलने का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता है। गोयल ने इसके जरिए रेलवे में बड़े पैमाने पर स्थानांतरण का इंतजाम कर लिया जो भाजपा हर विभाग में कर रही हैं ताकि नौकरशाही मेें अपने लोगों को बेहतर जगह दी जा सके।

किसी हादसे को राजनीति में बदलने का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता है। गोयल ने इसके जरिए रेलवे में बड़े पैमाने पर स्थानांतरण का इंतजाम कर लिया जो भाजपा हर विभाग में कर रही है ताकि नौकरशाही में अपने लोगों को बेहतर जगह दी जा सके। इससे साबित होता है कि गोयल ने भगवाकरण के एजेंडो को आगे बढ़ाने के लिए इस हादसे का भी इस्तेमाल कर लिया।

हादसे पर राजनीति और आम लोगों के बीच एकता के अभाव का फायदा उठाने का एक और नमूना पेश किया है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने। उन्होंने एक मोर्चा निकाला और घोषणा कर दी कि अगर पुलों पर फुटकर सामान बेचने वाले फेरीवालों और स्टेशन के रास्ते पर सड़क की दुकान लगाने वालों को नहीं भगाया गया तो उनके कार्यकर्ता इनके खिलाफ सीधी कारवाई करेंगे यानि उन्हें खुद भगाएंगे। शिवसेना की जगह लेने की कोशिश में लगी मनसे ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती है जो भारतीयों और गैर-महाराष्ट्रियन समुदाय के खिलाफ हो। मुंबई के फुटपाथ पर छोटे-छोटे सामान तथा खाने-पीने के चीजें बेचने वालों की बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश के लोगों की है। परेल-पुल के हादसे पर राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है?

इससे भी हैरतअंगेज बात यह है कि इस हादसे के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है न रेलवे पुलिस बल या शासकीय रेलवे पुलिस को। यानि इसके दोषी वे लोग ही हैं जो कुचले गए या जिन्होंने अपनी जान बचाने की कोशिश में दूसरों को कुचल डाला। इस तरह का तर्क पहली बार सुनाई दे रहा है। इसके पहले तैनात अधिकारियों या पुलिसकर्मियों को अवश्य दोषी माना जाता था। किसी प्लेटफार्म या पुल पर कैसे इतने लोग इकट्ठा हो गए और किसी अधिकारी ने इसकी क्यों चिंता नहीं की। उसने भीड़ को नियंत्रित करने का कोई कदम नहीं उठाया तो इसका दोष किस पर जाएगा? इसके पहले हुई ऐसी घटनाओं, दिल्ली और इलाहाबाद में रेलवे विभाग ने स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ कारवाई की है। जांच आयोग ने भी लोगों की जिम्मेदारी तय करने की कोशिश की है। सभी को जिम्मेदारी से मुक्त करने का अनोखा कदम उठाया गया। इससे भाजपा सरकार ने यह जता दिया किया है कि वह कड़े कदम उठाकर अधिकारियों या कर्मचारियों से तकरार मोल लेना नहीं चाहती है। यह एक सरकार के कमज़ोर होने के संकेत हैं।

जांच करने वालों ने एक कहानी प्रचारित की है जिसमें बताया गया है कि किसी फूल वालों ने कहा कि ”फूल गिर गयाÓÓ और लोगों ने इसे ”पुल गिर गयाÓÓ समझ लिया। यह किसी घायल ने बयान को आधार बनाकर फैलाया गया किस्सा है। प्रबंधन की भाषा बोलने वाले रेल मंत्री ने इस तरह के कुतर्क को कैसे और क्यों स्वीकार किया इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि सरकार के लिए इससे अच्छा क्या हो सकता है कि हादसे की वजह कोई अपूर्व चीज हो जाए। हालांकि जानमाल की सुरक्षा शासन की पहली जिम्मेदारी है, इस, मामूली बात को भी बताने की ज़रूरत है क्या?

परेल-पुल का हादसा जितना आम लोगों का लोकल ट्रेन सेवा पर उठता भरोसा है, उतना ही उनके अपने आत्मविश्वास में आई कमी है। भाजपा सांसद किरीट सोमैय्या ने वादा किया है कि हादसों की संख्या दो साल में आधी हो जाएगी। लेकिन मुंबई के लोग इस पर कितना भरोसा करेंगे जब लोग देखते हैं कि मुंबई में रोज़ ट्रेन से गिरकर या पटरी पार करते समय 9 से 10 लोग मरते हैं और रेलवे शायद ही इनमें कोई दखल देती है। इन हादसों के शिकार में से ज्य़ादातर की मौत समय फौरी चिकित्सकीय मदद नहीं मिलने और शरीर से ज्य़ादा खून बह जाने के कारण होती है। लोकल की सेवा को बेहतर बनाने और प्लेटफार्म पर बेहतर प्रबंधन का कभी इंतजाम नहीं किया जाता है।

जापान से बुलेट ट्रेन मंगाने में हज़ारों करोड़ का कारोबार शामिल है और इससे फायदा उठाने वालों की एक बड़ी संख्या है – उद्योगपति, कारोबारी, तथा राजनीतिज्ञ। लेकिन प्लेटफार्म के प्रबंधन से किसी को क्या हासिल हो सकता है। जापान से प्लेटफार्म-प्रबंधन की तकनीक सीखने का नाम कभी किसी सुरेश प्रभु या पीयूष गोयल नहीं लिया। भीड़ से भरी ट्रेनों में लोगों को चढ़ाने और हादसों आदि के लिए अलग से कर्मचारी तैनात होते हैं जिन्हें इस काम में महारत हासिल होती है।

रेल सुरक्षा पर परमाणु वैज्ञानिक डा. अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय कमेटी ने पांच साल में एक लाख करोड़ रु पए का खर्च तय किया था जिससे पटरियों को ठीक करने, सिग्नलिंग, ओवरब्रिज जैसी चीजों के अलावा सुरक्षा से जुड़े खाली पदों पर भर्ती की सिफारिश भी की गई थी। इसने सुरक्षा फंड के लिए धन जमा करने के लिए सवारियों पर ‘लेवीÓ लगाने की सलाह दी थी। ऐसा ही एक सुरक्षा फंड नीतिश कुमार ने बनाया था। उससे बहुत सारे काम भी तब हुए थे।

लेकिन सुरेश प्रभु ने अपना सारा ध्यान प्रचार और देशी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने में लगाया। उन्होंने ‘कायाकल्पÓ नाम से उद्योगपति रतन टाटा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। टाटा ने उसका पहला एजेंडा सुरक्षा तय किया था। उस कमेटी की कुछ बैठकें हुई, लेकिन प्रभु की रु चि उसमें खत्म हो गई क्योंकि सुरक्षा जैसे सवालों में उनकी कोई रु चि नहीं थी। उन्होंने यात्री भाड़े को भी बिना बजट-प्रावधानों के बढ़ाया, लेकिन उसे सुरक्षा पर खर्च करने की कोशिश नहीं की। अंत में, सुरक्षा में लापरवाही चलते उन्हें पद छोडऩा पड़ा।

परेल-हादसा मुंबई के घटते आत्म विश्वास को सामने लाना वाला है। इसे वापस लाने का काम भारतीय रेलवे के बूते का नहीं है क्योंकि वह एक खुद बड़े संकट का सामना कर रही है। रेल को भरोसेमंद बनाने के लिए एक बड़े आंदोलन की ज़रूरत है।