मंजिल से आगे का रास्ता

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फोटो: विकास कुमार
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संभवतः देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले कुछ लोग मिलकर कोई पार्टी बनाएं और साल भर के भीतर ही वह पार्टी चुनाव लड़कर सरकार भी बना ले. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने ऐसा कर दिखाया है. इस लिहाज से कह सकते हैं कि 26 दिसंबर, 2013 को अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रीय राजधानी के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेना ऐतिहासिक है.

आज अरविंद केजरीवाल जहां खड़े हैं, वहां पहुंचने के लिए उन्होंने लंबी दूरी तय की है. सूचना के अधिकार से लेकर जनलोकपाल और इसके बीच न जाने कितने अन्य मुद्दों को समय-समय पर उठाते रहने, उन्हें जनता के बीच सही ढंग से पहुंचाते रहने और फिर इसे एक सफल अभियान के रूप में तब्दील कर देने से जो चीज निकलती है, वह है आम आदमी पार्टी की सरकार. लेकिन इस सरकार के गठन ने केजरीवाल को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां उनके पास पाने के लिए बहुत कुछ है और जनता के पास खोने के लिए बहुत कुछ है.

अरविंद केजरीवाल जिस तरह के वादों के सहारे सत्ता तक पहुंचे हैं, अगर वे उन्हें पूरा करने में कामयाब हो जाते हैं तो वे इतिहास पुरूष बन जाएंगे. उनके सामने खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने का अवसर है, जिनका इस समय पूरे देश में घोर अभाव हो चला है. वे अमर हो सकते हैं, अगर उन्होंने सिर्फ उन्हीं बातों को लागू कर दिया जिनका जिक्र उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया है. यकीन मानिए, अगर वे ऐसा कर दिखाते हैं तो पूरे विश्व राजनीति में उन्हें एक अलग स्थान मिलेगा.

लेकिन संकट यही है. अगर आप आम आदमी पार्टी के घोषणा पत्र को देखेंगे तो पता चलेगा कि जो वादे उन्होंने किए हैं, उन्हें पूरा करना आसान नहीं है. यह भी कहा जा सकता है कि ये वादे यह मानकर किए गए थे कि वे सरकार नहीं बना पाएंगे. लेकिन अब उन्हें सरकार बनानी पड़ रही है. अब उनके काम का आकलन उनके घोषणा पत्र में दर्ज हर्फों के चश्मे से होगा, अब उन्हें हर पल परीक्षा से गुजरना होगा, उनके हर कदम पर टीका-टिप्पणी होगी.

अपने वादों को पूरा करने के लि केजरीवाल को बेहद ताकतवर कॉरपोरेट घरानों से टकराना पड़ेगा. बिजली की कीमतों की कमी के मामले में उनका सामना रिलायंस और टाटा जैसे औद्योगिक साम्राज्यों से होगा. इन्हीं दोनों कंपनियों के हाथ में दिल्ली की बिजली वितरण व्यवस्था है. हर रोज 700 लीटर पानी मुफ्त देना भी ऐसा ही दुश्कर लक्ष्य है क्योंकि दिल्ली में पानी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और हरियाणा की कृपा पर निर्भर है. इन हालात का सामना अरविंद कैसे करते हैं इस पर सबकी निगाहें ररहेंगी. अभी तक अरविंद केजरीवाल ने अपनी सूझबूझ से सबको चैंकाया है. अगर इन मसलों पर भी वे कोई चैंकाने वाला समाधान ले आएं तो वे भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ेंगे.

कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की वजह से अरविंद केजरीवाल पर अवसरवाद का आरोप लग रहा है. कहा जा रहा है कि उन्हें लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया था और अब वे उसके साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं. कुछ लोग इसे सुविधा की राजनीति कह रहे हैं. कुछ उसी तरह से जिस कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा जैसी पार्टियां लंबे समय से करती आ रही हैं. अरविंद पर इस तरह के आरोप लगने स्वाभाविक हैं. अरविंद केजरीवाल इन दलों पर इसी तरह के आरोप लगाते आए हैं . अरविंद पर अवसरवाद के आरोप इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि चुनाव के दौरान उन्होंने बार-बार कहा था कि किसी भी कीमत पर वे भाजपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. लेकिन अब उनकी पार्टी कांग्रेस के बाहरी सहयोग से सरकार बनाने जा रही है. हालांकि इस मुकाम तक पहुंचने के दौरान घटी घटनाओं को समझना भी जरूरी है. दिल्ली के नतीजे किसी के पक्ष में नहीं थे. विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी इसके बावजूद उसने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया. कांग्रेस ने आप को समर्थन की पेशकश की. इसके बाद भाजपा और कांग्रेस ने एक सुर से अरविंद की इस बात के लिए आलोचना शुरू कर दी कि वे सरकार बनाने से पीछे भाग रहे हैं. अरविंद ने इस आरोप का हल जनमत संग्रह के रूप में निकाला. जनता के साथ तमाम तरीकों से संवद के बाद आप ने पाया कि जनता कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के पक्ष में थी. बावजूद इसके इतना तो तय है कि अरविंद ने अपने मौलिक सिद्धांत से समझौता कर लिया है.

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