दुराग्रह के दुश्चक्र में?

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हेमराज की लाश मिलने के बाद तलवार दंपति स्वाभाविक रूप से शक के घेरे में आ गया क्योंकि घर में जबरन घुसने का कोई संकेत नहीं था. तो धारणा यह बनी कि घर में चार लोग थे. दो की हत्या हो गई. बाहर से कोई आया नहीं तो जो दो लोग बचे उन्हें यह साबित करना होगा कि वे बेकसूर हैं.

लेकिन अगर उस रात घर में इन चार के अलावा भी कुछ लोग रहे हों जिन्हें घर में जबरन घुसने की जरूरत नहीं थी तो? सीबीआई अधिकारी अरुण कुमार की प्रेस कॉन्फ्रेंस के मुताबिक कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल ने नार्को टेस्ट में और सीबीआई के सामने पूछताछ में माना था कि उस रात हेमराज ने उन्हें बुलाया था और वे देर रात उसके कमरे में इकट्ठा हुए थे. कृष्णा (जिसकी हाल ही में तलवार दंपति से तकरार हुई थी) पहले आया और उसने शराब पी. उसके बाद राजकुमार और विजय मंडल आए और सबने शराब का सेवन किया. इसके बाद आरुषि की चर्चा हुई. ये लोग उसके कमरे में घुसे. आरुषि ने चिल्लाने की कोशिश की लेकिन उसका मुंह बंद कर दिया गया और उसके सिर पर किसी कठोर चीज से वार किया गया. इसके बाद उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश की गई जिसके चलते इन सबमें झगड़ा हुआ. झगड़े के बाद ये लोग छत पर गए और काफी संघर्ष के बाद हेमराज की हत्या कर दी गई. इसके बाद उन्होंने छत पर ताला लगाया, आरुषि के कमरे में वापस आए (शायद यह देखने के लिए कि वह जिंदा तो नहीं) और भाग गए.

नार्को टेस्ट और पुलिस को दिए गए बयान भले ही कानूनी रूप से सबूत न माने जाएं लेकिन इसका समर्थन करते दूसरे सबूत हैं जो तहकीकात की एक तार्किक दिशा बनाते हैं. जैसे हेमराज के कमरे में तीन बोतलें पाई गई थीं. एक स्प्राइट, दूसरी किंगफिशर बीयर और तीसरी सुला वाइन की. हेमराज खुद शराब नहीं पीता था. यह साफ तौर पर संकेत है कि उस रात उसके कमरे में दो या इससे ज्यादा लोग मौजूद थे. घर की चाबियां उसके पास रहती थीं और उसका खुद का कमरा घर में खुलता था. तो घर में बेरोक-टोक प्रवेश पूरी तरह से संभव था.

इन लोगों द्वारा बताया गया घटनाओं का क्रम आरुषि और हेमराज की शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्टों से भी मेल खाता था. रिपोर्टों के मुताबिक शायद आरुषि और हेमराज दोनों ही सिर पर हुए पहले वार से खत्म हो गए थे. उनका गला बाद में रेता गया. वैज्ञानिकों और दिल्ली स्थित एम्स के डॉक्टरों से बनी सात सदस्यीय समिति जिसने अपराध स्थल का विश्लेषण किया था, उसका भी यह निष्कर्ष था कि आरुषि को उसके बेड पर ही मारा गया जबकि हेमराज की हत्या छत पर की गई.

इसके अलावा कृष्णा की स्वीकारोक्ति और नार्को टेस्ट के बाद उसके कमरे से एक खुखरी बरामद की गई. उस पर खून के बारीक धब्बे जैसे कुछ निशान भी थे. 31 अगस्त, 2008 को पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने कहा कि निश्चित रूप से यह वह हथियार हो सकता है जिससे हमला करके घातक चोट पहुंचाई गई. उनके मुताबिक यह भी संभव था कि गर्दन पर मिले घाव भी खुखरी की धार से हुए हों और यह भी हो सकता है कि ऐसा किसी और ज्यादा धारदार हथियार से किया गया हो. एम्स की समिति ने भी इस बात का समर्थन किया. सीबीआई सूत्र बताते हैं कि राजकुमार ने एक दूसरी खुखरी का भी जिक्र किया था जो उसने नोएडा के एक मॉल के पास फेंक दी थी. हालांकि इस दिशा में कभी आगे नहीं बढ़ा गया.

नार्को टेस्ट के दौरान तीनों ने यह भी बताया कि उस समय हेमराज के कमरे में मौजूद टीवी सेट पर चल रहे नेपाली भाषा के चैनल पर कौन-से गाने चल रहे थे. सीबीआई ने यह चैनल चलाने वालीं पत्रकार और निर्माता नलिनी सिंह सहित अन्य स्रोतों से इसकी पुष्टि के लिए पूछताछ की और पाया कि चैनल पर उस समय वही गाने चल रहे थे.

हालांकि सबसे अहम सबूत तो वह तकिया था जो 14 जून, 2008 को कृष्णा के कमरे से बरामद किया गया. बैंगनी रंग के इस तकिये पर खून जैसे कुछ धब्बे थे. इस अहम सबूत के साथ जो हुआ वह न सिर्फ डरावना है बल्कि इस मामले की सुनवाई का एक और स्याह पहलू भी है. यह हमारी जांच और फॉरेंसिक संस्थाओं की कुव्यवस्था तो दिखाता ही है, साथ यह भी बताता है कि वे किसी को फंसाने या अपनी गर्दन बचाने के लिए किस हद तक जा सकती हैं.

[box]सामान्य स्थिति में इस रिपोर्ट से हंगामा मच जाना चाहिए था. यह इस केस के रहस्य पर से पर्दा उठाती दिखती थी[/box]

लेकिन पहले यह जानते हैं कि खुखरी के साथ क्या हुआ. 17 जून, 2008 को दिल्ली स्थित सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (सीएफएसएल) में सेरोलॉजिस्ट एसके सिंघला ने कहा कि वे खुखरी पर मानव रक्त की पहचान करने में असमर्थ रहे हैं. इसके बाद यह हथियार सीएफएसएल में डीएनए विशेषज्ञ बीके महापात्र के पास भेजा गया. महापात्र ने कहा कि वे इससे किसी भी डीएनए तक नहीं पहुंच सके. प्राथमिक रूप से इसी खुखरी को कत्ल का हथियार माना जा रहा था. इसके बावजूद सीबीआई ने इस सबूत को और भी पड़ताल के लिए हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग ऐंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) नहीं भेजा. सुनवाई के दौरान जब तलवार के वकील ने सिंघला से खुखरी पर मौजूद खून के निशानों पर सवाल किए तो सिंघला ने फिर कहा कि यह इंसान का खून नहीं था. जब उनसे और सवाल किए गए तो उन्होंने कहा कि यह मुर्गे, कुत्ते, गाय या भैंस का भी खून नहीं था. वे खून के धब्बों का कोई और संभावित स्रोत भी नहीं बता पाए और खुखरी की कहानी तब से वहीं पर अटकी पड़ी है.

अब यह जानते हैं कि बैंगनी रंग के उस तकिये के कवर का क्या हुआ. यह बेहद डरावना है. कृष्णा के कमरे से बरामद यह कवर सीडीएफडी, हैदराबाद भेजा गया. छह नवंबर, 2008 को वहां से जो रिपोर्ट आई उसमें एक विस्फोटक जानकारी थी. इस पर लगा खून हेमराज के खून से मेल खाता था.

सामान्य स्थिति में इस रिपोर्ट से हंगामा मच जाना चाहिए था. यह इस केस के रहस्य पर से पर्दा उठाती दिखती थी. तार्किक रूप से देखें तो कृष्णा के कमरे से बरामद इस कवर पर हेमराज का खून होने का एक ही मतलब था और वह यह था कि कृष्णा उस रात हेमराज के कमरे में मौजूद था. इसे खुखरी की बरामदगी, नार्को टेस्ट की स्वीकारोक्तियों,  हेमराज के कमरे में मिली शराब की बोतलों के साथ जोड़कर देखें तो निश्चित रूप से मामला कुछ आकार लेता सा लगता है.

लेकिन सावधानी को हैरतअंगेज रूप से ताक पर रखते हुए करीब ढाई साल तक सीबीआई की इस रिपोर्ट पर नजर नहीं गई. तब भी जब इस केस का जिम्मा अरुण कुमार वाली टीम के पास था. हैरानी की बात यह भी है कि जब सुनवाई के दौरान सितंबर, 2008 से लेकर मार्च, 2009 तक जांच अधिकारी रहे एमएस फर्त्याल से इस बारे में सवाल किया गया तो उनका कहना था, ‘मैंने यह रिपोर्ट नहीं देखी क्योंकि मैं जांच में व्यस्त था.’

इस जानकारी के साथ कि कृष्णा के तकिये का अब तक पता नहीं चला है, दिसंबर, 2010 में सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. इस तरह उसने कृष्णा और अन्य को दोषमुक्ति दे दी. उसकी यह चूक तो बुरी थी ही, लेकिन जब उसे इस अहम सबूत के बारे में पता भी चला तो भी उसकी जो प्रतिक्रिया थी उसे सुनकर कोई भी सिहर जाए.

लेकिन उससे पहले क्लोजर रिपोर्ट अपनी कहानी कहती है. एजीएल कौल के नेतृत्व में सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कई कारणों का जिक्र किया जिनके चलते कृष्णा आदि को इस मामले का संदिग्ध नहीं माना जा सकता. कृष्णा और अन्य को भी दोषी साबित न होने तक निर्दोष कहलाने का अधिकार है. लेकिन अक्सर गंभीर तर्कों के खिलाफ तलवार दंपति के पीछे पड़ जाने वाली सीबीआई क्लोजर रिपोर्ट में कृष्णा और अन्य की दोषमुक्ति कितनी आसानी से मनवाना चाहती है, यह देखना दिलचस्प हैः

सीबीआई की दलील नौकरों के नार्को टेस्ट अविश्वसनीय थे

जवाबी दलील– रिपोर्ट बता ही चुकी है कि क्यों उन्हें भी उतना ही विश्वसनीय माना जा सकता था.

सीबीआई की दलील कृष्णा और राजकुमार की नार्को रिपोर्ट में जिक्र किया गया था कि आरुषि का मोबाइल नेपाल भेजा गया था जबकि हेमराज का फोन तोड़ दिया गया था. लेकिन ये बातें सही नहीं पाई गईं क्योंकि आरुषि का मोबाइल नोएडा से बरामद हुआ जबकि हेमराज का फोन पंजाब में सक्रिय था.

जवाबी दलील यह हैरत की बात है कि दो इतने अहम सबूतों की सीबीआई ने पूरी तरह से जांच नहीं की है. क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान अभियोजन पक्ष के एक गवाह और टाटा टेल्कॉम से जुड़े एमएन विजयन का कहना था कि उन्हें याद नहीं कि सीबीआई द्वारा कभी हेमराज का नंबर निगरानी पर लगाया भी गया था. अगर यह सही है तो जांच अधिकारी एजीएल कौल को कैसे पता चला कि यह फोन पंजाब में इस्तेमाल किया जा रहा था? अगर यह सही है भी तो इस बात की जांच क्यों नहीं की गई कि उस फोन को वहां कौन इस्तेमाल कर रहा है?

यही बात आरुषि के फोन के बारे में कही जा सकती है. कुसुम नाम की एक घरेलू नौकरानी का दावा था कि यह फोन उसे फुटपाथ पर पड़ा मिला जिसे उसने अपने एक रिश्तेदार रामभूल को दे दिया. कौल के जांच का जिम्मा संभालने के बाद ही सीबीआई को यह फोन मिला. कौल का दावा है कि फोन के डाटा कार्ड की मेमोरी फॉर्मैट कर दी गई और वे इसका आरोप तलवार दंपति पर लगाते हैं. हालांकि उन्होंने रामभूल को कभी अदालत में पेश नहीं किया. कौल ने यह भी माना कि उन्होंने उस पुलिस अधिकारी से कोई बयान नहीं लिया था जिसने यह फोन उन्हें दिया था. वे यह भी नहीं बता पाए कि अपराध के बाद आरुषि का फोन पहली बार कब और कहां इस्तेमाल हुआ.

अपराध की अगली सुबह कृष्णा को गैराज के कमरे में उसके परिवार के साथ पाया गया, इसलिए वह संदिग्ध नहीं हो सकता. उसके परिवार का कहना है कि वह पूरी रात उनके साथ ही था. न तो उसके पास कोई फोन आया और न ही उस दिन किसी अन्य नौकर ने उससे संपर्क किया.

जवाबी दलील– केवल घर पर होने से ही यह तय नहीं हो जाता है कि वह संदिग्ध नहीं हो सकता. दिल्ली के कुख्यात गैंगरेप मामले में भी कई संदिग्धों को उनके घरों से गिरफ्तार किया गया. परिवार का यह दावा जिसमें कहा गया है कि कृष्णा सारी रात घर पर ही था, उसके बचाव की कोशिश भी हो सकता है. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि घटना के दिन उसकी फोन पर किसी से बात नहीं हुई. दरअसल तलवार दंपति ने अपनी हालिया याचिका में यह अनुरोध भी किया है कि उन्हें नौकरों के उस दिन के कॉल रिकॉर्ड मुहैया कराए जाएं.

सीबीआई की दलील नौकरों में इतना  ‘साहस’ नहीं हो सकता है कि वे उस समय घर में घुसें जबकि तलवार दंपति घर पर मौजूद हों.

जवाबी दलील अजीब बात है. एक तरफ सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा था कि हेमराज ने आरुषि की सहमति से उसके साथ तब यौन संबंध बनाए जबकि ठीक बगल के कमरे में उसके मां-बाप सो रहे थे. दूसरी तरफ वह कह रही है कि नौकरों में इतना साहस नहीं था कि तलवार दंपति की मौजूदगी में वे हेमराज के कमरे में भी एकत्रित हो पाते.

सीबीआई की दलील राजकुमार प्रफुल्ल दुर्रानी के साथ उनकी पत्नी अनीता को लेने रेलवे स्टेशन गया हुआ था. वे रात तकरीबन 10.30 बजे घर पहुंचे जिसके बाद राजकुमार ने अनीता के लिए खाना पकाया. अनीता ने रात तकरीबन 12 बजे खाना खाया. करीब साढ़े बारह बजे दुर्रानी दंपति सोने चला गया. दुर्रानी के घर से तलवार के घर तक साइकिल से जाने में करीब 20 मिनट लगते हैं. सीबीआई का कहना है कि ऐसे में राजकुमार का घटना के वक्त तक तलवार दंपति के घर पहुंच पाना असंभव है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक आरुषि की हत्या रात 12 से एक बजे के बीच हुई. डॉ दुर्रानी ने भी अपना घर भीतर से बंद कर दिया था, इसलिए राजकुमार के लिए बाहर निकल पाना आसान नहीं था.

जवाबी दलील इस दलील में उस शाम घटी हर घटना को घड़ी की सुइयों के सहारे आंका गया है. इस मामले में फोरेंसिक्स की हालत जितनी खस्ता रही है उसके आधार पर यह कल्पना करना गलत नहीं होगा कि आरुषि की हत्या रात एक बजे के कुछ देर बाद भी की गई हो सकती है या फिर दुर्रानी परिवार के आने-खाने और सोने को लेकर सीबीआई ने जिस समय का अनुमान जताया है उसमें कुछ हेरफेर संभव है. राजकुमार के पास घर की चाबी थी, इसलिए वह दुर्रानी दंपति के सोने के बाद घर से बाहर जा सकता था.

जब मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने जांच का आदेश दिया था तब नूपुर तलवार को अचानक राजेश तलवार के साथ सहअभियुक्त बना दिया गया. फरवरी, 2011 में नूपुर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी. अभी यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि तलवार दंपति को छह नवंबर, 2008 की रिपोर्ट केस की सामग्री के रूप में दी गई. इसमें कृष्णा के तकिये पर हेमराज के खून के निशान मिलने की सनसनीखेज जानकारी थी. इसे पढ़कर नूपुर ने अनुपूरक याचिका दायर करते हुए दलील दी कि यह नया प्रमाण स्पष्ट संकेत करता है कि अपराध में कोई अन्य व्यक्ति शरीक था, ऐसे में मामले की नए सिरे से जांच की जाए.

सीबीआई अगर निष्पक्ष थी तो उसे नए और मजबूत सबूतों का स्वागत करना चाहिए था. इसके बजाय 8 मार्च, 2011 को जांच अधिकारी एजीएल कौल ने उच्च न्यायालय में कहा कि कृष्णा के तकिये के बारे में जो तथ्य दिए गए हैं वे दरअसल हैदराबाद के सीडीएफडी विशेषज्ञ द्वारा की गई ‘टाइपिंग की त्रुटि’ थी. उनके मुताबिक हेमराज के तकिये और कृष्णा के तकिये का ब्योरा आपस में बदल गया था. 18 मार्च को उच्च न्यायालय ने नूपुर की याचिका खारिज कर दी.

कोई भी यदि छह नवंबर की रिपोर्ट पढे़ तो उसे पता चलेगा कि कृष्णा के तकिये के बारे में लिखे विवरण में ‘टाइपिंग की गलती’ की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है. तकिये का विवरण इस रिपोर्ट में लगातार कई पृष्ठों में आता है. हर बार इसका जिक्र सबूत संख्या की तरह किया गया है और उसके आगे कोष्ठक में दर्ज है कि यह बैंगनी कवर वाला तकिया है. इस बात पर कोई असहमति नहीं है कि बैंगनी तकिया कृष्णा का है. इसे कौल भी मानते हैं. इसके बाद भी सबसे विचित्र बात है कि कौल के मुताबिक विशेषज्ञ जब यह कह रहे थे कि हेमराज का खून कृष्णा के तकिये के कवर पर पाया गया है तब असल में वे हेमराज के तकिये का जिक्र कर रहे थे.

एक बार के लिए हम यह मान लेते हैं कि कौल की बात सही है. पर एक अनुत्तरित सवाल यह है कि कैसे सिर्फ रिपोर्ट पढ़कर और बिना सीडीएफडी अधिकारियों से बात किए कौल रिपोर्ट में ‘टाइपिंग की गलती’ वाले निष्कर्ष पर पहुंच गए? क्या इसलिए कि रिपोर्ट को सही मानने पर तलवार दंपति को हत्यारा मानने वाली उनकी धारणा गलत साबित हो जाती. सीडीएफडी विशेषज्ञ एसपीआर प्रसाद से जिरह के दौरान मिली जानकारी साफ तौर पर कौल के दुराग्रह को उजागर करती है. प्रसाद के मुताबिक सीडीएफडी को इस बाबत कौल का एक पत्र 17 मार्च को मिला था. यानी उस तारीख के ठीक दस दिन बाद जब वे उच्च न्यायालय में ‘टाइपिंग की गलती’ वाला तर्क दे चुके थे. पत्र की भाषा भी अपने आप में संदेह पैदा करती है. प्रसाद के मुताबिक कौल ने पत्र में लिखा था कि तकिये के विवरण में कुछ गलती प्रतीत होती है इसलिए सीडीएफडी अपने दस्तावेजों में जांच करे कि क्या ऐसी गलती है.

प्रसाद यह भी मानते हैं कि कौल का पत्र मिलने के ढाई साल पहले तक सीडीएफडी में किसी को पता नहीं था कि इस तरह की कोई गलती है. उन्होंने न्यायालय में एक और चौंकाने वाली बात मानी. जब प्रसाद ने सीबीआई को तकियों के कवर दिए थे तो उन पर सीडीएफडी की मोहर थी और वे सीलबंद थे. लेकिन जब वे वापस किए गए तब सील टूटी हुई थी. प्रसाद को नहीं पता कि सील कब व क्यों तोड़ी गई और यह काम किसका था. कौल के पत्र के जवाब में 28 मार्च, 2011 को सीडीएफडी ने सीबीआई को जवाबी पत्र लिखा था. इसमें कहा गया था कि विवरण में टाइपिंग संबंधी गलती की गई है.

पत्र मिलने के बाद कौल ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र के साथ तकियों के कवर के ऐसे फोटो जमा किए थे जिन पर इस तरह के लेबल लगे थे जिनसे सीबीआई का  पक्ष मजबूत होता था. यहां तलवार दंपति की अपील फिर खारिज हो गई. इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि कौल ट्रायल कोर्ट में लगातार इन तस्वीरों को जमा करने और इन पर जिरह से बचते रहे. यहां तक कि जब बचाव पक्ष के वकील ने उनके सर्वोच्च न्यायालय में तस्वीरों के बारे में जमा किए गए शपथ पत्र की प्रमाणित कॉपी पेश की तो उन्होंने उसे पहचानने तक से इनकार कर दिया. ‘यह मेरा नहीं है’, कौल ने अपने शपथ पत्र से मुकरते हुए कहा, ‘मैं इस विषय पर कुछ नहीं कह सकता.’ इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ट्रायल जज ने भी इस एफिडेविट का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया.

इस दौरान ट्रायल कोर्ट में कौल ने कई बेतुके तर्क दिए. टाइपिंग की गलती के बारे में उनका कहना था कि 2009 में जैसे ही उन्हें इस मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया था, टाइपिंग की गलती वाली बात उनकी पकड़ में आ गई थी. मगर ढाई साल के दौरान उन्होंने इसका जिक्र न तो केस डायरी में किया न ही सीडीएफडी से इस बारे में जानकारी लेने की कोशिश की. उन्होंने अपने साथियों से भी इस बात की चर्चा करना जरूरी नहीं समझा और न ही क्लोजर रिपोर्ट में इसका जिक्र किया. इसकी वजह पूछने पर वे कहते हैं कि उन्होंने सोचा कि जब जरूरत होगी या कभी मामला ट्रायल के लिए आएगा तब वे विशेषज्ञों को इस बारे में बताएंगे.

रिपोर्ट के अगले भाग में: आरुषि मामले में जहां नौकरों की भूमिका की जांच में सीबीआई ने बेहद लापरवाही बरती वहीं तलवार दंपति की भूमिका की जांच और सुनवाई के दौरान वह संतुलन की हर सीमा लांघती नजर आई

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