भारत में आहार की नीति और राजनीति | Tehelka Hindi

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भारत में आहार की नीति और राजनीति

आजकल के हालात कुछ ऐसे ही संकेत देते हैं क्योंकि झारखंड में अभी हाल में भूख से हुई मौतों का कोई असर न तो अफसरशाही पर है, न नीति निर्माताओं पर और न राजनीतिज्ञों पर। इसकी वजह क्या है इसकी छानबीन कर रही हैं स्वाति सक्सेना

2017-11-30 , Issue 22 Volume 9

poverty

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दा
- कवि दुष्यंत कुमार

आहार और भूख महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनकी विकसित हो रहे देश में चर्चा होती है। 70 साल से आज़ाद देश भारत की क्या स्थिति है उसे यदि ‘ग्लोबल हंगर इंडैक्सÓ में देखे तो निराशा होती है। ‘इंटरनेशनल पालिसी रिसर्च इंस्टीच्यूटÓ की जारी रपट के अनुसार 119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है। ‘ग्लोबल हंगर इंडैक्सÓ ने इस स्थिति के लिए देश में कुपोषण, शिशु मौतों, शिशु विकास में रुकावट आदि को दोषी माना है। इन सब क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन काफी खराब है। इन तमाम मोर्चों पर भारत का स्तर आबादी में ज्य़ादा ऊंचा नही बढ़ा। खुद को ताकतवर और विकसित कहने वाला यह देश आज ज्य़ादातर अफ्रीकी देशों कई मध्यपूर्व राष्ट्रों से भी नीचे और एशिया में सबसे खराब पाकिस्तान और अफगानिस्तान से थोड़ा ऊपर है।
इसके बाद ही खबर आई कि तीन-चार दिनों की भूखी ग्यारह साल की संतोषी कुमारी की मौत भूख से हो गई है। जो ‘भात-भातÓ कहती हुई चल बसी। इसके परिवार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए राशन नहीं मिल रहा था। क्योंकि इनका आधार कार्ड राशनकार्ड से जुडा़ नहीं था। इसके बाद ही एक और बैजनाथ रविदास रिक्शा चालक की मौत भूख से हो गई। उसके पास न तो राशन कार्ड था और न आधार कार्ड।
इन मौतों से आंकड़ें ज़रूर बनते हैं ये मन को छूने वाले और दर्दनाक हैं। इन दोनों ही मामलों में से यह ज़रूर साबित हुआ गड़बड़ी पूरी प्रणाली में ही है। जिस प्रणाली से यह पूरी नाकामी उजागर हुई उससे उम्मीद थी कि इससे लोगों की मदद होगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
राशन कार्ड को आधार से जोडऩा, फिर राशन की दुकानों से राशन देना काम की दुहरी प्रक्रिया है। इसमें पहले कार्ड को आधार से जोड़ा जाता है फिर राशन की दुकानों से राशन पाने वाले इसकी तसदीक करते हैं। हालांकि लोगों की शिकायत है कि बहुधा स्कैनिंग मशीनें और कंप्यूटर नेटवर्क, बिजली न होने से काम ही नहीं करते। रविदास के परिवार का आरोप है कि कई बार बाबुओं, अधिकारियों के पास गुहार लगाने पर भी राशन कार्ड जारी नहीं हुए क्योंकि बिचौलियों ने बीच में अडंग़ा लगा दिया था।
भारत ने एक लंबे अर्से से गरीबी की माप को कैलोरी की खपत से जोड़ रखा है। गरीबी और विकास मापने का यह रवैया भी राजनीतिक है। दूसरे देशों में तो सरकारें गिर जाती हैं। भोजन के लिए दंगे और हिंसा व लूटपाट होने लगती है। ऐसा तब होता है जब समाज में भूख उस स्तर तक पहुंच जाती है जिस पर लोग बेताब हो उठते हैं।
इतिहास पलटें तो भारत में 1942-44 30वें और 40वें दशक में जो अकाल पड़ा उससे आज़ादी के संग्राम में लोगों की भागीदारी और बढ़ी।
लोगों ने यह माना कि आज़ाद देश में ऐसी
दुरावस्था नहीं होगी। अपना राज होगा। भूख के ही चलते फ्रांस, रूस और चीन में जनता ने आज़ादी के लिए क्रांति का सहारा लिया। उस समय एक मुहावरा चल निकला था जो एक राजा के वाक्य पर आधारित था कि ‘यदि लोगों को भूख लगी है तो उन्हें ब्रेड की जगह केक खाना चाहिएÓ। यही प्रतीक बना क्रांति का। भूखे लोगों में तनाव और भड़का और उन्होंने हिंसा का सहारा लेकर सत्ता उखाड़ फेंकी। बंदूकों, तोपों और सिपाहियों की संख्या पर गर्व करने वाले या तो मारे गए या फिर जेलों में पहुंच गए। पिछले कुछ दशकों से मध्यपूर्व में भी यही हाल है। आप याद कीजिए मिस्र में 1977 में कितना विशाल दंगा हुआ था रोटी के लिए। भोजन न मिलने की कई वजहें सरकार और उनके महकमे बताते हैं क्योंकि उनकी ही करतूतों के चलते किसान खेती से दूर हो जाते हैं। खेतों तक पानी न पहुंचने से फसलें नहीं होती। फसलों का सही दाम नहीं मिलता। संसाधन सूखने लगते हैं किसान हताश होता है। इन तमाम बातों के लिए अफसरशाही, भ्रष्टाचार और सरकारें ही होती हैं।
इसलिए सरकारें ऐसी रणनीतियां और नीतियां बनाती है जिससे भूख पर काबू पाया जाए और खाद्यान्न की सप्लाई लाइन बाधित नहीं हो और कीमतें न बढ़ें। खाद्यान्न की बेहतर वितरण की व्यवस्था बनी रहे। कीमतों में अनुदान की
व्यवस्था रखी जाए। यह सब वे ज़रूरी बातें हैं जिन पर विभिन्न देशों की सरकारें अपने-अपने देशों के नागारिकों की सुविधा के लिए ध्यान देती हैं। देशों के बीच खाद्यान्न राजनयिक संवादों का आधार भी होते हैं। खाद्यान्न को सहायता बतौर एक देश से दूसरे देश को देने की परंपरा भी है। बहुधा किसी भी प्राकृतिक विपदा या आपात स्थिति में ऐसा किया जाता है।
भोजन सुरक्षा के लिए भारत में कई कार्यक्रम चलते हैं। ‘नेशनल फूड सिक्यूरिटी एक्टÓ (एनएफएसए) 2013 काफी महत्वपूर्ण कानून है जिसके जरिए 80 करोड़ लोगों को सस्ती दरों पर अनाज मिलता है। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के साथ जुड़ा है। जिसके चलते चावल,चीनी,मिट्टी का तेल और दूसरी ज़रूरी चीजों को राशन की दुकानों से वितरित किया जाता है। इसी के तहत दोपहर के भोजन की योजना भी जुड़ी हैं। यह स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए है। इसके तहत उन्हें पुष्ट आहार देने की बात है। इसके अलावा नेशनल फूड सिक्यूरिटी एक्ट के तहत विशेष व्यवस्था बेहद गरीब और गर्भवती महिलाओं के लिए पौष्टिक आहार की विशेष योजना है। ग्रामीण भारत में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े मामलों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इसे देखती हैं, और उपयुक्त व्यवस्था अमल में लाती हैं।
सरकार ने विभिन्न योजनाओं को आधार कार्ड से जोड़ दिया है इससे समस्याएं खड़ी हो गई हैं। आधार को राशनकार्ड से जोडऩे से समस्याएं बढ़ गई हैं। इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं होता। मशहूर अर्थशास्त्री जॉन ड्रेज ने अभी हाल एक साक्षात्कार में झारखंड में आधार पर आधारित बॉयोमेट्रिक अथेंटिकेशन (एबीबीए) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर कहा था कि इसका लाभ ज़रूरतमंद लोगों को नहीं मिल रहा है। जन वितरण प्रणाली के अफसर और बाबू प्रणाली की असुविधाओं को हल करने की बजाए नई से नई समस्याएं खड़ी कर रहे हैं जिसके चलते जन साधारण लोगों में जिन 10 फीसद लोगों के पास राशन कार्ड थे उन्हें भी राशन नहीं मिल पा रहा है और जिनके पास राशनकार्ड ही नहीं है वहां तो हालात और खराब हैं। राशन विक्रेता इस स्थिति का लाभ बाजार में उठा रहे हैं।
भूख के चलते झारखंड में हुई कुछ मौतें ही सामने आई हैं लेकिन यह तादाद वास्तव में कितनी है कोई नहीं जानता। लेकिन इसका असर प्रदेश की राजनीति में दिख सकता है। खबरों के अनुसार झारखंड सरकार ने तो आधार कार्ड को राशनकार्ड से जोडऩे की अनिवार्यता खत्म कर दी है। इस राज्य में शिशुओं और बच्चों में कुपोषण और स्वच्छ पेय जल का अभाव है और राज्य के बड़े हिस्से में बिजली भी नहीं है।
कुपोषित बच्चों के विकसित होने का मतलब होता है कि वे मेहनत का कोई काम नहीं कर पाते। खराब स्वास्थ्य का असर बच्चों के दिमाग पर भी पड़ता है। बच्चे स्कूल नहीं जाते, श्रमिक काम पर नहीं जाते। आहार की बजाए वे नशा आदि लेने लगते हैं। पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं चौपट हैं। इसलिए कोई इलाज भी संभव नहीं। एक देश जो पूरी दुनिया में खुद को आर्थिक तौर पर सुपरपावर कहलाना चाहता है उसे अपने झारखंड राज्य के गांव-गांव में बिखरे सभी नागरिकों के स्वास्थ्य की चिंता करनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुपोषण और भूख भोजन की नियमित उपलब्धता से दूर हो सकती है। राज्य को इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। राष्ट्र का स्वास्थ्य बनाने के लिए उसे ऐसी बहुउद्देशीय रणनीति बनानी चाहिए जिसमें जनता को साफ-सफाई मिले और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके। नियमित तौर पर उन्हें राशनकार्ड और बगैर राशन कार्ड भी खाद्यान्न मुहैया कराया जाए और उन परिवारों पर ध्यान दिया जाए जो बीमारियों के शिकार हैं।

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 9 Issue 22, Dated 30 November 2017)

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